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हिंसक उपद्रवियों पर कसता शिकंजा

सीएए के खिलाफ प्रदर्शनों के दौरान हिंसा के लिए पुलिस मुख्य रूप से पीएफआइ नामक संगठन को जिम्मेदार ठहरा रही .

ऐसे होगी पहचान? लखनऊ में हिंसा के लिए कथित जिम्मेदार लोगों की फोटो वाला एक पोस्टर, जिसे पुलिस ने लग ऐसे होगी पहचान? लखनऊ में हिंसा के लिए कथित जिम्मेदार लोगों की फोटो वाला एक पोस्टर, जिसे पुलिस ने लग

नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ उत्तर प्रदेश में हुए हिंसक प्रदर्शन की जांच कर रही स्पेशल इनवेस्टिगेशन टीम (एसआइटी) को एक वीडियो हाथ लगा है. वीडियो में लखनऊ की एक बड़ी मस्जिद में एक वकील युवाओं को बता रहा है कि सरकार एक कानून लाने वाली है जिससे मुसलमानों की नागरिकता को खतरा पैदा हो जाएगा. वकील युवाओं को सरकार के अत्याचार के खिलाफ खड़े होने को भी प्रेरित करता है.

एसआइटी वीडियो की तह में गई तो पता चला कि राज्य की कई अन्य जगहों पर भी कुछ लोगों ने मुस्लिम युवाओं को सीएए के विरुद्ध आंदोलन के लिए उकसाया. जांच में यह भी सामने आया कि शामली, मुजफ्फरनगर समेत यूपी के कई पश्चिमी जिलों में अगस्त-सितंबर में मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्रों में एक पोस्टर लगाया गया जिसमें उर्दू, अंग्रेजी और हिंदी में लिखा था-'बेखौफ जियो, बाइज्जत जियो'. पोस्टर के बैकग्राउंड में भीड़ को हथियार लेकर दौड़ते दिखाया गया जिस पर एक युवक कुछ फेंक रहा है.

पुलिस ने जब इन साक्ष्यों की कडिय़ां जोड़ीं तो पता चला कि ये सभी पोस्टर पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआइ) नामक संगठन ने लगाए थे. पुलिस को 9 नवंबर को राम जन्मभूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी पश्चिमी यूपी के कुछ जिलों में चिपकाया गया पोस्टर भी मिला जिसमें बाबरी मस्जिद को दोबारा बनाने की अपील की गई है. इसमें भी पीएफआइ की भूमिका सामने आई. सीएए के विरोध में हुई हिंसा की जांच कर रहे लखनऊ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कलानिधि नैथानी कहते हैं, ''पीएफआइ के सदस्यों ने पहले तो सीएए का शांतिपूर्ण ढंग से विरोध करने की रणनीति बनाई थी पर बाद में इन्होंने युवाओं को हिंसा के लिए उकसाया. पुलिस को सोशल मीडिया पर आदान-प्रदान किए गए पीएफआइ नेताओं के संदेश मिले हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि हिंसा के पीछे इसी संगठन का हाथ है.'' इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर पुलिस ने पीएफआइ के प्रदेश अध्यक्ष वसीम अहमद, मंडल अध्यक्ष अशफाक अहमद और कोषाध्यक्ष नदीम समेत कुल 25 नेताओं-कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया.

सीएए के खिलाफ 19 दिसंबर से लखनऊ, मेरठ, संभल, कानपुर, बिजनौर, मुजफ्फरनगर समेत प्रदेश के 15 जिलों में हिंसात्मक प्रदर्शन का दौर शुरू हो गया था. करीब तीन दिन तक चले इस प्रदर्शन में 21 लोग मारे गए और 288 पुलिसकर्मी घायल हुए थे. इस मामले में अब तक पूरे प्रदेश में कुल सवा तीन सौ मुकदमे दर्ज हुए हैं जिसके आधार पर करीब 1,200 लोगों को गिरफ्तार किया गया है. हिंसा की जांच में जुटी पुलिस को पीएफआइ समेत कुछ अन्य संस्थाओं की संलिप्तता की जानकारी मिली है. इसी आधार पर प्रदेश सरकार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय से पीएफआइ पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की है.

छह महीने पहले से बन रही थी भूमिका

यूपी समेत अन्य राज्यों में हिंसा फैलाने की साजिश में पीएफआइ की भूमिका की सूचना खुफिया एजेंसियों को एक वर्ष पहले से मिलने लगी थी. खुफिया विभाग को सूचना मिली थी कि बीते वर्ष अक्तूबर में दिल्ली में पीएफआइ की राष्ट्रीय कांग्रेस में बड़ी संख्या में पश्चिमी यूपी से लोगों ने शिरकत की थी. यूपी में पीएफआइ की गतिविधियों का पहला संकेत छह महीने पहले लखनऊ में मिला जब खुर्रमनगर इलाके में कुछ पोस्टर चस्पां किए गए. खुफिया विभाग ने इसकी सूचना प्रदेश सरकार को दी थी. इनपुट के बाद भी प्रदेश में हिंसा क्यों नहीं रोकी जा सकी? पुलिस महानिरीक्षक (आइजी) प्रवीण कुमार कहते हैं, ''पुलिस ने पूरी तैयारी कर ली थी. पुलिस की सख्ती का ही नतीजा था कि सुप्रीम कोर्ट से राम जन्मभूमि विवाद का फैसला आने के बाद पूरी शांति बनी रही.

पुलिस के तैयार रहने से ही सीएए के विरोध में हिंसा करने वालों से सख्ती से निबटा गया.'' पीएफआइ की नींव वर्ष 2006 में केरल के कालीकट जिले में रखी गई थी. जुलाई, 2007 में कर्नाटक में पीएफआइ पहली बार रजिस्टर्ड संस्था के रूप में सामने आया. बीते 10 वर्षों में उसने कई राज्यों में विस्तार किया है और महिला एवं स्टुडेंट विंग भी बनाए. एक पुलिस अफसर बताते हैं, ''केंद्र में दोबारा भाजपा सरकार बनने और यूपी में योगी आदित्यनाथ की सरकार के बाद पीएफआइ ने अचानक यूपी में सक्रियता बढ़ा दी. ये खासकर बेरोजगार मुसलमान युवाओं में सरकार के प्रति गुस्सा भर रहे थे.'' कई जिलों में पीएफआइ नेताओं ने तीन तलाक, धारा 370 व अन्य कई मुद्दों पर सभाएं और नुक्कड़ नाटक आयोजित किए थे. पर पीएफआइ के उत्तर क्षेत्र के इंचार्ज अनीस अंसारी ने एक बयान जारी करके पुलिस के सभी आरोपों को निराधार बताया है. अंसारी का कहना है, ''हिंसा को छिपाने के लिए यूपी पुलिस सरकार के इशारे पर पीएफआइ को निशाना बना रही है. हमारा संगठन समाज में पिछड़े लोगों की बेहतरी के लिए काम करता है.''

कहां से आए हथियार, कारतूस

पुलिस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सीएए के खिलाफ हुई हिंसा में यूपी में मारे गए 21 लोगों में से 20 ऐसे हैं जो प्रदर्शनकारियों की फायरिंग के शिकार हुए. हिंसा से प्रभावित बड़े जिलों में पुलिस ने चौराहों पर लगे 'इंटीग्रेटेड ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम' के सीसीटीवी कैमरों से खींची गईं तस्वीरें निकाली हैं. संदिग्ध प्रदर्शनकारियों की फोटो हिंसा प्रभावित पुलिस थानों और चौराहों पर लगाई गई है. पुलिस को हाथ में असलाह लहराते युवाओं की फोटो मिली और वह यह जांच कर रही है कि उन्हें हथियार कहां से मिले? मेरठ में 20 दिसंबर को हुई हिंसा में उपद्रवियों ने पुलिस पर फायरिंग की थी.

मेरठ पुलिस की जांच में लिसाड़ीगेट के मजीदनगर, फतेहउल्लापुर, हुमायूं नगर में जाकिर कॉलोनी, किठौर के राघना इलाके बीते कुछ वर्षों में पकड़ी गई अवैध तमंचा फैक्टरियों के दोबारा गुपचुप चलने की सूचना मिलने पर पुलिस पूरे इलाके की नाकाबंदी कर छानबीन कर रही है. पुलिस यह भी जांच कर रही कि असलहा चलाने वाले प्रदर्शनकारियों को कारतूस कहां से मिले थे. लखनऊ में हिंसा के आरोप में पुलिस ने पश्चिमी बंगाल के मालदा जिले में रहने वाले तीन लोगों को पकड़ा है. पुलिस नेकानपुर में भी कुल 100 संदिग्धों की फोटो अलग-अलग जगहों पर चस्पां की. इन तस्वीरों की पहचान के आधार पर पुलिस को केरल के कुछ लोगों के कानपुर में आकर हिंसा करने की सूचना मिली है.

सीएए के विरोध में हुई हिंसा ने यूपी पुलिस के सामने दोबारा ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न होने देने की कठिन चुनौती भी रख दी है.

''नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में हुई हिंसा में पीएफआइ के साथ रिहाई मंच की भी भूमिका रही है. दोनों संगठनों के खिलाफ कार्रवाई के लिए केंद्र सरकार को पत्र लिखा गया है.''

ओ.पी. सिंह,

पुलिस महानिदेशक, यूपी

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