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आवरण कथाः बमकांड

भारत के सबसे अमीर आदमी से उगाही के लिए रची गई एक बचकाना सी साजिश मुंबई पुलिस के लिए गले की हड्डी बन गई है. मुंबई में खाकी-खादी की साठ-गांठ का खेल खुल चुका है और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली एमवीए सरकार के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है.

मुंबई बमकांड मुंबई बमकांड

मुंबई जहां दुनिया का सबसे बड़ा फिल्म उद्योग है, वहां वास्तविकता अक्सर कल्पनाओं को पीछे छोड़ देती है. 25 फरवरी को, एक ओर मुंबई जहां चार महीने से अधिक समय के बाद कोरोना वायरस के सबसे अधिक मामलों के अचानक सामने आने से संक्रमण की दूसरी लहर के भय से जूझ रही थी, वहीं दूसरी तरफ शहर के दक्षिणी छोर पर भारत के सबसे सनसनीखेज और रोमांच से भरपूर वास्तविक जीवन के खेल की तैयारी चल रही थी.

मध्यरात्रि के दो घंटे बाद, एक नकली लाइसेंस प्लेट के साथ एक हल्के हरे रंग की स्कॉर्पियो एसयूवी और एक सफेद इनोवा एमपीवी, मुंबई के सबसे पॉश इलाकों—मालाबार हिल और कंबाला हिल को काटने वाले पैडर रोड पर लहराती हुई आगे बढ़ रही थीं. गाडिय़ां उन रास्तों से गुजर रही थीं जहां अरबपतियों और रसूखदारों के घर हैं.

कंबाला हिल में अल्टामाउंट रोड पर कुमार मंगलम बिड़ला का घर, मंगलायन है; तो बीएमसी कमिशनर, आरबीआइ गवर्नर और मुंबई पोर्ट ट्रस्ट कमिशनर के आधिकारिक बंगले भी उसी इलाके में हैं. लेकिन गाडिय़ां जिस इमारत की ओर बढ़ रही थीं वह इन सबसे बहुत ऊंची है—अरबों डॉलर कीमत वाला मुकेश अंबानी का निवास स्थान ऐंटीलिया, जिसका नाम अटलांटिक महासागर में एक पौराणिक द्वीप के नाम पर रखा गया था.

अन्वेषण की अंधी गुफा
अन्वेषण की अंधी गुफा

दोनों गाडिय़ां भारत के सबसे अमीर व्य‌क्ति के 27-मंजिला निजी निवास से 300 मीटर की दूरी पर रुक गईं. स्कॉर्पियो को सड़क के मोड़ के पास फुटपाथ पर छोड़कर उसका ड्राइवर इनोवा में सवार हुआ, और चला गया. अगली सुबह लगभग 9 बजे, गहरे नीले रंग के सफारी सूट पहने अंबानी निवास से आए.

अन्वेषण की अंधी गुफा
अन्वेषण की अंधी गुफा

सुरक्षाकर्मियों ने उस बंदगाड़ी का मुआयना किया और गामदेवी पुलिस को सूचित किया. राजेश सिंह, जिनकी किराने की दुकान के सामने वह स्कॉर्पियो खड़ी थी, याद करते हैं, ''थोड़ी देर बाद ट्रैफिक पुलिस पहुंची और एक खिड़की का शीशा तोड़कर गाड़ी में प्रवेश किया. गाड़ी के अंदर 2.6 किलोग्राम वजन की 20 जिलेटिन की छड़ें बिखरी थीं, लेकिन उन विस्फोटकों से धमाके के लिए कोई डेटोनेटर नहीं था.

एक छोटी सी पर्ची भी पड़ी थी जिसमें हिंदी में लिखा था, ‘‘ये तो सिर्फ एक ट्रेलर है. नीता भाभी, मुकेश भैया, फैमिली ये तो सिर्फ एक झलक है. अगली बार ये सामान पूरा होकर तुम्हारे पास आएगा और पूरा इंतजाम हो गया है.’’

अन्वेषण की अंधी गुफा
अन्वेषण की अंधी गुफा

धमकी उसी तरह के फिल्मी अंदाज में दी गई थी जिसका इस्तेमाल 1990 के दशक में शहर के व्यापारियों और फिल्मी हस्तियों से पैसा वसूलने के लिए कराची स्थित अंडरवर्ल्ड किया करता था. जिलेटिन की छड़ें पत्थर की खदानों या सड़कों और पुलों के निर्माण के दौरान चट्टानें तोडऩे के लिए उपयोग की जाती हैं. माओवादी भी अक्सर हमले के लिए इसी विस्फोटक का इस्तेमाल करते हैं.

किसी वाहन के अंदर रखकर और डेटोनेटर की मदद से इसे उड़ाया जाए तो वे सुपरसोनिक गति से फैलते हैं और बहुत ज्यादा गर्म गैस के बुलबुले बनाते हैं जो प्रति वर्ग इंच दस लाख पाउंड से अधिक का प्रेशर पैदा करता है जिससे आसपास से गुजरने वाली गाडिय़ों के परखच्चे उड़ सकते हैं. मुंबई ने 12 मार्च, 1993 को पहली बार इसका हमला झेला था, जब पाकिस्तानी सेना की आइएसआइ और दाऊद इब्राहिम के बदमाशों ने मिलकर ब्लास्ट कराए थे. सैन्य इस्तेमाल वाले आरडीएक्स से सड़क के किनारे खड़ी कारों और स्कूटरों में 13 विस्फोट हुए जिसमें 257 लोग मारे गए और 800 से अधिक घायल हो गए थे. 

छाया अंधेरा छल छद्म का
छाया अंधेरा छल छद्म का

25 फरवरी को निशाने पर अरबपति का घर नहीं था, बल्कि कारों का वह काफिला था जिसमें देश के सबसे बड़े उद्योगपति का परिवार शहर की यात्रा करता है. विचित्र रूप से, स्कॉर्पियो पर लगी नकली लाइसेंस प्लेट का नंबर अंबानी परिवार के सुरक्षा काफिले में लगी गाडिय़ों जैसा ही था.

ऐंटीलिया की कहानी में नए मोड़ 
5 मार्च को, ठाणे में एक 49 वर्षीय ऑटो पार्ट्स डीलर और स्कॉर्पियो के मालिक मनसुख हिरेन की लाश उत्तर-पश्चिमी मुंबई के रेतीबंदर के खारे पानी में तैरती हुई पाई गई थी. उन्हें माफिया स्टाइल में मारा गया था. हिरेन को पास एक पुल से पानी में फेंक दिया गया था. उनके हाथ बंधे हुए थे और मुंह में पांच रूमाल ठूंसे हुए थे. संभवत: जब उन्हें फेंका गया होगा वे जीवित होंगे और मौत डूबने की वजह से हुई. 

छाया अंधेरा छल छद्म का
छाया अंधेरा छल छद्म का

स्कॉर्पियो के मालिक के रूप में हिरेन का नाम 26 फरवरी को सामने आया था और उन्होंने 18 फरवरी को अपनी गाड़ी के चोरी हो जाने की शिकायत दर्ज कराई थी. लेकिन 4 मार्च को खुद हिरेन लापता हो गए थे. एक दिन बाद उनकी लाश मिली तो यह स्पष्ट हो गया कि कोई तो है जो गुनाहों पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहा है. सवाल यह था कि आखिर यह कौन हो सकता है. राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) ने जांच में पाया कि इस मामले के पहले जांच अधिकारी, सहायक पुलिस निरीक्षक सचिन वाझे इसमें शामिल थे जिनके बारे में माना जाता है कि वे स्कॉर्पियो के पीछे-पीछे चल रही इनोवा चला रहे थे. 

वीआइपी रोड के किनारे 15 फुट ऊंचे पोल पर लगे चार कैमरों में से एक से मिले क्लोज-सर्किट टीवी फुटेज में एक नकाबपोश स्कॉर्पियो की ओर आता दिखता है जिसने सफेद रंग का कुर्ता पहना है और सिर रूमाल से ढका हुआ है. कथित रूप से यह वाझे थे. विस्फोटकों से भरी गाड़ी मोड़ पर इस प्रकार खड़ी की गई थी, जिससे वह सीसीटीवी की जद में नहीं थी. 

इस घटना की दो अलग-अलग एजेंसियां समानांतर जांच कर रही हैं: महाराष्ट्र आतंकवाद-निरोधक दस्ता (एटीएस), और एनआइए. एनआइए, केंद्रीय गृह मंत्रालय को रिपोर्ट करती है और आतंकवादी मामलों की जांच वही करती है. जैश उल-हिंद नामक एक आतंकी संगठन के 8 मार्च को टेलीग्राम चैट में धमकी भरा पत्र जारी करने के बाद एनआइए को जांच सौंपी गई.

बाद में यह जांच की दिशा को भटकाने वाली चाल साबित हुई; एनआइए ने जांच में जिस चीज का इशारा किया उसे मुंबई पुलिस के भीतर के लोग पहले से ही जानते थे—यह कि वाझे का पुलिसा के भीतर दबदबा उनकी रैंक से कहीं अधिक था. वे कथित तौर पर अपराध शाखा में चार वरिष्ठ अधिकारियों-सहायक आयुक्त, उपायुक्त (अपराध), अतिरिक्त आयुक्त और संयुक्त आयुक्त (अपराध) को दरकिनार करते हुए, मुंबई पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह को सीधे रिपोर्ट करते थे.

आनन-फानन तैयार सियासी साजिश
बॉम्बगेट यानी इस मामले में रोज नए खुलासे होते गए तो सरकार ने एक बलि का बकरा ढूंढने की अपनी हड़बड़ाहट में, पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह को 17 मार्च को होम गार्ड्स में स्थानांतरित कर दिया और उसके बाद मुंबई पुलिस कमिशनरेट के 146 साल के इतिहास का सबसे खराब संकट पैदा हो गया. 18 मार्च को लोकमत के साथ एक साक्षात्कार में, गृह मंत्री अनिल देशमुख ने कहा कि परमबीर सिंह को हटाया गया क्योंकि जांच में कई गंभीर लापरवाहियां पाई गई थीं.

बदले में, परमबीर सिंह ने अगले तीन दिनों तक सरकार के खिलाफ जानकारियां दीं. 20 मार्च को मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को लिखे और भेजे गए पत्र में उन्होंने सनसनीखेज आरोप लगाया कि गृह मंत्री देशमुख ने वाझे जैसे पुलिस अधिकारियों को मुंबई के 1,750 बार, रेस्तरां और ‘अन्य स्रोतों’ से महीने में 100 करोड़ रुपए की उगाही को कहा था. अगले दिन, 21 मार्च को वकील जयश्री पाटिल ने गामदेवी पुलिस स्टेशन में एक शिकायत दर्ज कराई जिसमें एक एफआइआर दर्ज कराने की मांग की गई थी.

अंत में 22 मार्च को परमबीर सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर की जिसमें देशमुख के खिलाफ सीबीआइ जांच की मांग की गई, और यह भारत में पहली बार था कि एक पूर्व पुलिस आयुक्त एक गृह मंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की सीबीआइ जांच के लिए अदालत पहुंचा था. गृह मंत्री को निशाने पर लेते हुए परमबीर सिंह ने शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) पर हमला किया जो पिछले 16 महीनों से राज्य में शासन कर रहे आठ दलों के गठबंधन की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है. 

विपक्षी भाजपा को आक्रामक होने का बढिय़ा मुद्दा मिला था. नवंबर 2024 में कार्यकाल समाप्त होने से पहले महाराष्ट्र विकास आघाड़ी (एमवीए) सरकार को संकट में डालने और गिराने का पहला प्रयास 23 मार्च को शुरू हुआ, जब विपक्ष के नेता देवेंद्र फड़णवीस ने सरकार पर पैसे लेकर पोस्टिंग करने के गोरखधंधे के सनसनीखेज आरोप लगाए. उन्होंने एमवीए सरकार के कई सदस्यों पर आरोप लगाया कि पुलिस अफसरों की पोस्टिंग की सिफारिश के बदले पैसे लिए गए थे.

फड़णवीस ने कहा, ''पूरे रैकेट को डीजीपी और अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) की तरफ से सीएम उद्धव ठाकरे के संज्ञान में लाया गया था. सीएम ने इसकी जांच कराने के बजाए फाइल गृह मंत्री को भेज दी जो खुद इस मामले में संदेह के घेरे में थे. संभवत:, ठाकरे ने सरकार को बचाने के लिए ऐसा किया.’’ हालांकि, फड़णवीस ने किसी का नाम नहीं लिया लेकिन उन्होंने 23 मार्च को दिल्ली में केंद्रीय गृह सचिव ए.के. भल्ला को नेताओं, अफसरों और दलालों के बीच कथित संवाद के कॉल डेटा रिकॉड्र्स सौंप दिए. फड़णवीस ने कहा, ‘‘इस मामले में सीबीआइ जांच होनी चाहिए.’’ 

1995 में नागपुर के पास कटोल से पहली बार निर्दलीय विधायक बने देशमुख ने बहुमत से चूक गई शिवसेना-भाजपा सरकार को समर्थन देने के लिए 35 विधायकों का समूह बनाने में बड़ी भूमिका निभाई थी. पच्चीस साल बाद, वे एमवीए सरकार के लिए खतरा बन गए हैं. उनकी पार्टी उनके साथ मजबूती से खड़ी है.

एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने परमबीर सिंह के आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि देशमुख और पुलिस आयुक्त की 1 फरवरी से 15 फरवरी के बीच कोई बैठक हुई ही नहीं होगी क्योंकि गृह मंत्री कोविड-19 से पीडि़त होने के कारण अस्पताल में भर्ती थे और 27 फरवरी तक उन्हें होम क्वारंटीन किया गया था. हालांकि फड़णवीस ने ऐसे सबूत पेश किए हैं जिनसे पता चलता है कि देशमुख 15 फरवरी को एक चार्टर्ड फ्लाइट से नागपुर से मुंबई पहुंचे थे. 

ऐंटीलिया घटना और हिरेन की हत्या, दोनों मामलों की जांच एनआईए कर रही है. एक चर्चा ऐसी भी चल रही है कि दोनों घटनाओं को ‘ठाणे नेक्सस’ के दुष्ट पुलिसकर्मियों ने अंजाम दिया जिन्होंने मुंबई के उत्तर में स्थित इस जिले में अपनी सेवाएं दी है. जांच एजेंसी के आगे के खुलासे देशमुख के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं. इस बीच, परमबीर सिंह के खुलासे इस अस्थिर गठबंधन को लगातार परेशान कर रहे हैं.
 
आखिरी 'एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’
ऐंटीलिया की घटना और विस्फोटक रहस्योद्घाटन को एक महीना हो चुका है लेकिन यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि ठिगने कद का, गंजा, और भावशून्य आंखों वाला 49 वर्षीय एपीआइ सचिन हिंदुराव वाझे आखिर मुकेश अंबानी को धमकी क्यों देना चाहता था. क्या भ्रष्ट पुलिस-राजनेता साठगांठ के जरिए भारत के सबसे अमीर व्यवसायी से पैसा उगाही की कोशिश हो रही थी. या पुलिसवाले अकेले काम कर रहे थे? या, जैसा कि परमबीर सिंह ने आरोप लगाया, इसमें बड़े खिलाड़ी शामिल हैं? 

माना जाता है कि 14 मार्च को गिरफ्तारी के बाद से एनआइए की हिरासत में वाझे ने जांचकर्ताओं को कुछ नहीं बताया है. लेकिन उसकी गिरफ्तारी से एक दिन पहले के उसके एक व्हाट्सऐप स्टेटस से पता चलता है कि उसे अंदाजा हो गया था कि शतरंज की बाजी में फंसे इस प्यादे के साथ अब क्या हो सकता है. उसने लिखा था ‘मुझे लगता है कि दुनिया को अलविदा कहने का समय आ रहा है.’

एनआइए ने मुंबई पुलिस कमिशनरेट के पास क्रॉफोर्ड मार्केट की एक पार्किंग से एक मर्सिडीज एमएल-250 एसयूवी बरामद की. यह उन कई गाडिय़ों में से एक है जिसका वाझे इस्तेमाल करता था. इसमें 5 लाख रुपए और नोट गिनने की मशीन थी. कथित तौर पर पुलिस वाले ने मरीन ड्राइव के पास स्थित ओबेरॉय ट्राइडेंट होटल में सुदेश खामकर के नाम से फर्जी आधार कार्ड का इस्तेमाल करके एक सूइट बुक कराया था. 

वाझे इस खेल का मोहरा भी हो सकता है, लेकिन वह स्पष्ट रूप से एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्यादा है जिसके बारे में लोगों का मानना है कि इसने भारत के शहरों में चलने वाले सबसे बड़े पुलिस-राजनेता रैकेट के खेल को खोलकर रख दिया है. परमबीर सिंह के पत्र के अनुसार, यह कई हजार करोड़ रुपए से ऊपर का खेल हो सकता है.

कोल्हापुर के एक स्थानीय नेता का बेटा वाझे शिवाजी कॉलेज में होनहार क्रिकेटर और कॉलेज टीम का विकेटकीपर रहा. वह महाराष्ट्र पुलिस में भर्ती हुए 1990 के बैच के पुलिस उप-निरीक्षकों में एक था. 2000 के दशक की शुरुआत में वह वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक प्रदीप शर्मा के संपर्क में आया. शर्मा को तब 'एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ के रूप में जाना जाता था.

ये ‘स्पेशलिस्ट’ वास्तव में मुंबई पुलिस की अपराध शाखा के क्रिमिनल इंटेलिजेंस यूनिट्स (सीआइयू) के सदस्य थे, जो सीधे पुलिस कमिशनर और ज्वाइंट सीपी (क्राइम) के तहत काम करते थे. इन स्पेशल यूनिट्स को अंडरवर्ल्ड की बढ़ती ताकत को बेअसर करने का काम सौंपा गया था. ऐसा करते हुए वे मीडिया में छाते गए और बॉलीवुड ने उन पर फिल्में बनाईं. इसके साथ ही, पुलिस के हाथों हुईं निर्मम हत्याएं मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और सुप्रीम कोर्ट की जद में आईं.

2002 में घाटकोपर में बेस्ट बस में बम विस्फोट के संदिग्ध 27 साल के सॉफ्टवेयर इंजीनियर ख्वाजा यूनुस की हिरासत में मौत के मामले में 2003 में वाझे पर शिकंजा कसा था. पुलिस के अनुसार, यूनुस हिरासत से भाग गया और एक परनाले में गिर गया पर उसकी लाश कभी नहीं मिली. ऐसी चर्चा आम थी कि यूनुस को हिरासत में मार दिया गया और उसकी लाश को नाले में फेंक दिया गया था.

वाझे जिसके नेतृत्व में वह ऑपरेशन हुआ था, उसे 2004 में निलंबित कर दिया गया. उसने 2006 में इस्तीफा दिया लेकिन लंबित जांच के कारण इसे अस्वीकार कर दिया गया. वह 15 साल गुमनामी में रहा, किताबें लिखीं और सॉफ्वेयर कौशल निखारा. इस दौरान उसने 2010 में एक मराठी सोशल मीडिया ऐप 'लाइ भारी’ लॉन्च किया और कई सॉफ्टवेयर फर्मों की शुरुआत की जिनमें से सभी लॉन्च के कुछ वर्षों के भीतर बंद हो गईं. कई साल ऐसे भी रहे जब उसे दरिद्रता की जिंदगी बितानी पड़ी थी.

नासिक पुलिस प्रशिक्षण अकादमी के 1989 बैच के वाझे के साथी शिरीष थोराट उसे साहसी और तेज-तर्रार पुलिस अधिकारी के रूप में याद करते हैं. गोवा पुलिस के पूर्व डिप्टी एसपी और अब न्यूजर्सी स्थित स्वतंत्र सिक्योरिटी कॉन्ट्रैक्टर थोराट याद करते हैं, ‘‘उसे खतरों से खेलने की आदत थी.’’

वाझे के जब दिन खराब चल रहे थे, थोराट और वाझे ने साथ मिलकर कई सॉफ्टवेयर सुरक्षा ऑडिट किए और 26/11 के हमलों के लिए शहर की रेकी करने वाले लश्कर के आतंकवादी डेविड हेडली पर 2014 में संयुक्त रूप से एक किताब द स्काउट लिखी. थोराट के अनुसार, वाझे में मुसीबत के लिए पैसे बचाकर रखने की प्रवृत्ति कभी नहीं रही और गैजेट का शौकीन वाझे हमेशा नवीनतम लैपटॉप, मोबाइल फोन और मोटरबाइक खरीदने को उत्सुक रहा. इसलिए पैसे आने के साथ ही खत्म हो जाते थे.

उसके एक दोस्त का कहना है कि 2013 में उसने एक निजी फर्म की सुरक्षा ऑडिट करके 15 लाख रुपए कमाए. बाद में पता चला कि वाझे ने उस पैसे से टोयोटा फॉच्र्यूनर एसयूवी खरीद ली. उसने अमेय खोपकर के खिलाफ लाइ भारी के लिए कॉपीराइट उल्लंघन का मुकदमा दायर किया, लेकिन हार गया. अदालत ने जुर्माना भरने का आदेश दिया जिसके लिए फॉर्च्यूनर बेचनी पड़ी. 2018 में 8 लाख रुपए की डीएसके-बेनेली बाइक खरीदी और रोड ट्रिप पर लद्दाख निकल गया, लेकिन बहुत बीमार होने के कारण उसे सैन्य विमान से निकाला गया.

2008 में वाझे के शिवसेना में जुडऩे से भी कुछ खास फायदा नहीं हुआ. हालांकि उसने बड़े धूमधाम से पार्टी का दामन थामा था और पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने बांद्रा (पूर्व) के अपने निवास मातोश्री में उसका स्वागत किया था. शिवसेना से हें छात्र नेता से फिल्म-निर्माता बने अभिजीत पणसे ने जोड़ा था. यह पणसे ही थे जिन्होंने सेना के संस्थापक बाल ठाकरे की जीवनी पर आधारित 2019 की बायोपिक ठाकरे बनाई थी, लेकिन तब पार्टी से अलग हो गए जब फिल्म के निर्माता संजय राउत ने वर्ली के एट्रिया मॉल में फिल्म प्रीमियर के दौरान उन्हें चौथी पंक्ति में बिठाया.

इंडिया टुडे से बातचीत में पणसे ने स्वीकारा कि उन्होंने ही वाझे के लिए शिवसेना में जगह बनाई थी. उन्होंने कहा, ‘‘हां, वे मेरे अच्छे दोस्त थे’’ लेकिन उन्होंने यह कहते हुए इससे ज्यादा बोलने से असमर्थता जता दी कि वे अभी कोविड-19 पीडि़त हैं और उबरने की कोशिश कर रहे हैं. वाझे ने भी 2009 में पार्टी सदस्यता का नवीनीकरण नहीं कराया, फिर भी शिवसेना प्रमुख ठाकरे उनसे इतने प्रभावित थे कि जब 2014 में भाजपा-सरकार ने सत्ता संभाली तो ठाकरे ने उन्हें पुलिस में फिर से लेने की सिफारिश की थी. 

फड़णवीस ने 17 मार्च को दिल्ली में कहा, ''उद्धव ठाकरे ने 2016 में मुझे वाझे को पुलिस में वापस लाने के अनुरोध के साथ फोन किया था. उन्होंने मुझे राजी करने के लिए शिवसेना के कुछ मंत्रियों को भी भेजा था. मैंने एडवोकेट-जनरल की सलाह के आधार पर ऐसा नहीं करने का फैसला किया था.’’ 

मुख्यमंत्री बनने के बाद ठाकरे ने जून 2020 में वाझे को मुंबई पुलिस में फिर से शामिल करा दिया. मुंबई पुलिस ने कहा कि पुलिस अफसरों की कमी के कारण उसे वापस लाया जा रहा है. लेकिन वाझे ने एमएटी (महाराष्ट्र एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल) या हाइकोर्ट के आदेश के आधार पर नहीं बल्कि सरकार की ओर से मुंबई के पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह की अध्यक्षता में गठित विशेष समिति की सिफारिश के आधार पर वाझे को पुन: पुलिस में शामिल कर लिया.

इसके बाद, वाझे को मुंबई पुलिस की हाइ-प्रोफाइल क्राइम ब्रांच में नियुक्त किया गया और उन्हें विशेष रूप से संवेदनशील क्रिमिनल इंटेलिजेंस यूनिट (सीआइयू) का प्रमुख बनाया गया. पुलिस के वरिष्ठ लोगों का कहना है कि यह असामान्य था, क्योंकि आमतौर पर एक वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक ही सीआइयू का प्रमुख होता है.

वाझे ने अवैध रूप से कारें मोडिफाइ करने के लिए 29 दिसंबर 2020 को सेलेब्रिटी कार डिजाइनर दिलीप छाबडिय़ा को गिरफ्तार किया था. इससे पहले वह तब सुर्खियों में आया जब आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में 11 नवंबर, 2020 की सुबह रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी को गिरफ्तार करने गई रायगढ़ पुलिस के साथ पहुंचा था. 

यह सामने आया है कि मुंबई के वर्ली में स्थित गोस्वामी के घर जाने के लिए वाझे ने उसी स्कॉर्पियो का इस्तेमाल किया था. उसने तब यह गाड़ी अपने दोस्त हिरेन से मांगी थी. हिरेन की दुकान मुंबई पुलिस मुक्चयालय के सामने स्थित क्रॉफोर्ड मार्केट में थी. वाझे ने 8 फरवरी को हिरेन को कार लौटा दी थी. 17 फरवरी को, हिरेन ने पूर्वोत्तर मुंबई के विक्रोली में ईस्टर्न एक्सप्रेस हाइवे पर अपनी गाड़ी छोड़ दी थी क्योंकि इसका स्टीयरिंग जाम हो गया था.

जब अगले दिन वे वापस आए, तो गाड़ी गायब थी. उन्होंने विक्रोली पुलिस थाने में शिकायत दर्ज करवाई. छह दिन बाद, स्कॉर्पियो 18 किमी दूर, अंबानी निवास के बाहर दिखाई दी. थोराट कहते हैं, ‘‘मैं सचमुच यह यकीन नहीं कर पा रहा था कि सचिन ऐसा कर सकता है लेकिन, पिछले कुछ दिनों से जो तथ्य सामने आ रहे हैं उससे मेरा वह भरोसा लगातार घट रहा है.’’

जांचकर्ता वाझे की पहेली की कडिय़ों को जोडऩे की कोशिश कर रहे थे, इसी बीच 21 मार्च को मामले में एक और नया मोड़ सामने आया जब एटीएस ने पूर्व कांस्टेबल विनायक शिंदे और बुकी नरेश गौर को गिरफ्तार किया. शिंदे 11 नवंबर, 2006 को रामनारायण गुप्ता उर्फ लखन भैया की सनसनीखेज हत्या के आरोप में 2013 में, दोषी ठहराए गए 13 पुलिसकर्मियों में से एक था.

नवी मुंबई की पुलिस ने दावा किया था कि गुप्ता को वर्सोवा में एक मुठभेड़ में मार गिराया गया था, लेकिन वास्तव में ठाणे जिले के नवी मुंबई में स्थिति निवास से कुछ दिनों पहले उनको अगवा किया गया और बाद में मार दिया गया था. हालांकि अदालत ने 2013 में पुलिस टीम के कथित प्रमुख, वरिष्ठ इंस्पेक्टर प्रदीप शर्मा को बरी कर दिया था. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश ने दोषी पुलिसकॢमयों को 'कॉन्ट्रैक्ट किलर’ करार दिया था.

'एनकाउंटर फिलॉस्फी’ को एक 'आपराधिक फिलॉस्फी’ के समान मानते हुए न्यायमूर्ति मार्केंडेय काटजू ने अपने फैसले में कहा था, ''ट्रिगर-दबाने का आतुर पुलिसकर्मी सोचते हैं कि वे एक मुठभेड़ के नाम पर लोगों को मारने के बाद भी आसानी से बच जाएंगे तो उन्हें यह पता होना चाहिए कि एक फंदा उनका भी इंतजार करता है.’’ जेल में उम्रकैद की सजा काट रहा शिंदे एक साल से फरलो पर बाहर था और जनवरी के उत्तरार्ध में कथित तौर पर वाझे से मिलने उसके दफ्तर भी आया था.

एटीएस को संदेह है कि इस बैठक में विस्फोटकों से भरे वाहन रखने की योजना तैयार की गई थी. एजेंसी को शक है कि शिंदे ही वह शख्स है, जिसने खुद को कांदिवली क्राइम ब्रांच में तैनात एक अधिकारी तावड़े के रूप में पेश करते हुए हिरेन को फोन किया था. फोन करने वाले ने हिरेन को ठाणे के घोड़बंदर रोड पर मिलने के लिए कहा, जहां से वे 4 मार्च को लापता हो गए थे. 

हिरेन की हत्या की जांच का जिम्मा अपने पास रखने के बाद, वाझे को लगता था कि सब कुछ पूरी तरह उसके नियंत्रण में है. लेकिन मुंबई में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कहते हैं, ''ऐसा लगता है कि तकनीक की इतनी अच्छी जानकारी रखने वाला व्यक्ति (वाझे) सीसीटीवी, डेटा डंप और सीडीआर के बारे में सब कुछ भूल गया था.’’ और उसने केवल ये गलतियां नहीं कीं. वह अंदाजा भी नहीं लगा पाया कि एनआइए इस गति से जांच कर सकती है और घटना के मात्र 11 दिन बाद ही जांच एनआइए के हाथ में जांच आए जाएगी.

(एजेंसी का मुंबई कार्यालय ऐंटीलिया के ठीक पीछे 25 मंजिला इमारत की सातवीं मंजिल पर है) जैश-उल-हिंद के टेलीग्राम संदेश के 27 फरवरी को वायरल होने के बाद हड़कंप मच गया और केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एजेंसी को जांच में लगाया. संदेश में कहा गया था कि अगर अंबानी भाजपा और आरएसएस को समर्थन देते रहे और पहले मांगे गए पैसे का भुगतान नहीं किया तो उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने होंगे. एक और कहानी जो चल रही है वह यह है कि किसी ने जानबूझकर यह मैसेज फैलाया ताकि एनआइए के लिए इसकी जांच में कूदने का रास्ता तैयार हो सके. यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि मैसेज किसने भेजा था. लेकिन वह भी बमकांड में कई अनुत्तरित प्रश्नों में से एक है.

सघन नगर, अधिकतम लाभ
महाराष्ट्र देश का सबसे औद्योगिक और शहरीकृत राज्य है, जो देश के औद्योगिक उत्पादन में 20 प्रतिशत का योगदान देता है. भारत की वित्तीय राजधानी मुंबई का राज्य के जीएसडीपी में 30 प्रतिशत योगदान है. नाइट फ्रैंक ने मार्च 2019 की रिपोर्ट में धन के मामले में मुंबई को दुनिया के 12वें सबसे अमीर शहर के रूप में स्थान दिया. 2017 में इसे 18वें नंबर पर रखा गया था. रिपोर्ट ने शहर में 'महत्वपूर्ण धन सृजन’ को रेखांकित किया. 

जाहिर है, दुनिया के सबसे सघन शहरों में से एक जहां 1.2 करोड़ लोग रहते हैं वहां बार, रेस्तरां और नाइट क्लबों से खूब आमदनी होती है. शायद इसी ने भारत के पहले संगठित अपराध सिंडिकेट्स को भी जन्म दिया जो तस्करी के रैकेट से लेकर जबरन वसूली तक फैला था.

शहर के 8,000 होटलों और रेस्तरां का प्रतिनिधित्व करने वाले इंडियन होटल ऐंड रेस्तरां एसोसिएशन (एएचएआर) के एक अधिकारी, परमबीर सिंह के पत्र से हैरान नहीं हैं. इस पदाअधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बतायाकि पुलिस नियमित रूप से एएचएआर के सदस्यों से 'हफ्ता’ या जबरन वसूली करती है. इससे पहले, पुलिस चार से अधिक व्यक्तियों के एक स्थान पर जमा होने के लिए अनिवार्य वार्षिक लाइसेंस जारी करने के लिए रेस्तरां मालिकों को परेशान करती थी. उन्होंने बताया, ''लाइसेंस फीस 25 रुपए प्रति वर्ष थी लेकिन हमें इसके लिए कई गुना भुगतान करना पड़ता था.’’ 

हालांकि, वे यह भी कहते हैं कि पुलिस की ओर से उत्पीडऩ की शिकायतों के बाद तत्कालीन सीएम देवेंद्र फड़णवीस ने 2015 में अनिवार्य लाइसेंस रद्द कर दिया और तब से रेस्तरां मालिक पुलिस को हफ्ता नहीं दे रहे हैं. लाउंज और नाइट क्लबों के मालिकों को व्यवसाय चलाने के लिए पुलिस को हर महीने 2 लाख रुपए देने होते हैं, भले ही यह गैर-कानूनी है. पदाअधिकारी ने बताया, ''मुझे लाउंज के मालिक से शिकायत मिली थी कि मासिक भुगतान लेने के लिए वाझे खुद आता था.’’

उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह, जिनकी याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय का पुलिस सुधारों पर 1996 का ऐतिसाहिक फैसला आया था, का मानना है कि पुलिस-राजनेताओं की साठगांठ का दीर्घकालिक समाधान कहीं और है. उन्होंने कहा, ''हमें चुनावी सुधारों से शुरुआत करनी होगी—जो पूरे सिस्टम में जहर घोल रहा है.’’ राजनेता पार्टियों को चलाने के लिए धन प्राप्त करने के लिए दब्बू पुलिस अधिकारियों की ओर देखते हैं.

पुलिस का भ्रष्टाचार न्यूयॉर्क से लेकर टोक्यो तक दुनिया के सभी प्रमुख महानगरों में एक जैसा है, जहां ‘अनुमतियां’ देने या कारोबारियों को नियमों में हेरफेर की छूट देने के एवज में पैसे वसूले जाते हैं. इसलिए, सिस्टम को साफ करने की तत्काल आवश्यकता है. प्रकाश सिंह दो उपाय सुझाते हैं—ईमानदार पुलिस कमिशनर की नियुक्ति की जाए और परमबीर सिंह के आरोपों की जांच सुप्रीम कोर्ट से नियुक्ति ईमानदार छवि वाले अधिकारी से कराई जाए. ‘‘रिपोर्ट दो महीने में आए और उस पर तुरंत कार्रवाई की जानी चाहिए.’’

महाराष्ट्र के पूर्व डीजीपी प्रवीण दीक्षित का कहना है कि सिस्टम को अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों उपायों की जरूरत है. वे कहते हैं, ''पोस्टिंग देते समय, चाहे वह डीजीपी हों या सीपी, वरिष्ठ अधिकारियों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए.’’

कगार पर गठबंधन
एमवीए फिलहाल सुरक्षित है, लेकिन केवल इसलिए कि राज्य की चारों बड़ी पार्टियों में से कोई भी अभी चुनाव नहीं चाहती. वैसे तो कोविड के मामलों में आया उछाल ही जल्द चुनाव नहीं होने देगा, लेकिन भाजपा को भी अभी चुनाव होने पर सत्ता में लौटने का भरोसा नहीं है. भगवा पार्टी 18 मार्च को सांगली और जलगांव के मेयर के चुनाव हार गई, बावजूद इसके कि दोनों नगर निगमों में उसका बहुमत है. भाजपा के एक बड़े नेता कहते हैं, ‘‘हमें अपना घर दुरुस्त करने के लिए वक्त चाहिए.’’ ऊपर से तो यही दिखाई देता है कि एमवीए मजबूती से जमा है.

एनसीपी के राज्य अध्यक्ष जयंत पाटिल ने 21 मार्च को साफ कर दिया कि देशमुख से पद छोडऩे के लिए नहीं कहा जाएगा. सेना और एनसीपी दोनों दावा कर रही हैं कि सरकार स्थिर है. शिवसेना नेता संजय राउत कहते हैं, ‘‘हम पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे.’’ जयंत पाटील उन्हीं की बात दोहराते हैं. फिर भी गठबंधन के भीतर खटपट है. मंत्रालय में चर्चा यह है कि नुक्सान को कम करने की कवायद में मुख्यमंत्री देशमुख को दूसरा मंत्रालय दे सकते हैं. 24 मार्च को एमवीए ने देशमुख पर सिंह के आरोपों की जांच के लिए हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज के अधीन एक कमेटी बनाने का फैसला किया.

अलबत्ता स्थिति में नाटकीय बदलाव आ सकता है अगर एनआइए ऐसे सबूत लेकर आती है जिनके आधार पर केंद्र राज्य सरकार को बर्खास्त करके राष्ट्रपति शासन लगा सके. ऐसा उसने 1980 में 112 दिनों के लिए किया था जब इंदिरा गांधी ने पवार की अगुआई वाली पीडीएफ की सरकार को बर्खास्त कर दिया था. एमवीए की तकदीर का फैसला अदालतें भी कर सकती हैं

 24 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने परम बीर सिंह को बॉम्बे हाई कोर्ट जाने के लिए कहा. अगर वहां देशमुख के खिलाफ सीबीआइ जांच की मांग मानी जाती है तो ठाकरे के सामने उन्हें हटाने के अलावा कोई चारा नहीं रहेगा. सरकार केवल तभी बच सकेगी जब पवार देशमुख को हटाने के लिए राजी होंगे. अगर वे मानने से इनकार करेंगे तो सरकार मुश्किल में पड़ जाएगी. एमवीए में फिलहाल आठ पार्टियां हैं, जिनमें सबसे बड़ी पार्टी सेना के 57, एनसीपी के 53 और कांग्रेस के 44 विधायक हैं. प्रहार जनशक्ति पार्टी और समाजवादी पार्टी के दो-दो और पीडब्ल्यूपी, स्वाभिमान पक्ष, बहुजन विकास अघाड़ी के एक-एक विधायक हैं.

288 सदस्यों की महाराष्ट्र विधानसभा में भाजपा 105 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन उसके पास बहुमत से 40 विधायक कम हैं. एनसीपी पर फिलहाल जो दा लगा है, उसको देखते हुए एक और भाजपा-एनसीपी गठबंधन की संभावना नहीं है.

इसके बजाए पार्टी ने गुरिल्ला लड़ाई का विकल्प चुना है. वह एमवीए के भ्रष्टाचार पर लगातार हमले कर रही है और ऐसी स्थिति पैदा कर रही है जिसे भाजपा के एक बड़े नेता महाराष्ट्र में 'मनमोहन सिंह सरकार सरीखी स्थिति’ कहते हैं—यानी एक कमजोर गठबंधन जो अपने पथभ्रष्ट मंत्रियों के साथ एक से दूसरे संकट में हिचकोले खाता रहे. खुले तौर पर हालांकि पार्टी कानून और व्यवस्था के बिगडऩे का हवाला देकर राष्ट्रपति शासन की मांग कर रही है. भाजपा के वरिष्ठ नेता सुधीर मुनगंटीवार कहते हैं, ''एक नागरिक के घर के नजदीक विस्फोटक रखने में सरकार की मिलीभगत बहुत गंभीर मामला है. हम राज्यपाल से महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश करने का आग्रह करते हैं.’’

इस बीच एक और टाइम बम फूटने को तैयार मालूम देता है. वह है सरकार के भ्रष्ट मंत्रियों के फोन टैप, जिनमें वे तबादलों और तैनातियों की बात कर रहे हैं. विपक्ष के नेता देवेंद्र फड़णवीस कहते हैं कि वे कैश-फॉर-पोस्टिंग्ज रैकेट के ‘सबूत’ केंद्रीय गृह सचिव ए.के. भल्ला को देंगे. फड़णवीस ने 24 मार्च को राज्य खुफिया महकमे में कमिशनर रश्मि शुक्ला की रिपोर्ट का जिक्र किया, जो 26 अगस्त 2020 को तब अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) सीताराम कुंटे को सौंपी गई थी. रिपोर्ट में कथित तौर पर इस पूरे रैकेट में शामिल राजनेताओं और अफसरों के नाम हैं. (कुंटे अब राज्य के मुख्य सचिव हैं.)

फड़णवीस कहते हैं कि कुंटे की इजाजत से नेताओं, अफसरों और एजेंटों के बीच बातचीत को टैप करने के बाद शुक्ला ने जो रिपोर्ट तैयार की, उसी की वजह से उन्हें कमिशनर सिविल डिफेंस बनाकर किनारे कर दिया गया. वे आरोप लगाते हैं कि मुख्यमंत्री ठाकरे इस रैकेट से वाकिफ थे लेकिन उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की. फड़णवीस कहते हैं, ‘‘जांच करने के बजाए मुख्यमंत्री ने फाइल अनिल देशमुख को भेज दी जो खुद मामले में एक संदिग्ध थे. शायद वे सरकार बचाने की कोशिश कर रहे थे.’’

अल्पसंख्यक मंत्री और एनसीपी प्रवक्ता नवाब मलिक शुक्ला को ‘भाजपा का एजेंट’ करार देते हैं और कहते हैं कि उन्होंने ‘अनधिकृत फोन टैपिंग का सहारा लिया’ जिसकी वजह से उन्हें किनारे किया गया. मलिक दावा करते हैं कि रिपोर्ट में जिन अफसरों का जिक्र है उन्हें वे तैनातियां दी ही नहीं गईं जिनका बातचीत (जिनकी लिखित प्रति अभी सामने नहीं आई है) में जिक्र है. बहरहाल, बमकांड केस लुकाछिपी का ऐसा खेल बन गया है जिसमें कोई नहीं जानता कि अगली बार कौन पकड़ा जाएगा. 

गहराता ही जा रहा रहस्य
ऐंटीलिया घटनाक्रम, मनसुख हिरेन की हत्या और फिर परमबीर सिंह के पत्र ने कई अनसुलझे सवाल छोड़ दिए हैं

● एंटीलिया के पास बम का खौफ पैदा करने के पीछे आखिर मंशा क्या थी?
एनआइए को अभी पता नहीं चल पाया है कि संभवत: सचिन वाझे के ऐंटीलिया के बाहर विस्फोटक रखने के पीछे मंशा क्या थी. एक मत यह है कि एक आतंकी मॉड्यूल ध्वस्त करते हुए दिखकर हीरो बनने की वजे की मंशा थी; दूसरी थ्योरी कहती है कि वह किसी और के इशारे पर काम कर रहा था. 

● तो आखिर कौन था पीछे?
कई पुलिस अफसरों का कहना है कि सिस्टम में किसी की मदद के बिना वाझे ऐसा कदम नहीं उठा सकता था. राज्य के गृह मंत्री अनिल देशमुख का आरोप है कि पूर्व मुंबई पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह भी इस मामले में एक संदिग्ध हैं.

● हिरेन को किसने मारा?
इस मामले में एटीएस ने अभी तक बुकी नरेश गोर और पुलिसकर्मी विनायक शिंदे को गिरफ्तार किया है. वाझे भी इसमें प्रमुख संदिग्ध है. उप-महानिरीक्षक शिवदीप लांडे ने साजिश के खुलासे का दावा किया है पर एजेंसी ने अभी तक हत्या के पीछे की मंशा उजागर नहीं की है.

● वाझे किसके आदेश पर बहाल हुआ था?
हिरासत में मौत के एक मामले में 2004 में निलंबित वाझे को 6 जून 2020 को तत्कालीन मुंबई पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह ने बहाल किया था. विपक्ष के नेता देवेंद्र फड़णवीस का आरोप है कि परमबीर सिंह को राजनैतिक नेतृत्व ने वाझे को वापस पुलिस में लेने को कहा था.

● क्या गृह मंत्री अनिल देशमुश कारोबारियों से वसूली कर रहे थे?
20 मार्च को परमबीर सिंह ने आरोप लगाया कि देशमुख ने फरवरी मध्य में अपने बंगले पर वाझे से मिलकर बार, रेस्तरां वगैरह से 100 करोड़ रु. महीना उगाहने को कहा था. देशमुख इन आरोपों से साफ इनकार करते हैं.

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