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आवरण कथाः पिछड़ों के लिए संग्राम

हर पार्टी के लिए ओबीसी वोट महत्वपूर्ण है, इसीलिए विपक्षी पार्टियां जाति जनगणना की जोरदार मांग कर रही हैं. सत्ताधारी भाजपा को अंदेशा है कि इससे उसकी सोशल इंजीनियरिंग की रणनीति बिगड़ जाएगी और अगड़ी जाति का मुख्य जनाधार बिखर जाएगा.

इस साल जून में ओबीसी आरक्षण के लिए थाणे में भाजपा समर्थकों का चन्न्का जाम आंदोलन इस साल जून में ओबीसी आरक्षण के लिए थाणे में भाजपा समर्थकों का चन्न्का जाम आंदोलन

जद (यू) प्रमुख और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 23 अगस्त को अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी राजद नेता तेजस्वी यादव के साथ एक असहज गठजोड़ किया. तेजस्वी राज्य विधानसभा में विपक्ष के भी नेता हैं. इन दोनों ने बिहार की 10 दूसरी पार्टियों के नेताओं के साथ दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मुलाकात कर जाति आधारित जनगणना की मांग की, हालांकि केंद्र सरकार ने जुलाई में ही संसद में कह दिया था कि ''नीतिगत मामले के तहत’’ जाति जनगणना 2021 की जनगणना का हिस्सा नहीं होगी.

दो कट्टर प्रतिद्वंद्वियों को एकजुट कर देने वाली जाति जनगणना की जोरदार मांग का मुख्य उद्देश्य ओबीसी (अन्य पिछड़ी जातियों) की संख्या तय करना है, जो हाल में चुनावी राजनीति में सबसे ज्यादा प्रभावशाली मतदाता समूह के रूप में उभरे हैं.

हालांकि इसका कोई सरकारी आंकड़ा नहीं है लेकिन धारणा है कि कुल आबादी में ओबीसी का हिस्सा 52 फीसद है (चार दशक पहले मंडल आयोग 1931 में की गई आखिरी जाति जनगणना के आधार पर इतना ही अनुमान लगाया था). लिहाजा उन्हें 27 फीसद आरक्षण मिलना चाहिए. अगर जाति जनगणना में इस धारणा की पुष्टि हो गई तो मौजूदा आरक्षण व्यवस्था में बदलाव की पुरजोर मांग उठ सकती है. 

इसमें दांव पर होंगे देशभर में केंद्र और राज्यों की 90 लाख से ज्यादा सरकारी नौकरियां और 23 लाख इंजीनियरिंग सीटों और 80,000 से ज्यादा मेडिकल सीटों समेत शैक्षिक संस्थाओं में दाखिले. भाजपा नीत केंद्र सरकार दूसरे जाति समूहों, खासकर अगड़ी जातियों की नाराजगी मोल लेने के डर से यथास्थिति बदलने से हिचक रही है. लेकिन खासकर उत्तर प्रदेश में अगले छह महीने के अंदर विधानसभा चुनाव के मद्देनजर अब यह मुद्दा महत्वपूर्ण हो गया है, जहां भाजपा दूसरी बार सत्ता में आने का प्रयास कर रही है.

पिछड़ों के लिए संग्राम
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इसी वजह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो खुद ओबीसी समुदाय से हैं, के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने अपने कैबिनेट सहयोगी राजनाथ सिंह के 2018 में किए वादे से मुकर गई है. राजनाथ सिंह ने वादा किया था कि 2021 की जनगणना में ओबीसी की संख्या जुटाई जाएगी. इस बीच दूसरी राजनैतिक पार्टियां इस मांग के जरिए न केवल ओबीसी को रिझाना चाहती हैं बल्कि भाजपा को उसके चुनावी शस्त्रागार के कुछ महत्वपूर्ण हथियारों से वंचित कर देना चाहती हैं.

विकासशील समाज अध्ययन केंद्र (सीएसडीएस) ने पाया कि भाजपा का ओबीसी वोट प्रतिशत 2009 में 22 फीसद से बढ़कर 2019 में 44 फीसद हो गया. 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 403 सदस्यीय विधानसभा में 312 सीटें जीतीं और उसका ओबीसी वोट प्रतिशत 47 फीसद था. फिलहाल राज्य में उसके 32 फीसद विधायक ओबीसी समुदाय के हैं जो 10 साल पहले के मुकाबले 20 फीसद ज्यादा हैं.

लेकिन दूसरी पार्टियां ओबीसी वोट के लिए भाजपा को चुनौती देना चाहती हैं. जाति जनगणना की मांग सिर्फ बिहार के नेताओं ने ही नहीं की है, बल्कि कांग्रेस, एनसीपी, द्रमुक, सपा और बसपा समेत लगभग सभी दूसरी गैर-भाजपाई राजनैतिक पार्टियों ने की है. भगवा पार्टी के ऐसा कराने से इनकार के कारण विपक्षी दलों को मोदी सरकार और खासकर उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार के खिलाफ नया हथियार मिल गया है.

समाजवादियों और कांग्रेस ने ओबीसी सम्मेलनों का आयोजन शुरू कर दिया है और बसपा भी हंगामा कर रही है. अन्य पिछड़े वर्गों के कल्याण पर संसद की संयुक्त समिति के सदस्य और बसपा के सांसद शिरोमणि वर्मा का कहना है, ‘‘हमने हमेशा कहा है कि ओबीसी को उनका हक मिलना चाहिए और इसके लिए उन्हें आबादी में अपना हिस्सा मालूम होना चाहिए.’’

पिछड़ों के लिए संग्राम
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मोदी सरकार के लिए शर्मिंदगी की एक बात और है कि जद (यू) और अपना दल जैसे गठबंधन सहयोगियों ने भी यही राग अलापना शुरू कर दिया है. यहां तक राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) ने भी इस विचार पर मुहर लगाई है. आयोग के चेयरमैन डॉ. भगवान लाल सहनी का कहना है, ''आयोग का मानना है कि ओबीसी की जनगणना होनी चाहिए. अब सरकार के काम करने की बारी है.’’

मुश्किल में फंस चुकी भाजपा का अब कहना है कि पार्टी ‘‘सिद्धांतत:’’ इस विचार के विरुद्ध नहीं है लेकिन इस मुद्दे पर ‘‘व्यापक सहमति’’ चाहती है. पार्टी के भीतर भी विरोधाभास हैं. पार्टी की सांसद संघमित्रा मौर्य ने लोकसभा में यह मांग उठाई और केंद्रीय शिक्षा मंत्री व ओबीसी नेता धर्मेंद्र प्रधान ने जाति आधारित जनगणना को ''क्रांतिकारी प्रक्रिया’’ करार दिया. ओबीसी संसदीय संयुक्त समिति के सदस्य और भाजपा सांसद राजेश वर्मा का कहना है, ''प्रधानमंत्री मोदी इस मामले पर गंभीरतापूर्वक विचार कर रहे हैं. हमने इस विचार को खारिज नहीं किया है लेकिन इस मुद्दे पर संसद में पहले बहस होनी चाहिए.’’

जाति जनगणना की अचानक मांग क्यों
जाति जनगणना की मांग में तेजी 4 मार्च को सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद शुरू हुई, जिसमें अदालत ने महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों में 27 फीसद ओबीसी कोटे को समुदायों के पिछड़ेपन के प्रायोगिक आंकड़ों की कमी की वजह से खारिज कर दिया था. लेखक, पुणे विश्वविद्यालय में महात्मा फुले चेयर के प्रमुख और ओबीसी एक्टिविस्ट प्रो. हरि नरके कहते हैं, ‘‘राज्य जाति जनगणना इसलिए चाहते हैं क्योंकि 9,00,0000 ओबीसी प्रतिनिधि देश में अपना पद गंवा सकते हैं, जिनमें अकेले महाराष्ट्र में 56,000 हैं.’’

देश की जनगणना में एससी/एसटी की गणना होती है जबकि दूसरी जातियों—'सामान्य’ (मुख्यत: अगड़ी जातियां) और ओबीसी—की गणना नहीं की जाती. एससी/एसटी को कुल आबादी में उनकी संख्या क्रमश:—15 और 7.5 फीसद—के अनुपात में सरकारी नौकरियों और शैक्षिक संस्थाओं में आरक्षण दिया गया है.

सरकार कानूनी बाधा के कारण अपनी मर्जी से ओबीसी आरक्षण में इजाफा नहीं कर सकती. सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में फैसला सुनाया था कि नौकरियों में 50 फीसद से ज्यादा आरक्षण जाति पर आधारित नहीं हो सकता. आरक्षण में एससी और एसटी का हिस्सा 23 फीसद होने की वजह से ओबीसी का हिस्सा बढ़ाने की ज्यादा गुंजाइश नहीं है.

प्रायोगिक आंकड़े जाति आधारित जनगणना से ही मिल सकते हैं, लिहाजा इसकी मांग बढ़ गई; इसी से चुनावी उद्देश्य भी सध जाएगा. कांग्रेस के राज्यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी कहते हैं, ''भाजपा सांसद और सहयोगी दलों समेत राजनैतिक फलक के ज्यादातर लोगों ने इसका समर्थन किया और जाति जनगणना की मांग की है.’’

ओबीसी मुद्दे उठाने की बेसब्री इन समुदायों के चुनावी महत्व की वजह से अचानक उभरी है. पिछले तीन दशकों में यह समुदाय—या इसके घटक—सपा, राजद और जद (यू) जैसी जाति आधारित पार्टियों की रीढ़ रहे और वे दो राष्ट्रीय पार्टियों—भाजपा और कांग्रेस—के बदलते भाग्य में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं.

इसकी भव्य एकता संसद से ज्यादा कहीं और नहीं दिखती. हाल में संपन्न संसद के मॉनसून सत्र में विपक्ष ने पेगासस जासूसी प्रकरण में सरकार की भूमिका का विरोध करते हुए किसी बहस में हिस्सा नहीं लिया. लेकिन जब राज्यों को किसी भी जाति समूह को ओबीसी घोषित करने का अधिकार देने वाला 127वां संविधान संशोधन विधेयक आया तो सभी पार्टियों ने न केवल बहस में हिस्सा लिया बल्कि एक साथ इस विधेयक के पक्ष में वोट भी कर दिया.

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ओबीसी जनगणना के प्रति भाजपा की अनिच्छा

कई राजनैतिक विश्लेषकों का कहना है कि जाति आधारित जनगणना से भाजपा और उसके पारंपरिक जातीय समीकरण के लिए बड़ी दुविधा की स्थिति खड़ी हो सकती है. हालांकि भाजपा की मातृ संस्था आरएसएस के सह-सर कार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने अगस्त में दोहराया कि संघ आरक्षण का पुरजोर समर्थन करता है लेकिन संघ जाति जनगणना के बारे में कुछ भी कहने से बच रहा है. इस विषय पर आरएसएस की समझ को, होसबले के पूर्ववर्ती सुरेश भैयाजी जोशी ने 2011 में रखा था. उन्होंने कहा था कि जाति आधारित जनगणना बाबा साहेब आंबेडकर जैसे नेताओं की तरफ से परिकल्पित जातिविहीन समाज के विचार के खिलाफ थी.

लेकिन, बात बस इतनी भर नहीं है. भाजपा पहले दो अगड़ी जाति समूहों—ब्राह्मणों और बनियों की पार्टी के रूप में उभरी थी लेकिन इसने बाद में समझ लिया कि केवल अगड़ी जाति के वोटों के बूते राजनीति में कामयाबी की ऊंची सीढ़ियां नहीं चढ़ी जा सकतीं. खासकर तब, जब वी.पी. सिंह के मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने के बाद ओबीसी जातियों ने महत्वपूर्ण राजनैतिक जमीन प्राप्त कर ली हो. इसके बाद पार्टी ने 'मंडल’ की राजनीति के जवाब में 'हिंदुत्व’ पर ध्यान केंद्रित कर राजनैतिक आधार को व्यापक बनाया.

उसने एक ऐसा विस्तृत दायरा तैयार किया जिसमें सभी हिंदू शामिल थे, चाहे वे किसी भी जाति से आते हों. यही वजह है कि भाजपा ने 1985 में अपनी भोपाल राष्ट्रीय कार्यकारिणी में मंडल आयोग को लागू करने की मांग करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया था, लेकिन बाद में अपना रुख बदल लिया और मंडल मुद्दे पर वी.पी. सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया और अयोध्या राम मंदिर आंदोलन को तेज कर दिया, जिसने उसे ओबीसी और दलितों को हिंदू के रूप में एकजुट करने में मदद की. 

विशेषज्ञों का मानना है कि भाजपा को डर है कि जाति जनगणना हिंदू वोटों को विभाजित कर देगी. इससे उसे ओबीसी के बीच अपनी पैठ मजबूत करने में मदद तो मिल सकती है, लेकिन सवर्णों की तीखी प्रतिक्रिया का भी सामना करना पड़ सकता है. सीएसडीएस के निदेशक संजय कुमार कहते हैं, ''अगर हमारे पास वास्तविक आंकड़े होंगे तो जाति आधारित क्षेत्रीय पार्टियां ओबीसी आरक्षण की 27 फीसद की सीमा को हटाने की मांग उठा सकती हैं.’’

आरक्षण ढांचे में बदलाव की कोई भी मांग सामाजिक अशांति और सवर्णों की ओर से तीव्र विरोध को फिर से जन्म दे सकती है जैसा कि मंडल आरक्षण व्यवस्था लागू होने के बाद देखा गया था. और भाजपा अपने मूल मतदाता आधार, सवर्णों को ठेस पहुंचाने का जोखिम नहीं उठा सकती.

पटना में एक भाजपा नेता कहते हैं, ''भाजपा के पास अल्पसंख्यक वोटों का सहारा नहीं है. हो सकता है कि ओबीसी के बीच हमारा प्रभाव थोड़ा बढ़ जाए, लेकिन इसका असली फायदा तो क्षेत्रीय दलों को होगा. जाति जनगणना में जोखिम-फायदे का अनुपात हमारे पक्ष में नहीं दिखता है.’’ 

वास्तव में, ओबीसी वोट बैंक को लुभाने की कोशिशों के बीच पार्टी हमेशा इस बात को लेकर चौकन्नी रही है कि सवर्णों के हितों को चोट न पहुंचे. 2019 में, मोदी सरकार ने सामाजिक ढांचे में ऊंची जगह रखने वाले समूहों, यानी आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यू) सवर्णों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की शुरुआत की. समाज विज्ञानी सुधा पई कहती हैं, ''कोई भी सरकार सवर्णों की नाराजगी को लेकर चिंतित होगी. हालांकि यह ओबीसी के हितों की हिमायती होने का दावा करती है लेकिन भाजपा, आखिरकार सवर्णों की ही पार्टी है. इसलिए, उसकी चिंता बड़ी है.’’

कई विश्लेषक इस विश्लेषण को नहीं स्वीकारते कि भाजपा को सवर्णों के विरोध का डर सता रहा होगा. अशोक यूनिवर्सिटी में आर्थिक डेटा और विश्लेषण के निदेशक अश्विनी देशपांडे कहते हैं, ''धर्म के इर्द-गिर्द बहुत संघर्ष और हिंसा है, लेकिन यहां केवल एक धर्म के लोगों की गिनती की जा रही है. गिनती से विवाद नहीं होता है. संघर्ष का वातावरण तो ध्रुवीकरण के एजेंडे वाले समूहों की तरफ से बनाया जाता है.’’

पिछड़ों के लिए संग्राम
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लखनऊ में गिरि इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज के एसोसिएट प्रोफेसर प्रशांत के. त्रिवेदी पिछले तीन दशकों में आकर्षक कॉर्पोरेट नौकरियों के अवसर बनने के साथ देश के सामाजिक आर्थिक परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव देखते हैं. वे कहते हैं, ''सरकारी नौकरियों को लेकर पुरानी सोच में बहुत बदलाव आ गया है. अब इसके लिए करो या मरो वाली पुरानी स्थिति नहीं रही.’’ 

लेकिन कुछ अन्य आशंकाएं भी हैं जिसके कारण भाजपा जाति जनगणना से हिचकिचा रही है. गुजरात में पाटीदार, महाराष्ट्र में मराठा और हरियाणा में जाट जैसे कई प्रमुख जाति समूह ओबीसी दर्जे की मांग को लेकर अक्सर हिंसक आंदोलन करते रहे हैं. इन विवादास्पद मांगों को हल किए बिना जातियों की कोई भी गिनती केंद्र के लिए बहुत संकटपूर्ण स्थिति बना सकती है. कुछ जाति समूहों के आधिकारिक वर्गीकरण पर भी कोई स्पष्टता नहीं है.

उदाहरण के लिए, जाटों को राजस्थान में ओबीसी का दर्जा प्राप्त है लेकिन हरियाणा या केंद्रीय सूची में नहीं. कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु और महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में ब्राह्मणों को भी ओबीसी सूची में जगह मिली है. भाजपा के ओबीसी विंग के राष्ट्रीय अध्यक्ष के. लक्ष्मण कहते हैं, ''कई व्यावहारिक मुद्दे हैं, जिन्हें पहले हल करने की जरूरत है. अन्यथा, यह 2011 की सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (एसईसीसी) की तरह ही खामियों भरी कसरत साबित होगी.’’

सेंटर फॉर पॉलिसी स्टडीज के निदेशक और ओबीसी के उप-वर्गीकरण पर गठित न्यायमूर्ति रोहिणी आयोग के सदस्य जे.के. बजाज इस बात से सहमत हैं कि एसईसीसी में विसंगतियां थीं, लेकिन उन्हें लगता है कि ऐसा इसलिए है क्योंकि गणनाकर्ताओं के पास जातियों की सूची नहीं थी.

बजाज कहते हैं, ‘‘कर्नाटक ने हाल के वर्षों में वास्तविक गणना से पहले सभी जातियों की एक व्यापक सूची के आधार पर एक राज्य स्तरीय जाति जनगणना की है.’’ वे आगाह करते हैं कि यह लंबी कवायद होगी, जिसमें समय लग सकता है और यह वर्तमान जनगणना में संभव नहीं हो सकता. कोविड महामारी के कारण पहले ही इसमें काफी देर हो चुकी है.

भाजपा नेता अब बड़ी चतुराई से गेंद राज्य सरकारों के पाले में डालने की कोशिश कर रहे हैं. भाजपा सांसद और अन्य पिछड़ा वर्ग कल्याण पर संसदीय समिति के पूर्व अध्यक्ष गणेश सिंह का कहना है कि ‘‘केंद्र ओबीसी की गिनती करे या न करे, लेकिन राज्यों को अपने दम पर यह कवायद शुरू करनी चाहिए.’’ भाजपा का अनुमान है कि कोई भी राज्य इसका जोखिम नहीं लेना चाहेगा क्योंकि परिणाम राजनैतिक और सामाजिक संतुलन को गंभीर रूप से बिगाड़ सकते हैं.

2015 में, कर्नाटक में सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने एक 'सामाजिक-आर्थिक और शिक्षा सर्वेक्षण’ किया था, जहां जाति का भी अलग जिक्र किया गया था लेकिन इसके परिणाम न तो कांग्रेस सरकार ने और न ही उसके बाद भाजपा की सरकार ने जारी किए. लीक हुए निष्कर्षों में अनुमान लगाया गया है कि राज्य के सबसे प्रभावशाली जाति समूहों में से एक लिंगायतों की आबादी 10 प्रतिशत (18 प्रतिशत के पहले के दावों के विपरीत) से भी कम है. राज्य के दो प्रमुख जाति समूहों—लिंगायतों और वोक्कालिगाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठनों ने इस सर्वेक्षण के परिणामों को सार्वजनिक किए जाने पर विरोध की धमकी भी दी थी.

भाजपा को लगता है कि राज्य इस तरह की कवायद से इस डर से कन्नी काटेंगे क्योंकि उन्हें आरक्षण का दायरा फिर से तय करना होगा. उदाहरण के लिए, कर्नाटक ओबीसी को 32 प्रतिशत आरक्षण देता है. 2015 की जाति गणना में कथित तौर पर पाया गया कि कुल आबादी में 24 प्रतिशत हिस्सा अनुसूचित जाति का है, जो उन्हें सबसे बड़ा समूह बनाता है. इससे वे अभी तक प्राप्त 15 प्रतिशत से अधिक आरक्षण कोटे की मांग कर सकते हैं. 

क्या भारत को जाति जनगणना की जरूरत है?

अधिकांश विशेषज्ञों का मानना है कि इसमें कोई बुराई नहीं है क्योंकि जातिगत पहचान भारत के सामाजिक-राजनैतिक अस्तित्व की वास्तविकता है. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर पॉलिटिकल स्टडीज के प्रोफेसर नरेंद्र कुमार पूछते हैं, ''जब संवैधानिक रूप से ओबीसी नामक एक श्रेणी बनाई गई है तो इस समूह की गिनती के सवाल पर बहस क्यों होनी चाहिए?’’

भाजपा के प्रतिद्वंद्वियों का तर्क है कि जाति की गिनती से सरकार को बेहतर नीतियां और कल्याणकारी कार्यक्रम तैयार करने में मदद मिलेगी. राजद के राज्यसभा सांसद और दिल्ली स्कूल ऑफ सोशल वर्क के प्रोफेसर मनोज के. झा कहते हैं, ''जाति जनगणना का उद्देश्य केवल पिछड़ी जातियों की संक्चया की जानकारी प्राप्त करना नहीं है.

यह एक बड़ी आबादी को सामाजिक-आर्थिक सोपान में उसकी वास्तविक स्थिति का आईना दिखाएगा. भारत जैसे कल्याणकारी राज्य में नीति-निर्माण और सामाजिक संतुलन के लिए, एक जनगणना अनिवार्य है.’’ जद (यू) के एक शीर्ष नेता का कहना है कि पार्टी समझती है कि जाति जनगणना से राज्य को ओबीसी में उन वर्गों की पहचान करने में मदद मिलेगी जो अभी भी समाज कल्याण की जद से बाहर हैं.

संसद में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, केंद्रीय मंत्रालयों और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में करीब 21 फीसद कार्यबल ओबीसी समुदाय से है. जहां प्राथमिक शिक्षा में ओबीसी की हिस्सेदारी 45 फीसद है, वहीं उच्च शिक्षा में उनका हिस्सा घटकर 37 फीसद रह गया है. भाजपा के लक्ष्मण का तर्क है कि गणना पर जोर के बजाए, कई राज्यों को आरक्षण को प्रभावी ढंग से लागू करने की जरूरत है क्योंकि 15,000 अधिसूचित ओबीसी समुदायों में से 9,500 को इसका लाभ भी नहीं मिलता है.

नारके का कहना है कि सरकार को ओबीसी के सामाजिक-आर्थिक उत्थान पर और अधिक खर्च करने की जरूरत है और इसके लिए गिनती जरूरी है. उनका दावा है, ‘‘इस साल के बजट में केंद्र ने पूरे वित्तीय वर्ष के लिए प्रति ओबीसी व्यक्ति सिर्फ 18 रुपए आवंटित किए.’’ गणेश सिंह स्वीकारते हैं कि आंकड़ों की कमी, ओबीसी बच्चों पर ध्यान केंद्रित करने में बाधक बने हैं. उनका कहना है, ''इसीलिए मैंने ओबीसी के लिए एक अलग फंड का सुझाव दिया.’’ 

भाजपा इस चक्रव्यूह से निकलने को क्या कर रही है

जहां केंद्र ने प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया है, वहीं भाजपा ने पहले ही विपक्षी दलों के खिलाफ आक्रामक शुरुआत कर दी है. 4 मार्च के शीर्ष अदालत के फैसले के बाद भगवा पार्टी ने महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन सरकार के खिलाफ राज्यव्यापी आंदोलन शुरू किया, जिसमें आरोप लगाए गए कि ठाकरे सरकार स्थानीय निकायों में ओबीसी का आरक्षण सुनिश्चित कराने में विफल रही है.

पार्टी ने यह भी घोषणा की कि अगर आरक्षण बहाल नहीं किया गया, तो वह आगामी स्थानीय निकाय चुनावों में केवल ओबीसी उम्मीदवारों को मैदान में उतारेगी. ठाकरे सरकार ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए मोदी सरकार से ओबीसी पर 2011 के एसईसीसी डेटा की मांग की ताकि वह इसे अदालत में अनुभवजन्य साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत कर सके. विडंबना यह है कि पिछली देवेंद्र फडणवीस की अगुवाई वाली भाजपा-शिवसेना सरकार ने भी केंद्र से इसी तरह की अपील की थी, जिसे खारिज कर दिया गया था.

भाजपा का ध्यान जवाबी कार्रवाई के अलावा अपनी छवि को सही करने पर भी है. मोदी मंत्रिपरिषद में ओबीसी सदस्यों की हिस्सेदारी मई 2019 के 13 से बढ़कर अब 27 हो गई है. और पार्टी चाहती है कि मतदाता इस पर ध्यान दें. पार्टी ने 27 ओबीसी मंत्रियों को सम्मानित करने के लिए दिल्ली में एक कार्यक्रम भी आयोजित किया. 127वें संविधान संशोधन अधिनियम के पारित होने के बाद, भाजपा अन्य बातों के अलावा ओबीसी को सशक्त बनाने के लिए केंद्र की ओर से किए गए कामों को प्रर्दिशत करने के लिए देश भर में 70 'मोदी समर्थन सक्वमेलन’ आयोजित करने की योजना बना रही है.

जुलाई में केंद्र ने अखिल भारतीय कोटे के तहत चिकित्सा और दंत चिकित्सा पाठ्यक्रमों में ओबीसी छात्रों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की. ओबीसी के क्रीमी लेयर के लिए आय सीमा भी 6 लाख रुपए से बढ़ाकर 8 लाख रुपये कर दी गई है (जो कि एनसीबीसी की सिफारिश के अनुसार 16 लाख रुपए तक भी जा सकती है). एनसीबीसी को मोदी सरकार में ही संवैधानिक दर्जा मिला. वहीं, भाजपा ओबीसी वोटों पर जाति आधारित पार्टियों के एकाधिकार को खत्म करने के लिए भी लगातार काम कर रही है.

भाजपा ने विभिन्न राज्यों में हाशिए पर पड़े ओबीसी समुदायों को रिझाने के बीच यह चर्चा शुरू कराई है कि क्षेत्रीय दल केवल प्रभावशाली ओबीसी जातियों की मदद करते हैं और इस तरह पूरे ओबीसी समुदाय के हिस्से का लाभ सिर्फ कुछ जातियां हथिया लेती हैं. सीएसडीएस के प्रो. कुमार कहते हैं, ''हर राज्य में प्रमुख ओबीसी जातियां एक विशेष पार्टी का समर्थन करती हैं.

मसलन, ओबीसी यादव बिहार में राजद और उत्तर प्रदेश में सपा का समर्थन करते हैं, लिंगायत कर्नाटक में जद (एस) का समर्थन करते हैं और कुर्मी बिहार में जद (यू) के लिए मतदान करते हैं. जहां ये क्षेत्रीय दल अपनी मूल समर्थन जाति पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, वहीं भाजपा ने बुद्धिमानी से अन्य ओबीसी जातियों को संगठित करने की कोशिश की है जिन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिल सका है.’’ 

यादवों के खिलाफ भाजपा का अभियान उत्तर प्रदेश में फायदेमंद रहा क्योंकि पार्टी ने पिछले दो लोकसभा चुनावों और 2017 के विधानसभा चुनाव में गैर-यादव ओबीसी वोटों का बड़ा हिस्सा हासिल किया. दूसरी ओर, कुर्मी बहुल अपना दल, राजभर बहुल एसबीएसपी और निषाद पार्टी जैसी गैर-यादव ओबीसी पार्टियों से भाजपा का गठबंधन बहुत कारगर रहा. 

आलोचक अब मान रहे हैं कि मोदी सरकार गैर-प्रमुख ओबीसी जातियों के बीच अपना आधार मजबूत करने के लिए रोहिणी आयोग की रिपोर्ट का उपयोग कर सकती है. उच्च न्यायालय की सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश जी. रोहिणी की अध्यक्षता में 2017 में गठित चार सदस्यीय आयोग ने इस बात की जांच की है कि ओबीसी को मिला 27 प्रतिशत आरक्षण किस प्रकार लागू किया जा रहा है.

सूत्रों के अनुसार, आयोग ने पाया कि केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश और सिविल सेवाओं में भर्ती के लिए दिए गए आरक्षण लाभ का 50 प्रतिशत, ओबीसी में शामिल करीब 6,000 जातियों और समुदायों में से केवल 40 जातियों ने हथिया लिया था. 27 फीसद ओबीसी आरक्षण कोटे के एक-चौथाई हिस्से पर सिर्फ 10 जातियों का एकाधिकार है.

यह भी पाया गया कि ओबीसी समुदायों के करीब 20 प्रतिशत लोगों को 2014 से 2018 तक आरक्षण कोटे का कोई लाभ नहीं मिला. समिति आरक्षण लाभ के समान वितरण के लिए केंद्रीय ओबीसी सूची में 2,633 ओबीसी उप-जातियों को चार समूहों में विभाजित करने की सिफारिश कर सकती है.

विशेषज्ञ उप-वर्गीकरण की इस कवायद को सही नहीं मान रहे, खासकर जाति गणना के अभाव में. प्रो देशपांडे पूछते हैं, ''सरकार की ओर से नियुक्त आयोग उप-वर्गीकरण के बारे में बात करता है, पर जब तक हमारे पास जातिवार आंकड़े नहीं होंगे, हम कैसे जानेंगे कि समान वितरण हुआ या नहीं?’’ फिर भी, ओबीसी जातियों का उप-वर्गीकरण कोई नई अवधारणा नहीं है. पहले से ही 11 राज्यों—पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, झारखंड, बिहार, जम्मू-कश्मीर, हरियाणा और पुदुच्चेरी—में ऐसी व्यवस्था है.

दलितों के उप-वर्गीकरण की व्यवस्था, जिसमें कई उपेक्षित दलित जातियों के महादलित के रूप में वर्गीकरण किया गया, से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अतीत में बहुत फायदे हुए हैं. इस तरह के प्रयोग को दोहराने के मकसद से आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश में ओबीसी आरक्षण संरचना को युक्तिसंगत बनाने के लिए मई 2018 में एक सामाजिक न्याय समिति बनाई.

समिति ने ओबीसी को तीन वर्गों—पिछड़ा वर्ग, अधिक पिछड़ा और सबसे पिछड़ा वर्ग—में विभाजित करने की सिफारिश की लेकिन उनकी सरकार इन सिफारिशों को लागू करने में टालमटोल करती आई है. इस ढुलमुल रवैये के साथ जाति जनगणना कराने से इनकार के कारण भाजपा के कुछ सहयोगी दल उससे छिटक गए हैं. भाजपा के सहयोगी रहे—एसबीएसपी और मौर्य समुदाय के प्रभुत्व वाला महान दल—दोनों दल अब सपा से घनिष्ठता बढ़ा रहे हैं.

आगे और नुक्सान से बचने के लिए, भाजपा को ओबीसी समूहों को एक छत के नीचे मजबूती से खड़ा करने के लिए एक नया फॉर्मूला खोजना होगा. इसने अतीत में ऐसा सफलतापूर्वक किया है जब भाजपा उत्तर प्रदेश में विपक्ष में थी. लेकिन केंद्र में सत्ताधारी दल के रूप में सात साल (और यूपी में चार साल) में पार्टी को अपने वादों और उन वादों को पूरा करने के बीच, बिल्कुल वैसा ही संतुलन बनाना पड़ा है जैसा रस्सी पर चलने के दौरान जरूरी होता है.ठ्ठ

—साथ में अमिताभ श्रीवास्तव और अनिलेश एस. महाजन.

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