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उत्तर प्रदेशः भाजपा की जीत या हार सामान्य बात

साल 2021 में हुए प्यू सर्वे और सीएसडीएस लोकनीति और कई राष्ट्रीय सर्वेक्षण हमें बताते हैं कि भारत के सभी संप्रदायों के लोग यह मानकर चलते हैं कि भारत सबका है.

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सार्थक बने रहने का प्रयास विधानसभा चुनावों के दौरान वाराणसी में मतदान केंद्र पर मतदाता सार्थक बने रहने का प्रयास विधानसभा चुनावों के दौरान वाराणसी में मतदान केंद्र पर मतदाता

विधानसभा चुनाव 2022 उत्तर प्रदेश

हिलाल अहमद

उत्तर प्रदेश (यूपी) में हाल में संपन्न विधानसभा चुनाव के संदर्भ में मुस्लिम राजनैतिक भागीदारी का सवाल एक बार फिर उभरकर सामने आया है. वैसे तो मुसलमान सियासत को समझने के लिए मुस्लिम वोट बैंक का मुहावरा बरसों से प्रचलित है. लेकिन इस बार ऐसा लगता है कि मुस्लिम वोट बैंक के नाम की उतनी चर्चा नहीं हुई, जितनी पहले देखी गई है.

यही वजह है कि राजनैतिक विश्लेषक और गैर-भाजपाई राजनेता 'कितने मुसलमानों को टिकट दिया गया’, 'कितने मुसलमान जीतकर आए’, के लगे-बंधे विमर्श पर बात करने से कतरा रहे हैं. दूसरी तरफ, विश्लेषकों की ऐसी जमात है जो यह मानकर चलना चाहती है कि मुसलमान जब भी चुनाव में हिस्सा लेते हैं तो उनका मकसद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को हराना होता है.

उत्तर प्रदेश के मुसलमानों के राजनैतिक रुझानों के विश्लेषण के लिए यह जरूरी है कि हम इन दोनों लगे-बंधे तर्कों से आगे निकलकर बात करें. मुझे लगता है कि हमें उन प्रक्रियाओं और रुझानों को जानने की जरूरत है जो मुसलमानों के वोटिंग पैटर्न को निर्धारित करती हैं. मैं उत्तर प्रदेश के मुस्लिम राजनैतिक रुझानों की दो विशेषताओं का यहां उल्लेख करना चाहता हूं.

मुस्लिम राजनैतिक रुझान की पहली विशेषता हिंदुत्व विमर्श की स्वीकार्यता पर टिकी है. यहां इस बात का उल्लेख करना जरूरी है कि पिछले आठ वर्षों से राष्ट्रवाद और हिंदुत्व दो ऐसी अवधारणाओं के रूप में हमारे सामने आए हैं जिन्होंने राजनीति की आम फहम जबान को परिभाषित किया है. कोई भी राजनैतिक दल इस स्थिति में नहीं है कि वह राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के बरअक्स कोई वैकल्पिक विमर्श खड़ा कर सके.

उत्तर प्रदेश के मुसलमान इस सच्चाई से अच्छी तरह वाकिफ हैं. इसलिए जब भारतीय जनता पार्टी के नेता मुस्लिम विरोध को हिंदुत्व के मूल के रूप में परिभाषित करते हैं तो मुस्लिम मतदाताओं को कोई बड़ा आश्चर्य नहीं होता. इसी तरह जब गैर-भाजपाई दलों के नेता अपने आपको ज्यादा हिंदू साबित करने की मुहिम में शामिल होते हैं तो भी मुस्लिम मतदाता को कोई बड़ी हैरानी नहीं होती.

इसका सीधा सा अर्थ यह है कि मुस्लिम विरोध पर टिके राष्ट्रवाद और सार्वजनिक विमर्श का सांप्रदायिक होना मुस्लिम मतदाता के लिए बेहद सामान्य परिघटना बन चुकी है. वह इस देश के तथाकथित उदारवादी गैर-राजनैतिक बुद्धिजीवियों और पत्रकारों से इतर जानता है कि हिंदुत्व इस समय का सबसे सशक्त राजनैतिक विमर्श है और उसको इसी माहौल में अपने लिए रास्ता बनाना है. 

शायद यही कारण है कि 2014 से लेकर अब तक मुस्लिम राजनैतिक रुझानों में कोई आमूल परिवर्तन नहीं आया है. वे उत्तर प्रदेश में उसी तरह से मतदान करते रहे हैं जैसा कि वे 2014 से पहले करते आ रहे थे. सीएसडीएस लोकनीति के चुनाव विश्लेषण इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं.

उदाहरण के लिए साल 2017 के विधानसभा चुनाव में 41 फीसद मुसलमानों ने समाजवादी पार्टी (सपा) को वोट दिया था, जबकि कांग्रेस को 20 फीसद और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को 19 फीसद मुस्लिम मत गया था. उल्लेखनीय बात यह है कि उस चुनाव में भाजपा ने भी नौ फीसद मुस्लिम मत हासिल किए थे. इन आंकड़ों से यह साफ जाहिर है कि कोई भी एक पार्टी किसी भी तरह के मुस्लिम वोट बैंक से लाभान्वित होती नजर नहीं आती. 

अगर इन आंकड़ों को मुस्लिम सामाजिक संरचनाओं के संदर्भ में देखा जाए तो एक अलग तरह की तस्वीर उभरकर सामने आती है. यह सही है कि साल 2017 में समाजवादी पार्टी मुसलमानों की पहली पसंद बनी थी लेकिन अगर हम मुसलमानों को मुस्लिम ओबीसी और मुस्लिम जनरल वर्ग में बांटकर देखें तो हम यह पाते हैं कि 46 फीसद जनरल मुसलमानों ने समाजवादी पार्टी को वोट दिया था.

इसके बरअक्स समाजवादी पार्टी केवल 35 फीसद मुस्लिम ओबीसी का वोट हासिल कर पाई. लगभग यही स्थिति साल 2019 के चुनाव में भी देखने को मिलती है. इस लोकसभा चुनाव में सपा, बसपा और राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) ने एक महागठबंधन बनाया था. लगभग 72 फीसद मुसलमानों ने महागठबंधन को वोट किया था जबकि कांग्रेस की मुस्लिम वोट की हिस्सेदारी 15 फीसद थी.

सबसे दिलचस्प बात यह है कि साल 2019 के चुनाव में भी आठ फीसद मुस्लिम मतदाताओं ने भाजपा को वोट दिया. इस बार के चुनाव में भी हमें यही पैटर्न देखने को मिल सकता है. यहां यह स्पष्ट है कि मुसलमान सिर्फ भाजपा को हराने के लिए वोट नहीं कर रहे हैं बल्कि उनके लिए मौजूदा राजनैतिक परिवेश में अपना स्थान बनाने की एक ललक नजर आती है. शायद यही कारण है कि 2014 से मुस्लिम मतदान फीसद में कोई खास परिवर्तन नहीं आया है. 

पहचान की अदृश्यता समकालीन मुस्लिम राजनीति की दूसरी विशेषता है. हिंदुत्व विमर्श की अब तक की सबसे बड़ी असफलता यह रही है कि वह भारत के आम हिंदू को इस बात के लिए राजी नहीं कर पाया है कि वह यह मानना शुरू कर दे कि भारत सिर्फ और सिर्फ हिंदुओं का है. साल 2021 में हुए प्यू सर्वे और सीएसडीएस लोकनीति और कई राष्ट्रीय सर्वेक्षण हमें बताते हैं कि भारत के सभी संप्रदायों के लोग यह मानकर चलते हैं कि भारत सबका है.

इसके साथ ही साथ यह मान्यता बेहद सशक्त है कि सभी पंथों और धर्मों का सम्मान करना राष्ट्रवाद की बुनियादी शर्त है. दिलचस्प बात यह है कि मीडिया केंद्रित सार्वजनिक विमर्श इस तरह के मूल्यों और मान्यताओं को तकरीबन नजरअंदाज कर देता है. इसका नतीजा यह हुआ है कि राष्ट्रवाद की निहायत एकतरफा समझ स्थापित हो गई है और इस समझ में मुस्लिम पहचान के लिए कोई जगह नहीं है.

मुसलमान मतदाता इस अंतरविरोध को अच्छी तरह से समझता है. वह जानता है कि विविधता में एकता का विमर्श पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, लेकिन सार्वजनिक स्तर पर उसकी पहचान भारत विरोधी बना दी गई है. ऐसे में मुस्लिम समुदाय अपने आपको अदृश्य बनाने के प्रयास में लगे नजर आते हैं. वे अपनी मुस्लिम पहचान पर कायम हैं, लेकिन उसे व्यक्त करने के लिए वे जिन प्रतीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं वे मजहबी न होकर संवैधानिक हैं. नागरिकता कानून के खिलाफ हुआ आंदोलन इस तथ्य की सशक्त मिसाल है.   
  
आज की मुस्लिम राजनीति की ये दोनों विशेषताएं सकारात्मक हैं. ये हमें बताती हैं कि उत्तर प्रदेश के मुसलमान अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में चुनावी राजनीति को राज्यतंत्र के साथ अपनी राजनैतिक सार्थकता बनाए रखने का एक साधन मानते हैं. उनके लिए भाजपा की जीत या हार एक सामान्य परिघटना से ज्यादा कुछ नहीं है.

हिलाल अहमद सीएसडीएस में एसोसिएट प्रोफेसर और मुस्लिम पॉलिटिकल डिस्कोर्स इन पोस्टकोलोनियल इंडिया: मॉन्युमेंट्स, मेमोरी, कंटेस्टेशन पुस्तक के लेखक हैं

मुस्लिम विरोध पर टिका राष्ट्रवाद और सार्वजनिक विमर्श का सांप्रदायिक होना मुस्लिम मतदाता के लिए बेहद सामान्य परिघटना बन चुकी है.

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