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आवरण कथाः जेल और जमानत का खेल

जमानत देने के मामले में अदालतें अक्सर किसी ठोस मानदंड का पालन नहीं करतीं. इससे आरोपियों के आजादी के अधिकार की अनदेखी हुई है और साथ ही जेलों में कैदियों की संख्या बेहिसाब बढ़ गई है. अब वक्त आ गया है कि एक जमानत कानून बनाया जाए और न्यायिक ढांचे में आमूलचूल बदलाव किया जाए.

जेल या बेल जेल या बेल

सुपरस्टार शाहरुख खान के 23 वर्षीय बेटे आर्यन खान सोच रहे होंगे कि उन्हें बेहद तकलीफ का सामना करना पड़ा था. 3 अक्तूबर को उन्हें कथित तौर पर नशीले पदार्थों के 'सेवन, बिक्री और खरीद में शामिल होने’ के लिए कठोर प्रावधानों वाले नार्कोटिक्स ड्रग्स और साइकोट्रोपिक पदार्थ (एनडीपीएस) कानून 1985 के तहत गिरफ्तार किया गया.

मगर गिरफ्तारी के 17 दिन बाद भी जब विशेष अदालत ने उनकी जमानत की याचिका खारिज कर दी, तो उनके मामले ने जनता का ध्यान खींचा और अदालत के विवेकाधिकार का प्रयोग तीखी बहस का विषय बन गया. मजबूत कानूनी टीम के दम पर आर्यन ने 26 अक्तूबर को बॉम्बे हाइ कोर्ट में तुरंत सुनवाई का इंतजाम कर लिया और 28 अक्तूबर को आखिरकार उन्हें जमानत मिल गई, जो ऐसे मामलों में कम ही होता है. दूसरों के अनुभव तो और भी बदतर हैं.

इसके ठीक उलट पंजाब के 72 वर्षीय अरबपति कारोबारी चुन्नी लाल गाबा का हश्र देखिए. एक ड्रग रैकेट में शामिल होने के लिए उन्हें 2014 में गिरफ्तार किया गया. इस जून में गाबा को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा, क्योंकि उनकी जमानत याचिका पंजाब और हरियाणा हाइ कोर्ट में 17 महीनों से लंबित थी. यह जानकर शीर्ष अदालत स्तब्ध रह गई. उसकी टिप्पणी थी: 'आरोपी को जिन अपराधों का जिम्मेदार बताया गया है, वे गंभीर हों या न हों, पर नियमित जमानत की अर्जी का लिस्ट न होना हिरासत में लिए गए शख्स की स्वतंत्रता का हनन है.’

इसी तरह धार्मिक भावनाओं को कथित चोट पहुंचाने वाले लतीफे सुनाने के लिए गिरफ्तार किए गए कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी को एक महीने से ज्यादा जेल में रहना पड़ा, क्योंकि सेशन कोर्ट और मध्य प्रदेश हाइ कोर्ट ने उनकी जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं. आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जमानत दी और कहा कि आरोप 'अस्पष्ट’ थे और पुलिस ने आरंभिक जांच के बगैर उन्हें गिरफ्तार करने में 'प्रक्रिया का पालन नहीं किया’.

बात सिर्फ जाने-माने लोगों या नशे से जुड़े मामलों की नहीं है. सूरत की एक अदालत ने मार्च 2020 में 127 लोगों को आतंकवाद के आरोपों से बरी कर दिया. जी हां, उनकी गिरफ्तारी के 20 साल बाद! 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने छह लोगों को 2002 के अक्षरधाम आतंकी हमले के आरोपों से बरी किया जब वे दस साल जेल में बिता चुके थे.

जमानत का रास्ता
जमानत का रास्ता

भारतीय जेलों में इस वक्त बंद 4,78,600 कैदियों में से 3,30,487 या 69 फीसद विचाराधीन हैं और यह तथ्य बताता है कि भारतीय न्याय प्रणाली में जमानत नहीं बल्कि जेल नियम बन गया है. अंधाधुंध गिरफ्तारी, जांच में देरी और मुकदमों की सुस्त रफ्तार के चलते ज्यादातर विचाराधीन बंदियों को लंबे वक्त तक कैद में रहना पड़ता है. 2017 में जारी विधि आयोग की 268वीं रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में केवल 28 फीसद आरोपियों को जमानत मिलती है.

सुप्रीम कोर्ट में वकील अभिनव सेखरी के मुताबिक करीब आधे मुकदमों के अंत में अभियुक्त बरी हो जाते हैं और हरेक मुकदमे में कम से कम 1-3 साल लगते हैं. इसका असर न केवल भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में दर्ज व्यक्ति के स्वतंत्रता के बुनियादी अधिकार पर पड़ता है, बल्कि किसी के 'दोषी साबित होने तक निर्दोष मानने’ के सिद्धांत की धज्जियां उड़ जाती हैं. इस सिद्धांत का तकाजा है कि दोषी साबित होने तक आरोपी के कहीं भी आने-जाने की स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार में कटौती न हो.

अक्तूबर 2020 में कहीं जाकर सुप्रीम कोर्ट ने उस बात की तस्दीक की जिसे न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर ने 1977 के अपने एक ऐतिहासिक फैसले में कानूनी सिद्धांत के तौर पर स्थापित किया था—जमानत नियम है और जेल अपवाद. न्यायमूर्ति डी.वाइ. चंद्रचूड़ ने इस सिद्धांत की मर्यादा कायम रखने का अनुरोध करते हुए अदालतों से कहा था कि वे नागरिक स्वतंत्रता की ''पहली रक्षा पंक्ति’’ बनी रहें, क्योंकि ''किसी को उसकी स्वतंत्रता से एक दिन के लिए भी वंचित करना ज्यादती है.’’

आरोपियों को उनका बुनियादी अधिकार देने से इनकार करने के अलावा जमानत की अर्जियां ठुकराने की बढ़ती घटनाएं जेलों में भीड़ भी बढ़ा रही हैं. यह तथ्य विधि आयोग की 268वीं रिपोर्ट में भी दर्ज है. भारत में 1,350 जेल हैं, जिनमें ऑक्युपेंसी रेट करीब 120 फीसद है. इन जेलों पर 2019-20 में करीब 6,000 करोड़ रुपए खर्च किए गए, फिर भी इनमें रह रहे कैदी बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहे, जिससे उनके बीमार पड़ने का जोखिम बढ़ गया, जो महामारी की स्थिति में विनाशकारी हो सकता था.

राष्ट्रीय पुलिस आयोग ने 1980 में पाया था कि 60 फीसद से ज्यादा गिरफ्तारियां गैरजरूरी थीं और जेलों का 42 फीसद खर्च ऐसी गिरफ्तारियों की वजह से हुआ. उसने कुछ दिशानिर्देशों की सिफारिश की और जांच के दौरान गिरफ्तारी को संज्ञेय अपराध बना दिया. मई में सुप्रीम कोर्ट ने जेलों में भीड़-भड़क्का रोकने की खातिर पुलिस को महामारी के दौरान गिरफ्तारियां कम करने का आदेश दिया और अदालतों से कहा कि वे मशीनी ढंग से हिरासत के फरमान न सुनाएं.

मगर इन निर्देशों का ज्यादा असर पड़ता नहीं दिखा. भोपाल के एक एनजीओ क्रिमिनल जस्टिस ऐंड पुलिस अकाउंटेबिलिटी प्रोजेक्ट के 2020 के एक अध्ययन से पता चला कि 22 मार्च से 17 मई, 2020 के बीच मध्य प्रदेश में 34,000 गिरफ्तारियां की गईं, जिनमें से ज्यादातर मामले लॉकडाउन के नियमों का उल्लंघन करने से संबंधित थे.

किस आधार पर मिलती है जमानत
किस आधार पर मिलती है जमानत

उत्तर प्रदेश और असम पुलिस के पूर्व डीजी प्रकाश सिंह कहते हैं, ''पुलिस गिरफ्तारी के अपने अधिकार का दुरुपयोग या जरूरत से ज्यादा उपयोग करती है. यह कई वजहों से होता है—भ्रष्टाचार, कानून और गिरफ्तारी के विषय में सुप्रीम कोर्ट की हिदायतों की जानकारी न होना, दिमाग का इस्तेमाल किए बगैर सरकारी आदेशों पर अमल, सत्तारूढ़ पार्टी को खुश करने की चाहत और कभी-कभी राजनैतिक संरक्षण प्राप्त माफिया के इशारे पर भी.’’

जमानत की अर्जियों पर प्रतिकूल फैसलों की इतनी बड़ी तादाद तो थी ही, उसकी प्रक्रियाओं में होने वाली देरी ने स्थिति और बदतर बना दी. 8 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने आगरा की सेंट्रल जेल से 13 सजायाफ्ता कैदियों को रिहा करने का आदेश दिया, जो अपराध करते वक्त नाबालिग थे. उन्हें तीन साल बाल सुधार गृहों में रखा जाना चाहिए था, पर वे 14 से 22 साल जेल में बिता चुके थे. अदालती आदेश के बाद भी जेल अधिकारियों को इन्हें रिहा करने में चार दिन लगे.

जून में पिंजरा तोड़ की कार्यकर्ता देवांगना कालिता और नताशा नरवाल और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्र आसिफ इकबाल तन्हा को दिल्ली हाइ कोर्ट से जमानत मिलने के बाद भी तिहाड़ जेल से बाहर आने में करीब दो दिन लगे, वह भी अदालत के दूसरी बार दखल देने के बाद. ज्यादातर मौकों पर ऐसी देरी का आम बहाना यह होता है कि अदालत के आदेश की हार्ड कॉपी समय पर नहीं मिली या आरोपी के पते की तस्दीक करने में मुश्किलें आईं.

जमानत की याचिकाओं पर सुनवाई में होने वाली प्रक्रियागत देरी अमूमन अदालतों में कर्मचारियों की भारी कमी की वजह से भी होती है. भारत में जज-आबादी अनुपात अंतरराष्ट्रीय मानक से बहुत कम है. 2000 में हमारे यहां प्रति दस लाख आबादी पर 14 जज थे. 2020 में बढ़कर 21 हो गए. चीन में यह आंकड़ा 147 और अमेरिका में 102 है. 21वें भारतीय विधि आयोग के चेयरमैन न्यायमूर्ति बी.एस. चौहान कहते हैं, ''जजों की स्वीकृत संख्या के करीब एक-चौथाई पद हर राज्य में हमेशा खाली रहते हैं.’’

जेल या जमानत का कोई तय फॉर्मूला नहीं
ज्यादातर कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि जमानत के आदेशों में विसंगतियां और सख्ती जमानत की मौजूदा व्यवस्था में गहरे मौजूद खामियों से पैदा होती हैं. दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) अपराधों को दो खानों में बांटती है—जमानती और गैर-जमानती. जमानती अपराधों में जमानत का अधिकार सर्वोपरि है. फिर भी अदालत से तय जमानती रकम की पेशकश पर ही जमानत दी जाती है.

विधि आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि इस प्रावधान की वजह से कई विचाराधीन, खासकर गरीब कैदियों को बेवजह कारावास में रहना पड़ता है. निचली अदालतों में तीन साल से कम सजा वाले छोटे-मोटे अपराधों तक के लिए भी जमानत की रकम कम से कम 10,000 रुपए है. अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की 2018 की एक रिपोर्ट कहती है कि नियमित वेतनभोगियों में भी 57 फीसद 10,000 रुपए महीने से कम कमाते हैं.

विचाराधीन कैदियों के शैक्षणिक स्तर—28 फीसद निरक्षर और 41 फीसद 10वीं से कम पढ़े—से यह भी खुलासा होता है कि उनमें से ज्यादातर साधनहीन पृष्ठभूमि से आते हैं. भारत की दो-तिहाई जेल आबादी दलित, आदिवासी और अन्य पिछड़ा वर्ग के समुदायों के विचाराधीन कैदियों की है, जो छोटे-मोटे अपराधों के आरोप में बंद हैं. कइयों के पास कानूनी मदद लेने को पैसे नहीं हैं. वे अपने अधिकारों से नावाकिफ भी हैं. सरकार की मुफ्त कानूनी सहायता आरोपपत्र दाखिल होने और मुकदमा शुरू होने के बाद मिलती है.

गैर-जमानती अपराधों के आरोपियों को जमानत का अधिकार नहीं है और जमानत मंजूर करना अदालत के विवेकाधिकार पर है. इस विवेकाधिकार के प्रयोग के नियम-कायदे कभी कानूनी रूप से तय नहीं किए गए, बस इतना कहा गया कि उम्र कैद और मौत की सजा वाले मामलों में मजिस्ट्रेट को जमानत मंजूर नहीं करनी चाहिए.

2007 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘अदालतों के सामने जमानत की अर्जियों का आकलन करके उन्हें मंजूर या खारिज करने का कोई बंधा-बंधाया फॉर्मूला नहीं है’, पर उसने विवेकाधिकार के प्रयोग के कुछ प्रासंगिक पहलू गिनाए, जैसे अपराध का स्वरूप और गंभीरता, साक्ष्य के गुण-दोष, आरोपी की विशिष्ट परिस्थितियां, मुकदमे के दौरान आरोपी की मौजूदगी पक्की न हो पाने का अंदेशा, सबूतों से छेड़छाड़ या गवाहों को प्रभावित करने की आशंका, और जनता या सरकार के व्यापक हित.

चूंकि जमानत मंजूर करना विवेकाधीन है, लिहाजा न्यायपालिका और खासकर निचली अदालतों ने जमानत मंजूर या नामंजूर करने में किसी निश्चित मानदंड का पालन नहीं किया. बल्कि ज्यादा चिंता में डालने वाली बात इन अदालतों से जमानत खारिज कर देने की बढ़ती घटनाएं हैं. ऐसे मामलों में तो यह और भी ज्यादा होता है जिन पर लोगों की नजरें टिकी हैं.

जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली में विधि संकाय की पूर्व डीन प्रोफेसर मंजुला बत्रा कहती हैं, ''देखने में आया है कि कई विवादास्पद मामलों में निचली अदालतें जमानत की अर्जी पर फैसला लेने की जिम्मेदारी ऊपरी अदालतों पर छोड़ देने को तरजीह देती हैं क्योंकि उनमें जमानत मंजूर करने का फैसला लेने का आत्मविश्वास नहीं होता.’’ राम मनोहर लोहिया लॉ यूनिवर्सिटी के कुलपति सुबीर के. भटनागर मानते हैं कि जज कभी-कभी शायद इसलिए भी जमानत से इनकार कर देते हैं कि कहीं उन्हें अपराध के पीड़ितों के प्रति असंवेदनशील न मान लिया जाए.

मध्य प्रदेश हाइ कोर्ट के न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने मई में अस्सी बरस की एक महिला आरोपी की जमानत मंजूर करते हुए ठीक यही अंदेशा जताया: ''इस अदालत ने एक के बाद एक मामलों में देखा है कि जिला अदालतें जमानत मंजूर करने के मामले में बेहद कंजूसी बरतती हैं.

बड़ी देर हुई इंसाफ में
बड़ी देर हुई इंसाफ में

अर्जियां आम तौर पर खारिज कर दी जाती हैं, वह भी बार-बार दोहराए जाने वाले आधारों पर कि आरोपित अपराध संगीन है या जांच चल रही है या आरोपी गवाहों को प्रभावित कर सकता है. नीचे की अदालतें मुश्किल से ही कभी जांच करती हैं कि ऊपर बताए गए चालू किस्म के कारणों के अलावा आरोपी को विचाराधीन कैदी के तौर पर लगातार कैद में रखना जरूरी है या नहीं.’’

विवेकाधिकार का नतीजा यह भी है कि जघन्य अपराधों के कुछ अन्य आरोपियों को संदिग्ध औचित्य और शर्तों पर जमानत मिल जा रही है. अगस्त में आइआइटी गुवाहाटी में अपनी सहपाठी के साथ बलात्कार के आरोपी 21 वर्षीय छात्र की जमानत मंजूर करते हुए गुवाहाटी हाइ कोर्ट ने कहा कि आरोपी के खिलाफ 'साफ-साफ प्रथम दृष्ट्या मामला’ है, लेकिन आरोपी प्रतिभाशाली छात्र और राज्य की भावी पूंजी है.

विश्वविद्यालय की एक साथी छात्रा के साथ बार-बार सामूहिक बलात्कार और आपराधिक रूप से डराने-धमकाने के लिए ट्रायल कोर्ट से सजा पाए तीन लोगों को जमानत देते हुए पंजाब और हरियाणा हाइ कोर्ट ने 2017 में जो कहा, वह तो और भी स्तब्धकारी है, ''आरोपी युवा हैं और मानसिक तथा भावनात्मक तकलीफ पैदा करने वाली ऐसी कोई हिंसा नहीं हुई, जो ऐसी परिस्थितियों में आम तौर पर होती ही है.’’

मार्च में सुप्रीम कोर्ट को मध्य प्रदेश हाइ कोर्ट का जुलाई 2020 का एक फैसला रद्द करना पड़ा था, जिसमें उसने यौन हमले के आरोपी से कहा था कि जमानत की पूर्वशर्त के तौर पर उसे पीडि़ता से 'राखी’ बंधवानी होगी. अगले ही महीने हत्या और हत्या के प्रयास के 15 मामलों के आरोपी गैंगस्टर अरुण यादव को इलाहाबाद हाइ कोर्ट से मिली जमानत रद्द करते हुए शीर्ष अदालत ने तमाम हाइ कोर्टों को सलाह दी कि वे शार्पशूटर और जघन्य अपराधियों को बंधे-बंधाए ढर्रे पर जमानत न दें, पहले गवाहों की सुरक्षा और पीड़ित परिवारों पर इसके प्रभावों की जांच कर लें.

जब प्रक्रिया दंड बन जाती है 
अदालतें हमेशा इतनी उदार नहीं रही हैं, खासकर यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम) या इस कानून के पूर्व अवतार पोटा और टाडा जैसे विशेष कानूनों से संबंधित मामलों में. अधिकांश आलोचक इस बात से सहमत हैं कि इन कानूनों में लंबे समय तक कारावास की गुंजाइश है.

यहां तक कि ट्रायल से पहले के चरण में और मामले में चाहे दम हो या न हो, फिर भी कारावास की पूरी गुंजाइश बनी रहती है जो यह बताता है कि इन कानूनों का प्राथमिक उद्देश्य निवारक नजरबंदी है. इसलिए, सरकारी अधिकारी अक्सर बिना अभियोजन के लोगों को जेल में डालने के लिए इन प्रावधानों का उपयोग करते हैं. मसलन, यूएपीए के तहत किसी को बिना जमानत के 90 दिनों तक हिरासत में रखा जा सकता है, जिसे 180 दिनों तक के लिए बढ़ाया जा सकता है.

कानून की इन खामियों का इस्तेमाल करते हुए सरकार अपराध को गैर-जमानती बनाने के लिए इस्तेमाल भी कर सकती है और कुछ ऐसा ही ज्यादातर यूएपीए प्रावधानों के साथ हुआ है. प्रो. भटनागर कहते हैं, ''राजनेताओं में दिन-ब-दिन असहमति बर्दाश्त करने की क्षमता कम होती जा रही है. इसलिए जब वे सत्ता में होते हैं, तो विरोधियों पर गैर-जमानती प्रावधानों के तहत कार्रवाई में जरा भी संकोच नहीं करते. लेकिन अदालतों को चाहिए कि वे व्यक्तियों की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए तेजी से काम करें.’’

सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार महसूस किया है कि विशेष कानून बेतुके और अप्रत्याशित हैं और इसलिए कोर्ट ने अभियुक्तों के अधिकारों के संबंध में अनुच्छेद 21 के उल्लंघन के बारे में कई बार चिंता व्यन्न्त की है. सुप्रीम कोर्ट के वकील उत्कर्ष सिंह के अनुसार 2017 में महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में जातिगत संघर्ष को भड़काने के आरोपी 80 वर्षीय कार्यकर्ता फादर स्टेन स्वामी के मामले में भी बिल्कुल ऐसा ही हुआ था.

अभियोजन पक्ष या तो केस डायरी या चार्जशीट के माध्यम से यह विश्वास करने को ''उचित आधार’’ प्रस्तुत कर सकता है कि आरोप प्रथम दृष्ट्या सच हैं, तो यूएपीए के तहत आरोपी को जमानत नहीं दी जा सकती. स्वामी पार्किसन से पीड़ित थे इसलिए वकीलों ने उनके बिगड़ते स्वास्थ्य को देखते हुए जमानत के लिए बार-बार अदालत का रुख किया था.

लेकिन अक्तूबर 2020 में गिरफ्तार होने के बाद जब तक स्वामी तजोला जेल में रहे, राष्ट्रीय जांच एजेंसी उनकी जमानत का विरोध करती रही, हालांकि इसने कभी भी पूछताछ के लिए उनकी हिरासत की मांग नहीं की. लगभग नौ महीने जेल में बिताने के बाद जुलाई में स्वामी की मृत्यु हो गई. उत्कर्ष सिंह कहते हैं, ''स्वामी को चिकित्सा आधार पर अंतरिम जमानत पर रिहा किया जा सकता था.

न्यायाधीशों को संतुलन बनाना चाहिए या राज्य की ओर से अत्याचारों की कठोरता कम करनी चाहिए. वे आरोपपत्र या आरोपों पर आंख मूंदकर विश्वास नहीं कर सकते, जब तक कि उसके पक्ष में कोई ठोस सबूत या परिस्थितियों की शृंखला न मौजूद हो जिससे आरोपी के खिलाफ दायर मामले पर विश्वास किया जा सकता हो. साथ ही उसमें प्रतिशोध की कोई भावना भी नहीं नजर आनी चाहिए.’’

इसी तरह, दिल्ली दंगों के मामले में एक साल से अधिक समय तक जेल में रखे गए पांच आरोपियों को 8 सितंबर को जमानत देते हुए दिल्ली हाइ कोर्ट ने कहा कि 'विरोध प्रदर्शन के एकमात्र कार्य’ को 'जेल में बंद रखने के औचित्य को सही ठहराने के लिए एक हथियार’ के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह कहते हैं, ''जायज या काल्पनिक आधार पर आरोपी को लंबे समय तक हिरासत में रखना सजा देने के समान है.’’

कुछ कानूनों के तहत गिरफ्तारी में जमानत और भी मुश्किल हो गई है जहां ये दो शर्तें लागू होती हैं: यही कि सरकारी वकील को जमानत पर रिहाई के लिए किसी भी आवेदन का विरोध करने की अनुमति दी जानी चाहिए. अगर वह ऐसा करता है तो अदालत को इस बात के लिए संतुष्ट होना होगा कि अभियुक्त के ऐसे अपराध में दोषी न मानने के पर्याप्त आधार हैं.

और वह जमानत पर रहते हुए कोई अन्य अपराध नहीं करेगा. इसलिए, ये शर्तें भारतीय न्यायशास्त्र के मूल सिद्धांत को उलट देती हैं—जमानत के चरण में भी आरोपी को खुद को बेगुनाह साबित करना पड़ता है. इन जुड़वां शर्तों को धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए), 2002; कंपनी अधिनियम, 2013; एनडीपीएस अधिनियम, 1985 और महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम, 1999 जैसे कानूनों के तहत अपराधों में लागू किया जाता है.

सुप्रीम कोर्ट के एक वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा कहते हैं, ''ऐसी शर्तें पक्का करती हैं कि जमानत बहुत ही कम मामलों में दी जाए, और व्यक्तियों को जांच एजेंसियों की दया पर छोड़ दिया जाता है. इसलिए हर 5-10 साल में सभी कानूनों का नियमित ऑडिट करना जरूरी है, विशेष रूप से उन कानूनों का जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता में कटौती करते हैं.’’
 
हालांकि पीएमएलए से संबंधित मामलों में जमानत पर कठोर नजरिए की वजह है: गिरफ्तार करने से पहले कानून यह अनिवार्य करता है कि जांच के दौरान जुटाई सामग्री के आधार पर यह 'विश्वास करने का कारण’ हो कि आरोपी व्यक्ति दोषी है. मनी लॉन्ड्रिंग और 'विश्वास करने का कारण’ 'लिखित रूप में दर्ज’ होना चाहिए.

सीआरपीसी के तहत पुलिस केवल संदेह के आधार पर गिरफ्तार कर सकती है. इसके अलावा, आर्थिक अपराध को लेकर एक सख्त रुख देखा जाता है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट जमानत पर फैसला करते समय उन्हें एक अलग वर्ग में मानता है. विधि आयोग की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि व्यक्तिगत वित्तीय लाभ के लिए अपराध लोकतंत्र के मूल सिद्धांत के लिए अभिशाप हैं क्योंकि वे व्यवस्था में लोगों के विश्वास को कम करते हैं, इसलिए सक्चत जमानत शर्तों को लागू करना आवश्यक है.

जून में रेलिगेयर एंटरप्राइजेज लिमिटेड (आरईएल) के धन की कथित हेराफेरी से संबंधित एक मामले में रेलिगेयर फिनवेस्ट लिमिटेड (आरएफएल) के पूर्व प्रमोटर शिविंदर मोहन सिंह को एक सिटी कोर्ट से मिली जमानत रद्द करते हुए दिल्ली हाइ कोर्ट की टिप्पणी थी: 'धोखाधड़ी से जुड़े ऐसे मामले में जमानत देना जिसमें एक एजेंट ने इतने बड़े पैमाने पर आपराधिक षड्यंत्र किया है और जिससे बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए हैं, न केवल जांच की प्रगति पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा बल्कि यह आपराधिक न्याय प्रणाली के भरोसे पर भी आघात है.’ शिविंदर और उनके भाई मलविंदर को दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने अक्तूबर 2019 में गिरफ्तार किया था और दोनों तब से जेल में हैं. 

क्या अदालतें जमानत नहीं देना चाहतीं?
लूथरा बताते हैं कि ऊंची अदालतों की बनाई गई मिसालें अक्सर निचली अदालतों के लिए जमानत देना मुश्किल बना देती हैं. वे कहते हैं, ''ऐसे मामलों की संक्चया बहुत अधिक है जहां ऊंची अदालतों ने निचली अदालतों से दी गई जमानत को खारिज कर दिया और सुप्रीम कोर्ट ने हाइ कोर्टों से दी गई जमानत को खारिज कर दिया है. यह बताता है कि जमानत देने के मामलों में न्यायाधीश विवेक का इस्तेमाल पर उसमें दखल करते हैं. नतीजतन, कई लोग जमानत देने के पक्ष में विवेक का प्रयोग करने से कतराते हैं.’’

ऊपरी न्यायालयों के कामकाज में यह अंतर अक्सर निचली अदालत को भ्रमित करने वाले संकेत भेजता है. एक वकील नाम न छापने की शर्त पर पिछले अक्तूबर में पत्रकार अर्नब गोस्वामी की जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की तत्काल सुनवाई की ओर इशारा करते हैं. उनके शब्दों में, ''गोस्वामी को विशेष तरजीह दी गई, जबकि उसी अवधि के दौरान दायर एक आरटीआइ में पाया गया कि शीर्ष अदालत के समक्ष जमानत के 900 से ज्यादा अर्जियां लंबित थीं.’’ 

कई कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि निचली अदालतों के अधिकारी अपनी वार्षिक रिपोर्ट में प्रतिकूल टिप्पणी या उनके खिलाफ विवेकपूर्ण जांच के डर से जमानत देने से हिचकते हैं. भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई कहते हैं, ''जमानत से जुड़े फैसलों में निचली अदालतों के न्यायाधीश ज्यादा साहसिक बन सकें, इसके लिए जरूरी है कि उनके न्यायिक फैसलों की समीक्षा को हाइ कोर्टों से उनके वार्षिक मूल्यांकन के दायरे से अलग कर दिया जाए.’’

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्ति चेलमेश्वर याद करते हैं कि कैसे निचली अदालत के मजिस्ट्रेट के खिलाफ एक शिकायत आंध्र प्रदेश हाइ कोर्ट में पहुंची थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि संबंधित न्यायाधीश ने एक आरोपी को बरी करने के लिए रिश्वत ली थी. न्यायिक अधिकारी को नोटिस जारी किया गया है.

बाद में जांच के दौरान पाया गया कि उसने वास्तव में आरोपी को दोषी ठहराया था लेकिन शिकायतकर्ता सजा से खुश नहीं था. यह बताते हुए कि निचली अदालत के न्यायाधीश क्यों सुरक्षित खेल ही खेलना चाहते हैं, वे कहते हैं, ''यह तथ्यात्मक रूप से गलत आरोप था, फिर भी जज को एक जांच का सामना करने की कवायद से गुजरना पड़ा.’’ 

यह भी व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि मीडिया ट्रायल और सोशल मीडिया की चर्चाओं से जमानत के फैसले प्रभावित होते हैं. उत्कर्ष कहते हैं, ''अगर किसी जज को लगता है कि उसके फैसले पर प्राइम टाइम टीवी चर्चा की जाएगी, तो इस बात की पूरी संभावना रहती है कि वह खुद को सुर्खियों से दूर रखने के लिए निर्णय लेने की जिम्मेदारी अपने से ऊपर की अदालतों को सौंप दे.’’
 
आखिर सरकार क्या कर रही है?
जैसे-जैसे जमानत आदेशों में विसंगतियां स्पष्ट होती जा रही हैं, वैसे-वैसे जमानत को लेकर नए कानून की मांग बढ़ रही है क्योंकि अदालत के दिशानिर्देशों का समान रूप से पालन नहीं किया जा रहा. केंद्र सरकार ने माना है कि देश के जमानत प्रावधानों में बड़े पैमाने पर बदलाव की जरूरत है. 2015 में केंद्रीय कानून मंत्रालय ने विधि आयोग से एक अलग जमानत अधिनियम की जरूरत की जांच के लिए कहा. हालांकि साल भर बाद उसने आयोग से कहा कि यह मकसद वह 'सीआरपीसी के मौजूदा प्रावधानों में जरूरी बदलाव लाकर’ पूरा करे.

विधि आयोग ने 1996 में अपनी 154वीं रिपोर्ट में पहले ही जमानत पर विचार करने के लिए प्रासंगिक 12 पहलुओं की एक लंबी सूची का हवाला दिया था जिसमें अपराध की गंभीरता, आरोपों की प्रकृति, आरोपी की हैसियत, पिछला जीवन और छेड़छाड़ की संभावना जैसे पहलू शामिल हैं. 2017 में अपनी 268वीं रिपोर्ट में आयोग ने बेगुनाही की संभावना को भी जमानत आवेदनों में एक अन्य प्रासंगिक विचार के रूप में शामिल किया.

इसने यह भी सिफारिश की कि जमानत की आर्थिक जुर्माने की शर्तों को अंतिम उपाय के रूप में लागू किया जाए और प्रस्ताव किया कि जमानत के विकल्प के रूप में मूल पहचान पत्रों को अदालत में जमा किया जाए. हालांकि, इनमें से किसी भी सिफारिश को अभी तक सीआरपीसी में शामिल नहीं किया गया है.

इससे पहले जमानत प्रावधानों से संबंधित सबसे बड़ा सुधार 2005 में हुआ था जब धारा 436ए को सीआरपीसी में शामिल किया गया था. यह तय करता है कि एक कैदी को निजी मुचलके पर जमानत पर रिहा किया जाएगा अगर वह उस अपराध के लिए जेल की आधी अवधि तक हिरासत में रहा है. इस प्रावधान को ठीक से लागू करवाने के लिए, सरकार ने ई-जेल पोर्टल लॉन्च किया है जो राज्य के जेल अधिकारियों को जमानत योग्य कैदियों की शीघ्र पहचान करने में सक्षम बनाता है.

विशेषज्ञों ने कई अन्य सुधारों के भी सुझाव दिए हैं. मसलन, जमानत आवेदनों पर निर्णय लेते समय व्यक्तिगत विवेक के इस्तेमाल के लिए एक चेकलिस्ट बनाना और पुलिस के लिए समय-समय पर चेक-इन जैसे गैर-हिरासत वाले विकल्प. प्रो. बत्रा अपराधों को जमानती या गैर-जमानती के रूप में वर्गीकृत करने के मानदंडों पर फिर से विचार के सुझाव देती हैं, और अधिक अपराधों को जमानती बनाने के पक्ष में हैं.

समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट ने भी व्यवस्था को बेहतर बनाने की कोशिश की है. मसलन, आगरा जेल की घटना से नाराज होकर मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमण की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने फास्ट ऐंड सिक्योर ट्रांसमिशन ऑफ इलेक्ट्रॉनिक रिकॉड्र्स (फास्टर) नामक एक नई योजना शुरू करने की घोषणा की. यह इलेक्ट्रॉनिक रूप से दर्ज दस्तावेजों को तेजी से और सुरक्षित तौर पर संचार संभव बनाता है.

इसने अदालत को तुरंत, सीधे, सुरक्षित और इलेक्ट्रॉनिक रूप से जमानत और अन्य आदेशों को जेल अधिकारियों, जिला और उच्च न्यायालयों को प्रेषित करने में सक्षम बनाया. पीठ ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सभी जेलों में अच्छी स्पीड वाले इंटरनेट कनेक्शन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया ताकि जेल अधिकारी इलेक्ट्रॉनिक रूप से प्रमाणित जमानत आदेश प्राप्त करने के बाद कैदियों को बिना देर किए रिहा कर सकें.

हालांकि, अधिकांश न्यायिक दिग्गज केवल जमानत के लिए अलग से कानून के पक्ष में नहीं हैं और कहते हैं कि व्यापक न्यायिक सुधार के अंतर्गत प्रावधानों को डाला जा सकता है. यहां तक कि विधि आयोग ने भी कहा है कि जमानत कानून में सुधार कोई ऐसा रामबाण नहीं हो सकता जो दंड न्याय प्रणाली की सभी बीमारियों को दूर कर दे. अधिकांश कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रायल की प्रक्रिया में तेजी लाना ही इसका समाधान हो सकता है. यह तभी संभव हो सकता है जब प्रक्रिया को पर्याप्त कार्यबल सहित एक मजबूत न्यायिक बुनियादी ढांचे का समर्थन प्रदान किया जाए. 

इसका संज्ञान लेते हुए कैबिनेट ने जुलाई में न्यायपालिका के लिए बुनियादी ढांचे के विकास के लिए केंद्र प्रायोजित योजना को 9,000 करोड़ रुपए के लक्षित खर्च के साथ पांच साल के विस्तार को मंजूरी दी. केंद्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू देश में न्यायिक बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए नए सिरे से जोर देने के लिए राज्य के कानून मंत्रियों से मिलने वाले हैं.

हालांकि, अधिकांश वरिष्ठ न्यायाधीशों का मानना है कि इस बात की संभावना कम है कि बुनियादी ढांचे को सुधारने और ज्यादा न्यायाधीशों को शामिल करने से न्यायपालिका को कुशल बनाया जा सकता है. गुणात्मक सुधार और त्वरित न्याय के लिए ऐसे व्यक्तियों की भर्ती करनी चाहिए जिनमें न्याय देने की योग्यता और जुनून हो.

एनसीआरबी (राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो) के आंकड़ों से पता चलता है कि न्यायाधीशों की संक्चया में नियमित वृद्धि के बावजूद लंबित मुकदमों में कोई उल्लेखनीय कमी नहीं आई है जो मुकदमों के समयबद्ध ढंग से निबटाने के लिए आवश्यक कौशल के महत्व को और अधिक उजागर करता है. 

जस्टिस गोगोई कहते हैं, ''न्यायिक फैसलों की ताकत इस बात पर निर्भर करती है कि एक न्यायाधीश किसी भी तरह के बाहरी प्रभाव से खुद को कितना दूर रखना चाहता है. यह तभी हो सकता है जब न्यायिक अधिकारी अपने काम के लिए उचित कौशल और जुनून से लैस हो.’’ एक व्यवस्था जो अपनी बेशुमार खामियों की वजह से चरमराई नजर आती हो, यह उसके लिए यह एक बड़ा और महत्वाकांक्षी लक्ष्य है.

न्यायमूर्ति, रंजन गोगोई
भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश

जमानत से जुड़े फैसलों में निचली अदालतों के न्यायाधीश ज्यादा साहसिक बन सकें, इसके लिए जरूरी है कि उनके न्यायिक फैसलों की समीक्षा को हाइ कोर्ट द्वारा उनके वार्षिक मूल्यांकन के दायरे से अलग कर दिया जाए 

न्यायमूर्ति, बीएस चौहान

इक्कीसवें भारतीय विधि आयोग के अध्यक्ष
कुछ लोग न्यायिक अफसरों पर कई बार गंभीर आरोप लगा देते हैं जिससे उनके फैसले प्रभावित हो जाते हैं, खास तौर पर वे मामले जिनमें उनके पास जमानत को लेकर व्यापक विवेकाधिकार हैं

प्रोफेसर सुबीर भटनागर
कुलपति, डॉ. राम मनोहर लोहिया नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी

असहमति व्यक्त करने वालों के प्रति राजनेताओं की सहनशीलता कम होती जा रही है. वे उन्हें राजद्रोह जैसे कानूनों के गैर-जमानती प्रावधानों के तहत अंदर करवा देते हैं 

प्रोफेसर मंजुला बत्रा
पूर्व डीन, लॉ फैकल्टी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया

शायद यही समय है जब जमानती और गैर-जमानती अपराधों की परिभाषा पर नए सिरे से विचार किया जाना चाहिए. कई अन्य अपराधों को जमानती बनाया जा सकता है 

विक्रम सिंह, पूर्व डीजी, 
उत्तर प्रदेश पुलिस

यूएपीए सरीखे कानूनों में लंबी कैद की गुंजाइश लोगों को बिना गुनाह साबित किए ही जेल में डाले रखने में सरकारी अधिकारियों की मदद करती है

जस्टिस चेल्लमेश्वर, पूर्व न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट

ज्यादातर अभियुक्त जेलों में इसलिए सड़ते रह जाते हैं क्योंकि मुकदमें खासे लंबे खिंचते हैं. पुलिस महकमे और न्यायपालिका में कार्यबल की कमी से काम का बोझ बहुत ज्यादा हो गया है 

सिद्धार्थ लूथरा, वरिष्ठ वकील, सुप्रीम कोर्ट
अब समय आ गया है कि जमानत के विषय पर न्याय प्रणाली में एकरूपता के लिए हम स्पष्ट कानूनी नियम बनाएं जिससे ऐसे फैसलों में न्यायाधीशों को उदार या सख्त न समझा जाए

प्रकाश सिंह, पूर्व डीजी, बीएसएफ और उत्तर प्रदेश तथा असम पुलिस
भ्रष्टाचार, अज्ञानता, सत्तारूढ़ दल को खुश करने या फिर राजनैतिक संरक्षण प्राप्त माफिया की शह पर पुलिस गिरफ्तारी के अपने अधिकार का दुरुपयोग करती है, या जरूरत से ज्यादा उपयोग.

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