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पंजाबः आप की नई सुबह

पंजाब के हताश-निराश मतदाताओं ने आप के चुनाव चिह्न झाड़ू से पुरानों को बुहार बाहर किया और भगवंत मान के साथ बिल्कुल नई शुरुआत की उत्सुकता दिखाई. मान ऐंड कंपनी के कंधों पर अब बड़ी जिम्मेदारी

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जोरदार आगाज केजरीवाल और भावी मुख्यमंत्री भगवंत मान पटियाला की एक प्रचार रैली में जोरदार आगाज केजरीवाल और भावी मुख्यमंत्री भगवंत मान पटियाला की एक प्रचार रैली में

पंजाब में मतगणना के पहले घंटे में ही अमूमन उनींदे रहने वाले धुरी कस्बे में आतिशबाजी की तड़तड़ाहट और विजयोल्लास से भरी ढोलों की आवाजें गूंजने लगीं. आम आदमी पार्टी (आप) के समर्थक हाथों में पार्टी का चुनाव चिह्न झाड़ू लिए अपने स्थानीय उम्मीदवार और मुख्यमंत्री पद के चेहरे भगवंत मान के घर पहुंच गए. दोपहर होते-होते जब आप 92 सीटों और 42 फीसद वोट हिस्सेदारी के साथ ऐतिहासिक कामयाबी की तरफ बढ़ रही थी, धीरे-धीरे जश्न पूरे राज्य में फैलता चला गया.

इतालवी बेप्पे ग्रिल्लो या यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की के सांचे में ढले लोकप्रिय कॉमेडियन से राजनेता बने मान ने राजनैतिक प्रतिष्ठान के खिलाफ अपनी बेरहम फब्तियों से खासी तारीफें बटोरीं. 2014 से संगरूर के सांसद मान की हंसी-मजाक से भरी भाषण कला ने लोकसभा में अपनी अलग पहचान बनाई. उधर गृहराज्य में उनके तीखे कटाक्षों ने पंजाब के दो सियासी दिग्गजों, शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) के प्रकाश सिंह बादल और पूर्व कांग्रेसी अमरिंदर सिंह तथा उनकी पार्टियों के प्रति मतदाताओं के मन में संदेह की लौ जलाए रखी, जिसने पारंपरिक पार्टियों के प्रति वोटरों के मोहभंग को आवाज दी.

इस जज्बे ने चुनावों पर भी अपनी छाप छोड़ी और पंजाब की राजनीति के बड़े नामों को धूल चटा दी. इस फेहरिस्त में चमकौर साहिब और भदौड़ दोनों सीटों से चुनाव हारे सत्तारूढ़ मुख्यमंत्री चरणजीत चन्नी, अमृतसर पूर्व से हार का स्वाद चखने वाले पंजाब कांग्रेस के प्रमुख नवजोत सिद्धू, अपनी पारंपरिक सीट लांबी से उखाड़ फेंके गए प्रकाश सिंह बादल, जलालपुर से पराजित उनके बेटे और एसएडी के पार्टी प्रमुख सुखबीर बादल और बठिंडा ग्रामीण सीट से चारों खाने चित्त वित्त मंत्री मनप्रीत बादल के अलावा और भी कई हैं. पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह भी अपने गढ़ पटियाला से हार गए. इन सभी जगहों पर आप के उम्मीदवारों ने फतह के झंडे गाड़े. आप को उस अफरा-तफरी का पूरा फायदा मिला जो सितंबर 2021 के मध्य में कांग्रेस की ओर से अमरिंदर को हटाए जाने के बाद पंजाब की राजनीति में मची थी. नेतृत्व के अभाव में पार्टी नेता आपस में गुत्थमगुत्था हो गए जिससे मतदाताओं में भ्रम फैला. इस बदलाव के शिल्पकार गांधी भाई-बहनों प्रियंका और राहुल ने भ्रम को खत्म करने की कम ही कोशिश की. चुनाव के महज दो हफ्ते पहले जब चन्नी को पार्टी का मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित किया, तब तक नुक्सान हो चुका था.

पंजाबः आप की नई सुबह
पंजाबः आप की नई सुबह

राज्य के पहले दलित मुख्यमंत्री चन्नी समर्थन के लिए खुद अपने रामदासी/रविदसिया समुदाय पर भारी भरोसा करके चल रहे थे. इस समुदाय का पंजाब के दोआबा इलाके में दबदबा है, जो राज्य विधानसभा में 23 विधायक भेजता है. अंतत: हुआ यह कि कांग्रेस इस इलाके की महज आठ सीटें जीत पाई. दलित उसके पीछे लामबंद नहीं हुए. इसके पीछे मोटा-मोटी वजह थी कांग्रेस के भीतर जबरदस्त अंतर्कलह और दिल्ली स्थित पार्टी मुख्यालय में लिए गए गड़बड़ फैसले. हकीकत यह है कि व्यापक दोआबा इलाके की सुल्तानपुर लोधी सीट से निर्दलीय विजेता और उद्योगपति राणा गुरजीत सिंह के बेटे राणा इंदर प्रताप सिंह चन्नी सरकार में कैबिनेट मंत्री थे.

इन चुनावों में कांग्रेस की सीटें पिछली विधानसभा की 80 सीटों से घटकर महज 18 रह गईं. वोट हिस्सेदारी 2017 की 38.5 फीसद से घटकर 23 फीसद पर आ गई, जो पार्टी के लिए उग्रवाद के बाद के युग का नया निचला स्तर है. उनके पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी एसएडी का भी अपने पारंपरिक पंथिक वोटरों का भरोसा गंवाने का सिलसिला थमा नहीं. बादल परिवार इन लोकप्रिय धारणाओं से दागदार नजर आता है, फिर चाहे वे कितनी भी मनगढ़ंत हों, कि उन्होंने सिख धार्मिक संस्थाओं की बेअदबी की कथित घटनाओं के दोषियों की सरपरस्ती की, मादक पदार्थों के व्यापारियों को पनाह दी और एसजीपीसी के गुरुद्वारों की रकम में गड़बड़ी की. उधर, उनके तत्कालीन सहयोगी दल भाजपा के प्रति लंबे चले किसान आंदोलन के नतीजतन मतदाताओं की बेरुखी बनी रही. नतीजा यह कि 100 साल पुराना एसएडी अपनी सहयोगी पार्टी बसपा की अकेली सीट के साथ महज तीन सीटों पर सिमट गया. 18.4 फीसद वोट हिस्सेदारी के साथ इस पंथिक पार्टी का यह अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन है.

सरहदी राज्य की इस हैरतअंगेज जीत ने पार्टी नेताओं के मन में आप की ज्यादा बड़ी राष्ट्रीय भूमिका की महत्वाकांक्षा जगा दी है. पार्टी के पंजाब चुनाव प्रभारी राघव चड्ढा कहते हैं, ''इसमें कोई शक नहीं कि आज के नतीजों ने आप को भारतीय राजनीति के इतिहास में अब तक की सबसे तेजी से बढ़ती राजनैतिक पार्टी बना दिया है. आज हम राष्ट्रीय पार्टी हैं. देश भर में मजबूत ताकत हैं जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती. किसी भी दूसरी पार्टी ने यह हैसियत हासिल नहीं की. यह तय करना आप पर नहीं है कि गुजरात, हिमाचल प्रदेश में चुनाव लड़े या नहीं, यह तय करना इन राज्यों के लोगों पर है कि वे अपने राज्य में आप को चाहते हैं या नहीं.'' इस साल जब राज्यसभा के चुनाव होंगे, आप पंजाब से पांच सदस्य ऊपरी सदन में भेज सकेगी.

आप ने चंडीगढ़ में अपने पंख फैला ही लिए हैं. यहां 35 सदस्यों के स्थानीय निगम में उसके 14 सदस्य चुनकर आए. इसी तरह पार्टी के दो सदस्य गोवा में चुने गए. मगर उनकी आसमान छूती महत्वाकांक्षा परवान चढ़ सके, इसके लिए मान को काम करके दिखाना होगा. पंजाब में पूर्ण सरकार के साथ अब आप अपने राजकाज के मॉडल को नजीर बनाकर और केजरीवाल को राष्ट्रीय नेता की तरह पेश करने पर काम कर सकती है. नतीजों के ऐलान के दिन (10 मार्च ) दिल्ली में एक जनसभा में केजरीवाल ने स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह के शब्दों की दुहाई दी, ''जब तक व्यवस्था नहीं बदलती, कुछ नहीं बदलता...'' मान को यही बदलाव बनना पड़ेगा. भाजपा को हिंदू बहुल पठानकोट और मुकेरियां की सीटें जरूर मिलीं और उसने करीब 6 फीसद की वोट हिस्सेदारी भी बरकरार रखी, पर दूसरी जगहों पर वह मूल हिंदू समुदाय का भरोसा जीतने में भी नाकाम रही. चुनावों से पहले जिस एक और चीज ने राजनैतिक मंथन में इजाफा किया, वे शिक्षकों से लेकर आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, ठेका कामगारों वगैरह तक की नौकरियों को नियमित करने की मांग को लेकर चल रहे प्रदर्शन थे. 

इन तमाम हालात का फायदा आप को मिला. मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार का राजतिलक होने के बाद मान राज्य में खुलकर चुनाव अभियान चला पाए. राज्य के एक शीर्ष आप नेता कहते हैं कि हालांकि दिल्ली की इसी काम के लिए समर्पित टीम ने उन्हें मीडिया से अलग-थलग रखा, पर 'झाड़ू पर बटन दबाने' का ज्यादा बड़ा संदेश पहले ही राज्य के कोने-कोने में पहुंच चुका था.

पंजाब का कुल जमा कर्ज तकरीबन 2.82 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच गया है, ऐसे में मान के सामने गंभीर चुनौतियां हैं. बीते पांच साल में पंजाब के कर्ज में 1 लाख करोड़ रुपए का इजाफा हुआ. मान की मुश्किलें इस बात से बढ़ेंगी कि जून के बाद केंद्र जीएसटी की भरपाई की रकम देने को बाध्य नहीं होगा. राज्य अब भी जीएसटी से राजस्व के लक्ष्य का 20 फीसद कम संग्रह कर पा रहा है. मान के आलोचक कहते हैं कि एक तरफ मुद्दे इतने गंभीर हैं और दूसरी तरफ उन्हें कोई प्रशासनिक तजुर्बा नहीं है.

दिल्ली में केजरीवाल के विपरीत, पंजाब में मान को सरप्लस बजट की आलीशान सुविधा भी हासिल नहीं है. राज्य के कृषि संकट से निपटने के लिए उन्हें किसानों को फसलों में विविधता के लिए प्रोत्साहित करना होगा, पंजाब में उद्योग लगाने के उपाय खोजने होंगे. किसान यूनियनों के हालिया विरोध प्रदर्शनों के चलते निजी निवेशक पंजाब पर बड़ा दांव लगाने से कतराने लगे हैं. उनकी सबसे बड़ी चुनौती दबदबा रखने वाले जाट सिखों, दलितों और सवर्ण हिंदुओं के बीच संतुलन साधना होगा. इस धारणा को बनने से रोकना होगा कि उन्हें दिल्ली का पार्टी हाइकमान पट्टी पढ़ा रहा है. इसके लिए वे अमरिंदर से सीख सकते हैं, जिन्होंने कांग्रेसी मुख्यमंत्री होने के बावजूद पंजाब को क्षेत्रीय संस्था की तरह चलाया. सतलज-यमुना लिंक नहर और किसानों को मुफ्त बिजली सरीखे कई मुद्दों पर उन्होंने हाइकमान की बात नहीं मानी. इसी तरह पराली जलाने और पानी के बंटवारे सरीखे मुद्दों पर मान को केजरीवाल की दिल्ली सरकार के सामने तनकर खड़ा होना होगा. साथ ही मान को पंथिक मुद्दों पर संभलकर चलना होगा.

एसएडी के लगभग पूर्ण सफाये से आप के सामने शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) और सिख राजनीति में सुखबीर बादल को और भी किनारे लगाने के दरवाजे खुल गए हैं. ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद यह पहली बार है जब एसएडी राज्य की राजनीति से तकरीबन बाहर है और कांग्रेस भी कमजोर है. उधर, राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे की बात करें, तो सिमरनजीत सिंह मान की अगुआई वाले शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) सहित खालिस्तान-समर्थक धड़ों ने करीब 5 फीसद वोट जुटाए. उनके साथ लोकतांत्रिक ढंग से निपटते हुए मान को आप पर विश्वास का जोखिम उठाने वाले हिंदू वोटरों को भी भरोसा दिलाना होगा.

कानून और व्यवस्था के मसले, सीमा पार से हथियारों की तस्करी, सिंचाई और बांधों को लेकर राज्यों के बीच के विवाद और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ पंजाब को सौंपना, ये मुद्दे चुनौतियों की उस खड़ी फसल में शामिल हैं जो कभी ग्रामीण खुशहाली और तरक्की के लिए भारत की नजीर रहे इस राज्य की बागडोर संभालने पर मान की अग्निपरीक्षा लेंगे. मान और उनकी पार्टी के लिए यह बेहद मुश्किल काम है, तो अभूतपूर्व मौका भी है.

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