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और चीते फिर किसी को नजर नहीं आए...

1923 की अपनी किताब वाइल्ड एनिमल्स इन सेंट्रल इंडिया में संरक्षणवादी डनबर ब्रैंडर ने लिखा कि चीता सेंट्रल प्रॉविन्स से लगभग गायब हो गया था.

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बेरहमी से शिकार बेरहमी से शिकार

भारत की आजादी के कुछ महीनों बाद, कोरिया (एक रियासत जो ईस्टर्न एस्टेट एजेंसी के अधीन थी और अब आधुनिक छत्तीसगढ़ का हिस्सा है) के शासक रामानुज प्रताप सिंहदेव ने रात में ड्राइविंग करते समय तीन चीतों को देखा. वे सभी एक साथ बैठे थे, शायद गाड़ी की रोशनी से आंखें चौंधिया गई थीं और वे डरे हुए थे.

राजा के सचिव ने एक लोकप्रिय टैक्सिर्डिमस्ट (जानवरों की खाल में भूसा भरने वाले प्रशिक्षित कारीगर) वैन इंजेन को शिकार का जो ब्यौरा भेजा उसमें लिखा था, ''पहली गोली से एक चीता ढेर हो गया और दूसरी गोली से शेष दोनों मारे गए. दूसरी गोली एक चीते के शरीर से आर-पार होती दूसरे के शरीर में जा धंसी.’’ चीते लगभग एक जैसे थे—सभी नर—और माना गया कि उनका जन्म एक साथ हुआ था. यह पता नहीं चला कि जन्म कोरिया में ही हुआ था या कहीं और से आए थे.

1923 की अपनी किताब वाइल्ड एनिमल्स इन सेंट्रल इंडिया में संरक्षणवादी डनबर ब्रैंडर ने लिखा कि चीता सेंट्रल प्रॉविन्स से लगभग गायब हो गया था.

जनवरी 1948 में, इंजेन ने बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) से इस शिकार का एक रिकॉर्ड प्रकाशित करने का अनुरोध किया. शिकार का विवरण किस प्रकार लिखा जाए, इसका फैसला संपादकों पर छोड़ दिया गया था—और उन्होंने अपनी बेबाक राय दी भी.

उन्होंने प्रकाशित रिकॉर्ड में लिखा, ''जानवरों की इस प्रकार हत्या से संपादक इतने विचलित हुए कि उन्होंने गुस्से में इसे रद्दी की टोकरी में फेंक दिया. इसके प्रकाशन के पीछे मंशा राजा की निंदा या बहादुरी की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि वे तो जवाब तलब किए जाने के पक्ष में हैं.’’

तब के भारतीय राजकुमारों की तरह खुद को एक खिलाड़ी होने के उनके दावों को चुनौती देते हुए पत्रिका ने राजा को फटकार लगाई और भारत में चीते की स्थिति से अनभिज्ञ होने के लिए खरी-खोटी सुनाई.

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