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आवरण कथाः आर्थिक बहाली का खाका

बोर्ड ऑफ इंडिया टुडे इकॉनॉमिस्ट्स के विशेषज्ञ बता रहे हैं कि वे क्या उम्मीद करते हैं केंद्रीय बजट 2021 से

अदिति नैयर अदिति नैयर

अदिति नैयर, प्रिंसिपल इकोनॉमिस्ट, इक्रा लिमिटेड
डी. के. श्रीवास्तव, चीफ पॉलिसी एडवाइजर ईवाई, इंडिया
प्रणब सेन, कंट्री डायरेक्टर, इंडिया प्रोग्राम ऑफ द इंटरनेशनल ग्रोथ सेंटर
वाइ. के. अलघ, अर्थशास्त्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री
इला पटनायक, प्रोफेसर, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस ऐंड पॉलिसी
साजिद चिनॉय, चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट, जे.पी. मॉग

सवाल अर्थव्यवस्था में मंदी को देखते हुए केंद्रीय बजट में कौन-से तीन प्रमुख उपाय आप देखना चाहेंगे जिनसे वृद्धि को बढ़ावा मिले?

जवाबः अदिति नैयर: पूंजीगत खर्च को, खासकर उन परियोजनाओं को जिनकी नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चरर पाइपलाइन (एनआइपी) में पहचान की गई है और जहां योजनाएं उन्नत चरण में हैं, प्राथमिकता देने से कई गुना प्रभाव उत्पन्न करने और फौरी तौर पर आॢथक बहाली में खासी मदद मिलेगी.

दूसरे, वैक्सीन के कार्यक्रम की शुरुआत के लिए पर्याप्त बजटीय प्रावधान करने के नतीजतन आर्थिक कारकों में भरोसा अथाह बढ़ेगा और खपत तथा निवेश दोनों के बारे में निर्णय लेने में सहायता मिलेगी. इसके अलावा, सब्सिडी की बकाया रकम, ठेकेदारों और विक्रेताओं की बकाया धनराशियां चुकाने की मंजूरी और टैक्स रिफंड में तेजी लाने से अर्थव्यवस्था में तरलता के साथ-साथ भरोसा बढ़ाने में मदद मिलेगी.

डी.के. श्रीवास्तव: सबसे पहले सरकार को गैर-रक्षा पूंजीगत खर्च बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए. इससे निर्माण और बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ेगा और आवास तथा सड़क के अलावा दूसरे क्षेत्र भी इसके दायरे में आ जाएंगे. इन क्षेत्रों के कई गुना बढ़ोतरी करने वाले असर होंगे. दूसरे, सरकार को राजकोषीय मजबूती की संशोधित योजना लेकर आना चाहिए. 2020-21 और 2021-22 में केंद्र का राजकोषीय घाटा जीडीपी के 6-7 फीसद के दायरे में रखना पड़ सकता है और ज्यादा वास्तविक सीमा तक राजकोषीय मजबूती शायद 2022-23 के आगे ही शुरू हो सकेगी.

केंद्र और राज्य सरकारें दोनों को 2021-22 में अतिरिक्त राजकोषीय गुंजाइश का इस्तेमाल बजट के राजस्व और पूंजीगत दोनों पक्षों से जुड़े सरकारी खर्च में बढ़ोतरी के लिए करना चाहिए. तीसरे, सरकार को एनआइपी की समीक्षा करनी चाहिए, उन क्षेत्रों और संसाधनों की पहचान करनी चाहिए जिनमें मूल निवेश योजना के मुकाबले कम निवेश किया गया है और रूपांतरित समयबद्ध योजना लेकर आना चाहिए. खासकर राज्य सरकारों और पीएसई की भूमिका और निवेश में उनकी हिस्सेदारी का नए सिरे से आकलन करने की जरूरत है, ताकि एनआइपी को पूरा करने में उनकी असरदार भागीदारी पक्की की जा सके.

प्रणब सेन: मैं देखना चाहूंगा: (1) टीकाकरण सहित रोग प्रबंधन और नियंत्रण के लिए राज्यों को और ज्यादा आर्थिक सहायता; (2) जिला और जिले से निचले स्तरों पर स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए बजट में और अधिक सहायता; और (3) पूरे भारत में स्वास्थ्य अनुसंधान और परीक्षण के बुनियादी ढांचे को बढ़ाने और उन्नत बनाने के लिए बजटीय सहायता.

वाइ.के. अलघ: वी कर्व के चढ़ाव पर लौटने के लिए हमें असल सरकारी खर्च के कार्यक्रम की दरकार है. इससे वैक्सीन कार्यक्रम के लिए स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे को मजबूती मिलनी चाहिए; ग्रामीण-शहरी व्यापार और परिवहन नेटवर्क की मरम्मत और इसका विस्तार होना चाहिए; और आपूर्ति शृंखला को मजबूत बनाने के लिए ग्रामीण इलाकों में पहले चरण की प्रोसेसिंग को शक्तिशाली बनाना चाहिए.

कृषि इस ढलान के विरुद्ध मजबूती से टिकी रही है. इसे बेहतर प्रदर्शन के लिए सहारे की जरूरत है. उत्तर-पश्चिम भारत में बारी-बारी से धान और गेहूं के खिलाफ कदम उठाना गलत होगा. हो सकता है डेयरी और बागवानी को और मजबूत करने के लिए, दक्षिण पंजाब में और हरियाणा के असिंचित इलाकों में जो इंदिरा गांधी नहर के दायरे में नहीं आते, दलहनों और तिलहनों के लिए कदम उठाए जा सकते हों.

मगर यहां एमएसपी अहम है, जो पश्चिमी तट और दक्खन के पठार पर उतना अहम नहीं है, जहां अच्छी क्वालिटी के अनाज उगाए जाते हैं और बाजार मूल्य भी आम तौर पर ज्यादा हैं. यहां व्यापारी एक अलग, ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाता है.

हमें विविधता लाने, बाजार और इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाने के लिए अमल के खाके की जरूरत है, बजाय इसके कि हम नाटकीय नतीजों की उम्मीद करें और फिर मायूस हों. नीति आयोग के रमेश चंद ने अपने शोधपत्र में इस बारे में लिखा है, जिसे 2021 में लागू किया जा सकता है और वह भी सलाह-मशविरा करके, क्योंकि इसे संसद से हड़बड़ी में (पारित) करवाया गया था.

इला पटनायक: यह कर दरों में कटौती करने और मांग तथा खपत में तेजी लाने का बड़ा मौका है. कर अनुपालनों को सरल बनाने की मांग लगातार की जाती रही है. यह करों को तर्कसंगत बनाने और आयकर उल्लंघनों को गैर-आपराधिक बनाने के साथ-साथ किया जाना चाहिए. बजट में सार्वजनिक ऋण प्रबंधन एजेंसी (पीडीएमए) के लिए प्रावधान करने की जरूरत है.

फिलहाल पीडीएमए की जगह सार्वजनिक ऋण प्रबंधन प्रकोष्ठ काम कर रहा है, लेकिन इसे ज्यादा ताकतवर बनाना और वैधानिक दर्जा देना जरूरी है.

भारत को इंफ्रास्ट्रक्चर में बहुत बड़ी मात्रा में धन लगाने की दरकार है. लंबे वक्त की बचतों से लंबे वक्त की इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में धन लगाने को लेकर समस्या हमेशा ही रही है. एक तरफ जहां पीडीएमए की जरूरत है, वहीं दूसरी तरफ अगर हम इंफ्रास्ट्रक्चर बॉन्ड में निवेश करने के लिए लोगों को प्रोत्साहन लाभ भी दें तो इस समस्या से निपटा जा सकता है. टैक्स ब्रेक से सार्वजनिक बचत में और इजाफा हो सकता है.

ढेर सारी बचत जहां शेयर बाजारों में जा रही है, वहीं कर्ज और खासकर इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए लंबे वक्त के कर्ज में अपर्याप्त रूप से धनराशियां जा रही हैं. टैक्स ब्रेक के साथ सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर बॉन्ड से बुनियादी ढांचे को बढ़ावा मिल सकता है जिसकी उसे दरकार है. विकास वित्त संस्था (डीएफआइ) को भी बॉन्ड मार्केट के जरिये ही धन उगाहना पड़ेगा क्योंकि यह बैंक की तरह जमा धनराशि लेने वाली संस्था नहीं होगी.

साजिद चिनॉय: भारत की अर्थव्यवस्था कोविड से उम्मीद से कहीं ज्यादा तेजी से उबर रही है. हम उक्वमीद कर रहे हैं कि 2020-21 में जीडीपी करीब 6.5 फीसद संकुचित होगा, जो पहले अपेक्षित दहाई अंक के संकुचन से कम है. अलबत्ता इस शुरुआती बहाली को बजट के जरिए और प्रोत्साहित करने की जरूरत होगी. इसलिए आदर्श तो यही होगा कि बजट ऐसा हो जो आर्थिक गतिविधियों में तेजी लाने के लिए पूरा जोर लगाए और साथ ही हेडलाइन फिस्कल डेफिसिट को कम करे और मध्यम वक्त की विश्वसनीय राजकोषीय योजना सामने रखे.

इन लक्ष्यों को पाने का एक तरीका तो यह है कि परिसंपत्तियों की बिक्री का आक्रामक कार्यक्रम शुरू किया जाए. ज्यादा परिसंपत्तियों की बिक्री बढ़-चढ़कर सार्वजनिक निवेश के लिए धन मुहैया कर सकती है जबकि करों में उछाल की वापसी का इस्तेमाल हेडलाइन डेफिसिट को धीरे-धीरे कम करने के लिए किया जा सकता है. मध्यम वक्त की विश्वसनीय राजकोषीय मजबूती योजना बॉन्ड मार्केट को सहारा देने, उधारी की लागत पर बढ़ते जोखिम को कम करने और बहाली को तेज करने में मदद करेगी.


''हमें विविधता लाने, बाजार और इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाने के लिए अमल के खाके की जरूरत है, बजाय इसके कि हम नाटकीय नतीजों की उम्मीद करें और फिर मायसू हों.’’

वाइ.के. अलघ

सवाल 
(1) ज्यादा खर्च कर पाने के लिए क्या सरकार को राजकोषीय घाटे का लक्ष्य जीडीपी के मौजूदा 3.5 फीसद से बदलना चाहिए? यदि हां, तो कौन-सा प्रतिशत आपको सही और काफी लगता है?
(2) आपकी राय में वे कौन से तीन क्षेत्र हैं जिन पर सरकार को अपने खर्च केंद्रित करने चाहिए?

जवाबः अदिति नैयर:  राजस्व के सुचारु और स्थिर होने से वित्त वर्ष 2022 में राजकोषीय घाटे के आकार को काबू में रखने में वैसे भी मदद मिलेगी, उस अच्छी-खासी बढ़ोतरी के मुकाबले जो मौजूदा साल में महामारी की वजह से पैदा हुई थी. हमारी राय में केंद्र और राज्यों दोनों को राजकोषीय सख्ती बरतने से बचना चाहिए क्योंकि इससे प्रतीक्षित आर्थिक बहाली धीमी पड़ जाएगी.

भारत सरकार वित्त वर्ष 2022 में जीडीपी के 3.5 फीसद राजस्व घाटे और जीडीपी के 5 फीसद राजकोषीय घाटे के साथ स्वास्थ्य के खर्चों, टीकाकरण की शुरुआत और साथ ही पूंजीगत खर्च को प्राथमिकता दे सकेगी.

राजस्व साझेदारी और राजकोषीय घाटे के लक्ष्यों के बारे में 15वें वित्त आयोग की सिफारिशें, भारत सरकार की तरफ दी जाने वाली उधार की इजाजत और खुद अपने कर राजस्व में वह जिस हद तक सुधार ला पाती है, ये सब वित्त वर्ष 2022 में सरकार के राजकोषीय रुझानों का रास्ता तय करेंगे. हमारी राय में राज्य सरकारें वित्त वर्ष 2022 में जीएसडीपी के 3.5 फीसद राजकोषीय घाटे के लक्ष्य के साथ उस पूंजीगत खर्च के एक हिस्से को प्राथमिकता दे सकती हैं जो महामारी की वजह से टालना पड़ा था.

डी.के. श्रीवास्तव : (1) राजकोषीय घाटे का मौजूदा लक्ष्य 2020-21 और 2021-22 दोनों के लिए संशोधित करने की जरूरत है. असल में, कहा जा सकता है कि इन दो सालों में यह जीडीपी के 6-7 फीसद के दायरे में होना चाहिए. राजकोषीय मजबूती का खाका फिर से बनाना चाहिए और लक्ष्य भी नए सिरे से तय करना चाहिए. केंद्र सरकार की उधारी के मामले में ज्यादा लचीलेपन की जरूरत है, क्योंकि वृहत स्थिरता लाने में इसकी बनिस्बत ज्यादा अहम भूमिका है.

केंद्र के लिए राजकोषीय घाटे का चालू लक्ष्य मध्यम वक्त के लिए मौजूदा 3 फीसद से बढ़ाकर 4 फीसद किया जा सकता है और कानूनी तौर पर तय किया गया संयुक्त ऋण-जीडीपी अनुपात का एफआरबीएम लक्ष्य मौजूदा 60 फीसद से बढ़ाकर 70 फीसद कर देना चाहिए. केंद्र का ऋण-जीडीपी लक्ष्य 40 फीसद पर कायम रखा जा सकता है जबकि राज्यों का 20 फीसद से बढ़ाकर 30 फीसद किया जा सकता है.

इससे मौजूदा एफआरबीएम आंतरिक तौर पर सुसंगत और वृद्धि उन्मुख हो जाएगा और वृहत आर्थिक स्थिरता लाने के लिए कहीं ज्यादा लचीलापन देगा. यह केंद्र और राज्य दोनों को अतिरिक्त राजकोषीय गुंजाइश भी मुहैया करेगा, केंद्र को ज्यादा ऊंचे राजकोषीय घाटे की वजह से और राज्यों को ज्यादा ऊंचे ऋण-जीडीपी अनुपात के कारण, जिसे दुनिया भर में और भारत में निचली ब्याज दरों के लंबे वक्त के रुझान को देखते हुए सही ठहराया जा सकता है.

(2) पहला क्षेत्र तो स्वास्थ्य ही है, जिसमें पूंजीगत और राजस्व दोनों खर्च शामिल हैं. 2020 की यूएनडीपी मानव विकास रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में प्रति 10,000 की आबादी पर महज पांच बिस्तर हैं जबकि मानक विकासशील देशों के लिए 21 और दुनिया के लिए 27 बिस्तरों का है. यही नहीं, महामारी सरीखी स्थितियों से निपटने की खातिर ज्यादा विशेष सुविधाओं वाली अतिरिक्त क्षमता की जरूरत है. इस क्षेत्र में लंबे वक्त के और टिकाऊ निवेश की दरकार है.

दूसरा क्षेत्र आवास और निर्माण का होगा, जिसके लिए केंद्र का आवंटन गैर-रक्षा पूंजीगत खर्च के लिए जीडीपी के प्रतिशत की तौर पर बढ़ाया जाना चाहिए. यह वह क्षेत्र है जो हुनरमंद और गैर-हुनरमंद दोनों श्रमिकों को खपा सकता है और इसके कई गुना बढ़ाने वाले असर होंगे. तीसरा क्षेत्र जिसके लिए संसाधन तय किए जा सकते हैं, शहरी बेरोजगारों के लिए मनरेगा सरीखी रोजगार गारंटी योजना शुरू करने से जुड़ा है.

प्रणब सेन: (1) हां, होना चाहिए. 6 फीसद तक बढ़ाना ठीक है.
(2) प्रश्न 1 में जवाब दिया जा चुका है.
वाइ.के. अलघ: मैं (अर्थशास्त्री) एन.के. सिंह से सहमत हूं कि अगर जिंदगियां दांव पर लगी हों तो घाटे का लक्ष्य स्थगित किया जा सकता है, हालांकि मेरे दोस्त (उदय) कोटक सही ही कह रहे हैं कि बाद में जरूरी समायोजन कहीं ज्यादा गंभीर होंगे. अगर प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में सरकारी निवेश बढ़ता है तो निजी क्षेत्र (अनुकूल) प्रतिक्रिया देगा. 2020 में 7-8 फीसद की गिरावट के साथ 2021-22 में 10 फीसद की वृद्धि दर औसत से कुछ कम होगी (2020-22 में 5 फीसद या उसके आसपास).

ऊंची वृद्धि बजट पर निर्भर करेगी. अगर पहले की रणनीतियां (बैंकों और निजी क्षेत्र से निवेश उगाहने के लिए कहना) दोहराई जाती हैं, तो ज्यादा बेहतर की उम्मीद नहीं की जा सकती. यदि इसमें वास्तविक प्रोत्साहन निहित हैं तो निजी क्षेत्र अच्छी प्रतिक्रिया देगा क्योंकि उसके पास विशाल अतिरिक्त क्षमता है. 2020-22 के लिए 14-15 फीसद की वृद्धि दर (औसतन 6 फीसद) संभव है. हम असल में बेहतर कर सकते हैं, लेकिन अब और खेलते नहीं हैं, इसलिए पीपीपी में निजी क्षेत्र में लंबे वक्त के निवेश आकर्षित करने के अनुमान लगाते हुए सतर्क रहना पड़ता है.

इला पटनायक: (1) महामारी असाधारण परिस्थिति है. सरकार को चाहिए कि थोड़ा अपनी जेब ढीली करे. मगर हमें महामारी के बाद भी जीना पड़ेगा. राजकोषीय घाटे का लक्ष्य 4.5 फीसद से ज्यादा नहीं होना चाहिए.

(2) सुरक्षा एजेंसियों के सुधार में पैसा लगाने की जरूरत है. इससे राज्यों में कानून और व्यवस्था की स्थिति में अपने आप सुधार आने लगेगा. वायु प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए भी पैसा लगाने की जरूरत है. इससे और ज्यादा निवेशक भारत आने के लिए प्रोत्साहित होंगे. तीसरा, हमें बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं में निवेश करते रहने की जरूरत है. हालांकि धन के सतत स्रोतों की कमी प्रस्तावित डीएफआइ की राह में बड़ी अड़चन साबित हो सकती है.

साजिद चिनॉय: राजकोषीय नीति को दुनिया भर में कोविड के असर को कम करने के लिए अहम भूमिका अदा करनी पड़ी है. इतना ही नहीं, इस झटके की अभूतपूर्व फितरत का मतलब यह है कि अतीत की राजकोषीय कट्टरता को कुछ वक्त के लिए ठंडे बस्ते में डालना होगा. आने वाले सालों में घटते ऋण-जीडीपी अनुपात के साथ हेडलाइन फिस्कल डेफिसिट में धीरे-धीरे कमी लाना आर्थिक वृद्धि को वृहत आर्थिक स्थिरता के संतुलित करने का सबसे अच्छा तरीका होगा.

मजबूती की मात्रा इस बात से तय होनी चाहिए कि वित्त वर्ष 2022 में टेक्स/जीडीपी की बहाली की उक्वमीद किस हद तक है ताकि जीडीपी के अनुपात में खर्च को संभाला और बढ़ाया जा सके. राजकोषीय जोश का सकारात्मक बना रहना जरूरी है ताकि निजी निवेश में भारी बढ़ोतरी के लिए मांग में जोश फूंका जा सके. खर्च का पूरा जोर विशाल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे—भौतिक बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य और शिक्षा—पर होना चाहिए.

''महामारी असाधारण परिस्थिति है. सरकार को चाहिए कि थोड़ा अपनी जेब ढीली करे. मगर हमें महामारी के बाद भी जीना पड़ेगा. लिहाजा एक संतुलित नजरिये की जरूरत है’’

इला पटनाइक
सवालः देश में नौकरी की समस्या कितनी बड़ी है? आपके विचार में ऐसे तीन कदम जिन्हें सरकार को इस समस्या से निपटने के लिए उठाने चाहिए?
जवाबः अदिति नैयर: महामारी ने स्व-रोजगार, अनौपचारिक क्षेत्रों, छोटे उद्यमों और संपर्क-गहन नौकरियों पर एक प्रतिकूल प्रभाव डाला है. व्यापक पैमाने पर टीकाकरण इन्हें, इनकी पूर्व-कोविड स्थिति के करीब पहुंचाने में कुछ मदद करेगा. इसके अलावा, उच्च पूंजीगत व्यय, विशेष रूप से कोर इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर व्यय, अर्थव्यवस्था में नई नौकरियां लाने में मदद करेगा. मनरेगा का एक शहरी संस्करण रोजगार प्रदान करेगा और कार्यशील आबादी के एक महत्वपूर्ण हिस्से को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करेगा. 

डी.के. श्रीवास्तव: नौकरी की स्थिति गंभीर चिंता का विषय है, खासकर अनौपचारिक क्षेत्र और व्यापार, होटल, परिवहन, भंडारण और संचार क्षेत्र में. ये मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं. लेकिन चूंकि ग्रामीण इलाकों में भी बड़े पैमाने पर प्रवास हुआ है इसलिए ग्रामीण स्थिति भी बहुत बेहतर नहीं है.

विकास को गति देने और आर्थिक नीतियों को रोजगार-गहन क्षेत्रों पर केंद्रित करने जैसे स्पष्ट नीति हस्तक्षेपों की आवश्यकता है. विशिष्ट उपायों में शामिल हो सकते हैं: 1) एक शहरी रोजगार गारंटी योजना; 2) आवास और निर्माण क्षेत्रों के लिए उच्च बजट आवंटन; और 3) निजी क्षेत्र के लिए उच्च ऋण प्रवाह सुनिश्चित करना और इसके लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की जोखिम लेने वाली भूख को बढ़ाने के लिए बैंकों का पुनपूंजीकरण किया जा सकता है. 

प्रणब सेन: बेरोजगारी दर से जो संकेत मिले हैं, उसके अनुसार नौकरियों की स्थिति बहुत अधिक गंभीर है. स्थायी और अर्ध-स्थायी नौकरियों में कमी आई है और कैजुअल या अनौपचारिक काम बढ़ गया है. इस स्थिति को बदलने के लिए मेरे कुछ सुझाव हैं: 1) अनुपालन की आवश्यकताएं पूरी करने से पहले कंपनियों को एक ग्रेस पीरियड-मान लें कि लगभग पांच साल की अनुमति देने के लिए ईपीएफओ/ ईएसआइसी नियमों में संशोधन किया जाए; 2) उत्पादन बढ़ाने के लिए मौद्रिक नीति का उपयोग करें ताकि कंपनियों को अधिक श्रम प्रधान तकनीकों को अपनाने के लिए एक प्रोत्साहन मिले; और 3) जिन क्षेत्रों में बेरोजगारी अधिक दिखती है उनमें छोटी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर ध्यान केंद्रित करना. 

वाइ.के. अलघ: रोजगार संदर्भ कृषि में निवेश और मजबूत करने की रणनीति पर निर्भर करेगा. मैं एक शहरी मनरेगा जैसी योजना के पक्ष में नहीं हूं न्न्योंकि जवाहर योजना जैसे श्रम-गहन बुनियादी ढांचे के निर्माण में निवेश की बेहतर संभावनाएं हैं.

इला पटनायक: देश में नौकरियों के परिदृश्य को समझने के लिए शायद ही कोई अच्छा डेटा उपलब्ध है. अधिक निवेश की अनुमति देने के लिए टैरिफ में कटौती करने की आवश्यकता है. फिर हमें जीएसटी दरों में कटौती और बुनियादी ढांचे में निवेश को बढ़ाने के प्रयास करने चाहिए. इन तीन कदमों से न केवल मांग में तेजी आएगी बल्कि अधिक नौकरियों के लिए भी रास्ते खुलेंगे.

साजिद चिनॉय: जैसा कि दुनिया भर में दिख रहा है, वही स्थिति भारत में भी है. श्रम बाजार के सर्वेक्षण और मनरेगा की मांग दोनों से जो संकेत मिल रहे हैं वे दर्शा रहे हैं कि श्रम बाजार सिकुड़ा है. दुनिया के अन्य हिस्सों में चीजें पूंजी और लाभ के माध्यम से पटरी पर लौट रही हैं न कि श्रम या मजदूरी की बदौलत. इस पृष्ठभूमि में, बुनियादी ढांचा क्षेत्र को एक सार्थक प्रोत्साहन महत्वपूर्ण होगा.

यह तुरंत समग्र मांग को बढ़ावा देगा. यह श्रम-गहन है, इसलिए इससे नौकरियों का सृजन होता है और इसके बड़े गुणक प्रभाव होते हैं. निजी निवेश बढऩे की उम्मीद की जा सकती है और अर्थव्यवस्था की मध्यम अवधि की प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिल सकता है. यदि परिसंपत्तियों की बिक्री करके वित्त पोषण किया जाता है, तो इससे सार्वजनिक क्षेत्र की बैलेंस-शीट पर उत्पादकता-बढ़ाने वाली संपत्ति की अदला-बदली नजर आएगी. 

‘‘मनरेगा का एक शहरी संस्करण रोजगार प्रदान करेगा और कार्यशील आबादी के एक महत्वपूर्ण हिस्से को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करेगा’’

अदिति नैयर
सवालः खपत की मांग बढ़ाने के लिए सरकार को किन विशिष्ट उपायों की घोषणा करनी चाहिए?
1) आयकर की दरें कम की जाएं; 2) जीएसटी की दरें घटें या उनसे छूट दी जाए; 3) मनरेगा के समकक्ष एक शहरी रोजगार गारंटी व्यवस्था बने; 4) प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण; 5) अन्य (कृपया स्पष्ट करें) यह भी बताएं कि आपकी ऐसी राय क्यों हैं?

जवाब. अदिति नैयर: इस स्तर पर जब राजस्व में कुछ हद तक कमी दिख रही है, समय आयकर दरों को कम करने के विचार के लिए उपयुक्त नहीं है क्योंकि अगर अपेक्षित राजस्व उछाल नहीं हुआ तो बाद में खर्च पर प्रतिबंध लगाना पड़ सकता है. 

इसके अलावा जीएसटी दरों में कोई भी संशोधन, जीएसटी परिषद के अधिकार क्षेत्र में है. लॉकडाउन के दौरान बुरी तरह प्रभावित होने के बाद, जीएसटी संग्रह में हाल के महीनों में फिर से सुधार देखा गया है. हालांकि, कुछ अभिनव उधार विकल्प विकसित हुए थे जो वित्त वर्ष 2021 में अपरिहार्य थे और उनकी वजह से जीएसटी में उछाल देखी गई होगी.

इसके बाद वित्तीय वर्ष 2022 में जीएसटी मुआवजे के रूप में कितनी बड़ी आवश्यकता होगी और क्या निर्दिष्ट उपकर संग्रह उसके लिए अगर पर्याप्त नहीं तो भी क्या पर्याप्त होने के आसपास भी होगा, यह अभी तक स्पष्ट नहीं है. इसलिए, जब तक कि संग्रह में अधिक स्थिरता आती है और वित्त वर्ष 2022 के लिए कितने मुआवजे की आवश्यकता होगी यह स्पष्ट नहीं होता, तब तक के लिए जीएसटी दरों को अपरिवर्तित छोड़ दिया जा सकता है. 

मनरेगा के एक शहरी समकक्ष से उन श्रमिकों के शहरी क्षेत्रों में वापस लौटने की संभावना बढ़ेगी जो शहरों में नौकरियों की अनुपलब्धता की आशंका से, दूरदराज के इलाकों में ही बने हुए हैं. यह उपभोग की मांग को बढ़ाएगा, ग्रामीण क्षेत्रों में फिर से धन प्रेषण को शुरू करेगा और निजी क्षेत्र के लिए शहरी क्षेत्रों में उपलब्ध श्रम भंडार को भी बढ़ाएगा.

डी.के. श्रीवास्तव: आयकर की दरों को कम करना उचित नहीं हो सकता है क्योंकि इससे सरकार के कर राजस्व में गिरावट आएगी जो कोविड के सदमे से पहले ही शुरू हो गई थी. यह भी देखा जाता है कि खर्च के लिए उपलब्ध निजी आय बढऩे से 2020-21 में निजी खपत में कोई वृद्धि नहीं हुई. सीआईटी दरों को घटाया गया, बावजूद इसके अब तक कोई उच्च निजी निवेश नहीं आया.

राजकोषीय प्रोत्साहन की पहल के हिस्से के रूप में व्यक्तिगत आयकर भुगतानों को स्थगित करने से भी व्यक्तिगत खपत में वृद्धि नहीं हुई. इसके बजाय, इससे घरेलू वित्तीय बचत में वृद्धि हुई. जीएसटी दरों में कमी या अधिक छूट भी उचित नहीं होगी क्योंकि जीएसटी राजस्व अभी भी पहले वाली कर व्यवस्था की तुलना में राजस्व-तटस्थ नहीं हुआ है. जीएसटी दरों को कुछ युक्तिसंगत बनाना, विशेष रूप से जहां भी लागू हो वहां से उत्क्रमी शुल्क संरचना को समाप्त करने का काम किया जा सकता है.

नौकरी से संबंधित योजना की तुलना में प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण भी कम फायदेमंद होगा क्योंकि यह नौकरियों के निर्माण और खपत की मांग में वृद्धि, दोनों काम करता है. सूचीबद्ध चार विकल्पों में, मनरेगा के शहरी समकक्ष सबसे प्रभावी होंगे. अन्य उपायों में, मनरेगा के दायरे को और बढ़ाने पर भी विचार किया जा सकता है. सामान्य तौर पर, लक्षित एरिया/ सेक्टर में सरकारी व्यय को बढ़ाकर, उपभोग की मांग को बढ़ाने का प्रयास बेहतर विकल्प होगा.

प्रणब सेन: कर दरों में कटौती—यानी (1) और (2)—को बिल्कुल नहीं करना चाहिए, खासतौर से आयकर में छूट जो सिर्फ उन्हें लाभ पहुंचाती है जिनकी आमदनी बंद नहीं हुई है.

मनरेगा के समकक्ष शहरी व्यवस्था (3) निर्माण का काम, बहुत पहले हो जाना चाहिए था और अब तो इसे होना ही चाहिए. समस्या यह है कि अब तक, इस तरह के कार्यक्रम का कोई प्रभावी डिजाइन नहीं है और ऐसा करना बेहद कठिन है. इस तरह की व्यवस्था को विकसित करने के लिए काफी शोध और परामर्श की जरूरत है.

एक प्रारंभिक बिंदु अर्थशास्त्री ज्यां द्रेंज का विकेंद्रीकृत शहरी रोजगार और प्रशिक्षण प्रस्ताव हो सकता है. यह पूरी तरह सही नहीं है, लेकिन यह एक बहुत ही उपयोगी शुरुआती बिंदु बनाता है. 

प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण (4) बहुत उपयोगी हैं, लेकिन उस तरीके से नहीं जैसे कि अब तक उनका उपयोग किया गया है. एक बार के हस्तांतरण का बहुत कम प्रभाव होता है और आवश्यकता है जब तक अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ठीक नहीं हो जाती तब तक के लिए स्थिर और सतत हस्तांतरण का आश्वासन देने की. इसमें तीन से चार साल लग सकते हैं. 

बुनियादी ढांचे (5) में सार्वजनिक निवेश बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि निर्माण एक प्रमुख रोजगार सृजनकर्ता है और इसका मजबूत प्रभाव और संबंध कई अन्य क्षेत्रों में देखा जा सकता है. हालांकि, इस मामले में भी, यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि मध्यम-से-लंबी अवधि की भागीदारी का आश्वासन मिले, ताकि कंपनियां आकस्मिक श्रम पर भरोसा करने के बजाय उन्हें व्यवस्थित रूप से लंबी अवधि के लिए काम पर रख सकें. 

वाइ.के. अलघ: राजकोषीय स्थिति को देखते हुए, कई कर रियायतें संभव नहीं हैं और वास्तव में, विनिवेश प्रस्तावों में वास्तविक समस्याओं को देखते हुए वास्तविक निवेशों के लिए संसाधन निर्माण एक बड़ी समस्या होगी.

इला पटनायक:  बुनियादी ढांचा निर्माण, कानून व्यवस्था, जल, स्वच्छता, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, बिजली, सड़क, सार्वजनिक परिवहन, स्वास्थ्य और शिक्षा में सुधार के लिए शहरों के पास उपलब्ध धन की स्थिति को देखते हुए, शहरी मनरेगा एक खराब और अदूरदर्शी विचार है. 

भले ही उनके पास आवश्यक कौशल न हो और न ही उन्हें शहरों में श्रम की स्थिति का अनुमान हो, आगे चलकर मनरेगा का एक शहरी संस्करण ग्रामीण क्षेत्रों में नौकरी चाह रखने वालों को भी शहरों में नौकरी खोजने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है. 

साजिद चिनॉय: खपत की स्थिति में एक स्थायी सुधार, आय की स्थिति में सुधार पर निर्भर करेगा जो इस बात पर निर्भर करता है कि नौकरी और मजदूरी में जो गिरावट आई थी उसमें कितनी जल्दी सुधार होता है. एहतियाती बचत बढ़ाने की प्रवृ‌त्ति तभी देखी जाती है जब काम को लेकर एक अनिश्चितता की स्थिति हो.

नौकरी सृजन आय की अनिश्चितता को कम करता है और इसलिए नौकरियों का निर्माण ही खपत को बढ़ाने का सबसे प्रभावी तरीका हो सकता है. खपत तो उसका एक प्रतिफल है. यदि एक सार्वजनिक निवेश का धक्का, निजी निवेश को बढ़ाने में सफल हो और रोजगार निर्माण होने लगे, तो अंतत: उपभोग अपने आप सुधर जाएगा.

''प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण उपयोगी है लेकिन अर्थव्यवस्था के पूरी तरह उबरने तक स्थिर और सतत हस्तांतरण का आश्वासन देने की जरूरत है.’’

 

प्रणव सेन

सवाल. बजट में अपने खर्चों को पूरा करने के लिए सरकार किस तरह से संसाधन कैसे जुटा सकती है? 1) सार्वजनिक उपक्रमों के विनिवेश से, 2) कर देयताओं पर माफी योजनाओं से, 3) कर मुक्त बॉण्ड की पेशकश से, 4) अन्य (कृपया स्पष्ट करें).
कृपया यह भी बताए कि आपको ऐसा न्न्यों लगता है?

 

जवाबः अदिति नैयर: सार्वजनिक उपक्रमों से विनिवेश राजस्व बढ़ाने और खर्च बढ़ाने के लिए राजकोषीय स्थान बनाने का व्यवहार्य तरीका है. महामारी के कारण केंद्र सरकार की ओर से वित्त वर्ष  2021 के लिए तय किए विनिवेश लक्ष्य के सापेक्ष काफी पीछे रह जाना तय होने के कारण वित्त वर्ष 2022 के लिए संभावनाएं अच्छी हैं.

इसके अलावा विनिवेश के लिए एक मध्यम अवधि की योजना बनाई जा सकती है, जिसमें विनिवेश के लिए संभावित संस्थाओं को रेखांकित किया गया हो, विनिवेश से पहले उठाए जाने वाले कदमों की आवश्यकताएं पहचान ली गई हों तथा इसकी सांकेतिक समय सीमा भी हो. इससे राजस्व पूर्वानुमानों की विश्वसनीयता बढ़ जाएगी.

डी. के. श्रीवास्तव: 2021-22 में जब वृद्धि दर बढ़ी होगी, तब सार्वजनिक उपक्रमों के विनिवेश में बहुत बेहतर प्रदर्शन की गुंजाइश है. स्टॉक की कीमतें पहले से ही अपेक्षाकृत ऊंची हैं और ऐसे में तेजी से विनिवेश पहल को आगे बढ़ाना उपयुक्त होगा. पुरानी कर देयताओं के लिए आम माफी योजनाओं या टैक्स-फ्री बॉण्ड अतिरिक्त संसाधन जुटाने के लिए वांछनीय तरीके नहीं हो सकते हैं.

इनसे सरकार के कर राजस्व में अल्पकालिक क्षरण होगा जो हाल के वर्षों में पहले ही अपेक्षित या बजट में उल्लिखित विकास दर से कम रहा है. इसके बजाय, सरकारी स्वामित्व वाली परिसंपत्तियों का मौद्रीकरण और 4जी तथा 5 जी स्पेक्ट्रमों की नए सिरे से नीलामी जैसे उपाय वांछनीय हो सकते हैं.

प्रणब सेन: पीएसयू विनिवेश, एमनेस्टी योजनाएं और कर-मुक्त बॉन्ड आदि में से कोई विचार ठीक नहीं हैं. हमें नए निवेश की आवश्यकता है और विनिवेश नए निवेश के लिए निवेश योग्य संसाधनों की उपलब्धता को कम करेगा. जहां तक एक एमनेस्टी योजनाओं का सवाल है तो यह ऐसी स्थिति में काम नहीं करेंगी जब व्यावहारिक रूप से हर कोई किसी न किसी रूप में आर्थिक संकट में है.

किसी भी स्थिति में कर-मुक्त बॉण्ड अजीब हैं क्योंकि वे केवल करदाताओं को ही प्रभावी रूप से ऊंचे दरों से लाभ प्रदान करते हैं जिससे अर्थव्यवस्था में प्रोत्साहन संरचना पर कुप्रभाव पड़ता है. छोटी बचत योजनाओं के माध्यम से सभी बचतकर्ताओं को ऊंची ब्याज दर की पेशकश करना बेहतर होगा.

वर्तमान संदर्भ में बेहतर होगा कि रिजर्व बैंक घाटे का मौद्रीकरण करे और खुले बाजार से सरकारी बॉण्डों की खरीद के माध्यम से उन्हें बढऩे से रोके.

वाइ.के. अलघ: (उत्तर नहीं दिया)

इला पटनायक: सार्वजनिक उपक्रमों में सरकार की अंशधारिता के विनिवेश का यह अच्छा समय है. निधियों को आकर्षित करने का दूसरा तरीका है टैक्स-फ्री बॉण्ड.

साजिद चिनॉय: चौतरफा उपलब्ध वैश्विक तरलता और वैश्विक तथा भारतीय इक्विटी बाजारों में उछाल को देखते हुए यह परिसंपत्तियों की बिक्री के माध्यम से संसाधन जुटाने और उसे वास्तविक अर्थव्यवस्था में लगाने का अवसर है. परिसंपत्तियों की बिक्री में विनिवेश, रणनीतिक बिक्री, भूमि और बुनियादी ढांचे का मौद्रीकरण आदि शामिल हो सकते हैं. रणनीतिक बिक्री में भी दक्षता बढ़ाने वाली विशेषताएं होती है क्योंकि उनसे मूल्य-निर्माण होता है.

''वैश्विक तरलता के साथ वैश्विक और भारतीय इक्विटी बाजारों में उछाल को देखते हुए यह परिसंपत्तियों की बिक्री से संसाधन जुटाने का अवसर है’’

 

साजिद चिनॉय
स. निम्नलिखित के लिए आपका क्या पूर्वानुमान है और क्यों?
1) 2020-21 में जीडीपी वृद्धि 2) महंगाई

जवाबः अदिति नैयर: 1) वित्त वर्ष 2021 में जीडीपी: जलाशयों में पर्याप्त जल भंडारण और कृषि उत्पादकता में प्रति एकड़ 2.9 प्रतिशत की वृद्धि से रबी की पैदावार में वृद्धि का अच्छा अनुमान है और ये सारी बातें वित्त वर्ष 2021 के उत्तरार्ध में कृषि के स्थिर जीवीए विकास में योगदान करने वाली हैं. महत्वपूर्ण संकेतकों के जो आंकड़े उपलब्ध हैं उनमें से अधिकांश, जैसे कि बिजली की मांग, गैर-तेल व्यापारिक निर्यात, रेल भाड़ा, जीएसटी ई-वे बिल और वाहन पंजीकरण, में वित्तवर्ष 2021 की दूसरी तिमाही के सापेक्ष तीसरी तिमाही में सुधार हुआ है.

यह सुझाव देता है कि वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद और जीवीए में संकुचन तीसरी तिमाही के क्रमश: 7.5 प्रतिशत और 7 प्रतिशत से काफी कम हो जाएंगे. हालांकि, अधिक मात्रा में उत्पादन के कारण लाभप्रदता में हुए सुधार का हिस्सा कच्चे माल और कुछ क्षेत्रों में कर्मचारी लागत बढऩे से अवशोषित हो जाएगा. बुनियादी आर्थिक क्रियाओं में सुधार, शहरी क्षेत्रों से ग्रामीण क्षेत्रों में फिर से पैसे भेजे जाने, अच्छी खरीद, रबी मौसम के लिए एक अच्छी संभावना और टीके की उपलब्धता से, अगली तिमाही में मांग में मजबूती आने की उम्मीद है जिसके परिणामस्वरूप कई गैर-संपर्क-गहन क्षेत्रों में स्थितियों के सामान्य होने की गति में तेजी आएगी.

वित्तवर्ष 2021 की चौथी तिमाही में निर्यात में मामूली वृद्धि हो सकती है, क्योंकि टीकारण से कारोबार भागीदारों में भरोसा बढ़ेगा. इसके अलावा, कर राजस्व बढ़ता दिख रहा है जिससे सरकार के पास इस वित्तवर्ष के शेष हिस्सों में खर्च को बढ़ाने की गुंजाइश बेहतर होने की उ्मीद है. हालांकि, प्रमाण राज्य-वार पूंजीगत व्यय में मिश्रित रुझानों के संकेत देते हैं. निजी क्षेत्र द्वारा कुछ क्षेत्रों में निवेश में थोड़ा सुधार हो सकता है लेकिन वित्तवर्ष 2022 के उत्तरार्ध तक इसके व्यापक रूप से पुनरुद्धार की उम्मीद नहीं की जा सकती है.

वित्त वर्ष 2021 की तीसरी तिमाही में हल्के संकुचन के बाद, हम वित्तवर्ष 2021 की चौथी तिमाही में अच्छी वृद्धि की उम्मीद कर सकते हैं, जिसके परिणामस्वरूप वास्तविक अर्थों में जीडीपी में एक साल में 7.8 प्रतिशत के वास्तविक संकुचन होगा, जो एनएसओ की ओर से अनुमानित 7.7 प्रतिशत के स्तर के समान है. 

2) महंगाई: सीआरए ने वित्त वर्ष 2021 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) में 6.4 प्रतिशत वृद्धि की उक्वमीद जताई है जो वित्त वर्ष 2021 में खाद्य मुद्रास्फीति में 8 फीसदी की तेज वृद्धि, साल के एक बड़े हिस्से में सब्जियां और संबंधित आपूर्ति बाधित होने, वैश्विक आपूर्ति से जुड़े मुद्दों के कारण खाद्य तेलों के दबाव, साथ ही दालों जैसी प्रोटीन वाली वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि आदि कारकों से प्रेरित होगा. लॉकडाउन के दौरान आपूर्ति में रुकावट और कुछ वस्तुओं जैसे ईंधन पर उच्च करों के कारण भी कोर सीपीआई मुद्रास्फीति में वृद्धि हुई है, जिसे वित्तवर्ष 2021 में औसतन 5.5 प्रतिशत रहने की उम्मीद है.

डी.के. श्रीवास्तव: 2020-21 में, वास्तविक जीडीपी वृद्धि एनएसओ के उस पूर्वानुमान के करीब हो सकती है, जिसमें उसने इसके (-) 7.7 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है. यह पूर्वानुमान विश्व बैंक और आईएमएफ द्वारा दिए गए क्रमश: (-) 9.6 प्रतिशत और (-)10.3 प्रतिशत से अधिक यथार्थवादी हो सकता है. ऐसा इसलिए क्योंकि 2020-21 की चौथी तिमाही में एक उचित रिकवरी संभव है.

चूंकि अर्थव्यवस्था लगभग पूरी तरह से लॉकडाउन से बाहर निकल रही है और कोविड टीकाकरण कार्यक्रम के गति पकडऩे से सामान्य स्थिति को बहाल किया जा सकता है. एनएसओ के पूर्वानुमान के सही साबित होने के लिए 2020-21 की दूसरी छमाही में 1 प्रतिशत से भी कम सकारात्मक वृद्धि की जरूरत है और इसकी संभावना प्रबल है.

मौजूदा रुझानों के आधार पर, 2020-21 के पूरे वर्ष के लिए सीपीआइ मुद्रास्फीति दर लगभग 6.7 प्रतिशत रहने की उम्मीद है. नवंबर 2020 तक, सीपीआइ मुद्रास्फीति औसतन 6.9 प्रतिशत रही है. आरबीआइ को उम्मीद है कि 2020-21 की अंतिम तिमाही में मुद्रास्फीति की दर 5.8 प्रतिशत रहेगी. 6.9 प्रतिशत को 75 प्रतिशत का भार और 5.8 प्रतिशत को 25 प्रतिशत का भार प्रदान करते हुए अगर हम एक भारित औसत लेते हैं, तो हमें 6.7 प्रतिशत के करीब भारित औसत मुद्रास्फीति प्राप्त होती है.
 
प्रणब सेन: 1) जहां तक जीडीपी वृद्धि का संबंध है, दो आंकड़े हैं जो प्रासंगिक लगते हैं. पहला एक अनुमान है जो एनएसओ से आएगा जो कि गैर-कॉर्पोरेट क्षेत्र के प्रदर्शन को ज्यादातर ध्यान में नहीं रखता है. इसका पहला पूर्वानुमान आ ही चुका है और इसने -7.7 प्रतिशत बताया है और इस बात की संभावना नहीं है कि आगे चलकर इसमें बड़ा बदलाव आए.

दूसरा जीडीपी वृद्धि का 'वास्तविक’ अनुमान है जो कॉर्पोरेट और गैर-कॉरपोरेट क्षेत्रों के बीच अंतर के प्रभाव को ध्यान में रखता है. मेरा व्यक्तिगत मूल्यांकन यह है कि जीडीपी में वृद्धि दोहरे अंकों में नकारात्मक, शायद-12 प्रतिशत के आसपास हो सकती है.

2) इस वर्ष अब तक मुद्रास्फीति लगभग 7 प्रतिशत जैसे उच्च स्तर तक रही है. हालांकि, यह आपूर्ति की तुलना में मांग में तेजी से सुधार का परिणाम है. आने वाले महीनों में इसके बदलने की संभावना है क्योंकि आपूर्ति पक्ष सुधरना शुरू हो जाएगा और मांग पक्ष धीमा हो जाएगा. मुझे उम्मीद है कि इस वित्त वर्ष की अंतिम तिमाही में मुद्रास्फीति तेजी से नीचे आ जाएगी और 4 प्रतिशत के आसपास रहेगी.

वाइ.के. अलघ: 
(उत्तर देने से इंकार कर दिया)

इला पटनायक: 
2020-21 (2021 में समाप्त) में: जीडीपी में वास्तविक वृद्धि दर -7 से -8 प्रतिशत
महंगाई: 6 से 7 प्रतिशत.
 
साजिद चिनॉय:
1) 2020-21 जीडीपी वृद्धि:
- 6.5 प्रतिशत 
2)  2020-21 में औसत महंगाई:
6 प्रतिशत


 

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