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एनईपी के लिए चाहिए नया जोश

कोविड की महामारी के दौरान पढ़ाई में हुए नुक्सान से नई शिक्षा नीति (एनईपी) पर अमल में रुकावट पैदा हो गई, नुक्सान की भरपाई के लिए अब इस पर नए सिरे से बल देने की जरूरत होगी

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धर्मेंद्र प्रधान, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, शिक्षा मंत्री

3 साल, मोदी सरकार 2.0

शिक्षा

महामारी के कारण शिक्षा के क्षेत्र को भारी क्षति हुई. पिछले दो वर्षों में ज्यादातर समय स्कूल और कॉलेज बंद रहे जिसके चलते युवा आबादी वाले भारत जैसे देश में शिक्षा से जुड़े करोड़ों युवाओं और बच्चों की जिंदगियां अस्त-व्यस्त हो गईं. इसका शैक्षिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव बहुत दूरगामी होने वाला है. प्रथम नाम के एक एनजीओ की ओर से प्रकाशित की गई एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (एएसईआर), 2021 बताती है कि 2018 से 2021 के बीच बच्चों में बुनियादी गणित और पढ़ाई का स्तर बहुत नीचे गिर गया.

महामारी के चलते शिक्षा में डिजिटल तकनीक को अपनाने में तेजी जरूर आई लेकिन सामाजिक-आर्थिक असमानता और संबंधित बुनियादी सुविधाओं में कमी के कारण कितने ही बच्चों को पढ़ाई छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा. इससे अलग-अलग वर्गों के विद्यार्थियों की शिक्षा में बहुत बड़ी दरार पैदा हो गई. इससे नई शिक्षा नीति (एनईपी) का क्रियान्वयन बहुत चुनौतीपूर्ण हो गया है. एनईपी का उद्देश्य देश की शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन लाना है.

2020 में शुरू की गई नई शिक्षा नीति कहती है, ''सबसे पहली प्राथमिकता...2025 तक प्राइमरी स्कूल में बुनियादी साक्षरता और गणना की योग्यता हासिल करना होगा. इस शिक्षा नीति का बाकी का लक्ष्य तभी प्रासंगिक होगा...जब पढ़ाई का यह सबसे मूलभूत लक्ष्य हासिल कर लिया जाएगा.'' शिक्षा मंत्रालय ने इस दरार को पाटने के लिए कुछ कदम उठाए हैं, जिनमें पढ़ाई का एक आकलन सर्वेक्षण और 'निपुण भारत' व स्टार्स (एसटीएआरएस या इंप्लीमेन्टेशन ऑफ स्ट्रेंथनिंग टीचिंग-लर्निंग ऐंड रिजल्ट्स ऑफ स्टेट्स) जैसे कार्यक्रमों के अलावा डिजिटल बुनियादी ढांचे का विस्तार करना शामिल है. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने भी एनईपी के अनुसार जरूरी सुधार शुरू कर दिए हैं. लेकिन इस क्षेत्र के बजट में कोई खास बढ़ोतरी नहीं की गई है. वित्त वर्ष 2022 में इसके बजट में 8 प्रतिशत की कमी कर दी गई थी. मौजूदा वित्त वर्ष में यह महामारी से पहले के स्तर से ऊपर हो गया है.

क्या-क्या किया

नई शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 में आरंभ की गई

विश्व बैंक की सहायता से स्टार्स योजना शुरू की गई, उम्मीद की जाती है कि इससे स्कूलों में गतिविधियों की निगरानी में सुधार आएगा

बचपन के प्रारंभिक वर्षों में सभी बच्चों को देखभाल और शिक्षा देने के लिए बालवाटिका, ग्रेड 3 तक के विद्यार्थियों के लिए निपुण भारत, कला एकीकृत शिक्षा, और खिलौनों के माध्यम से शिक्षण जैसे कार्यक्रम शुरू किए जाएंगे

एनसीईआरटी की ओर से विकसित आकलन की एक रूपरेखा के आधार पर विद्यार्थियों की शिक्षा के नतीजों का बड़े स्तर पर सर्वेक्षण

उच्च शिक्षा के संस्थानों को पूर्ण रूप से ऑनलाइन कोर्स कराने की अनुमति दी गई. अन्य कार्यक्रमों मंक चार वर्ष का डिग्री कोर्स, कोर्स में प्रवेश और उसे छोड़ने के अनेक विकल्प, एकेडमिक क्रेडिट, पीएच.डी के नियमों में परवर्तन, विदेशी विश्वविद्यालयों और छात्रों के लिए अनेक प्रोत्साहन, केंद्रीय विश्वविद्यालयों के लिए एक ही प्रवेश परीक्षा शामिल हैं

आगे की चुनौतियां

नई शिक्षा नीति (एनईपी) के क्रियान्वयन को तेज करने के लिए राज्यों के साथ समन्वय बढ़ाना

कागज पर बीते पांच वर्षों में शिक्षा विभाग के बजट में 31 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. 2018-19 से बजट के आवंटन के मुकाबले वास्तविक खर्च कम रहा है एनईपी को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए सरकार को शिक्षा पर खर्च का लक्ष्य आवश्यक तौर पर जीडीपी के 6 प्रतिशत के बराबर रखना होगा

नई शिक्षा नीति के दो साल के बाद भी नेशनल करिक्युलम फ्रेमवर्क (राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की रूपरेखा) तैयार नहीं है. इस प्रक्रिया की गति को हर हाल में तेज करना होगा

एनईपी का लक्ष्य 10 लाख नए अध्यापकों की भर्ती करने का है. मौजूदा समय में केंद्रीय विद्यालयों (केवी) और जवाहर नवोदय विद्यालयों (जेएनवी) में अध्यापकों के 14,346 पद और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 6,000 से ज्यादा पद खाली पड़े हैं. इन सभी रिक्तियों को प्राथमिकता के आधार पर भरने की जरूरत है 

प्रस्तावित सिंगल हायर एजुकेशन रेगुलेटर का गठन अभी तक नहीं हुआ है, शोध और नए प्रयोगों के लिए आवंटित होने वाली रकम को बढ़ाने की जरूरत है

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