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संगीत: एक जुनून है जो हमें जोड़ता है

हिंदी फिल्म संगीत का कारोबार बहुत बड़ा है. इसने नामी सितारे पैदा किए. लेकिन इसमें कुछ नया करने की संभावनाएं कम हैं

भारतीय संगीत से मेरा पहला परिचय मेरे मां-बाप ने कराया था. मैं पांच साल का था जब देखता था कि अम्मी पढ़ाई करते वक्त हिंदी गाने सुना करती थीं. वे पंजाब यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थीं. अब्बू जान अपने दोस्तों के साथ देर रात तक बहस-गोष्ठियां और मेहमानवाजी करते. मैं उनके साथ के.एल. सहगल, मन्ना डे, हेमंत कुमार, एस.डी. बर्मन और लता मंगेशकर के गानें गुनगुनाता बड़ा हुआ.

भारतीय गायकों में किशोर कुमार, हेमंत कुमार, मन्ना डे और गायिकाओं में लता दीदी और आशा भोंसले के गानों के लिए मेरे मन में खास जगह तैयार हो चुकी थी. संगीत को पेशे के तौर पर चुनने के पीछे उनकी अहम भूमिका रही है. वे मेरे लिए आदर्श हैं जो मुझे मेहनत से आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं न कि नकल करके. संगीत गढ़ते समय इन्हीं विलक्षण लोगों की तरह मौलिक कल्पना और  अलग शैली होनी चाहिए.

दोनों मुल्कों के संगीत की बात करें तो भारतीय संगीत मुख्य रूप से यहां के फिल्म उद्योग से पनपा है. यहां गानों का संगीत फिल्म की मांग पर आधारित होता है और गायक उन गानों को संगीत निर्देशक और दृश्यों की मांग के अनुसार ही गाते हैं. गाना बनने और उस पर अभिनेता के साथ फिल्माए जाते ही उसकी मुट्ठी में आ जाती है बेहिसाब शोहरत. साथ ही व्यावसायिक सफलता और तारीफ भी.

पाकिस्तान में फिल्म उद्योग के बदहाल होने के चलते संगीत ने दूसरे माध्यम और मुकाम तलाश लिए. संगीतकारों, गायकों ने पार्श्वगायन के अलावा कव्वाली, गजल, पॉप, रॉक और फ्यूजन को भी लोकप्रियता हासिल करने का माध्यम बना लिया. सूफी गायकी ने भी अपनी परंपरागत चौखट लांघी और आधुनिक पीढ़ी की जुबान पर बैठ लोकप्रियता में सबको पीछे छोड़ दिया.

आज यहां बॉलीवुड का वर्चस्व है, जिसकी वजह से स्वतंत्र कलाकारों और कम जानी-पहचानी शैलियों के लिए शायद ही कोई जगह बची है. पाकिस्तान में प्रतिभा को उभरने का बहुत कम मौका मिल पाता है. फिल्म उद्योग के अभाव में हमारे संगीतकार निजी म्युजिक चैनलों पर निर्भर  हैं. लेकिन न्यूज चैनलों के प्रति लोगों की दीवानगी के चलते वहां भी नाउम्मीदी का आलम है. म्युजिक चैनलों की रेटिंग लगातार गिर रही है. ऐसे वक्त में कोक स्टूडियो जैसे रियलिटी शो थोड़ी राहत देते हैं.

दोनों मुल्कों के बीच संगीत का साझ सेतु बनाने के लिए काफी कुछ करना पड़ेगा. दोनों तरफ के संगीतकारों को ज्‍यादा साझेदारियां करनी होंगी. अपनी पहली फिल्म तेरे बिन लादेन के दौरान शंकर-एहसान-लॉय के साथ काम के वक्त दोस्ती और मस्ती दोनों का मजा लिया मैंने. मेरे लिए यह बड़े काम का अनुभव था.

भारत में अब संगीत को लेकर होने वाले कॉन्ट्रेक्ट को भी नई शक्ल दिए जाने की जरूरत है. हिंदुस्तानी रिकॉर्ड कंपनियों को भी इस बारे में चीजों पर नए सिरे से विचार करना चाहिए. पश्चिम की तरह यहां भी संगीत के असल अधिकार गीतकार और संगीतकार के पास ही होने चाहिए. अधिकार भी खरीदे नहीं बल्कि साझ किए जाएं. गायक और दूसरे जिन-जिनने भी संगीत को सफल बनाया है, उन्हें फायदा पहुंचना चाहिए, न सिर्फ लाइव शो के जरिए, बल्कि रॉयल्टी से भी.

रेडियो और टीवी के एयरटाइम का कुछ हिस्सा उभरते युवा कलाकारों के लिए रखना चाहिए. जिस संगीत की रचना में उन्होंने अपना सब कुछ लगा दिया, लाजिमी है कि उन्हें उस बारे में पेश होने और बोलने का मौका मिले. दर्शकों को भी हर तरह का संगीत सुनने और देखने का हक हो.

नामी संगीतकारों को उचित और खास स्थान मिलना ही चाहिए. मैं शिद्दत से महसूस करता हूं कि भारत और पाकिस्तान को अपने-अपने संगीत और मनोरंजन चैनलों को एक दूसरे के यहां एयरस्पेस देना चाहिए. अपने आसमान खोलो और उड़ चलो. आज नहीं तो कल उन्मुक्त स्वर सभी को अपने आकर्षण में बांध ही लेंगे.
(प्राची रेगे से बातचीत के आधार पर)

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