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आवरण कथा-उनके नायक, हमारे नायक

भाजपा यह भरोसा दिलाकर ओबीसी और दलित समुदायों में अपनी पैठ बनाने में कामयाब रही कि हिंदुत्व के राष्ट्रवाद में उनकी भी भूमिका है. पर क्या वही सब 2019 में भी काम करेगा?

फोटो क्रेडिट-सोनू किशन फोटो क्रेडिट-सोनू किशन

चुनावी कामयाबी के लिए हिंदुत्व को व्यापक हिंदू जनसमर्थन की दरकार है. इसका मतलब है कि जातिगत पहचान को ज्यादा बड़े धार्मिक ढांचे में जज्ब किया जाए और जातिगत मुलाहिजों से ऊपर साझा हितों वाले हिंदू समुदाय को बढ़ावा दिया जाए. यह धार्मिक पहचान वोटों को लामबंद करने का आधार बन जाती है और बाकायदा अभियान चलाकर वोटरों को समझाया जाता है कि हिंदुओं में भले ही आंतरिक मतभेद हों, जिन्हें जातिगत विभाजन और तीखा करते हों पर व्यापक साझा हितों के लिए उन्हें एकजुट होना ही चाहिए. इसमें दो राय है ही नहीं कि जाति सामाजिक ऊंच-नीच का आईना है. आजाद भारत में गैर-बराबरी, जातिगत भेदभाव और प्रखर सियासी स्वर का नतीजा है कि दलितों और ओबीसी में इस व्यवस्था को खारिज करने का हौसला आया है. उन्होंने जाति की राजनीति को गले लगाया और सेकुलर समाज में अधिकारों और हकों का दावा किया, उस समाज में जिसमें उसूलन सब बराबर हैं और हर किसी को कामयाबी का मौका हासिल करने का हक है.

मंडल आयोग की रिपोर्ट के बाद परवान चढ़ी जाति की राजनीति 2014 तक अपने आप में हिंदुत्व की राजनीति की दुश्मन मालूम पड़ती थी, मानो हिंदुत्व की राजनीति केवल ऊंची जातियों के लिए है. चुनावी जरूरतों के चलते हिंदुत्व को गले लगाने वाली सियासी पार्टियों को जाति की राजनीति को जगह देनी पड़ी. हिंदुत्व को जाति के दावों को हथियाना पड़ा और जातिगत पहचान को 'धर्मपरायण' से बदलकर 'धर्मरक्षक' बनाना पड़ा. हिंदुत्व धर्म से जुड़े राष्ट्रवाद के आधार पर ऊंची जातियों को आसानी से लामबंद कर सकता है पर यह बात ओबीसी और दलित समुदायों को समझाने के लिए ज्यादा कड़े विमर्श की दरकार थी क्योंकि ये समुदाय 'ब्राह्मणवादी' मूल्य व्यवस्था को लेकर गहरे संदेह से घिरे थे और इसे हिंदुत्व से जोड़कर देखते थे.

हिंदुत्व ने जिन तरीकों से इन समुदायों में पैठ बनाई, उनमें तमाम जातियों के नायकों को अपनाना और हिंदू योद्धाओं के तौर पर उनका महिमामंडन करना शामिल था. हिंदुत्व के संगठनों ने ऐसे नायकों की 'जयंतियां' मनाने के लिए रकमें दीं, मूर्तियां स्थापित कीं और उनकी जातिगत पहचानों से बाहर उन्हें नायक का दर्जा दिया. कभी राजभरों के हीरो रहे सुहेलदेव सरीखे नायकों को आरएसएस ने हिंदू नायक करार दिया, क्योंकि कहते हैं कि उन्होंने गजनवी के जनरल को हराया था.

ऊंची जातियों के दमन का विरोध करने वाले बलदेव और दलदेव सरीखे पासी राजाओं के भी उत्सव मनाए गए, जो कभी बसपा जैसी पार्टियों के नायक और प्रतीक हुआ करते थे पर अब राष्ट्रीय हीरो हैं. इस तरह अपनाए गए नायकों में जाटव समुदाय के रविदास और सुपच ऋषि; बंधुआ मजदूरों के हकों के लिए लडऩे की वजह से मुसहर समुदाय में पूजित दीना-भद्री; अहीर नायक लोरिक यादव शामिल हैं. इनमें सबसे मशहूर सरदार वल्लभभाई पटेल (कुर्मी समुदाय के) हैं जिन्हें हिंदुत्व की किंवदंती के मुताबिक उनका हक नहीं दिया गया.

उत्तर प्रदेश में भाजपा ने 2014 में जातियों के नायकों को गले लगाने का मतपेटियों में जमकर फायदा उठाया. सुहेलदेव अब निचली जाति के प्रचंड राजा ही नहीं थे, विदेशी आक्रांता से राष्ट्र की रक्षा करने वाले थे. इसने राज्य के दलित और ओबीसी वोटरों को भाजपा के पाले में लाने में मदद की. भाजपा की अगुआई वाली सरकार ने गाजीपुर से दिल्ली की नई 'सुपरफास्ट' रेल का नाम भी सुहेलदेव पर रखा. हिंदुत्व की राजनीति ने चतुराई से जातियों के हीरो को राष्ट्रीय नायकों में मिला लिया और इस तरह हिंदुस्तान, हिंदू धर्म और हिंदुत्व को अखंड विचार में मिलाने में कामयाब रही.

यही वजह है कि पुलवामा, बालाकोट और राष्ट्रीय सुरक्षा पर भाजपा नेताओं की लफ्फाजी को राम मंदिर पर उनकी लफ्फाजी से अलग कर पाना मुश्किल है. 'विकास' भले ही 2014 का नारा हो, पर लगता है आतंकवाद और मंदिर भाजपा का मूल एजेंडा है. हिंदुत्व की राजनीति ने खुद को 'राष्ट्र' और 'राष्ट्रीय हित' के बराबर रखने की कोशिश की है, जिसके भीतर बाद में जाति को समाहित किया गया है.

आरएसएस ने हिंदी पट्टी के गैर-जाटव दलित समुदायों और गैर-यादव ओबीसी में बहुत काम किया है. उसने गुजरात से त्रिपुरा तक जनजातीय इलाकों में आदिवासियों, खानाबदोशों और दूसरी दरकिनार जातियों के बीच भी काम किया है. इसके पीछे इरादा हमेशा यूपी, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखंड में इन समूहों की राजनैतिक संभावना को गोलबंद करना और अपनी सेवा, अपने सामाजिक काम को कीमती वोटों में बदलना था. वक्त के साथ भाजपा जाति की चेतना को हिंदुत्व की चेतना के साथ जोडऩे में, जातिगत दमन के प्रतिरोध से हटकर जातिगत इतिहास की कीर्तियों और किंवदंतियों पर जोर देने में कामयाब रही. हिंदुत्व के विमर्श इन समुदायों के इतिहास, पहचान, संसाधनों, प्रतीकों और संस्कृतियों की फिर से व्याख्या करते हैं और उन्हें वेदों, पुराणों और राम के स्वयंभू हिंदू आख्यान से जोड़ते हैं.

इस आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने आकांक्षाओं की कहीं ज्यादा खामोश अपील के साथ राष्ट्रवादी और हिंदुत्व के रूपकों का तानाबाना खड़ा किया है. एससी और ओबीसी वोट जुटाने की गरज से भाजपा ने जाति आधारित पार्टियों के साथ गठजोड़ भी कायम किए हैं. केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल (उत्तर प्रदेश की कुर्मी जाति) की अगुआई वाले अपना दल या राज्य के पूरब में असरदार उत्तर प्रदेश के मंत्री ओमप्रकाश राजभर की अगुआई वाली सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के साथ उसके गठबंधन को ही लें. इस गठबंधन ने पांच साल पहले निश्चित ही मदद की थी. इसी लिहाज से बिहार में नीतीश कुमार और रामविलास पासवान को जोड़ा गया है.

ऊंची जातियों के हिंदू बड़े पैमाने पर हिंदुत्व की विचारधारा के साथ हैं ही. कई वैश्य समुदाय भी खुद को भारतीय जनता पार्टी का आधार मानते हैं. 2014 में व्यापक जाति गठजोड़ कायम किया गया था पर उसके बाद खासी उथल-पुथल हुई है. क्या भाजपा दलितों और ओबीसी को आगे भी समझा पाएगी कि उनकी भलाई पार्टी के साथ रहने में ही है और हिंदुत्व का राष्ट्रवाद दूसरे अल्पसंख्यक समुदायों को न भी शामिल करे पर उन्हें अपने में शामिल करता है?

(बद्री नारायण गोविंद बल्लभ पंत सोशल साइंस इंस्टिट्यूट, इलाहाबाद में प्रोफेसर हैं)

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