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आवरण कथाः एसेट मॉनिटाइजेशन इस बार बड़ा ख्वाब

मोदी सरकार की सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्तिपयों के 'मॉनिटाइजेशन’ यानी निजी क्षेत्र को लंबे वक्त के लिए लीज पर देकर अगले चार वर्षों में 6 लाख करोड़ रुपए उगाहने की ख्वाहिश, क्या वह इस बड़े बदलाव में कामयाब हो पाएगी?

मोदी सरकार की सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्तिपयों के 'मॉनिटाइजेशन’ यानी निजी क्षेत्र को लंबे वक्त के लिए लीज की तैयारी मोदी सरकार की सार्वजनिक क्षेत्र की संपत्तिपयों के 'मॉनिटाइजेशन’ यानी निजी क्षेत्र को लंबे वक्त के लिए लीज की तैयारी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता संभाली, तो उनके बड़े वादों में एक ‘‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम राजकाज’’ भी था. उम्मीद यह थी कि उनकी सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की कुछ संपत्तियों से अपना नियंत्रण हटा लेगी. उन्हें सीधे निजी क्षेत्र को बेच दिया जाएगा या उत्पादकता बढ़ाने के लिए प्रबंधन/संचालन में निजी क्षेत्र को शामिल कर लिया जाएगा.

अपने पहले कार्यकाल में उनकी सरकार इस मोर्चे पर कुछ खास नहीं कर सकी. विपक्ष के 'सूट-बूट की सरकार’ के ताने से वह घिर जो गई थी.

इस साल फरवरी में केंद्रीय बजट में मोदी सरकार ने विनिवेश और सरकारी परिसंपत्तियों के मॉनिटाइजेशन या मौद्रीकरण की दो जोरदार घोषणाएं कीं, जो निजी क्षेत्र से जुड़ी थीं. विनिवेश की उसकी कोशिशों के शुरुआती नतीजे मिले-जुले रहे.

एयर इंडिया की बिक्री में कुछेक निजी आवेदकों ने दिलचस्पी दिखाई और इसकी बोली की प्रक्रिया इसी वित्त वर्ष में पूरी होनी है, वहीं एलआइसी (जीवन बीमा निगम) इस साल शेयर सूचीबद्ध करवाने की तैयारी में जुटा है. हालांकि बीपीसीएल (भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड), कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया और आइडीबीआइ बैंक सरीखे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की बिक्री अधर में लटकी है.

फेहरिस्त में क्या-क्या
फेहरिस्त में क्या-क्या

यही वह मोड़ है, जब सरकार ने अपना अगला बड़ा अभियान—परिसंपत्तियों का मॉनिटाइजेशन—शुरू करने का फैसला किया. इसके तहत सरकारी संपत्तियां अग्रिम शुल्क के एवज में निजी कंपनियों को दी जाएंगी. सरकार का मानना है कि इस तरह लक्ष्य हासिल करना आसान होगा. उसने निजीकरण के उस भारी विरोध को भी दरकिनार कर दिया, जिससे सार्वजनिक संपत्तियों से राजस्व उगाहने की पिछली कोशिशों को पलीता लगाया था.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 23 अगस्त को केंद्र की राष्ट्रीय मौद्रीकरण पाइपलाइन (एनएमपी) लॉन्च करने का ऐलान किया. इसके तहत सरकार का इरादा अगले चार वर्षों में बुनियादी ढांचे की बड़ी परियोजनाओं को 15 से 30 साल तक की अवधि के लिए निजी कंपनियों को लीज पर देने का है. बदले में वह 6 लाख करोड़ रु. उगाहने की उम्मीद कर रही है, जो देश में शिक्षा और स्वास्थ्य के बजट के जोड़ के बराबर है.

इससे वह अपनी महत्वाकांक्षी इंफ्रास्ट्रक्चर योजनाओं में धन लगा पाएगी, बजट घाटे की भरपाई कर पाएगी और उम्मीद यह है कि निजी क्षेत्र में नई जान फूंक पाएगी. केंद्र को यह उम्मीद भी है कि इस तरह वह अपने उस सुधार एजेंडे को पूरा नहीं कर पाने की आलोचनाओं से भी पिंड छुड़ा लेगा, जिसका मकसद सरकारी प्रबंधन के नाकारापन की वजह से अपनी क्षमता से कमतर प्रदर्शन करने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों को नई जिंदगी देना था.

इससे उसे पिछली यूपीए सरकार के उस पीपीपी (सार्वजनिक-निजी भागीदारी) मॉडल की खामियों को दुरुस्त करने का भी मौका मिलेगा, जिसका खाका 2015 में विजय केलकर समिति की सिफारिशों में पेश किया गया था.

कहीं तो कुछ कम है
कहीं तो कुछ कम है

तत्कालीन योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया कहते हैं कि सरकार को मॉनिटाइजेशन और निजीकरण दोनों की पहल करनी चाहिए ''क्योंकि हमें नहीं पता कि बेहतर क्या है.’’ निजीकरण को लोगों के गले उतारना ज्यादा कठिन है, क्योंकि इसमें जमीन सरीखी सरकारी संपत्तियों की मिल्कियत छोड़नी पड़ती है, जबकि 30 साल की लीज को सही ठहराना ज्यादा आसान है.

एनएमपी तैयार करने वाला नीति आयोग यह भी बताता है कि उत्तर अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में टोल रोड, बंदरगाहों और हवाई अड्डों सरीखी मौजूदा इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में संस्थागत निवेशकों और फंडों के निवेश का इतिहास रहा है. अभी कुछ वक्त पहले ऐसे निवेश एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भी हुए हैं.

केंद्र की संपत्ति मौद्रीकरण योजना के तहत सड़क, रेलवे, बिजली पारेषण, विमानन और बंदरगाह सहित 13 क्षेत्रों की पहचान (देखें फेहरिस्त में क्या-क्या) है, संपतियां लीज पर दी जाएंगी. ये प्रतिस्पर्धी बोली लगाने की प्रक्रिया के तहत दी जाएंगी, और मिल्कियत सरकार के पास रहेगी.

एनएमपी का लक्ष्य करीब 1.6 लाख करोड़ रुपए सड़क परियोजनाओं से, 1.5 लाख करोड़ रुपए रेलवे से, 45,000 करोड़ रुपए बिजली पारेषण से, 40,000 करोड़ रुपए बिजली उत्पादन से और इसी तरह अन्य परियोजनाओं के मॉनिटाइजेशन से हासिल करना है. इसमें 27,000 किमी सड़कें, 25 हवाई अड्डे और 21 लाख टन क्षमता के गोदाम तथा अन्य शामिल हैं.

सरकार की पेशकश ब्राउनफील्ड परियोजनाओं की है. मतलब जो पूरी हो चुकी हैं और सुचारु ढंग से काम कर रही हैं. सीतारमण ने कहा, ''एनएमपी (में केवल वही) परियोजनाएं (हैं), जिनमें निवेश हो चुका है, जिनमें संपत्तियां तैयार हो चुकी हैं, जो या तो धूल खा रही हैं, पूरी तरह मॉनिटाइज नहीं की जा सकी हैं या जिनका इस्तेमाल कम हुआ है.

निजी भागीदारी लाकर हम (इन्हें) बेहतर मॉनिटाइज कर पाएंगे और इन्फ्रास्ट्रक्चर में आगे भी निवेश पक्का कर पाएंगे.’’ कोटक महिंद्रा एसेट मैनेजमेंट कंपनी के एमडी नीलेश शाह कहते हैं कि एनएमपी 'गेमचेंजर’ है. हालांकि वे जोर देकर यह भी कहते हैं कि इस पर अमल बेहद अहम है, खासकर ''विनिवेश की नाकामियों से सीखना होगा.’’

कहीं तो कुछ कम है
कहीं तो कुछ कम है

संपत्तियों का मॉनिटाइजेशन कोई नया विचार नहीं है. पिछली सरकारें और कुछ हद तक मौजूदा सरकार भी पहले इसे लागू कर चुकी है. विशालकाय वैश्विक वित्तीय समूह मैक्वायरी ने 2018 में 9,681.5 करोड़ रुपए की बोली से टोल-ऑपरेट-ट्रांसफर (टीओटी) मॉडल के तहत एनएचएआइ (भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण) के मातहत सड़कों की नौ पट्टियों के संचालन का अधिकार हासिल किया था.

2004 में टोल अधिकार हासिल करके 15 साल तक मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे का संचालन करने के बाद आइआरबी इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपर्स ने पिछले साल महाराष्ट्र राज्य सड़क विकास निगम को 6,500 करोड़ रुपए चुकाकर टीओटी के तहत 30 साल के लिए टोल वसूलने का अधिकार प्राप्त किया. मार्च में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि एनएचएआइ की योजना अगले पांच साल में टीओटी के तहत 1 लाख करोड़ रुपए जुटाने की है. इसी तरह कई हवाई अड्डे मौजूदा मॉनिटाइजेशन प्रक्रिया में कामयाब रहे हैं.

मोदी सरकार की योजना जिस मायने में नई जमीन तोड़ती है, वह है इसका पैमाना. पहचान की गई संपत्तियां 12 मंत्रालयों और महकमों से जुड़े क्षेत्रों की हैं और इनमें 20 श्रेणियों की संपत्तियां हैं. क्रिसिल के चीफ इकोनॉमिस्ट डी.के. जोशी कहते हैं, ‘‘मौद्रीकरण योजना जरा महत्वाकांक्षी मालूम देती है. इसे कामयाब बनाने के लिए बहुत जोर लगाना पड़ेगा.’’ तो भी यह आकर्षक विकल्प नजर आता है.

पहले तो निवेशक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं से जुड़े निर्माण में देरी सरीखे वित्तीय जोखिमों से बच जाएंगे, वहीं सरकार देश की संपत्तियां बेचने के आरोप से बच जाएगी. जोशी कहते हैं, ''यह (निजीकरण के मुकाबले) ज्यादा खुशगवार समाधान मालूम देता है.’’ दूसरे, ये संपत्तियां बाकायदे मौजूद हैं और निजी क्षेत्र को दक्षता से बस इनका संचालन भर करना है, जबकि सरकार को और ज्यादा बुनियादी ढांचा खड़ा करने के लिए पैसा मिल जाएगा.

सरकार ने 2024-25 तक 111 लाख करोड़ रुपए के खर्च वाली राष्ट्रीय इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन (एनआइपी) से लेकर पीएम गतिशक्ति योजना—जिसकी घोषणा 15 अगस्त को प्रधानमंत्री मोदी ने की और जिसमें 100 लाख करोड़ रुपए का खर्च शामिल बताया जाता है—तक कई महत्वाकांक्षी लक्ष्यों का ऐलान किया है. जोशी कहते हैं, ‘‘हमें देखना होगा कि सरकार इसे कैसे पूरा करती है.

पिछला अनुभव उत्साहवर्धक दिखाई देता है.’’ केंद्र को उम्मीद है कि वह संपत्तियों के मॉनिटाइजेशन से एनआइपी की 14 फीसद लागत जुटा लेगा. वह लंबे वक्त की इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में पैसा लगाने के लिए 20,000 करोड़ रुपए की शुरुआती पूंजी से विकास वित्त की एक संस्था भी बना रहा है. 

केंद्र ने राज्यों को पीएसयू में अपनी हिस्सेदारी छोड़ने के बदले प्रोत्साहन लाभ देने के लिए 5,000 करोड़ रुपए रखे हैं. अगर कोई राज्य अपनी पूरी हिस्सेदारी छोड़ देता है, तो केंद्र विनिवेश मूल्य के बराबर रकम देगा. अगर राज्य पीएसयू को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करता है, तो केंद्र उसे इससे जुटाए गए धन का 50 फीसद देगा. अगर राज्य परिसंपत्ति का मौद्रीकरण करता है, तो उसे उगाहे गए धन का 33 फीसद मिलेगा.

बुनियादी ढांचा क्षेत्र में पीपीपी प्रोजेक्ट
बुनियादी ढांचा क्षेत्र में पीपीपी प्रोजेक्ट

परिसंपत्तियों के मौद्रीकरण के कई अलग-अलग मॉडल पर काम चल रहा है. इनमें टीओटी मॉडल, ओएमटी (ऑपरेट-मेनटेन-ट्रांसफर) रियायतें, इन्फ्रास्ट्रक्चर/रियल एस्टेट निवेश ट्रस्ट और अन्य हैं. नीति आयोग का कहना है परिसंपत्ति, लक्षित निवेशक, परियोजना का दायरा और जोखिम में साझेदारी की सीमा पर यह निर्भर करेगा कि आखिर कौन-सा मॉडल इस्तेमाल किया जाए.

कामकाज के सुस्पष्ट मानदंडों के साथ अनुबंध के साफ और दोटूक ढांचे के तहत सुव्यवस्थित भागीदारियों के जरिए योजना लागू की जाएगी. नीति आयोग ने अमल का जो खाका बनाया है, उसमें मंत्रालयों के सालाना लक्ष्य, सलाहकारों को साथ लेना और 'वैकल्पिक/ताकतवर’ तंत्र के जरिए मंजूरियों को आसान और कारगर बनाना भी है.

एनएमपी कार्यक्रम को लेकर बेहद उत्सुक एक निवेश फर्म के बड़े एग्जीक्यूटिव कहते हैं कि सड़क और रेल परियोजनाओं में बहुत ज्यादा दिलचस्पी दिखती है. सड़कें, रेलवे और बिजली मिलकर कुल एनएमपी के करीब 65 फीसद हैं. इन तीन क्षेत्रों में कार्यक्रम जैसे आगे बढ़ेगा, उसी से अन्य क्षेत्रों के लिए रुझान तय हो सकेगा. हवाई अड्डों और सड़कों के मामले में तो कुछ समझ है कि चीजें किस तरह हो सकती हैं, पर रेलवे काफी हद तक नई शै है. आम जन की भलाई और मुनाफे के बीच संतुलन कैसे साधा जाता है, इसको लेकर भी सवाल हैं.

केयर रेटिंग्ज के चीफ इकोनॉमिस्ट मदन सबनवीस कहते हैं, ''एक बड़ा सवाल यह है कि ऐसी परिसंपत्तियों के लिए कितनी भूख है. फिर, जहां परिसंपत्ति पर मालिकाना हक पीएसयू का है, राजस्व उस पीएसयू को जाएगा, सरकार को नहीं.’’ जो भी हो, कुछ लोगों का कहना है कि विचार के स्तर पर यह कदम रोमांचक है. वे आइपीओ (आरंभिक सार्वजनिक निर्गम) बाजार में मौजूद जबरदस्त फंडिंग की तरफ इशारा करते हैं और कहते हैं कि बीमा कंपनियों और पेंशन फंड सरीखे निवेशक लंबे वक्त के ऐसे निवेशों की तलाश में हैं जो उन्हें स्थिर सालाना रिटर्न दे सकें.

उम्मीद की दूसरी वजह है वैश्विक वित्तीय बाजारों में इन दिनों मौजूद जबरदस्त फंडिंग. पूर्व वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा बताते हैं कि वैश्विक वित्तीय बाजारों में फिलहाल 18 ट्रिलियन डॉलर की प्रचुर धनराशि है. ऐसे में भारतीय कंपनियों के सामने यह विकल्प है कि वे इस फंडिंग को अपने खातों में कर्ज की तरह लें और कम जोखिम वाली एनएमपी परियोजनाओं में लगा दें. आरबीआइ (भारतीय रिजर्व बैंक) के एक बड़े अफसर कहते हैं, ''बाजार में तरलता की कोई कमी नहीं है. तमाम वित्तीय संस्थाएं कारगर परियोजनाएं चाहती हैं. एनएमपी उन्हें यही देगा.’’

सत्तारूढ़ भाजपा के लिए राहत की बात यह है कि उसकी संपत्ति मौद्रीकरण योजना को उसकी वैचारिक मातृ संस्था आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) का समर्थन मिल गया है. आरएसएस से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच (एसजेएम) के कई लोगों का कहना है कि सरकार को संपत्ति मौद्रीकरण योजना का पारदर्शी और खरा होना पक्का करना चाहिए और यह भी कि सही मूल्य निर्धारण हो.

अटल बिहारी वाजपेयी की हुकूमत में और मोदी के पहले कार्यकाल में भी इस मंच ने निजीकरण की कोशिशों का विरोध किया था. आरएसएस के शीर्ष नेता बताते हैं कि वे सार्वजनिक क्षेत्र में निजी पूंजी के खिलाफ नहीं हैं, वे सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों की रणनीतिक बिक्री के खिलाफ हैं. एक नेता ने कहा, ''यही रुख जारी है.’’ एसजेएम के राष्ट्रीय सह-संयोजक अश्विनी महाजन कहते हैं कि निजी क्षेत्र की फर्म अगर सार्वजनिक संपत्तियों में निवेश करने को उत्सुक हैं तो उनका स्वागत करना चाहिए, पर रणनीतिक बिक्री ''राजनैतिक और कारोबार दोनों के लिहाज से बुरी पेशकश है.’’

भारत में भीड़ भरी सड़कों और धीमी ट्रेन सेवाओं से लेकर नाकाफी अस्पतालों तक में झलकने वाली बुनियादी ढांचे की कमी आर्थिक वृद्धि और नौकरियों के सृजन में भारी अड़चनें पैदा करती है. केलकर समिति की रिपोर्ट कहती है कि कम उत्पादकता, प्रतिस्पर्धा की दयनीय क्षमता, ऊंची लागतें और शहरीकरण की सुस्त रफ्तार इसके कुछ नतीजे हैं. यहीं निजी क्षेत्र के साथ मिलकर काम करना बेहद अहम हो जाता है. मगर जब सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के मिलकर काम करने की बात आती है, तब भारत का रिकॉर्ड ज्यादा से ज्यादा मिला-जुला ही रहा है.

पीपीपी मॉडल 21वीं सदी के पहले दशक में विकास का सबसे पंसदीदा मॉडल बनकर उभरा. भारत में 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान बरास्ते पीपीपी बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं की बहार आ गई. अलबत्ता उनमें से कई जमीन अधिग्रहण और मंजूरियों में देरी में फंसकर रह गईं और पर्याप्त तत्परता न बरते जाने की वजह से कई डूबत खाते के कर्ज बन गए. एक सरकार की मंजूर परियोजनाओं को अगली सरकार ने रद्द कर दिया.

बुनियादी ढांचा मुहैया नहीं करवाया गया. मसलन, अडानी ग्रुप ने अपने बंदरगाहों में सुचारु कामकाज के लिए खुद अपनी रेललाइन बिछाईं, पर दूसरे डेवलपरों के पास ऐसा करने की क्षमता नहीं थी. जीएमआर और जीवीके सरीखी इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनियां दिवालिया हो गईं, जिसके पीछे एयरपोर्ट फीस न बढ़ा पाना, जमीन अधिग्रहण न कर पाना और ऐसी ही कई दूसरी वजहें थीं.

मगर विश्लेषकों का कहना है कि इस बार जोखिम खासे कम हो गए हैं. फीडबैक इन्फ्रा के चेयरमैन विनायक चटर्जी बताते हैं, ''बुनियादी ढांचे के मौद्रीकरण में, जो मोटे तौर पर एनएमपी का कुल जमा मतलब है, तीन किस्म के जोखिम हैं—विकास जोखिम, निर्माण जोखिम और परिचालन जोखिम. निवेशकों की एक पसंदीदा कंपनी अब ब्राउनफील्ड संपत्तियों का अधिग्रहण कर रही है, क्योंकि इसमें जोखिम शृंखला की पहली दो कड़ियां हट गई हैं.’

पीपीपी के जमाने की तबाही की कहानियों के साथ नई दिल्ली के ताज मानसिंह होटल सरीखी कामयाबी की कहानियां भी हैं. इस होटल को टाटा ग्रुप ने दशकों की मेहनत से हॉस्पिटैलिटी आइकन के तौर पर विकसित किया था और शुरुआती लीज खत्म होने पर 2018 में प्रतिस्पर्धी बोली के जरिए दोबारा लीज हासिल की. (आलोचक हालांकि इसे ऐसा मामला बताते हैं जिसमें कभी सार्वजनिक रही संपत्ति तकरीबन निजी बन गई.)

एक और मिसाल वाल स्ट्रीट की बड़ी कंपनी ब्लैकस्टोन है, जिसका कहना है कि प्रतिफल के लिहाज से भारत सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाला बाजार है—इसका 25 अरब डॉलर का बीज निवेश अब 50 अरब डॉलर से ज्यादा मूल्य का हो गया है. इनमें दो रियल एस्टेट निवेश ट्रस्ट हैं जो आमदनी देने वाली रियल एस्टेट संपत्तियों के मालिक, संचालक या वित्तपोषक हैं और ये इसे ऑफिस रियल एस्टेट का सबसे बड़ा मालिक और खुदरा तथा लॉजिस्टिक्स क्षेत्र का अगुआ खिलाड़ी बनाते हैं.

अलबत्ता, जहां एनएमपी की कामयाबी इसके अमल में है, वहीं अहम चुनौतियों से भी पार पाना होगा. और इनमें शामिल हैं:

संपत्ति का मूल्य निर्धारण: यह अहम मुद्दा है. परियोजना का वास्तविक मूल्य कैसे तय किया जाए? इसे उसके मौजूदा मूल्य से आंका जाए या उसके भावी संभावित मूल्य से? यही नहीं, बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं को मुनाफा देने में कई साल लगते हैं, इसलिए ऐसी परियोजनाओं को निवेशकों के लिए आकर्षक बनाने की गरज से परिसंपत्ति मौद्रीकरण अनुबंधों की आयु या जीवनकाल को लचीला रखने की जरूरत है.

नीति आयोग ने परियोजनाओं का मूल्य तय करने के कई तरीके प्रस्तावित किए हैं (देखें: कैसे तय हो संपत्तियों का मूल्य). इन अनुबंधों को कैसे गढ़ा जाता है, उससे भी मूल्य निर्धारित होगा. मसलन, सरकार खेल के अलावा दूसरे जमावड़ों के लिए स्टेडियमों के इस्तेमाल की इजाजत देकर उनमें निवेश को ज्यादा आकर्षक बना सकती है. एक स्वतंत्र नियामक होगा या नहीं, इस पर भी स्पष्टता जरूरी है, क्योंकि निवेशक 'कमान और कंट्रोल’ वाला या नीति में रातोरात बदलाव वाला माहौल कतई नहीं चाहेंगे. समूची व्यवस्था को पारदर्शी और लाभदायक होना ही नहीं बल्कि दिखना भी होगा.

अतीत की नाकामियां: इसी से जुड़ी एक और कोशिश—विनिवेश—में सरकार लक्ष्य पूरे करने में बार-बार नाकाम हुई है. 2014-15 और 2020-21 के बीच मोदी सरकार ने इस प्रक्रिया से 6.57 लाख करोड़ रुपए जुटाने का लक्ष्य रखा था, मगर वह 4.04 लाख करोड़ रुपए यानी करीब 60 फीसद ही जुटा सकी.

2020-21 में केंद्र ने 2.1 लाख करोड़ उगाहने की उम्मीद की और महज 21,000 करोड़ रुपए उगाह पाई, बावजूद इसके कि उस वित्तीय साल के दूसरे आधे हिस्से में ज्यादातर समय शेयर बाजार उछाल से चहक रहे थे. 2021-22 के लिए केंद्र ने पीएसयू के विनिवेश, निजीकरण और संपत्ति मौद्रीकरण से 1.75 लाख करोड़ रु. जुटाने का लक्ष्य रखा, पर अभी तक किसी भी संपत्ति का निजीकरण मुश्किल से ही हो पाया है.

कुछ देशों ने कैसे किया अपनी संपत्तियों का मौद्रीकरण
कुछ देशों ने कैसे किया अपनी संपत्तियों का मौद्रीकरण

बीपीसीएल, शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया और कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया सरीखी फर्मों का विनिवेश अभी फलीभूत होना है. सरकार ने 2021-22 में सार्वजनिक क्षेत्र के दो बैंकों और एक सामान्य बीमा कंपनी के निजीकरण का भी प्रस्ताव रखा था, पर अभी प्रगति सुस्त ही है. इसे देखते हुए फिक्र यह है कि कहीं संपत्ति मौद्रीकरण यानी एसेट मॉनिटाइजेशन का हश्र भी यही तो नहीं होगा.

एकाधिकार को रोकना: कइयों को फिक्र है कि संपत्ति मौद्रीकरण एकाधिकारों का निर्माण कर सकता है, जिससे क्रोनीइज्म यानी चहेतों के साम्राज्य फलेंगे-फूलेंगे. अभी हाल ही हुई हवाई अड्डों की नीलामी एक ही संचालक—अडानी ग्रुप—के हाथ में गई, इससे यह तर्क मजबूत ही हुआ. (अडानी ग्रुप भारत में सबसे ज्यादा सात हवाई अड्डों का अकेला संचालक है.) हालांकि नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत कहते हैं कि एनएमपी की प्रक्रिया पारदर्शी होगी.

वे कहते हैं, ''यह सब पारदर्शी प्रतिस्पर्धी बोली की प्रक्रिया के तहत है.’’ चटर्जी की राय है कि अगर पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर चिंताएं हैं तो भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग सरीखे नियामकों को इनकी जांच-पड़ताल करनी चाहिए. एकाधिकारों को रोकने के लिए अनुबंधों में धाराएं जोड़ी जा सकती हैं. मसलन, अगर किसी एक क्षेत्र में छह परियोजनाओं का मौद्रीकरण होना है, तो एक ही बोली लगाने वाले के एक या दो से ज्यादा परियोजनाओं के अधिकार हासिल करने पर पाबंदी की धारा जोड़ी जा सकती है.

सुस्पष्ट रुख और पर्याप्त जांच-पड़ताल: बेंगलूरू स्थित डॉ. बी.आर. आंबेडकर स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स युनिवर्सिटी के वाइस-चांसलर प्रो. एन.आर. भानुमूर्ति कहते हैं, ''मोटे तौर पर मैं सरकारी परिसंपत्तियां निजी क्षेत्र को देने के फलसफे का समर्थक हूं. एनएमपी कार्य कुशलता का मुद्दा हल करेगा, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र निजी क्षेत्र के मुकाबले नाकाम रहा है.’’

भारतीय रेल नेटवर्क पर ट्रेन मार्गों के निजीकरण की हालिया कोशिश से सबक सीखने की जरूरत है. शुरुआत में हालांकि दर्जन भर दावेदार थे पर केवल दो ने बोली लगाई. राजस्व में साझेदारी और मार्गों के मामले में लचीलेपन के अलावा नियामक का न होना और ढुलाई के शुल्कों का भुगतान जैसी वजहों से बोली लगाने वाले छिटक गए.

लाल फीते की कतरब्यौंत: निवेशकों को जरूरी मंजूरियां लेने के लिए बरसों लटकाया जाएगा तो परिसंपत्ति का मूल्य मिट्टी में मिल जाएगा. दिलचस्पी जगाने के लिए परिसंपत्ति को टुकड़ों में भी बांटना पड़ सकता है. एक निवेश बैंकर कहते हैं कि बीपीसीए का विनिवेश इसलिए धीमा रहा क्योंकि फर्म के रिफाइनरी कारोबार में दिलचस्पी रखने वाला निवेशक हो सकता है कंपनी की भारी-भरकम रियल एस्टेट संपत्तियां लेने का इच्छुक न रहा हो. विवाद समाधान तंत्र दूसरी चुनौती हो सकती है. भारत को अनुबंध प्रवर्तन में अभी बहुत काम करना है.

इसी तरह, बिजली क्षेत्र में शुल्क नियम-कायदों के अधीन हैं, जिससे निवेशकों का उत्साह फीका पड़ सकता है. शाह एनएमपी की साज-संभाल के लिए टुमासेक होलडिंग्ज, जिसका मुख्यालय सिंगापुर में है, सरीखी कंपनी के गठन का सुझाव देते हैं. दूसरों का कहना है कि एनएमपी के विशाल पैमाने के चलते इसे कामयाब बनाने के लिए भारत को भारी बौद्धिक पूंजी की जरूरत पड़ेगी. पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जुलाई 2014 के अपने बजट में 500 करोड़ रुपए के कोष से पीपीपी थिंक टैंक—3पी इंडिया—बनाने का ऐलान किया था. यह अब तक नहीं बना.

परिसंपत्ति का मूल्य ह्रास: दूसरी चिंता की बात यह पक्का करना है कि सरकार को लौटाए जाते वक्त परिसंपत्तियां उतनी ही कीमती हों जितनी वे लीज पर दिए जाते वक्त थीं. पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने एक इंटरव्यू में कहा, ‘‘जब वित्त मंत्री कहती हैं कि हम मालिक हैं और संपत्ति हमें लौटा दी जाएगी, तब वे किस संपत्ति की और किस रूप में उसकी बात कर रही हैं?’’ उनका प्रस्ताव है कि संपत्तियों का अवमूल्यन एक मूल्य ह्रास आरक्षित कोष में जाना चाहिए, जिसका इस्तेमाल संपत्ति को अच्छी हालत में रखने में हो.

सार्वजनिक संपत्ति पर तंग नजरिया: शेल इंडिया के पूर्व चेयरमैन विक्रम सिंह मेहता कहते हैं कि उन्हें चिंता यह है कि एनएमपी मॉडल सार्वजनिक उपयोगिता संपत्तियों को वित्त या रोकड़े के संकीर्ण चश्मे से देखता है और जनकल्याण में उनके संभावित योगदान को कम करके आंकता है. नीति आयोग के मुताबिक, कोई सार्वजनिक संपत्ति मॉनिटाइजेशन के लिए उपयुक्त है या नहीं, यह इससे तय होता है कि वह सक्रिय और बेहतर इस्तेमाल की संभावना के साथ राजस्व देने वाली है या नहीं. अगर ऐसा है, तो मौद्रीकरण के लिए उस पर विचार किया जा सकता है.

मेहता ने 6 सितंबर को एक लेख में लिखा, ''मुझे चिंता है कि यह मॉडल लगता है सरकार को इन संपत्तियों की स्वाभाविक सामाजिक अहमियत को बाहर लाने की जिक्वमेदारी से मुन्न्त करता है.’’ मगर कांत कहते हैं कि केंद्र ने निजी क्षेत्र के सलाहकारों को लेकर एक पीपीपी प्रकोष्ठ बनाया है, जो एनएमपी पर अमल के लिए सरकार के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. वे यह भी कहते हैं कि सालाना लक्ष्यों के साथ परियोजनाओं की कड़ी निगरानी की जाएगी. इससे सरकार के मौद्रीकरण लक्ष्यों और जनकल्याण के उद्देश्यों के बीच संतुलन साध पाने की भी उम्मीद है.

कुल मिलाकर, संपत्ति मौद्रीकरण निजी क्षेत्र को साथ लाने के लिए सरकार का जबरदस्त फैसला है. अगर इसे अच्छे से लागू किया जाता है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका कई गुना असर हो सकता है. सरकार आज जिन हालात से गुजर रही है, उनको देखते हुए उसके पास कम ही दूसरे विकल्प बचे थे. ऐसे में इस कोशिश को कामयाब बनाना बेहद जरूरी है. 
—साथ में अनिलेश महाजन

‘‘एसेट मॉनिटाइजेशन का विकास और रोजगार सृजन के मामले में कई स्तरों पर असर पड़ने वाला है’’
अमिताभ कांत, सीईओ, नीति आयोग

''निजी क्षेत्र की भागीदारी आमंत्रित कर हम संपत्तियों को बेहतर ढंग से मॉनेटाइज कर पाएंगे और बुनियादी ढांचे के निर्माण में निवेश को पक्का कर पाएंगे’’
निर्मला सीतारमण, केंद्रीय वित्त मंत्री

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