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आवरण कथाः नाकामियों की त्रासदी

सामूहिक अंत्येष्टियां, अस्पताल में बिस्तरों के लिए मारामारी, चिकित्सा ऑक्सीजन के लिए हायतौबा, हर तरफ हाहाकार, पारिवारिक त्रासदियां—कोविड की दूसरी लहर के डरावने नजारों ने देश की राज्यसत्ता की घोर नाकामी को बेनकाब कर दिया.

चिताओं की तपिश दिल्ली के गाजीपुर अंत्येष्टि स्थल पर जलती चिताओं के बीच शव जलाने के लिए लकड़ियां ले जाते कर्मचारी चिताओं की तपिश दिल्ली के गाजीपुर अंत्येष्टि स्थल पर जलती चिताओं के बीच शव जलाने के लिए लकड़ियां ले जाते कर्मचारी

सामूहिक चिताएं और कफन में लिपटे शवों की सर्पिल कतारें. बीमार को भर्ती कर लेने की गुहार लगाते हांफते-चिल्लातें स्त्री-पुरुष. मातम मनाते टूटे और रोते-बिलखते लोग. नई दिल्ली में आज, देश के किसी भी दूसरे महानगर की तरह, सड़कें खामोश और बाजार बंद हैं. लेकिन किसी भी अस्पताल का रुख करें तो आपको सड़कों का जाना-पहचाना कोलाहल मिलेगा, जो कभी निस्तब्ध रहने वाले आइसीयू में चरम पर पहुंच जाएगा, जहां बदहवास और मरते लोगों की चीखें और कराहें गूंज रही हैं.

बेशक हममें से ज्यादातर लोग अपने घरों में बंद हैं, और ऐसे दृश्यों को केवल अपने टीवी के परदे पर देख रहे होते हैं. हालांकि हम अपने परिजनों, मित्रों, मित्रों के मित्रों को अस्पताल में एक बिस्तर या ऑक्सीजन सिलिंडर, रेमडेसिविर या ज्यादा ऑक्सीजन की गुहार लगाते हुए फोन कॉल नहीं कर रहे या टेक्स्ट मेसेज नहीं भेज रहे होते हैं, तो फेसबुक और व्हॉट्सऐप पर हमदर्दी जता रहे होते हैं.

कोविड-19 की दूसरी लहर अभी अपने चरम की तरफ बढ़ ही रही है, लेकिन इसकी दहशत हम सबके चारों ओर पसर आई है और हममें से कई सारे दुखों से घिरे हैं. हम सभी को यह दुखद एहसास हो चुका है कि हम बार-बार लौटकर आते दु:स्वप्न, पहले से सुन रखी त्रासदी के बीच असहाय खड़े हैं. उन दिनों की कटु यादें हमारे भीतर हैं जब हम बार-बार की गई मूर्खताओं से भरमाए गए थे. भारतीयों की अतिमानवनीय रोगप्रतिरोधक क्षमता से जुड़ी मूर्खता याद है? स्टील के बर्तन बजाना याद है? दुनिया को यह बताना याद है कि भारत ने कोविड-19 पर फतह हासिल कर ली है?

इस फतह का ऐलान जनवरी में हुआ था. उस अट्टाहास जैसी शेखी और आज 3,80,000 नए संक्रमणों तथा रोज 4,000 मौतों के बीच चार महीनों में गंवाए गए मौकों की दास्तान बाबस्ता है. यह सब इसके बावजूद हुआ है कि केंद्र सरकार के पास कोविड के प्रबंधन के लिए शीर्ष अफसरों और विशेषज्ञों के अधिकार-प्राप्त समूहों और कार्यबलों का पूरा जत्था है (साथ का ग्राफिक देखें). यह कार्रवाई का वक्त था.

जाहिर चीजों—यानी डॉक्टरों, अस्पतालों में बिस्तरों, कोविड की दवाइयों और टीकों, ऑक्सीजन, वायरस रिसर्च और केंद्र-राज्य तालमेल—की प्राथमिकताएं तय करने का वक्त था. आप कह सकते हैं कि कोविड की सबसे अधिक पस्त तो शिकार तो देश की राज्यसत्ता है, लेकिन यह बात को अधिक खींचना होगा. 

हकीकत यह है कि राज्यसत्ता और उसे चलाने वालों ने हमें नाकाम किया है—उसी तरह जैसे जिंदगी में कोई हिमालय के आकार की भारी-भरकम भूल हो जाए. अलबत्ता वह राज्यसत्ता अब भी मौजूद है, उसकी सारी शाखाएं भी पूरी तरह साबुत हैं और कोविड-19 के मौजूदा उभार को शांत करने और इसके की तीसरी लहर के खतरे को रोकने की चुनौती पर खरा उतरने के लिए हमें इस पर भरोसा करना ही होगा. इस प्रक्रिया की शुरुआत इस बात की पड़ताल से होनी चाहिए कि हम कहां और कैसे नाकाम हुए.

अगले पन्ने में हम अपने राजनैतिक नेतृत्व की लापरवाही, उदासीनता और नाकामी की दुखद कहानी बेपरदा कर रहे हैं. संस्थाओं का ढह जाना और अफसरशाही की कायरता जिसने सुपर स्प्रैडर धार्मिक मेलों और आठ चरण लंबे चुनाव अभियान के राजनैतिक उत्सव की सुविधा प्रदान की, वह भी तब जब महामारी की दूसरी लहर फूट पड़ी थी. वह अहंकार जिसकी बदौलत हमारे नेता विशेषज्ञ समूहों की चेतावनियों को नजरअंदाज कर पाए. राष्ट्रीय आपदा के बीचोबीच केंद्र और राज्यों के बीच सर्वदलीय गठबंधन बनाने की उनकी अक्षमता. 

अब जब देश की कुछ सबसे मुखर और तेज आवाजें खामोश हो गई हैं, कोविड की दूसरी लहर को संभालने में सरकार की नाकामी को लेकर पूछे जा रहे परेशान और नाराज करने वाले सवालों पर सत्ताधारियों की खामोशी कानफोड़ू हो सकती है. हमारी रिपोर्टें इनमें से कुछ सवालों के जवाब देती हैं और विशेषज्ञों के सुझाव सामने रखती हैं कि गलतियों की इस अनवरत त्रासदी से निकलने का रास्ता कैसे खोजें. सबसे ज्यादा जरूरत है कि सरकार के सक्रिय होकर काम करे और तेजी से कदम उठाए. ठ्ठ

कोविड-19 के इंतजामों के लिए मोदी सरकार का खास व्यवस्था तंत्र
केंद्र सरकार ने 29 मार्च 2020 को कोविड-19 महामारी के खिलाफ लड़ाई के विभिन्न पहलुओं से निपटने के लिए 11 अधिकार-प्राप्त समितियों का गठन किया था. 11 सितंबर को उन्हें छह छोटे समूहों में बदल दिया गया और प्रत्येक को ज्यादा बड़ी भूमिका सौंपी गई.

ये समूह मुख्य सचिवों या दूसरे निर्दिष्ट अधिकारियो के जरिए राज्य सरकारों के साथ तालमेल करके अपने काम करते हैं. इन अधिकार-प्राप्त समूहों की तो प्रमुख भूमिकाएं हैं ही, असल मुद्दा, राज्यों के साथ तालमेल बिठाने और अक्तूबर के आसपास पहली लहर के मंद पडऩे तथा मार्च में दूसरी लहर के आने के बाद, उनकी धीमी पड़ती रफ्तार का है. अब ये समूह चिकित्सा के बुनियादी ढांचे को बढ़ाने और मजबूत करने की जद्दोजहद में जुटे हैं

प्रमुख अधिकारः प्राप्त समूह

चिकित्सा ढांचा और कोविड प्रबंधन
अध्यक्ष:
डॉ. विनोद पॉल, नीति आयोग
सदस्य: बॉयोटक्नोलॉजी विभाग की सचिव डॉ. रेणु स्वरूप; एनडीएमए के वी. तिरुप्पुगझ; केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, केंद्रीय कैबिनेट और पीएमओ में डायरेक्टर स्तर का एक अधिकारी; एम्स के डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया; आइसीएमआर के डॉ. रमण आर. गंगाखेडकर; रक्षा मंत्रालय के विशेष सचिव जीवेश नंदन

कार्यक्षेत्र: कोविड के प्रकोप को रोकना, मानक प्रोटोकॉल प्रकियाओं का सुझाव देना और वैक्सीन के विकास/उत्पादन की निगरानी करना. यह अस्पताल में बिस्तरों, आइसोलेशन और क्वारंटीन सुविधाओं की उपलब्धता की समीक्षा भी करता है और रोग की निगरानी तथा टेस्टिंग भी संभालता है

ऑक्सीजन की आपूर्ति को बढ़ाना और उसका प्रबंधन
अध्यक्ष:
गुरुप्रसाद महापात्र, सचिव, उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग
सदस्य: फार्मास्यूटिकल्स की सचिव एस. अपर्णा; टेक्सटाइल्स सचिव यू.पी. सिंह; आयुष सचिव राजेश कोटेचा और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आपात चिकित्सा रिस्पॉन्स डिविजन के अधिकारी डॉ. पी. रवींद्रन
कार्यक्षेत्र: ऑक्सीजन और संबंधित संसाधनों और बुनियादी ढांचे का प्रबंधन और मांग तथा आपूर्ति का समन्वय बनाना

आपूर्ति श्रृंखलाओं और लॉजिस्टिक्स प्रबंधन को आसान बनाना
अध्यक्ष:
अजय भल्ला, गृह सचिव
सदस्य: सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के सचिव गिरिधर अरमने; नागरिक उड्डयन विभाग के सचिव प्रदीप सिंह खरोला; खाद्य प्रसंस्करण विभाग की सचिव पुष्पा सुब्रह्मण्यम; उपभोक्ता मामले विभाग की सचिव लीना नंदन; वाणिज्य मंत्रालय, पीएमओ और कैबिनेट सचिवालय के अधिकारी

कार्यक्षेत्र: कोविड प्रबंधन से जुड़े रणनीतिक मुद्दों से निपटना, आपूर्ति शृंखला और लॉजिस्टिक प्रबंधन को आसान बनाना, लॉकडाउन, कर्फ्यू  और सार्वजनिक आवाजाही पर पाबंदियों से पैदा जटिलताओं को संभालना, साथ ही मानक प्रोटोकॉल प्रक्रियाओं पर अमल पक्का करने के लिए राज्यों से तालमेल

आर्थिक और कल्याणकारी उपाय
अध्यक्ष:
अजय सेठ, सचिव, आर्थिक मामलों का विभाग
सदस्य: खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग के सचिव सुधांशु पांडेय; बैंकिंग सचिव देबाशीष पंडा; आवास और शहरी मामले मंत्रालय के सचिव दुर्गाशंकर मिश्रा; ग्रामीण विकास सचिव एन.एन. सिन्हा; पीएमओ, नीति आयोग और कैबिनेट सचिवालय के अधिकारी
कार्यक्षेत्र : एमएसएमई, उद्यमियों और समाज के कमजोर तबकों को पूंजी की जरूरत, अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन देने की जरूरत को आसान बनाने के तरीके खोजना

संचार और कोविड से जुड़े व्यवहार
अध्यक्ष:
अमित खरे, सचिव, सूचना और प्रसारण
सदस्य: पीएमओ; स्वास्थ्य मंत्रालय, आयुष मंत्रालय, कैबिनेट सचिवालय, नीति आयोग और इलेक्ट्रॉनिक्स तथा सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधिकारी
कार्यक्षेत्र : जागरूकता के तरीके, संचार संभालना, और जन शिकायतों का निवारण तथा डेटा प्रबंधन 

निजी क्षेत्र, एनजीओ और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ तालमेल
अध्यक्ष:
अमिताभ कांत, सीईओ, नीति आयोग
सदस्य: व्यय सचिव टी.वी. सोमनाथन; केंद्र के वैज्ञानिक सलाहकार के. विजय राघवन; विदेश मामलों के मंत्रालय, गृह मंत्रालय और स्वास्थ्य तथा परिवार कल्याण मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव
कार्यक्षेत्र: कोविड प्रबंधन के लिए एनजीओ, सिविल सोसायटी समूहों और विदेशी सहायता समूहों के साथ तालमेल करना

उपसमूह और प्रकोष्ठ
कोविड राहत प्रकोष्ठ

केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव, स्वास्थ्य के तहत. इस प्रकोष्ठ में अन्यों के अलावा शिक्षा मंत्रालय के एक संयुक्त सचिव, विदेश मंत्रालय के दो अतिरिक्त सचिव स्तर के अधिकारी, सीमा शुल्क विभाग के मुक्चय आयुक्त और नागरिक विमानन मंत्रालय के आर्थिक सलाहकार भी हैं. यह विदेशी कोविड-19 सहायता, राहत सामग्री और दान की प्राप्तियों और आवंटन में तालमेल का काम करता है

ऑक्सीजन उप-समूह
केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के तहत रेलवे मंत्रालय और राज्य परिवहन विभागों के साथ गठित, ताकि तरल चिकित्सा ऑक्सीजन टैंकरों का आवाजाही को आसान बनाए. इसका काम उत्पादन संयंत्रों से राज्यों की ओर से तय डिलिवरी बिंदुओं तक ऑक्सीजन सुचारू ढंग से पहुंचाना की व्यवस्था करना है. अतिरिक्त सचिव स्तर के अधिकारियों का एक अलग उप-समूह ऑक्सीजन के उत्पादन और राज्यों को आपूर्ति की निगरानी करता है

कार्यबल
कोविड के लिए राष्ट्रीय कार्यबल 
अध्यक्ष:
डॉ. विनोद पॉल, सदस्य, नीति आयोग
सह-अध्यक्ष: राजेश भूषण, स्वास्थ्य सचिव; डॉ. बलराम भार्गव, सचिव, स्वास्थ्य शोध विभाग और डीजी, आइसीएमआर

सदस्य: डॉ. रणदीप गुलेरिया, एम्स, नई दिल्ली; डॉ रमण आर. गंगाखेडकर, आइसीएमआर; डॉ. के. श्रीनाथ रेड्डी, पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ हेल्थ; डॉ. वनीत विग, एम्स, नई दिल्ली; डॉ. राजन खोबरागड़े, अतिरिक्त मुख्य सचिव, केरल सरकार; डॉ. शशिकांत, एम्स, नई दिल्ली; डॉ. ललित धर, एम्स, नई दिल्ली; डॉ. जे.वी. प्रसाद राव, पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव; डॉ. सुरजीत सिंह, राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र, दिल्ली; डॉ. स्वरूप सरकार, आइसीएमआर

कार्यक्षेत्र: आइसीएमआर ने कोविड-19 के लिए अनुसंधान अध्ययनों की शुरुआत करने और क्लिनिकल रिसर्च, डाग्नोस्टिक तथा बॉयो-मार्कर, एपिडेमियोलॉजी और निगरानी, वैक्सीन और दवा विकसित करने की खातिर एक राष्ट्रीय कार्यबल का गठन किया

वैन्न्सीन पर राष्ट्रीय विशेषज्ञ समूह
अध्यक्ष:
डॉ. विनोद पॉल, सदस्य नीति आयोग
सह-अध्यक्ष: राजेश भूषण, स्वास्थ्य सचिव
सदस्य: विदेश मंत्रालय, बॉयोटेक्नोलॉजी विभाग, हेल्थ रिसर्च और फार्मास्यूटिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव और साथ ही डायरेक्टर जनरल, स्वास्थ्य सेवा; डायरेक्टर, एम्स, दिल्ली; डायरेक्टर, एनएआरआइ; टीकाकरण पर राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समूह, वित्त मंत्रालय और भारत के सभी क्षेत्रों की नुमाइंदगी करने वाले पांच राज्य सरकारों के प्रतिनिधि

कार्यक्षेत्र : परीक्षणों के मार्गदर्शन, वैक्सीन के चयन, समान वितरण, खरीद, धन जुटाने, डिलिवरी तंत्र, आबादी समूह की प्राथमिकता तय करने, वैक्सीन की सुरक्षा निगरानी, क्षेत्रीय सहयोग और पड़ोसी देशों की सहायता करने तथा संचार सहित वैक्सीन की शुरुआत के तमाम पहलुओं का मार्गदर्शन करना

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