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आवरण कथाः खूनी अतीत की दस्तक

1990 में श्रीनगर में भारतीय वायु सेना के चार जवानों की हत्या के आरोपी आठ उग्रवादियों में यासीन का नाम भी शामिल है. यह मामला जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट में लंबित है.

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खुल्लमखुल्ला पंडितों की हत्याओं के वक्त यासीन मलिक (ऊपर) जेकेएलएफ का मुखिया था खुल्लमखुल्ला पंडितों की हत्याओं के वक्त यासीन मलिक (ऊपर) जेकेएलएफ का मुखिया था

मोअज्जम मोहम्मद

जब 1989-90 में आतंकवाद का दौर शुरू हुआ, उस वक्त जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) अगुआ हथियारबंद संगठन था. उसके बाद 'आजाद जम्मू-कश्मीर’ की वकालत करने के लिए इसने अहिंसक तौर-तरीके अपना लिए. लेकिन विवेक अग्निहोत्री की कश्मीर फाइल्स में दिखाए जाने के बाद पंडितों पर हमले में इस संगठन की कथित भूमिका इसके जीवित नेताओं, खासकर यासीन मलिक और फारूक अहमद डार उर्फ बिट्टा कराटे को फिर से परेशान करने वापस आ गई है.

यासीन और बिट्टा दोनों घाटी में आतंकी गतिविधियों के लिए पाकिस्तान से फंडिंग लेने के आरोप में दिल्ली के तिहाड़ जेल में बंद हैं. इस मामले की जांच एनआइए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) कर रही है, लेकिन दोनों पर कश्मीरी पंडितों की हत्या का कोई भी मामला नहीं चल रहा.

कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति (केपीएसएस) के अध्यक्ष संजय टिक्कू के मुताबिक, पंडितों की 90 फीसद हत्याओं को जेकेएलएफ के उग्रवादियों ने अंजाम दिया था. हिज्बुल मुजाहिदीन—शायद कश्मीर में आज का सबसे बड़ा उग्रवादी संगठन—1991 के बाद ही नक्शे पर उभरा, जब अधिकतर पंडित घाटी छोड़कर जा चुके थे. बिट्टा ने 20 पंडितों को मारने की बात सार्वजनिक तौर पर कबूली थी, हालांकि बाद में उसने कहा कि वह बयान उसने ''दबाव’’ में दिया था.

इस महीने सतीश टिक्कू के परिवार ने वह केस फिर से खोलने की मांग की, जिसकी सुनवाई श्रीनगर की एक अदालत 31 मार्च को करेगी. बिट्टा ने 2 फरवरी, 1990 को टिक्कू की गोली मारकर हत्या कर दी थी. इस मामले में 16 साल जेल में बिताने के बाद बिट्टा को 2006 में जमानत मिल गई थी. अदालत ने कहा था, ''अभियोजन पक्ष ने मामले में बहस करने में पूरी तरह से उदासीनता बरती.’’

दो उग्रवादियों की दास्तान

 

बिट्टा के पिता राजमिस्त्री थे और वह श्रीनगर के गुरु बाजार में पला-बढ़ा. वह एक ऐसे स्कूल में पढ़ने गया जहां कई सारे पंडित शिक्षक थे. लेकिन दसवीं कक्षा में उसने पढ़ाई छोड़ दी और ब्लैक में सिनेमा के टिकट बेचने लगा. अपना नाम जाहिर न करने की शर्त पर उसके एक पड़ोसी बताते हैं कि बिट्टा में पंडितों के खिलाफ नफरत भरी पड़ी थी. वह मार्शल आर्ट्स में प्रशिक्षित है. इसी वजह से उसका नाम 'बिट्टा कराटे’ पड़ गया. उसे 1990 में गिरफ्तार किया गया. उम्र के पचासवें पड़ाव तक आते-आते यासीन से उसके मतभेद हो गए. और पंडितों की हत्या की बात कबूलने के बाद जेकेएलएफ ने सीधे तौर पर उससे नाता तोड़ लिया.

यासीन भी पंडितों की हत्या के मामले में जांच के दायरे में है क्योंकि वह उस वक्त जेकेएलएफ का मुखिया था. 2002 में बीबीसी के हार्डटॉक नाम के इंटरव्यू प्रोग्राम में उसने टिम सिबेस्टियन को बताया था कि जेकेएलएफ ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश नीलकंठ गंजू को मार दिया था क्योंकि गंजू ने संगठन के संस्थापक मकबूल भट को मौत की सजा सुनाई थी. 1990 में श्रीनगर में भारतीय वायु सेना के चार जवानों की हत्या के आरोपी आठ उग्रवादियों में यासीन का नाम भी शामिल है. यह मामला जम्मू-कश्मीर हाइकोर्ट में लंबित है.

श्रीनगर के मैसुमा के रहने वाले यासीन के पिता एक सरकारी कंपनी में ड्राइवर थे. जवानी के दिनों में यासीन विरोध-प्रदर्शनों में हिस्सा लेता था और सुरक्षाबलों पर पत्थरबाजी करता था. श्री प्रताप कॉलेज से स्नातक यासीन 1987 के चुनावों के दौरान मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट के उम्मीदवार सैयद सलाहुद्दीन की कैंपेन टीम में शामिल था. चुनावों में कथित धांधली के बाद यासीन और उसके सहयोगियों ने इस्लामिक स्टुडेंट्स लीग के बैनर तले बंद का आह्वान किया था.

तब वह पहली बार गिरफ्तार हुआ. अपनी रिहाई के बाद इशफाक मजीद, हामिद शेख और जाविद मीर के साथ उसने 1988 में एलओसी पार किया और पाकिस्तान में तीन महीनों तक हथियारों का प्रशिक्षण लिया. 8 दिसंबर, 1989 को तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद का अपहरण करके वे सब सुर्खियों में आ गए थे.

साल भर बाद उसे गिरफ्तार किया गया और वह 1994 तक जेल में रहा. बहुत पहले उससे किनारा कर लेने वाले उसके एक सहयोगी का कहना है, ''युद्धविराम घोषित करने से जेकेएलएफ में फूट पड़ गई थी.’’ कई सहयोगियों ने अलग गुट बना लिया. ''देश-विरोधी गतिविधियों’’ में लिप्त होने के आरोप में मार्च, 2019 में जेकेएलएफ पर प्रतिबंध लगा दिया गया.

—मोअज्जम मोहम्मद

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