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आवरण कथाः अर्थव्यवस्था बहाली का बेहतरीन नुस्खा

कोविड की दूसरी लहर ने देश की आर्थिक बहाली की नाजुक डोर पीछे खींच ली, बोर्ड  ऑफ इंडिया टुडे इकोनॉमिस्ट्स का नजरिया कि कैसे लौटेगी गाड़ी पटरी पर.

अदिति नायर, मुख्य अर्थशास्त्री, आइसीआरए अदिति नायर, मुख्य अर्थशास्त्री, आइसीआरए

रजनीश कुमार पूर्व चेयरमैन, भारतीय स्टेट बैंक

डी.के. जोशी मुख्य अर्थशास्त्री, क्रिसिल

अदिति नायर, मुख्य अर्थशास्त्री, आइसीआरए

एस.सी. गर्ग, पूर्व वित्त सचिव

पिनाकी चक्रवती, डायरेक्टर, नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ पब्लिक फोइनेंस ऐंड पॉलिसी

डी.के. श्रीवास्तव, मुख्य पॉलिसी सलाहकार, ईवाइ इंडिया

प्र अर्थव्यवस्था को कितनी बुरी मार पड़ी है? खासकर अनलॉक 2.0 धीरे-धीरे होता है तो मध्यावधि में वृद्धि दर का आकलन क्या है?

रजनीश कुमार: अर्थव्यवस्था बहाली की चढ़ती रफ्तार को कोविड की दूसरी लहर ने धीमा कर दिया. हालांकि दूसरा लॉकडाउन पहले वाले की तरह सख्त नहीं है, इसलिए अर्थव्यवस्था को वैसी चपत नहीं लगी, जैसी पिछली बार लगी थी. संक्रमण के मामले भी कम होने लगे हैं, यानी चरम स्थिति पार हो गई है.

इन हालात में इस लहर की आर्थिक मार 2021-22 की पहली तिमाही तक या खिसककर जुलाई तक जाने की संभावना है. इस मोड़ पर यही सबसे आशावादी तस्वीर उभरती है. इससे महामारी के प्रोटोकॉल पर अमल, वैक्सीन तथा मेडिकल आपूर्ति, स्वास्थ्य सुविधाएं, तीसरी लहर की तैयारी वगैरह के लिए थोड़ी मोहलत मिल जाती है. इसके अलावा लोगों का दुनिया से उठ जाना, रोजगार खत्म होना और उत्पादन बैठना, सब कुछ निराशाजनक ही है. 

डी.के. जोशी: जब तक 40 फीसदी आबादी को वैक्सीन नहीं लग जाती (अमेरिका और ब्रिटेन ने इसे अर्थव्यवस्था खोलने की पहली शर्त बनाया), डर बना रहेगा और राज्यों को पूरी तरह खोलने के पहले सवाधानी बरतनी होगी. हमें आशंकित तीसरी लहर के लिए भी तैयार रहना है.

आर्थिक गतिविधि पर इन सभी वजहों का असर विभिन्न सूचकांकों में दिखता है. पहली लहर में पर्यटन, होटल-रेस्तरां और हवाई यात्रा जैसे ठेका आधारित सेवाओं में कामकाज और रोजगार पर बड़ी मार पड़ी और इस साल भी उनकी हालत खस्ता है. इसी से वृद्धि दर के अनुमानों में संशोधनों का पता चलता है, जो कुछ महीने पहले के दहाई अंक से इकाई पर आ टिके हैं. अगर वैक्सीन की आपूर्ति योजना के मुताबिक अगस्त के बाद बढ़ती है और वैक्सीन लगाने की दर रफ्तार पकड़ती है तो वित्त वर्ष के दूसरे हिस्से और अगले वित्त वर्ष की संभावना उज्ज्वल होगी.

मध्यावधि में निजी निवेश और उत्पादन से जुड़ी सरकारी प्रोत्साहन योजनाओं की मदद से सालाना 6 और 6.5 फीसद वृद्धि दर की उम्मीद है. लेकिन कुल मिलाकर लंबी अवधि में अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा.

बढ़ती गैर-बराबरी और पारिवारिक बजट सिकुड़ने से आर्थिक बहाली कमजोर पड़ सकती है. फिलहाल, यह तय लगता है कि सरकार को भारी खर्च करना होगा-सिर्फ स्वास्थ्य क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि उसे हर तरह के नुक्सान की भरपाई करनी होगी.

एस.सी. गर्ग: 2019-20 में सिर्फ 4 फीसद की वृद्धि दर से 2020-21 में 7-8 फीसद तक सिकुड़ जाने के बाद 2021-22 में भी सुस्त बहाली, देश मानो थम गया है.

अर्थव्यवस्था 2018-19 के वास्तविक जीडीपी दर पर ठहरी हुई है, यह दुर्भाग्यपूर्ण है. इसका मतलब है कि करोड़ों की नौकरियां जा रही हैं और आमदनी टूट रही है. इससे सरकारी कर संग्रह को भी चपत लगी, सिर्फ पेट्रोलियम टैक्स ही कायम रहा, जिसे सरकार ने ढिठाई से बेहिसाब ऊंचा रखा हुआ है.

मध्यावधि संभावनाएं इस पर निर्भर करेंगी कि देश तीन प्रमुख पहलुओं पर कैसे आगे बढ़ता है—एक, कोविड संक्रमण पूरी तरह सामान्य हो जाता है. दो, सरकार भविष्य के एजेंडे पर जरो देती है. और तीन, कारोबार अपनी स्वाभाविक रफ्तार पकड़ लेते हैं. अगर ये सभी स्थितियां वृद्धि को प्रोत्साहन देने वाली हुईं तो देश 2022-23 से 7 से 8 फीसद वृद्धि दर की ऊंची पटरी पर चल पड़ सकता है. अगर सरकार अपना हिसाब  दुरुस्त नहीं कर पाती, या कारोबार रफ्तार नहीं पकड़ते तो देश 4-5 फीसद की निम्न वृद्धि दर की ओर फिसल जाएगा.

अदिति नायर: दूसरी लहर में खासकर ग्रामीण इलाकों में रोजना संक्रमण मामलों में तेज उछाल का लोगों की क्रय-शक्ति पर लंबे समय तक असर दिखेगा. इसके अलावा कोविड इलाज के भारी-भरकम खर्च और पेट्रोल-डीजल की ऊंची कीमतें ग्रामीण और शहरी इलाकों में खर्चने लायक आमदनी को कम कर सकती हैं.

हालंकि सुस्त घरेलू मांग कीमतों पर ऐसे दौर में अंकुश लगाएंगी, जब वैक्सीन से उपजी उम्मीदों ने उपभोक्त वस्तुओं की कीमतें दुनिया भर में बढ़ा दी हैं. इससे घरेलू उत्पादकों का पड़ता कम हो सकता है. लिहाजा, वित्त वर्ष 2022 में जीडीपी में दहाई वृ़द्धि दर की उम्मीदें हमेशा के लिए बुझ गई हैं. दूसरी बात यह है कि वैक्सीन लगाने से तीसरी कोविड लहर रुकती है, तो वित्त वर्ष 2022 के अंत में आर्थिक गतिविधियों में उठान दिख सकता है.

पिनाकी चक्रबर्ती: दूसरी लहर में देशव्यापी लॉकडाउन नहीं हुआ. वैक्सीन आ गई है, और उम्मीद है कि तीसरी लहर की रोकथाम के लिए पर्याप्त सावधानी हम बरत पाएंगे. बड़े पैमाने पर टीकाकरण ही सामान्य आर्थिक गतिविधि के लौटने की शर्त है.

डी.के. श्रीवास्तव: अर्थव्यवस्था को 2021-22 की पहली तिमाही में भारी झटका लगेगा. निर्माण, व्यापार, परिवहन, होटल और उत्पादन क्षेत्र में बुरा असर दिखेगा. सरकार दूसरी और अगली तिमाहियों में ठोस वित्तीय प्रोत्साहन देती है तो नुक्सान की कुछ भरपाई हो सकती है. टीकाकरण की रफ्तार बढ़ाई जाए.

2021-22 में 9-9.5 फीसद जीडीपी वृद्धि दर संभव है. 2020-21 के लिए एनएसओ का अस्थाई वृद्धि दर का अनुमान (-)7.3 फीसद है, इसके पहले उसका अनुमान (-)8 फीसद था. मध्यावधि में देश 7 फीसद दर हासिल करने और उसे बनाए रखने की दिशा में बढ़ सकता है.

प्र. इतनी नौकरियों के खत्म होने और छोटे उद्योग-धंधों के चौपट हो जाने के बाद आय में मदद के क्या उपाय हैं?

रजनीश कुमार: विशुद्ध रोजगार सर्वेक्षणों से पता चला है कि अनेक नौकरियां स्थायी रूप से समाप्त हो गईं जिससे बेरोजगारी में तेज वृद्धि हुई है. विश्व बैंक के ताजा आंकड़ों के अनुसार 2019 में देश की कुल श्रम शक्ति 49.5 करोड़ से घट कर 47.2 करोड़ हो गई. एक अनुमान के अनुसार, कर्मचारियों की तनख्वाह से निकलने वाला कुल ईपीएफओ और एनपीएस योगदान पिछले वित्त वर्ष की तुलना में लगभग 19 लाख रुपये कम था.

करीब 284 सूचीबद्ध कंपनियों के कर्मचारियों के खर्च के आंकड़ों के विश्लेषण में पाया गया कि वित्त वर्ष 2021 में बड़ी कंपनियों (1000 करोड़ रु. से अधिक कारोबार वाली) के कर्मचारियों को छोड़ कर, सभी कंपनियों के कर्मचारियों के खर्च में गिरावट आई है. बड़ी गिरावट छोटी फर्मों में दिखी.

आय में इजाफे के लिए उद्योग-धंधों को मदद की दरकार है. देश में सबसे अधिक रोजगार वाले खुदरा, आतिथ्य और एमएसएमई क्षेत्र के लिए प्रोत्साहन पैकेज के साथ तत्काल नकद राहत की आवश्यकता है.
 
डी.के. जोशी: भारतीय रिजर्व बैंक ने कई बिलकुल ठीक कदम उठाए हैं. मसलन, सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों की मदद और कोविड के खिलाफ लड़ाई में अग्रिम मोर्चे पर मौजूद स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में नकद प्रवाह बढ़ाने के साथ ही माइक्रोफाइनेंस संस्थानों और छोटे तथा मझोले उद्यमों को समर्थन. लेकिन राजकोषीय नीति में अपेक्षित बदलाव नहीं हो रहा है, जो इस कठिन समय में अधिक प्रभावी हस्तक्षेप कर सकती है.

सबसे अधिक तकलीफ में शहरी गरीबों की मदद के लिए विशिष्ट और तत्काल उपायों की आवश्यकता है. ग्रामीण भारत में संक्रमण तेजी से बढ़ा है, इसलिए लंबे समय से उपेक्षित रहे ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे को बेहतर करने के लिए खर्च करने की दरकार है. रोजगार बढ़ाने और आजीविकाओं की रक्षा के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत आवंटन जरूर बढ़ाया जाना चाहिए.

एस.सी. गर्ग: सही मदद कार्यक्रम के लिए यह देखने की जरूरत है कि कौन से व्यवसाय पीड़ित हैं और किन्हें पटरी पर लाया जा सकता है. मोटे तौर पर अपरिवर्तित मांग और अनुकूल मानसून की प्रकृति के कारण पहले लॉकडाउन में कृषि पर फर्क नहीं पड़ा. लॉकडाउन 2.0 में भी शायद यह अप्रभावित रहेगी.

दुनिया भर में अधिकांश खाद्य और अन्य कृषि वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हुई है. आयात की काफी मांग है जिसके कारण पिछले साल भारतीय कृषि निर्यात में काफी वृद्धि हुई. अफसोस की बात है कि जिंसों की कीमतों में उछाल के इस दौर में भी सरकार को 40 प्रतिशत से अधिक गेहूं की फसल की खरीद करनी पड़ी और प्रधानमंत्री किसान योजना को जारी रखना पड़ा. न्यूनतम समर्थन मूल्य तथा इनपुट सब्सिडी खत्म करने जैसे कृषि सुधारों यह सही समय है. इनके स्थान पर आय सहायता कार्यक्रम लागू किए जाने चाहिए, जिनसे किसानों और कृषि का बहुत भला होगा.

देश में असंगठित छोटे धंधों में लगे लोगों का कोई डेटाबेस नहीं है. सरकार को ऐसे उद्योग-धंधों और श्रमिकों तक पहुंच बनाकर उन्हें प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता प्रदान करनी चाहिए. इन धंधों को बैंक ऋण नहीं मिलता है. पिछले 12 महीनों में चार बार विस्तार के बावजूद कुल तीन लाख करोड़ रुपए की भी गारंटी न प्रदान कर सकी आपात ऋण साख गारंटी योजना का विस्तार करने से कोई लाभ नहीं है क्योंकि यह 90 फीसद छोटे धंधों के लिए कारगर नहीं है. 

अदिति नायर: दूसरी लहर के दीर्घकालिक असर को देखते हुए, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में मांग बढ़ाने के लिए मदद की आवश्यकता पड़ सकती है. अभी अप्रैल-मई 2021 के लिए घोषित मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध कराकर ऐसा किया जा सकता है. इसके अतिरिक्त, लक्षित नकद हस्तांतरण पर विचार किया जा सकता है. श्रमिक ग्रामीण क्षेत्रों में लौट गए हैं, इसलिए  मनरेगा आवंटन में वृद्धि से सबसे निचले पायदान के लोगों को मदद मिल सकती है और मांग बनाए रखी जा सकती है. इसके अलावा, पेट्रोल-डीजल की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर हैं, उत्पाद शुल्क में कटौती से खासकर शहरी क्षेत्रों में मदद हो सकती है, .

पिनाकी चक्रवर्ती: पहली लहर के दौरान रुकी हुई मांग का लाभ मिला तो कुछ भरपाई हुई थी. दूसरी लहर में ऐसा नहीं है. मध्यम अवधि में मांग कमजोर रह सकती है. श्रेणीबद्ध तरीके से राजकोषीय और मौद्रिक दोनों तरह की मदद की दरकार है.

डी.के. श्रीवास्तव: शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारों को तत्काल सहायता की आवश्यकता है. यह पहली और दूसरी तिमाही में सबसे जरूरी है. एमएसएमई क्षेत्र में भी तेजी से गतिविधियां शुरू हों तो मदद मिल सकती है, बशर्ते उसे रियायती दरों पर ऋण प्राप्त हो. केंद्र के शुद्ध कर राजस्व में अप्रैल, 2021 में आई तेज उछाल की मदद से ऐसा करना आसान होगा.

ध्यान रहे कि सीजीए के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2020 में लगभग 21,000 करोड़ रुपए की तुलना में अप्रैल 2021 में कुल राजस्व 1.31 लाख करोड़ रुपए था. यह भी तय करना चाहिए कि राजस्व प्राप्तियां कम रहें तब भी खर्च में कमी न हो. राजस्व कम पड़े तो उसे अतिरिक्त उधारी से पूरा किया जाना चाहिए.

‘‘मनरेगा में आवंटन बढ़ाने से सबसे निचले पायदान की आबादी को आर्थिक मदद मिल सकती है और मांग बनाए रखी जा सकती है’’
—अदिति नायर

प्र. सरकार की प्राथमिकता में किस किस्म का बदलाव होना चाहिए? क्या यह मोदी सरकार के लिए 1991 जैसा क्षण है, यानी उसे कुछ बड़े बदलाव करने की कोशिश करनी चाहिए?

रजनीश कुमार: बदहाल क्षेत्रों को सीधे वित्तीय प्रोत्साहन देना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. कोविड पीड़ितों के परिवारों को सीधे नकद हस्तांतरण की भी जरूरत है ताकि टूट चूकी खपत कुछ बढ़े. मंदी के पहले के दौर में ऐसा नहीं हुआ, मगर इस बार निजी खपत घटी, सेवा क्षेत्र और कम हुनरमंद कामगारों की छंटनी हुई है.

समाज के सबसे कमजोर तबकों को सीधे वित्तीय सहायता वक्त की जरूरत है. सरकार को खासकर व्यापार और वाणिज्य के केंद्रों में टीके लगाने को प्राथमिकता देनी चाहिए, ताकि कारोबार तेजी से खुल सकें. साथ ही, टेक्नोलॉजी कारोबारों के चलते रहने में अहम भूमिका निभाती है, इसलिए सरकार को टेक्नोलॉजी के बुनियादी ढांचे में निवेश करना चाहिए.

डी.के. जोशी: यह 1991 के संकट से ज्यादा बड़ी चुनौती है—आर्थिक के साथ-साथ मानवीय संकट भी है. फिर 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था सकारात्मक जीडीपी वृद्धि के साथ बढ़ रही थी, जबकि 2021 के वित्तीय साल में यह तकरीबन 8 फीसद सिकुड़ गई है.

फिर भी पहली प्राथमिकता लोगों की सेहत ही होनी चाहिए. इसका मतलब है समूची आबादी को जल्द से जल्द टीके लगाना और वैक्सीन की दूसरी डोज का समय पर इंतजाम करना. अमेरिका और ब्रिटेन सरीखे उन्नत देशों से हम सीख सकते हैं कि लक्ष्य रखकर उन सेवाओं को ज्यादा तेजी से सक्रिय किया जा सकता है, जिनमें एक-दूसरे का संपर्क जरूरी है. जब तक हम यह नहीं हासिल कर लेते, राजकोषीय नीति को कमजोर उद्योग-धंधों और घर-परिवारों को उबारने के लिए उदारता से मदद का हाथ बढ़ाना ही चाहिए.

एस.सी. गर्ग: 1991 आर्थिक, वित्तीय और राजकोषीय नीतियों के ढांचागत बदलाव का क्षण था. असल में देश ने बदलाव के ऐसे दो क्षण देखे-1951 और 1991. 1951 में देश ने समाजवाद की राह पकड़ी, जो शुरुआत में भावनात्मक तौर आकर्षक थी लेकिन अंतत: बहुत नुक्सानदायक और महंगी साबित हुई. 1991 में देश में बड़े ढांचागत सुधार शुरू करके अर्थव्यवस्था को फिर पटरी पर लाने के लिए विदेशी मुद्रा संकट का इस्तेमाल किया गया. देश अपनी अर्थव्यवस्था को आज भी अनिवार्यत: 1991 के सुधारों के तहत ही चला रहा है.

देश 1991 के सुधारों की ज्यादातर ताकत का इस्तेमाल करने के बाद काफी समय से निचली वृद्धि में अटका है. अगला उछाल अगले ढांचागत सुधारों से आ सकता है और ये हैं सार्वजनिक क्षेत्र का निजीकरण, सरकार का केवल सार्वजनिक और लाभदायक सेवाएं मुहैया करवाने पर ध्यान देना और डिजिटल अर्थव्यवस्था की ताकत को पूरी तरह खोलना. सामान और सेवा क्षेत्र सहित ज्यादातर कारोबार ज्यादा से ज्यादा डिजिटल हो रहे हैं. देश में स्टार्ट-अप के लिए अनुकूल वातारण को बहुत ज्यादा बढ़ावा देने की जरूरत है.

इसके अलावा, भारत को पर्यावरण से जुड़े सामान और प्रदूषण को संभालने में भारी सरकारी निवेश की दरकार है. उसे डिजिटल अर्थव्यवस्था के माकूल बुनियादी ढांचे का निर्माण करने और उसे प्रोत्साहन देने की भी जरूरत है. सरकार के सामने इन सुधारों को भारत के लिए 2021 का क्षण बनाने का मौका है. 2021-22 के बजट में कुछ ऐलान ऐसे थे जिनसे सरकार के इस संकल्प का इशारा मिलता है कि वह 2021 के इस क्षण को पकड़ रही है. मगर इस एजेंडे को बढ़ाने और रफ्तार को बनाए रखने की जरूरत है.

इसमें  दो राय नहीं कि 2021 का यह दौर भारत को निक्वन मध्यम आय अर्थव्यवस्था की जकड़बंदियों से आजाद करने और 2035 तक 10 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के रास्ते पर ले जाने के लिए अंतिम जोर लगाने का मौका दे सकता है.

अदिति नायर: बीते एक साल में हमने सरकार को तमाम मौद्रिक उपायों के साथ-साथ कई किस्म के राजकोषीय कदम उठाते देखा है. 2022 के वित्तीय साल में हम उम्मीद करते हैं कि सरकार मौजूदा टूलकिट से ताकत लेगी.

ऊपर आय और मांग की सहायता के जो रूप बताए गए हैं, उनके अलावा फोकस के अन्य क्षेत्रों में इमरजेंसी क्रेडिट लाइन गारंटी स्कीम (ईसीएलजीएस) में आगे के जरूरी बदलाव और टीका अभियान के लिए धनराशि बढ़ाना शामिल हैं.

इस पड़ाव पर हल्का-सा जोखिम है कि वित्तीय साल 2022 में सरकार का राजकोषीय घाटा बजट अनुमान (15.1 खरब रुपए) से ज्यादा होगा, खासकर विनिवेश की प्राप्तियों में कमी की वजह से. लिहाजा वित्तीय प्रोत्साहन की गुंजाइश सीमित है और इसलिए असरदार ढंग से लक्ष्य साधना बेहद जरूरी है.

पिनाकी चक्रवर्ती: केंद्र और राज्यों दोनों की ओर से वृद्धि को बढ़ावा देने वाले पूंजीगत खर्चों और रोजी-रोजगार तथा सामाजिक सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी मदद में एक तरह का तालमेल होना चाहिए. 2021-22 के बजट में पूंजीगत खर्चों पर जोर दिया गया है.

डी.के. श्रीवास्तव: केंद्र और राज्य सरकारों दोनों को स्वास्थ्य पर खर्चों को प्राथमिकता देनी चाहिए. इसमें वैक्सीन की खरीद को तेज करना, स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे को बढ़ावा देने के लिए निर्माण कार्य हाथ में लेना और मौजूदा तथा नए अस्पतालों में स्वास्थ्य पेशेवरों को लाना शामिल है. इसके अलावा सरकार को पूंजीगत खर्चों पर ध्यान देकर उस क्षेत्र में खर्च करना चाहिए जिसे 'सार्वजनिक प्रशासन, प्रतिरक्षा और अन्य सेवाएं’ कहा जाता है.

साफ संकेत दिखाई दे रहे हैं. सीजीए डेटा के मुताबिक, खासकर केंद्र के पूंजीगत खर्च में अप्रैल 2020 के मुकाबले अप्रैल 2021 में 66.5 फीसद का इजाफा हुआ. मनरेगा और ऐसी शहरी योजना के जरिए ग्रामीण और शहरी आमदनियों को सहारा देकर मांग को मजबूती देने की भी जरूरत है.

प्र. तीसरी लहर की चिंताओं को देखते हुए आप स्वास्थ्य से जुड़े किन उपायों की सलाह देंगे, जिनसे कारोबार-धंधों को सहारा मिले और उपभोक्ताओं का भरोसा कायम हो?

रजनीश कुमार: हमारी बहुत बड़ी आबादी और वायरस की फितरत को देखते हुए जब तक हम तेजी से टीके नहीं लगाते हैं, तीसरी लहर के प्रकोप की काफी आशंका है. जो देश तेजी से और बड़े पैमाने पर अपने लोगों को टीके लगा रहे हैं, वहां संक्रमण का ग्राफ उतरने लगा है. साथ ही, स्वास्थ्य का बुनियादी ढांचा विकसित करने पर जोर देने से भरोसा पैदा होगा.

डी.के. जोशी: और तेजी से टीके लगाएं, स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे को, खासकर ग्रामीण इलाकों में उन्नत बनाएं और उद्योग-धंधों, रोजी-रोजगार तथा घर-परिवारों के लिए वित्तीय सहायता देने के कार्यक्रम शुरू करें.

एस.सी. गर्ग: देश को सार्वजनिक और निजी दोनों तरह की स्वास्थ्य सुविधाओं और बुनियादी ढांचे का विस्तार करना होगा. देश की स्वास्थ्य सेवाओं में सबसे ज्यादा किल्लत डॉक्टरों और पारा-मेडिकल स्टाफ का है. कई संकीर्ण वजहों से मेडिकल एसोसिएशन सहित भारतीय नीति-निर्माताओं ने मेडिकल शिक्षा का विस्तार नहीं होने दिया. देश की जरूरतों को पूरा करने के लिए, और इस क्षेत्र में निर्यात के जबरदस्त अवसरों का फायदा उठाने के लिए भी, देश को डॉक्टर और पारामेडिकल स्टाफ तैयार करने पर जोर देना चाहिए.

चिकित्सा उपकरणों के उत्पादन के लिए पीएलआइ किस्म की योजनाओं के अलावा देश को चाहिए कि देश के हरेक कस्बे में निजी क्लिनिक स्थापित करने के लिए प्रोत्साहन देने का कार्यक्रम प्राथमिकता के आधार पर चलाए.

सरकार ने 2021-22 के बजट में टीकाकरण के लिए 35,000 करोड़ रुपए मुहैया करके अच्छी शुरुआत की. ये 100 करोड़ लोगों को वैक्सीन की दो दो डोज देने के लिए काफी होने चाहिए. मैं समझ नहीं पाता कि ऐसा क्यों है, लेकिन केंद्रीय टीकाकरण कार्यक्रम को खासा हल्का कर दिया गया है. अच्छा होगा कि केंद्र कमर कस ले और देश में केंद्रीय तालमेल के साथ, एक ही जगह खरीदे गए टीकों के साथ एक ही बिंदु से निगरानी में टीकाकरण कार्यक्रम चलाए.

सरकार के लिए सबसे अहम उपाय यह होगा कि वह स्वास्थ्य क्षेत्र के सार्वजनिक बुनियादी ढांचे में नए सिरे से भारी निवेश करे. एम्स का विस्तार सर्वाधिक स्वागतयोग्य है. ज्यादा अहम यह होगा कि जिला अस्पतालों और सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों का कायाकल्प करके उन्हें जिलों और कस्बों में चिकित्सा सेवा के सक्रिय और हमेशा तत्पर रहने वाले केंद्रों में बदले. इन सुविधाओं में दस गुना निवेश बढ़ाने की जरूरत है.

अदिति नायर: युवा वयस्कों के लिए ज्यादा तेजी से टीके लगाने की शुरुआत होनी चाहिए, जो आर्थिक गतिविधि के एक बेहद अहम इंजन की तरह हैं, मौजूदा मोड़ पर भरोसा बढ़ाने वाला प्रमुख उपाय होगा. इसके अलावा बच्चों को वैक्सीन लगाने की रफ्तार तेज करने और बच्चों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाने पर ध्यान देने से संभावित तीसरी लहर को लेकर पैदा चिंताएं कुछ कम होंगी.

पिनाकी चक्रवर्ती: इसका ज्यादातर वास्ता लोगों के व्यवहार में आने वाले बदलावों से है. कोशिश यह होनी चाहिए कि लोग कोविड की रोकथाम के माकूल व्यवहार करें और टीके लगाने के लिए आगे आएं. हमें सजग रहना होगा और अपने लोगों को यथासंभव तेजी से टीके लगाने होंगे ताकि हमें फिर लॉकडाउन से न गुजरना पड़े.

डी.के. श्रीवास्तव: पहली प्राथमिकता टीकाकरण कार्यक्रम में तेजी लाकर कोविड की तीसरी लहर के असर से बचने या उसे कम करने की होनी चाहिए. शहीर बस्तियों और खासकर घनी बसी आवादी वाली बस्तियों में पूरी तरह टीके लगाने चाहिए. इसमें युवा आबादी (12 साल की उम्र से ऊपर की) शामिल हो.

स्वास्थ्य पर बजट में तय पूंजीगत खर्च में अच्छी-खासी बढ़ोतरी करके स्वास्थ्य का अतिरिक्त बुनियादी ढांचा खड़ा करने पर सरकारी खर्च करने से चक्रवृद्धि प्रभाव के जरिए मांग को सहारा मिलेगा. पूरे साल लगातार वित्तीय प्रोत्साहन की गुंजाइश है और कारोबार-धंधों को कम ब्याज दरों पर कर्ज मुहैया करवाया जाए और कुछ हद तक वित्तीय प्रोत्साहन दिया जाए. 

‘‘समूचे देश में केंद्रीय पहल में एक तरह की ख्ारीद और निगरानी व्यवस्था में टीकाकरण कार्यक्रम चलाया जाए’’
—एस.सी. गर्ग

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