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आवरण कथाः समाधान के लिए संवाद का समय

2020 में सड़क पर उतरे लोगों ने सहज ही संविधान के अस्तित्व को साबित किया. अब वह समय भी आ गया है कि शासक वर्ग इसकी हदों का ख्याल करे

संजय हेगड़े संजय हेगड़े

नया दौर, नई राहें 2021
संजय हेगड़े

नया-नया स्वतंत्र हुआ भारत जनवरी 1950 में, बीत रहे दशक की भारी उथल-पुथल की पृष्ठभूमि में रचे गए नए संविधान के साथ गणतंत्र के रूप में सामने आया. 1940 के दशक के भारत ने द्वितीय विश्व युद्ध, यहूदियों का महासंहार, एटमी हमला, विभाजन के बाद के दंगे और महात्मा गांधी का कत्ल देखा था. हमारे गणतंत्र के संस्थापकों ने एक ऐसा रास्ता चुना जिसने देश को बीते दशक की हिंसा के कारणों से दूर ले जाते हुए इसे हर नागरिक की रक्षा करने वाले सक्रिय लोकतंत्र के रूप में शांतिपूर्ण उदय के रास्ते पर बनाए रखा.

भारतीय संविधान पर हस्ताक्षर करने की पूर्वसंध्या पर डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भारत को तीन चेतावनियां दीं. उन्होंने भारत को राजनैतिक सवालों के निबटारे के लिए हिंसक आंदोलनों से बचने और केवल संवैधानिक साधनों का सहारा लेने की चेतावनी दी. दूसरे, उन्होंने भारत का आह्वान किया कि वह अपनी स्वतंत्रता को कभी किसी महान व्यक्ति के चरणों में न रखे. तीसरे, उन्होंने भारत को चेताया था कि सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र के बिना केवल राजनैतिक लोकतंत्र दो कौड़ी का होगा. 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में उनके भाषण में एक चौथी चेतावनी भी थी.

डॉ. आंबेडकर ने चेताया था कि ''भारत जैसे देश में—जहां लंबे समय से लोकतंत्र का उपयोग न होने के कारण इसके अपेक्षाकृत एक नई चीज मान लिए जाने का अंदेशा है—इस बात का खतरा मौजूद है कि लोकतंत्र अपना स्थान कहीं तानाशाही को न दे दे. इस नवजात लोकतंत्र के लिए बहुत संभव है कि वह अपना रूप बनाए रखे लेकिन वास्तव में तानाशाही को जगह दे दे. भारी बहुमत की स्थिति में दूसरी संभावना के सच होने का खतरा बहुत अधिक है.’’

भारतीय संविधान के जीवनकाल के 70 वर्षों में देश अक्सर तीनों चेतावनियों में से इस या उस की परवाह न करते हुए आगे बढ़ा है. शायद ही कभी तीनों आकस्मिकताएं एक साथ हुई हों. पर आज तीनों एक साथ मौजूद हैं. सड़कों पर आंदोलन है; एक-आदमी वाली सरकार के पास भारी बहुमत है और बेहद अमीर लोग अपने साथी देशवासियों से बड़े पैमाने पर कटे हुए हैं. हमारा समाज खुद को प्राचीन धार्मिक मतभेदों के आधार पर विभाजित करने की उल्टी दौड़ में लगा है. अब जब कैलेंडर 21वीं सदी के एक नए दशक में प्रवेश कर चुका है, तब संभव है कि आंबेडकर की चौथी चेतावनी को भी नजरअंदाज किया जा चुका हो.

2020 की शुरुआत हमने शाहीन बाग में सड़कों को अवरुद्ध करने वाले आंदोलन के साथ की थी और इसका अंत दिल्ली के सिंघु बॉर्डर पर किसानों का रास्ता रोके जाने के साथ हुआ है. राष्ट्र की सीमाओं में चीनी घुसपैठ और देश भर में कोविड-19 वायरस के फैलाव ने हालात नियंत्रण से बाहर जाने की भावना को बढ़ाया है. देश में अराजकता के बोलबाले के बीच केंद्र के लिए स्थितियां संभाल पाना मुश्किल हो रहा है. लेकिन इस सारी अराजकता के बीच आंबेडकर की अध्यक्षता में बना भारत का संविधान भी कोने-कोने तक पहुंच गया है.

साल की शुरुआत जब नागरिकता संशोधन विधेयक के राष्ट्रव्यापी विरोध के साथ हुई थी, तब आंदोलन का मुक्चय केंद्र बने दिल्ली के शाहीन बाग समेत पूरे देश में हो रहे विरोध प्रदर्शनों में संविधान की प्रस्तावना पढ़ी और उद्धृत की जा रही थी. राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान के साथ ही संविधान की प्रस्तावना भी नागरिकों के लिए नागरिक जीवन से अपने संबंधों की प्रतिज्ञाएं दोहराने की प्रार्थना और वादा दोनों बन गई थी.

भाईचारे के रूप में अभिव्यन्न्त एक नागरिक से दूसरे नागरिक के बीच के सामाजिक अनुबंध को प्रतिबिंबित करने के लिए संविधान का पाठ हुआ. इसे एक स्वतंत्र नागरिक और एक निर्वाचित लेकिन जवाबदेह सरकार के बीच संबंधों के नियामक के रूप में भी देखा गया. यह राष्ट्रीय अभिलेख अदालतों और विधानसभाओं तक सीमित न रह कर प्रदर्शनकारियों के बीच एक वादे और नागरिकता छीने जाने के विरुद्ध जादुई ताबीज के रूप में मौजूद रहता था.

मार्च 2020 में कोविड की शुरुआत के बाद विरोध प्रदर्शनों में गिरावट दिखी, लेकिन साल के आगे बढऩे के क्रम में विधायी शक्तियों के ऐसे ही दुरुपयोग के चलते किसानों के विरोध आंदोलन की दूसरी लहर शुरू हो गई. राम मनोहर लोहिया की मशहूर चेतावनी थी कि ‘अगर सड़कें खामोश हो जाएंगी, तो संसद आवारा हो जाएगी.’ अब ऐसा लगता है मानो संसद के भीतर के मौन ने सार्वजनिक विमर्श को सड़कों पर उतार दिया है. ऐसा इसलिए है कि संसद में सार्थक चर्चा बहुत कम ही होती है.

केवल कार्यपालिका की मर्जी से बने विधान का अनुमोदन करने के लिए इकट्ठा होने वाली संसद कोई विचार-विमर्श करने वाला निकाय नहीं होती. यह 19वीं सदी में ब्रिटिश संसद के कामकाज के बारे में डब्ल्यू.एस. गिल्बर्ट के वर्णन जैसी स्थिति है, कि ''उस सदन में, सांसद जब होते हैं विभाजित, और उनमें हो मस्तिष्क व विचार क्षमता, तो, उन्हें बाहर छोड़ आना होता है मस्तिष्क को, वोट करना होता है वहां, जहां उनका नेता कहे.’’

दलबदल विरोधी कानूनों के चलते भारत में सांसद बताए अनुसार ही वोट देने के लिए बाध्य होते हैं. भारतीय संसद में भारी बहुमत के चलते मौजूदा सरकार के पास किसी नतीजे या जिन पर लागू होना है उन पर पडऩे वाले प्रभावों की चिंता किए बगैर जो मन में आए, कानून पारित करने की क्षमता है. इसी तरह, किसानों से परामर्श किए बिना कृषि अधिनियमों को और गैर-भेदभाव के बुनियादी सांविधानिक प्रावधानों का खंडन करने वाले धर्म-आधारित नागरिकता अधिनियमों को लाया गया.

रातोरात, कानूनों ने तिहरे तलाक का अपराधीकरण कर दिया, ऊंची जातियों के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण दे दिया और संविधान के अनुच्छेद 370 को खोखला कर दिया. पहले से कोई संसदीय परामर्श किए बिना, तुरंत लिए गए निर्णयों को विधायी प्रक्रिया के माध्यम से दूरगामी परिणाम वाले कानूनों में बदल दिया जा रहा है.

केंद्र में तेजी से बनाए गए कानूनों का एक नतीजा यह है कि राज्य विधायिकाएं भी सत्तारूढ़ बहुमत को तुरत-फुरत बहुसंख्यकवादी कानून बनाने के तंत्र में बदलने का साहस करने लगी हैं. राज्यों में गोहत्या, धर्मांतरण और विवाहों के खिलाफ अध्यादेश के रास्ते तेजी से कानून बना कर नागरिकों के एक वर्ग के खिलाफ अपने शस्त्रागारों को बड़ा किया गया है. 

संवैधानिक रूप से संसद और विधानसभाओं को किसी सरकार की कर्तव्यनिष्ठ मुहर भर नहीं बनाया गया था. उन्हें कानून बनाने की नाजुक प्रक्रिया में व्यक्तिगत घटकों की चिंताओं का प्रतिनिधित्व करने के लिए आकल्पित किया गया था. उनके होने का अर्थ था कि वे बहस, चर्चा, असहमति और साथ मिलकर काम करने के बाद अंत में विधायी कार्य पर मतदान करेंगे. हम अब जो कर रहे हैं उसमें हमारे पास अपने नेता से 'आपका कहा हो जाएगा’ का सामूहिक उच्चारण करने वाली त्वरित प्रक्रिया है. विधायी प्रक्रिया की औपचारिकताओं का पालन करना भर बुद्धिमत्तापूर्ण कानून बनाने की प्रक्रिया की गारंटी नहीं है.

सामान्य समय में, कोई वास्तविक लोकतांत्रिक संवैधानिक गणराज्य कानून बनाने की शक्ति का उपयोग करने के पहले नागरिक समाज से परामर्श करने और शासित लोगों की सहमति पाने के लिए रुकेगा. पूर्व सहमति के बिना कानून बनाना कभी-कभी कानून बनाने की संसदीय विधिक सुपुष्टता को विरोध करने वालों के अपूर्ण वीटो के सामने ला खड़ा करता है. जल्दबाजी में कानून बनाने और परमादेशों के माध्यम से शासन की प्रक्रिया को संगठित जनाक्रोश के सार्वजनिक प्रदर्शन का सामना करना पड़ रहा है.

जहां विरोध प्रदर्शन जारी रहते हैं और समर्थन पाते हैं, वहां आगे की वार्ता लंबित रहने के कारण कानून लागू नहीं होते. मसलन, नागरिकता (संशोधन) अधिनियम के तहत नियमों को अभी तक अधिसूचित नहीं किया गया है, जिससे प्रभावी रूप से यह अधिनियम ठंडे बस्ते में चला गया है. विरोध प्रदर्शन करने वाले किसानों से कहा जा रहा है कि कृषि कानून अभी परिवीक्षाधीन हैं. यहां तक कि धारा 370 के समापन और जम्मू-कश्मीर को अलग केंद्र शासित प्रदेश बना देने के इर्दगिर्द भी अस्थायित्व की भावना है.

अराजकता का व्याकरण तब भी इस्तेमाल होता है जब अविवेकपूर्ण कानूनों को अदालतों में चुनौती दी जाती है. हालांकि, न्यायिक समीक्षा विचारपूर्ण कानून-निर्माण प्रक्रिया का विकल्प नहीं है. कोई संवैधानिक अदालत केवल विधायी शक्ति के अस्तित्व और संवैधानिक सीमाओं के अनुरूप इसके प्रयोग के तरीके की जांच भर कर सकती है. अदालतें कानून के गुण-अवगुण की समीक्षा नहीं कर सकतीं और न ही वे विधायी बुद्धिमत्ता के खिलाफ अपीलीय मंच बन सकती हैं.

कानून विभिन्न प्रकार के उद्देश्यों से बनाए जाते हैं, और वे सभी उद्देश्य सौक्वय नहीं होते. किसी एक कानून से लाभान्वित होने वालों की संख्या बहुत कम हो सकती है जबकि उससे दंडित होने वालों की संख्या ज्यादा. लेकिन अदालतें विधायिका के इरादों पर उंगली नहीं उठा सकतीं और न ही उन पर अविश्वास जता सकती हैं.

अदालतें अनुचित तरीके से बनाए गए कानूनों को खत्म कर सकती हैं, लेकिन न तो उन्हें संशोधित कर सकती हैं और न ही उनका प्रतिस्थापन कर सकती हैं. पर हाल के दिनों में विधायी ज्यादतियों को रोकने में अदालतों ने इस सीमित अधिकार का भी कम ही प्रयोग किया है. इसीलिए विरोध प्रदर्शन ही तात्कालिक लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया का एकमात्र सुरक्षा वाल्व रहे हैं. बोस्टन चाय पार्टी या नमक सत्याग्रह ने अतीत के सबसे शक्तिशाली साम्राज्यों के मनमाने आदेशों को खत्म करवाया है.

तो 2021 के गर्भ में भारत के लिए क्या है? क्या हमसे लोकतंत्र संभल नहीं रहा या हमारे पास इसका केवल रूप बचा है? अगर 2020 के कई लघु-आपातकालों ने भारत को कुछ सिखाया है, तो वह यह कि समस्याओं का कोई फटाफट हल नहीं होता. न ही कोई अकेला सुपरमैन होता है जो अकेले सारे समाधान देने में सक्षम हो. आंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि ‘‘धर्म में भक्ति आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकती है, लेकिन राजनीति में भक्ति या नायक-पूजा पतन और अंतिम रूप से तानाशाही का निश्चित मार्ग है.’’

इसलिए, व्यक्तिपूजा की संस्कृति का स्थान संस्थागत अखंडता को दिया जाना चाहिए अन्यथा सड़कों पर विरोध प्रदर्शनों से पूरा तंत्र नष्ट हो जाएगा अथवा तानाशाही में परिणत हो जाएगा. किसी का लगातार चुनाव जीतना ही पर्याप्त नहीं है, उसे काम भी संवैधानिक सीमाओं के भीतर करना होगा. 2021 में असम, केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में राज्य विधानसभाओं के महत्वपूर्ण चुनाव होने वाले हैं और ज्यादा ध्रुवीकरण का ज्यादा चुनावी लाभ मिल सकता है. लेकिन इस प्रलोभन को दरकिनार किया जाना चाहिए क्योंकि देश को थोड़ा आराम मिलने और आजादी के बाद से अब तक के सबसे कठिन वर्षों में से एक के बाद थोड़ा पुर्नव्यवस्थित होने की आवश्यकता है.

पुर्नव्यवस्था नए सिरे से संवाद की मांग करती है. टी.एस. इलियट के शब्दों में ''क्योंकि पिछले साल के शब्दों का रिश्ता है पिछले साल की भाषा से/ और अगले साल के शब्दों को इंतजार है दूसरी आवाज का/ और हर अंत का मतलब है, नई शुरुआत करना.’’ सरकार और उसके आलोचकों को एक दूसरे पर चिल्लाना बंद करने और नई शुरुआत करने की जरूरत है. संसद को लगभग आम-सहमति से कानून बनाने के विमर्शी निकाय के रूप में वापस आना चाहिए.

विधायी शक्ति को नागरिकों के किसी समूह को दूसरे पर वरीयता देते हुए उसके निजी लाभों का साधन नहीं होना चाहिए. कानून बनाना गोली चलाने के बाद बातचीत का रास्ता अपनाने जैसा मामला नहीं हो सकता. संवैधानिक अदालतों को कानूनों को चुनौती के मामले तेजी से निबटाने चाहिए और अनुचित न्यायिक स्थगन या देरी का सहारा नहीं लेना चाहिए. सड़कों पर विरोध करने वालों और रास्ता रोकने वालों को भी अधिकतम लाभ की स्थिति का आकांक्षी होने के बजाए उचित अंतिम चाल का ध्यान रखने की जरूरत है.

शासकों और नागरिकों को एक दूसरे के बारे में बात करने के बजाए एक दूसरे से बात करने की ओर लौटने की जरूरत है. यह नुस्खा सरलतावादी लग सकता है, लेकिन यह लगभग सात दशकों से काम करता आया है. भारत को कम गुस्से वाले दौर में लौटने की सख्त जरूरत है, और इसका सबसे आसान तरीका यह है कि बढिय़ा डॉक्टर डॉ. आंबेडकर की बात सुनी जाए. सड़कों ने सहज ही संविधान को अपना लिया है, अब शासकों की बारी है कि वे इससे मर्यादित हों...

संजय हेगड़े सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं

 

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