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आवरण कथाः मुसीबतों का शुरू हुआ सिलसिला

कश्मीरी पंडितों को घाटी से पलायन के लिए मजबूर करने वाली सांप्रदायिक हिंसा के कई कारण थे—हिंसक आतंकवाद और गलत सियासी गुणा-भाग से लेकर शरारती विदेशी शक्तियां और हद दर्जे की सरकारी खुन्नसें.

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इंदिरा गांधी-शेख अब्दुल्ला इंदिरा गांधी-शेख अब्दुल्ला

1975 
1975 में इस समझौते पर दस्तखत हुए, जिसे इंदिरा गांधी-शेख अब्दुल्ला समझौता भी कहा जाता है. राज्य को भारत के साथ और ज्यादा जोड़ने के उपाय लागू करने पर सहमति के साथ नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) के संस्थापक शेख अब्दुल्ला सत्ता में लौटे. जम्मू और कश्मीर की जमात-ए-इस्लामी और पीपल्स लीग तथा पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर का जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) इस समझौते का विरोध करने वाले मुख्य धड़े थे

1978-1981 
शेख अब्दुल्ला सरकार ने केंद्र के साथ टकराव का रुख अपनाया और पूरे राज्य में कोई 300 जगहों के नामों का इस्लामीकरण करके ध्रुवीकरण को तीखा किया. पाकिस्तान की आइएसआइ ने सूफीवाद की जगह उग्र वहाबीवाद फैलाकर घाटी के मुसलमानों को कट्टर बनाने की कोशिशें बढ़ा दीं

1982 
शेख अब्दुल्ला की मृत्यु. बेटे फारूक ने मुख्यमंत्री के रूप में विरासत संभाली

1984 
फरवरी में जेकेएलएफ के उग्रवादी मकबूल भट को फांसी पर चढ़ाए जाने के साथ घाटी में विरोध प्रदर्शनों ने व्यापक शक्ल अख्तियार की. भारतीय सेना ने उन्हें कुचल दिया. जुलाई में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समर्थन से फारुक के बहनोई गुलाम मोहम्मद शाह मुख्यमंत्री बने. अक्तूबर में सिख अंगरक्षकों ने प्रधानमंत्री गांधी की हत्या कर दी और सिख विरोधी दंगे भड़क उठे

1987
फारूक अब्दुल्ला और राजीव गांधी के मातहत नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस ने चुनावी गठबंधन बनाया. इस्लामपरस्त ताकतें मुस्लिम युनाइटेड फ्रंट के बैनर तले एकजुट हुईं. एनसी-कांग्रेस का गठबंधन जीता लेकिन चुनावों में जमकर धांधली करने के आरोप लगाए गए

1986
गुलाम मोहम्मद शाह ने जम्मू के एक प्राचीन हिंदू मंदिर के परिसर के भीतर मस्जिद के निर्माण का ऐलान करके इस्लामपरस्तों पर डोरे डाले. उत्तर प्रदेश की बाबरी मस्जिद हिंदू दर्शनार्थियों के लिए खोल दिए जाने से सांप्रदायिक तनाव और बदतर हो गया. विरोध प्रदर्शन दंगों में बदल गए. हिंसा रोकने के लिए सेना को बुलाया गया. केंद्र ने राज्य प्रशासन को बर्खास्त करके जगमोहन के मातहत राज्यपाल शासन लगा दिया

1988 
अफगानिस्तान में सोवियत बलों के खिलाफ तैनात जेहादियों की कामयाबी से उत्साहित आइएसआइ ने भारत में उग्रवादियों को हथियार और प्रशिक्षण देकर कश्मीर में इसी रणनीति को दोहराने की आस लगाई. विद्रोहियों ने घाटी में हिंसा बढ़ा दी, जिसमें जेकेएलएफ की भारतीय शाखा प्रमुखता से उभरकर आई. इसकी मुख्य मंडली में चार लोग थे—हमीद शेख, अशरफ वानी, जावेद अहमद मीर और यासिन मलिक

1989
राष्ट्रीय चुनाव में कांग्रेस को हराकर वी.पी. सिंह  की गठबंधन सरकार सत्ता में आई. कश्मीरी नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद को केंद्रीय गृह मंत्री बनाया गया. उपद्रवियों ने जम्मू और कश्मीर में एक के बाद एक हत्याओं का सिलसिला शुरू किया, जिनमें एनसी कार्यकर्ता मोहम्मद यूसुफ हलवाई, भाजपा के सदस्य टीकालाल टिपलू और अलगाववादी नेता मकबूल भट को मौत की सजा सुनाने वाले जज नीलकंठ गंजू की हत्याएं शामिल हैं. दिसंबर में जेकेएलएफ के उग्रवादियों ने सईद की बेटी रुबैया को अगवा कर लिया. समझौता वार्ता चली और जेल में बंद पांच उग्रवादियों को छोड़ने की एवज में रुबैया को रिहा करवाया गया

1990-91
हिंसा बढ़ी और धमकियों का सिलसिला भी. कई चौंकाने वाली हत्याएं हुई, जिनमें वायु सेना के चार कर्मियों और कई कश्मीरी पंडितों की हत्याएं शामिल थीं. ऐसे में बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हो गया. कुछ अनुमानों के मुताबिक, 90 फीसद से ज्यादा पंडितों ने इस अवधि में घाटी छोड़ दी. 1991 तक अनुमानित तौर पर 689 पंडित मारे गए, जबकि 77,000 भागकर पड़ोस के जम्मू चले गए

1990
कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने के साथ प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने 19 जनवरी को जगमोहन को फिर राज्यपाल नियुक्त किया. विरोध में मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने इस्तीफा दे दिया. घर-घर तलाशी अभियान के साथ उग्रवादियों पर कड़ी कार्रवाई का आदेश हुआ, जिससे विरोध प्रदर्शन और भड़क उठे.

सुरक्षा बलों ने 21 जनवरी को श्रीनगर में प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाईं, जिसमें 50 लोग मारे गए. घाटी बगावत से हिल उठी. सुरक्षाकर्मियों और कश्मीर पंडितों को निशाना बनाया जाने लगा. मस्जिदों से और अखबारों में धमकी भरे संदेश प्रसारित किए जाने लगे, जिनमें पंडितों को चले जाने की चेतावनी दी गई और कश्मीरियों को इस्लामी वेशभूषा अपनाने की सख्त हिदायत दी गई.
 

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