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दिशा-दशा का लेखाजोखा

आदिवासियों की आबादी बहुत कम है और उनकी बेहतरी के लिए सार्वजनिक खर्च में इन सालों के दौरान इजाफा भी हुआ है. फिर तकरीबन तमाम संकेतकों पर वे सबसे नीचे क्यों हैं?

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सबसे बड़े आदिवासी समूह सबसे बड़े आदिवासी समूह

भारत की जनजातियां गिनती के लिहाज से छोटा-सा अल्पसंख्यक समुदाय हैं, कुल आबादी की महज 9 फीसद. मगर भाषा, संस्कृति और विविधता के लिहाज से उनका फैलाव विशाल है. भारत के सबसे पुराने बाशिंदे एक समान या सजातीय समूह नहीं हैं, जैसा कि उन्हें अक्सर समझा जाता है. देश के समूचे भूभाग में फैले आदिवासियों में आबादी के आकार, भाषा, सांस्कृतिक खूबियों, प्राथमिक आजीविका और विकास की स्थिति के लिहाज से खासी भिन्नताएं हैं.

यहां तक कि उनका भौगोलिक फैलाव भी एक समान नहीं है. उनमें से करीब 80 फीसद नौ राज्यों—महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, राजस्थान, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और आंध्र प्रदेश—में बसे हैं. करीब 12 फीसद उत्तरपूर्वी राज्यों में, पांच फीसद दक्षिण और तीन फीसद उत्तरी इलाके में रहते हैं. भारत में 700 से ज्यादा मान्यता प्राप्त जनजातियां हैं, जिनमें से महज दो की आबादी एक करोड़ से ज्यादा और 30 की 5,00,000 से ज्यादा है.

1950 में जब संविधान अंगीकार किया गया, ब्रिटिश सरकार की तरफ से जनजातियों के रूप में पहचाने और गिने गए समुदायों को नया नाम अनुसूचित जनजाति (एसटी) दिया गया. संविधान ने एसटी की मान्यता के लिए कसौटी परिभाषित नहीं की. 1961-62 की लोकुर समिति ने उनकी पहचान के लिए पांच कसौटियों की सिफारिश की—आदिकालीन लक्षण, विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक अलगाव, विस्तृत समुदाय के साथ संपर्क में संकोच और पिछड़ापन. जनजातियों को न केवल सामाजिक-सांस्कृतिक सत्ता बल्कि राजनैतिक-प्रशासनिक वर्ग के रूप में भी भिन्न माना गया है, ताकि उन्हें कुछ निश्चित प्रशासनिक और राजनैतिक रियायतें दी जा सकें.

उन तमाम जगहों पर जहां वे एसटी के रूप में अधिसूचित हैं, उन्हें शिक्षा और रोजगार में आरक्षण का लाभ हासिल है और जहां संख्या के लिहाज से उनका दबदबा है, वहां संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची के रूप में उनके लिए दो विशिष्ट प्रशासनिक व्यवस्थाएं की गई हैं.

पांचवीं अनुसूची 10 राज्यों—आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड और राजस्थान—के ''अनुसूचित क्षेत्रों'' में रह रही जनजातियों को संवैधानिक रक्षाकवच प्रदान करती है. भारत के राष्ट्रपति कुछ निश्चित व्यापक मानदंडों के आधार पर किसी क्षेत्र को 'अनुसूचित' घोषित कर सकते हैं. ये मानदंड हैं: आबादी में आदिवासियों का बड़ा हिस्सा, सुगठित प्रशासनिक इकाई की संभावना और उस इलाके तथा वहां रह रहे लोगों का सापेक्ष सामाजिक और आर्थिक पिछड़ापन. पांचवीं अनुसूची के तहत आने वाले इलाकों के प्रशासन में राज्यपाल के विवेकाधीन अधिकार अहम भूमिका अदा करते हैं.

छठी अनुसूची में असम, त्रिपुरा, मेघालय और मिजोरम के 10 स्वायत्त जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन और नियंत्रण समाहित है. छठी अनुसूची के तहत स्वायत्त जिला परिषदों (एडीसी) को अधिक शक्तियां और अधिकार दिए गए हैं, जिनकी बदौलत उन्हें अहम विधायी, न्यायिक और प्रशासनिक स्वायत्तता हासिल है. छठी अनुसूची पांचवीं के मुकाबले ज्यादा शक्तियां देती है, इसलिए छत्तीसगढ़, अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख के कुछेक हिस्सों सहित कई अन्य क्षेत्र भी अपने यहां इस प्रावधान के अमल की मांग करते रहे हैं.

केंद्र और राज्य आदिवासी आबादी के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए कई सारे क ल्याणकारी कार्यक्रम चलाते रहे हैं. करीब 40 केंद्रीय मंत्रालयों और महकमों ने हर साल योजनाओं के लिए अपने कुल आवंटन की 4.3 से 17.5 फीसद रकम आदिवासी उपयोजना या अनुसूचित जनजाति घटक निधि के रूप में तय की है. इन मंत्रालयों की तरफ से आवंटित कुल रकम 2017-18 में 22,906 करोड़ रुपए से 50 फीसद की बढ़ोतरी के साथ 2020-21 में 34,492.87 करोड़ रुपए हो गई. इन पहलों की कमियां पूरी करने के लिए आदिवासी मामलों का मंत्रालय अतिरिक्त धनराशि मुहैया करता है. मंत्रालय का बजट 2020-21 में 5,494 करोड़ रुपए से 53 फीसद बढ़कर इस वित्त वर्ष में 8,451.92 करोड़ पर पहुंच गया. इसके अलावा प्रधानमंत्री आदि आदर्श ग्राम योजना (पीएमएएजीवाइ) का लक्ष्य अच्छी-खासी आदिवासी आबादी वाले 36,428 गांवों में बुनियादी ढांचा मुहैया करवाना है. वहीं पांच साल (2021-28) के लिए 1,612.27 करोड़ रुपए के खर्च के साथ प्रधानमंत्री जनजातीय विकास मिशन (पीएमजेवीएम) का लक्ष्य आदिवासी उद्यमिता की पहल करना और आजीविका के अवसर प्रदान करना है. यह कोशिश इसलिए की जा रही है ताकि आदिवासी समाज और बाकी आबादी के बीच आर्थिक मानदंडों पर अंतर कम किया जा सके.

विशेष प्रशासनिक प्रावधानों और बहुतेरी सरकारी योजनाओं के बावजूद सामाजिक-आर्थिक संकेतक बताते हैं कि जनजातियां भारत के सबसे गरीब और सबसे साधनहीन तबकों में हैं, जिनकी 90 फीसद आबादी 2011 की जनगणना के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में रहती है. गरीबी के लिहाज से आदिवासियों और बाकी आबादी के बीच भारी असमानता है—2011-12 में गांवों के 45 फीसद आदिवासी गरीबी रेखा के नीचे थे, जबकि कुल ग्रामीण आबादी के 26 फीसद लोग इस श्रेणी में थे. 2011 में कुल आबादी की 74 फीसद साक्षरता दर के मुकाबले आदिवासी लोगों की साक्षरता दर महज 59 फीसद थी. शिशु मृत्यु दर, सामान्य से कम वजन के बच्चे और महिलाओं में खून की कमी सरीखे स्वास्थ्य के तकरीबन 
तमाम संकेतकों पर आदिवासी लोगों की हालत आम आबादी के मुकाबले बदतर रही है.

विकास से साफ तौर पर वंचित होने की वजह से कई जनजातियां और भी ज्यादा अलग-थलग पड़ती गई हैं. आदिवासियों पर सरकारी खर्च लगातार बढ़ रहा है, पर विकास कार्यक्रमों की तादाद और संसाधन के आवंटन में बढ़ोतरी के अनुरूप विकास की रफ्तार नहीं बढ़ी है. आदिवासियों के विकास और उन्हें मुख्यधारा में लाने की खातिर ज्यादा समावेशी नजरिए और तौर-तरीकों की तत्काल जरूरत है. अब जब एक आदिवासी देश की प्रथम नागरिक हैं, यह नए युग की शुरुआत हो सकती है.

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