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इंद्राणी मुखर्जी: दौलत, दोस्ती और फरेब की दास्तान

गुवाहाटी की एक मामूली-सी लड़की इंद्राणी बोरा, फिर कोलकाता की इंद्राणी खन्ना, उसके बाद श्रीमती पीटर मुखर्जी और अब अपनी ही बेटी की हत्या की आरोपी की अजीबोगरीब दास्तान, जिससे पूरा देश हिल उठा. इंद्राणी की दास्तान में शामिल तमाम किरदार सामान्य पारिवारिक रिश्तों के इतर भी एक बेहद पेचीदा बुनावट वाले जाल से गुंथे हैं. जानें इंद्राणी की पूरी कहानी.

अगस्त 2007 का एक भीगा हुआ दिन. अधबने बांद्रा-वर्ली सी लिंक की पृष्ठभूमि में स्थित मुंबई के उस दफ्तर में इंद्राणी मुखर्जी से एक नए सहयोगी को मिलवाने ले आया जाता है, जो जल्द ही लॉन्च होने वाले उनके टीवी साम्राज्य का अस्थायी मुख्यालय है. बिना किसी अभिवादन या भूमिका के इंद्राणी अपने नए सहयोगी से मुस्कराते हुए कहती हैं, “फर्ज करो कि एक घास के मैदान में सौ भेड़ें चर रही हैं. फिर सोचो कि उनमें से 99 एक ही दिशा में देख रही हैं, बस एक है जो दूसरी ओर देख रही है. क्या तुम बता सकते हो कि वह इकलौती भेड़ कौन है?” नए सहयोगी ने स्तब्धता में अनभिज्ञता जाहिर की. इंद्राणी ने कहा, “वह भेड़ आइएनएक्स है!”

यह 39 साल की एक उदीयमान मीडिया मालकिन इंद्राणी मुखर्जी का नया अवतार था जिसने कल्पना की थी कि भविष्य में कभी वह रूपर्ट मर्डोक जैसी ताकतवर होगी. उस वक्त तक इंद्राणी अपनी उथल-पुथल भरी जिंदगी में कई अवतार ले चुकी थी. कभी वह गुवाहाटी के मध्यवर्गीय वातावरण में लाड से पली-बढ़ी एक लड़की की भूमिका में थी. एक ऐसी लड़की जिसने बहुत कम उम्र में घर छोड़ दिया और जल्दीबाजी में कुछ रिश्तों में उलझ गई. फिर वह एक ऐसी औरत के किरदार में आई जिसने दो बच्चे पैदा करने के बाद उस रिश्ते को तोड़ दिया और नए पति के साथ कोलकाता की चमक-दमक भरी दुनिया को गले लगा लिया. अचानक उसने रूप बदला और मुंबई में नियुक्ति करने वाली एक फर्म के साथ ताजा शुरुआत की. उसका आखिरी किरदार पीटर मुखर्जी की पत्नी के रूप में दिखा जहां वह भारतीय टेलीविजन उद्योग की पहली महिला के तौर पर अपना स्वतंत्र वजूद तलाश रही थी. इंद्राणी की जिंदगी एक महागाथा की तरह हमारे सामने खुलती है जिसमें मार्गरेट मिशेल, जॉन स्टाइनबेक और डैनियल स्टील का थोड़ा-थोड़ा अंश मौजूद है, सिवाए उस हत्या के जिसने आज इस दास्तान में रोल्ड डॉल जैसा एक काला अध्याय जोड़कर उसे विद्रूप बना डाला है. पूरी कहानी मधुर भंडारकर की किसी फिल्म की पटकथा जैसी रोमांचक है.

इंद्राणी मुखर्जी की कहानीइंद्राणी पर आज अपनी बेटी शीना बोरा की हत्या का आरोप है जिसका परिचय उसने मुंबई के अभिजात्य समाज को अपनी सौतेली बहन के रूप में करवाया था. कथित तौर पर उसने यह अपराध कोलकाता के ऊंचे समाज से आने वाले अपने पूर्व पति संजीव खन्ना और ड्राइवर श्याम राय के साथ मिलकर किया था. ड्राइवर ने बाद में मुंबई के एक बार में अपने किसी दोस्त से इसका जिक्र कर डाला. तीनों ने मिलकर कथित रूप से शीना को 24 अप्रैल, 2012 को अगवा किया, उसका गला घोंटा और फिर उसे जलाकर दफन कर दिया. पिछले 25 अगस्त को हुई इंद्राणी की गिरफ्तारी और उसके बाद उसकी परदे के पीछे की जिंदगी के बारे में सामने आए विवरणों ने उसके अतीत से जुड़े ऐसे सिलसिलेवार खुलासों की झड़ी लगा दी है जिससे पूरा देश हिल उठा है. टीवी कैमरों की भीड़ के बीच पुलिस इंद्राणी को जब अदालत में पेश करने ले जा रही थी, तो उसने अपना चेहरा काले कपड़ों से ढक रखा था, बावजूद इसके पूरे देश की निगाहें उसके ऊपर थीं. पूरी दुनिया आज उसके ऊपर हंस रही है&उसकी हालत मिनेसोटा के डेंटिस्ट वॉल्टर पामर जैसी है जिस पर जिम्बॉब्वे के जंगलों में सेसिल नाम के शेर को मारने का आरोप है. वह उन पारिवारिक धारावाहिकों की परित्यक्त खलनायिका में तब्दील हो चुकी है जिन्हें मनोरंजन चैनल 9एक्स का प्रोग्रामिंग प्रमुख के नाते उसने मंजूरी दी थी.

मुंबई पुलिस के मीडिया प्रेमी आयुक्त राकेश मारिया के नेतृत्व में पुलिस आज जब उसके खिलाफ चार्जशीट तैयार करने के कगार पर है, तब भी इंद्राणी की करीने से बुनी हुई कहानी में हकीकत और फसाने को अलग कर पाना मुश्किल जान पड़ रहा है. उसकी जिंदगी की यह दास्तान इतनी नाजुक है कि आज उसके करोड़ों टुकड़े यहां-वहां बेतरतीब बिखरे पड़े हैं.  
पुलिस और मीडिया ने मिलकर इस मामले में जो भ्रमजाल रचा है, उसमें जवाब कम हैं जबकि नित नए सवाल जरूर पैदा हो रहे हैं. हत्या का कारण, हत्या कैसे की गई, इंद्राणी और खन्ना का अचानक दोबारा मिलना, ये सब कुछ अब भी धुंधलके में है. क्या यह किसी अनैतिक पारिवारिक टकराव का नतीजा था? क्या सारा मामला पैसे से जुड़ा था, जैसा कि कुछ शीर्ष जांचकर्ताओं ने इंडिया टुडे को बताया है? शीना को अपनी जान क्यों गंवानी पड़ी? और शायद सबसे अहम सवाल यह है कि क्या कोई मां अपने बच्चे की इस तरीके से हत्या कर सकती है? आधुनिक दौर में पतन की इस महान दास्तान को समझने के लिए हमें सबसे पहले यह जानने की कोशिश करनी होगी कि इंद्राणी आखिर है कौन? इसके लिए हमें उसकी जिंदगी के जटिल सफर पर एक नजर डालनी होगी.

इंद्राणी
इंद्राणी की कहानी 1968 में गुवाहाटी की एक धूल भरी कॉलोनी सुंदरपुर से शुरू होती है, जो हमेशा इतनी सुंदर नहीं थी जितनी आज है. कभी अचानक आई बाढ़ और बाथटब जितने गहरे गड्ढों के लिए सुर्खियों में रहने वाले इस इलाके का इधर अचानक ऐसे कायाकल्प हुआ है गोया किसी को पता रहा हो कि देश की निगाह इधर उठने वाली है.

यहां कंक्रीट की बनी सड़कें आज चिकनी हो चुकी हैं. अधिकतर मकानों के भीतर बड़े-बड़े बगीचे हैं और उनके ड्राइववे में ढेर सारी गाडिय़ां खड़ी दिखती हैं. इसी कतार में मकान नंबर 8 हमेशा अलग से मौजूद रहा है तो अपने आकार, आकृति या बाहर खड़ी कारों के कारण नहीं बल्कि ताले वाली विशाल खिड़कियों और उस विशिष्ट गोलाकार सीढ़ी के चलते, जो सीधे पहली मंजिल के एक कमरे तक जाती है. इसी मकान में इंद्राणी बोरा अपने पिता उपेंद्र कुमार बोरा और मां दुर्गा रानी बोरा के साथ रहती थी, जिसे बचपन में प्यार से पोरी कहकर बुलाया जाता था जो उसका “घोरुवा नाम” (घर का नाम) था. आजकल इस मकान से रिपोर्टरों और राहगीरों को दूर रखने के लिए इसकी निगरानी विशाल काया वाले छह लोग करते हैं जो स्थानीय जिम के नियमित ग्राहक हैं. बताया गया है कि दुर्गा रानी की तबीयत ठीक नहीं है और उन्हें परेशान नहीं किया जाना चाहिए.

बोरा परिवार से मिलने की तो इजाजत नहीं है, लेकिन इस इलाके में टीवी कैमरे या नोटबुक के साथ भी दिख जाने वाले किसी शख्स को स्थानीय लोग पूरे चाव से इस परिवार के बारे में तमाम कहानियां सुनाने को तैयार मिलते हैं. पड़ोसियों का कहना है कि बोरा परिवार “अलग-थलग” रहता है और “दूसरों से घुलना-मिलना पसंद नहीं करता.” थोड़ी दूरी पर रहने वाले जीबोन बारदोलाई की मानें तो ये लोग इलाके के किसी भी आयोजन या शादी समारोह में शायद ही कभी देखे जाते हैं. किसी को भी हालांकि पक्के तौर पर यह नहीं पता कि उपेंद्र कुमार बोरा का खर्च कैसे चलता है. यहां से चार घंटे दूर असम की सांस्कृतिक राजधानी तेजपुर में रहने वाले उपेंद्र के भाई मानिक बताते हैं कि उपेंद्र ठेकेदार हुआ करते थे. मानिक ने इंडिया टुडे को बताया, “उन्होंने कुछ प्रॉपर्टी भी किराए पर दी हुई थी.” वे बताते हैं कि उपेंद्र को अब भी मकान के किराए के बतौर 27,500 रुपए प्रति माह मिलते हैं जो कि शहर के किराए की मौजूदा दर के हिसाब से अच्छी रकम है. भूतल का एक हिस्सा एक निजी फर्म को किराए पर दिया गया है जबकि दो परिवार और कुछ नौकर वगैरह उन कमरों में रहते हैं जो कभी बोरा के सर्वेंट क्वार्टर (नौकरों के कमरे) हुआ करते थे.

नाम न छापने की शर्त पर 31 साल का एक शख्स बताता है कि उपेंद्र कभी उसके पिता के पेंट के कारखाने में मैनेजर की नौकरी करते थे लेकिन पैसे पर हुए किसी विवाद के कारण उन्हें निकाल दिया गया था. लोग याद करते हैं कि बोरा परिवार का गुवाहाटी में कभी “चाणक्य इन” नाम का एक गेस्ट हाउस भी हुआ करता था जिस पर एक स्थानीय अखबार के मुताबिक, 2000 में दिसपुर पुलिस ने छापा मारा था, क्योंकि आरोप था कि उसके कमरे घंटे के हिसाब से अनैतिक कृत्यों के लिए किराए पर दिए जा रहे थे. इंडिया टुडे ने जब दिसपुर थाने के रिकॉर्ड खंगाले, तो ऐसा कोई भी मामला दर्ज नहीं मिला. ऐसी ही एक और अफवाह फिजाओं में तैर रही है जिसका कोई ठोस आधार नहीं है, जिसमें उनके पड़ोसी, इंद्राणी के सहयोगी और यहां तक कि रिश्तेदार भी उसका नाम आज टीवी पर दिखने वाले एक शख्स के साथ जोड़ते हैं.

इंद्राणी की कहानीकुल मिलाकर यह जान पड़ता है कि बोरा परिवार एक आरामदेह मध्यवर्गीय जिंदगी बसर कर रहा था. मानिक के मुताबिक, उनके भाई की उम्र नब्बे के आसपास है, हालांकि मतदाता सूची के मुताबिक, उपेंद्र की उम्र 78 और उनकी पत्नी दुर्गा की 73 साल है. इन्होंने अपनी इकलौती बेटी इंद्राणी को सेंट मेरीज, गुवाहाटी में पढऩे के लिए भेजा था, जो राज्य के प्रतिष्ठित महिला स्कूलों में एक था. एक शख्स ने बताया कि इंद्राणी जब नौवीं क्लास में थी तब एक नेपाली के साथ भाग गई थी जिसके बाद उसे स्कूल से निकाल दिया गया था. स्कूल के रिकॉर्ड दूसरी ही कहानी कहते हैं. इंद्राणी पढऩे में कुशाग्र थी और 1983 में उसने 80 फीसदी से ज्यादा अंकों के साथ दसवीं की परीक्षा पास की थी. उसके सहपाठी उसे एक बिगड़ैल लड़की के रूप में याद रखते हैं जो पढ़ाई में हमेशा अच्छे अंक लाती थी.

दसवीं के बाद इंद्राणी ने गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज में दाखिला लिया. इस कॉलेज से असम की मशहूर शख्सियतें पढ़कर निकली हैं, जिनमें संगीतकार भूपेन हजारिका से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री सरत चंद्र सिन्हा जैसे कई मशहूर लोग हैं. कॉटन कॉलेज में ही इंद्राणी की मुलाकात बिष्णु चौधरी से हुई, जो वहां कानून की पढ़ाई कर रहा था और गुवाहाटी के मशहूर चिकित्सक बी.एल. चौधरी का बेटा था. कुछ पुराने सहपाठी कहते पाए जाते हैं कि दोनों ने कुछ समय के लिए शादी कर ली थी, लेकिन चौधरी का कहना है कि उनके बीच संबंध रिश्ता जरूर था लेकिन उन्होंने कभी भी शादी नहीं की.

इंटरमीडिएट के बीच में ही इंद्राणी शिलांग के लेडी कीन कॉलेज चली आई और 1985 में बारहवीं की बोर्ड परीक्षा यहां से पास की. यहां वह अक्सर एक लोकप्रिय रेस्तरां चिराग में जाया करती थी, जहां उसकी मुलाकात सिद्धार्थ दास से हुई. जिस सिद्धार्थ दास को 1 सितंबर को मुंह पर रूमाल लपेटे अपने किस्से सुनाते देखा गया था, उससे उलट उस वक्त दास एक शानदार नौजवान थे जो एक निजी फर्म में नौकरी करते थे. ऐसा लगता है कि मीडिया में खुलासे से पहले सिद्धार्थ की पत्नी बबली को इंद्राणी के साथ रिश्तों का कोई इलहाम नहीं था. इंद्राणी ने 198 6 में अपने परिवार को बता दिया था कि सिद्धार्थ उसका पति है और उसे लेकर वह सुंदरपुर में अपने मां-बाप के साथ रहने आ गई थी. करीब तीन दशक बाद इस महीने सिद्धार्थ ने यह बयान दिया है कि उस वक्त उनकी शादी नहीं हुई थी.

इंद्राणी के पिता ने सिद्धार्थ को खड़ा करने में मदद की और उनके लिए गणेशगुरी में एक रेस्तरां खोला, लेकिन वह चल नहीं सका. इंद्राणी को बेरोजगार पति मंजूर नहीं था. 1987 में शीना और 1988 में मिखाइल का जन्म हो चुका था जिनके चलते दोनों के बीच तनाव बढऩे लगा. जून 1990 में इंद्राणी यह कहकर कोलकाता चली गई कि वह अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती है. उसके तीन दिनों के भीतर सिद्धार्थ को उसके गुवाहाटी वाले मकान से बाहर निकाल दिया गया.

शीना को जब 1992 में स्कूल में डालने का वक्त आया, तो बोरा परिवार ने तय किया कि दोनों बच्चों के कानूनी अभिभावक उनके नाना-नानी को ही होना है. अगले साल इंद्राणी ने कामरूप न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में एक हलफनामा दाखिल करके अपने दोनों बच्चों की देखभाल कानूनी रूप से अपनी मां को सौंप दी. इस हलफनामे में दोनों बच्चों के जन्म के साल को बदल दिया गया. हलफनामे में इंद्राणी ने दावा किया है कि 1989 में ही सिद्धार्थ के साथ उसका संपर्क खत्म हो गया था और मिखाइल का जन्म 1990 में हुआ. सिद्धार्थ उनकी जिंदगी से बाहर जा चुके थे और इंद्राणी कोलकाता में बस गई थी, लिहाजा बोरा दंपती ने ही दोनों बच्चों को अपने दम पर बड़ा किया.

शीना का नाम डिज्नीलैंड स्कूल में लिखवाया गया, जो आज सुदर्शन पब्लिक स्कूल के नाम से जाना जाता है. यह गुवाहाटी के खानपाड़ा में स्थित है. शांत स्वभाव की शीना ने दसवीं की परीक्षा 80 से ज्यादा अंकों से पास की और बारहवीं की बोर्ड परीक्षा मानविकी विषय में फैकल्टी हायर सेकंडरी स्कूल से पास की. मिखाइल पढ़ाई में उतना तेज नहीं था. नौवीं कक्षा में डिज्नीलैंड स्कूल से उसका नाम कट गया और दसवीं की परीक्षा उसने प्राइवेट छात्र के रूप में पास की. इस वक्त तक बोरा परिवार की आय का मुख्य स्रोत चाणक्य इन नाम का उनका अतिथिगृह था. यह गेस्टहाउस जब 2000 में बंद हो गया तो इन्हें खर्च चलाने में दिक्कत आने लगी. ऐसा जान पड़ता है कि इस दौर में उपेंद्र, दुर्गा रानी और दोनों बच्चों का इंद्राणी से कोई भी संपर्क नहीं रह गया था&फिलहाल तो यही माना जा सकता है. इंद्राणी के मां-बाप उसके छोड़े हुए बच्चों का किसी तरह पालन-पोषण कर रहे थे और समाज से कटे हुए थे.

इंद्राणी की दास्तानपारिवारिक झंझटों से मुक्त एक नवयुवती के रूप में इंद्राणी ने कोलकाता में अपना नया अवतार लिया. इंद्राणी दास नाम की जिस 22 वर्षीय खुशनुमा लड़की ने कोलकाता की धरती पर कदम रखा था, उसे शहर के पार्टीबाज लोग आज एक आकर्षक और हंसमुख लड़की के रूप में याद करते हैं. कोलकाता का कॉर्पोरेट जगत उसके मादक असमिया सौंदर्य को नहीं भूल पाता, जब वह काली, लाल या पीली शिफॉन की साड़ी में लिपटी हुई अपनी छोटी सी एचआर फर्म आइएनएक्स सर्विसेज के लिए धंधे की तलाश में हर कॉर्पोरेट का दरवाजा खटखटाती फिरती थी.

इंद्राणी को अभिजात्यों के संस्कार में ढलने में बहुत वक्त नहीं लगा. शहर में आने के बाद वह भले ही एक मामूली पीजी आवास में रहती थी लेकिन 1993 में संजीव खन्ना के साथ संक्षिप्त प्रेम और जल्दबाजी में किए विवाह के चलते उसकी पहुंच अलीपुर में रईसों के इलाके हेस्टिंग्स तक हो गई. कोलकाता में क्लब की दुनिया के लोग मानते हैं कि कलकत्ता क्रिकेट ऐंड फुटबॉल क्लब (सीसीएफसी) &भारत का सबसे पुराना खेल क्लब और दस साल तक शहर में रहते हुए इंद्राणी का पसंदीदा मैदान&में नियमित पहुंचने वाले खन्ना इंद्राणी पर फिदा थे. सीसीएफसी कमेटी के एक सदस्य कहते हैं, “वह एक हंसोड़ शख्स था, मित्रवत था, बड़ों का सम्मान करता था, उसकी पढ़ाई-लिखाई और पृष्ठभूमि अच्छी थी. क्लब की अहम गतिविधियों जैसे हॉकी, फुटबॉल, क्रिकेट या रग्बी से हालांकि उसका कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन मोटर रैली का वह प्रेमी था और वह बहुत सारे लोगों को जानता था.” उसका बुरा पक्ष यह था कि उसे शराब पसंद थी, कभी-कभार वह नशे में दूसरों से उलझ जाता, फिर क्लब से कुछ दिनों तक निलंबित रहता और कई बार उसने पैसे नहीं चुकाए थे. उसके दोस्त बताते हैं कि वह उदास शहजादे की तरह जीता था और इंद्राणी पर फिदा था. दोनों की 1997 में एक बेटी हुई जिसका नाम विधि है.

प्रतिष्ठित नियुक्ति एजेंसी एबीसी कंसल्टेंट्स के साथ काम कर चुकी एक एचआर कंसल्टेंट इंद्राणी के बारे में याद करती हैं कि वह अक्सर उनके पास आइएनएक्स की सेवाओं के लिए आया करती थी जिसे उसने 1996 के आसपास खोला था. वे कहती हैं, “उसका दक्रतर पार्क स्ट्रीट पोस्ट ऑफिस के आसपास कहीं था और वह नियमित रूप से हमारे दफ्तर चली आती थी. वह रेस्तरां, छोटे होटलों और ईवेंट वगैरह में अपनी सेवाएं देती थी, बुनियादी रूप से उसका काम कॉलेज से निकली नई लड़कियों को काम पर रखवाना था.” कुछ साल में उसका नेटवर्क फैलने लगा.

कोलकाता के प्रभावशाली रईस तबके तक इंद्राणी की पहुंच बनाने में शायद टी.पी. रॉय नाम का शख्स मददगार रहा जिसे उसके दोस्त रॉनी कह कर बुलाते थे और उत्तरी बंगाल के दुआर स्थित चाय बागानों का वह मालिक हुआ करता था. रॉय शहर के क्लबों का सक्रिय सदस्य था. कुछ साल पहले उसे लकवा मार गया. टॉली क्लब के सदस्य आज भी इस गप्पी बुजुर्ग को याद करते हैं जो खुद अपना ड्रिंक बनाता था जिसके साथ एक नर्स भी होती थी. रॉय ऐसे पुराने रईस खानदान से था जिसकी छवि शहर में बहुत ऊंची थी, क्योंकि उसके बाप-दादाओं ने कला के प्रति अपने प्रेम वगैरह से काफी पहले बहुत सारा पैसा बनाया था और हमेशा अय्याशी भरा जीवन जिया था. रॉय और उसके परिवार को जानने वाले एक शख्स बताते हैं, “उनके पास अब वैसा पैसा नहीं रह गया है.” क्लब के एक बुजुर्ग सदस्य बताते हैं, “उनका सामाजिक संपर्क हालांकि हमेशा बना रहा. इंद्राणी उनके करीब थी और उनके माध्यम से उसकी पहुंच बेहद नकचढ़े और अभिजात्य समाज के उस विशिष्ट हिस्से तक हो गई जो वैसे मुमकिन नहीं होता.”

एक और एचआर कंसल्टेंट बताते हैं, “वह कभी किटी पार्टी की शौकीन नहीं रही. उसके शिकार की पसंदीदा जगहें कॉर्पोरेट दफ्तर थे, सीसीएफसी था, रईस मारवाड़ी लड़कियों का जुटान होता था जिनमें अधिकतर क्वीन ऑफ द मिशंस और कलकत्ता गर्ल्स से पढ़ी होती थीं और आइएएस अफसरों की पत्नियों का “सर्किट” था.” शहर की बदलती हुई सीरत के साथ शायद इन्हीं तबकों के माध्यम से इंद्राणी कामयाबी की सीढिय़ां चढ़ती गई. प्रवासी अंग्रेजी खानसामा और रेस्तरां सलाहकार शॉन केनवर्दी कहते हैं, “कोलकाता का मतलब इतिहास और विरासत है लेकिन आज की तारीख में मारवाडिय़ों की स्मार्ट और कूल जमात शहर में हलचल पैदा कर रही है. शहर का पासापलट यहीं से हो रहा है.” आज से 14 साल पहले पार्क होटल में एग्जीक्यूटिव शेफ बनकर आए केनवर्दी ने हाल में 1658 बार ऐंड किचेन खोला है. वे इंद्राणी से तो कभी नहीं मिले, लेकिन 1658 को शुरू करने में मदद देने वाले खन्ना को उन्होंने “एक शानदार शख्स” बताया.

इंद्राणी की कहानीकोलकाता में इंद्राणी की छवियां हैं जो परस्पर विरोधाभासों से युक्त हैं. मधुर व्यक्तित्व से लेकर जोड़-जुगाड़ करने वाली तक, विनम्र लेकिन अक्खड़ भी, जिंदादिल लेकिन प्रतिशोध से भरी हुई. एक वरिष्ठ एचआर कर्मी की मानें तो वह “अपनी महत्वाकांक्षा में अंधी” थी. इसके बावजूद “दूसरों को उसके भीतर ऐसी किसी भी प्रवृत्ति का एहसास तक नहीं होता था.”
इंद्राणी और खन्ना में धीरे-धीरे दूरियां बढऩे लगीं और अंत में वे अलग हो गए. जल्द ही वह शहर से गायब हो गई. कोलकाता में उसकी आखिरी याद 2002 में मुंबई से आया वह फोन कॉल है जो उसने हर ऐसे शक्स को किया था जो शहर में मायने रखता था. उसने कहा था, “पता है? पहले मैं इंद्राणी दास थी. फिर मैं इंद्राणी खन्ना हुई. अब मैं इंद्राणी मुखर्जी होने जा रही हूं. पीटर ने मेरे लिए एक शानदार लाल मर्सिडीज खरीदी है.” असम की इस मामूली लड़की ने बड़ी मेहनत करके अपना यह नया अवतार लिया थाः जिसका होना कोई मतलब नहीं रखता था, आज वह कुछ बन चुकी थी.

इस खबर के बाद सीसीएफसी में लोग रस लेकर बातें बनाने लगे. शराब और हंसी-ठट्ठे के दौर के बीच लोग अचानक एक-दूसरे के करीब आकर फुसफुसाते, “क्या किया है उसने?” मेन बार में बस एक शख्स था जो जैक डेनियल के सागर में गोते लगाता हुआ डार्टबोर्ड पर निशाना साधते हुए इस सब से बेखबर जान पड़ता था. उसे देखकर लोग आहें भरते, “बेचारा संजू.”
मुंबई में आकर इंद्राणी की किस्मत बदल गई. विज्ञापन जगत के बादशाह अलीक पदमसी की पत्नी शैरोन प्रभाकर बताती हैं कि अलीक अपने ग्राहकों से मिलने के लिए अक्सर कोलकाता जाया करते थे, जहां अक्सर इंद्राणी से उनकी भेंट होती थी. वह हर पार्टी में मौजूद होती थी और उसकी फर्म को रिलायंस से एक ठेका मिला था. उसकी शादी फंसी हुई थी और वह कुछ बड़ा करने का सपना देख रही थी.

पदमसी कहते हैं कि उन्होंने ही उस दुबली-पतली विनम्र महिला को मुंबई आने को कहा था. जब वह 2001 में मुंबई आ गई, तो उसने पदमसी को वहां संपर्क साधने का अपना औजार बनाया. आज विज्ञापन जगत के अधिकतर लोग याद करते हैं कि इंद्राणी से उनकी पहली मुलाकात पदमसी के साथ ही हुई थी, जो उस वक्त अपने करियर के शिखर पर थे. ताज प्रेसिडेंट के द लाइब्रेरी बार में 2002 में सुहेल सेठ की दी हुई एक पार्टी में पदमसी ने उसे अपनी खूबसूरत मेहमान के रूप में मिलवाया था और वहां एक महिला मित्र के साथ मौजूद स्टार टीवी के सीईओ पीटर मुखर्जी उससे इतने प्रभावित हुए कि उसे घर तक छोडऩे की पेशकश कर बैठे.

अगले ही दिन वह पीटर के दफ्तर में काम मांगने पहुंच गई. तीसरे दिन वे दोनों डेट कर रहे थे. चौथे दिन पीटर उसकी बनाई पसंदीदा पूर्वोत्तरी मटन करी पर अपना दिल हार बैठे. अब इंद्राणी की पीठ पर पीटर का मजबूत हाथ था और उसने अपना सारा ध्यान मीडिया पर लगाते हुए टाइक्वस समूह, एचटी मीडिया, परसेप्ट पिकर कंपनी, बिग एफएम, वर्ल्डस्पेस सैटेलाइट रेडियो और फेडएक्स जैसी बड़ी कंपनियों को अपना ग्राहक बनाना शुरू कर दिया. कुछ महीने बाद इंद्राणी पीटर के साथ रहने लगी. तीन महीने बाद दोनों ने पोचकनवाला रोड स्थित पीटर के संगमरमर वाले फर्श के मकान में शादी कर ली जहां उनके पड़ोसियों में गायक दंपती सोनाली और रूप कुमार राठौड़ तथा वरिष्ठ कस्टम अधिकारी नीरजा शाह भी थे.
इस नवयुगल को जल्द ही ऐसी जोड़ी के रूप में जाना जाने लगा जो एक-दूसरे से दूर नहीं रह सकती थी. मशहूर किस्सा है कि दोनों को इश्क में पड़े हुए अभी कुछ हफ्ते ही बीते थे कि सोशलाइट फरजाना कॉन्ट्रैक्टर के मालाबार हिल स्थित मकान पर 2002 में एक डिनर के दौरान दोनों ने मेज के नीचे एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया और एक ने दाएं तो दूसरे ने बाएं हाथ से खाना खाया. स्टार टीवी के सीईओ की इस बचकानी हरकत पर उनके दोस्त खूब हंसे थे. एक और मशहूर किस्सा यह है कि इंद्राणी ने मुंबई के अपने शुरुआती दिनों में एक पार्टी के दौरान अभिनेत्री सिमी ग्रेवाल पर कुछ भद्दी फब्तियां कसी थीं. एक और दोस्त जिसने एक बार एक सीईओ को उसे सलाह देते देखा था कि उसे अपना वाइन का गिलास कैसे थामना चाहिए, कहते हैं कि अपने व्यवहार के चलते उसने जल्द ही कई खामोश दुश्मन कमा लिए थे.

मुंबई में पहली बार इंद्राणी की कल्पनाओं को पर लगे. उसने अपनी पिछली जिंदगी की एक बिल्कुल नई कहानी गढ़ ली, जिसकी पुष्टि वरिष्ठ पत्रकार वीर सांघवी ने की है जिनके साथ उसने आइएनएक्स मीडिया के समाचार चैनल न्यूज एक्स की योजना बनाने के दौरान कुछ समय तक काम किया था. इंद्राणी ने अपने नए दोस्तों को बताया था कि उसके पिता बचपन में ही गुजर गए थे और उसकी मां ने उसके चाचा से शादी कर ली थी. इंद्राणी के मुताबिक, उसके सौतेले पिता ने उसका यौन शोषण किया था जिस वजह से वह बचपन में ही भागकर कोलकाता चली आई थी. उसका यह भी दावा था कि उसके पूर्व पति संजीव खन्ना का व्यवहार पाश्विक था और वे गाली-गलौज करते थे, जिसके चलते वह अपनी बेटी विधि को लेकर मुंबई चली आई जिसे बाद में पीटर ने गोद ले लिया.

मुखर्जी दंपती के लिए मुंबई के पैसे वाले तबके ने अपने दरवाजे खोल दिए तो इसलिए क्योंकि वे पीटर को जानते थे, उनकी पत्नी को नहीं, जिसके बारे में टीवी जगत से जुड़ी रवीना राज कोहली कहती हैं कि “अक्सर शराब के दौर में हम उसके बारे में बातें किया करते थे.” इंद्राणी अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए काफी कुशलता से आगे बढ़ रही थी. उद्योग के एक बड़ी शख्सियत की पत्नी कहती हैं, “वह बहुत अच्छी थी, इतनी अच्छी कि थोड़ी देर बाद आपको उस पर विश्वास ही नहीं हो पाता. वह बात करते वक्त सामने वाले की आंखों में सीधा देखती थी, अपनी भौंहें मटकाते हुए आपको “वेब” कहती. कोई भी इतना भला तो नहीं होता.” सोशलाइट और पूर्व मिस इंडिया क्वीनी सिंह कहती हैं, “वह मुंबई के अभिजात्य समाज का हिस्सा कभी नहीं थी. वह  बाहरी थी. मुंबई का समाज उसे स्वीकार नहीं करता, इसलिए वह पूरी सोची-समझी रणनीति के साथ लोगों को अपना बनाने में जुटी थी.”

ऐसी कई टिप्पणियां, जिनमें “आकर्षक आंखों” वाली बात भी शामिल है, जो लोगों को इंद्राणी में कभी दिखाई देती थी, उससे लोग आज सिर्फ इसलिए कट रहे हैं, क्योंकि इंद्राणी पर हत्या का आरोप लग चुका है. इंद्राणी और पीटर, दो जिस्म एक जान थे और इंद्राणी ने शहर में बहुत कामयाबी हासिल की&पीटर गोल्फ खेलते थे और कारों के शौकीन थे, तो इंद्राणी शीर्ष सीईओ के साथ संवाद करती और अपनी पसंदीदा मटन करी पकाती थी. टाइम्स समूह के पूर्व सीईओ प्रदीप गुहा, जिन्होंने पेज3 की अवधारणा को जन्म दिया, कहते हैं, “मुंबई का समाज कामयाबी के आगे नतमस्तक होता है. सफलता के आगे सब भुला दिया जाता है. आपको वह पसंद हो या नहीं, लेकिन वह कामयाब तो थी.”

इंद्राणी की नई शादी की खबर जब 2002 में गुवाहाटी तक पहुंची तो उसके माता-पिता ने तकरीबन एक दशक में उसे पहली बार चिट्ठी लिखी. उन्होंने उसे बताया कि उन्हें पैसों की दिक्कत है और वे बच्चों का ख्याल अब नहीं रख सकते. उन्होंने इंद्राणी से हर महीने कुछ पैसे भेजने का आग्रह किया. इंद्राणी को डर था कि इस पत्र से कहीं उसका अतीत पीटर के सामने खुल न जाए, फिर भी उसने उनकी मदद करने का फैसला किया.

असम में बोरा परिवार के पड़ोसी बताते हैं कि रातोरात उस घर की रंगत ही बदल गई. आंतरिक साज-सज्जा करने वालों को बुलवाया गया, दो नई कारें खरीद ली गईं. इंद्राणी 2006 में गुवाहाटी गई और शीना को अपनी सौतेली बहन बनाकर मुंबई ले आई. मुखर्जी परिवार ने उसका दाखिला सेंट जेवियर कॉलेज में करवा दिया और शीना की दोस्ती विधि के साथ हो गई. अक्सर सामाजिक आयोजनों में उसे मुखर्जी परिवार के साथ देखा जाने लगा. मिखाइल को आगे की पढ़ाई के लिए पुणे भेज दिया गया. पीटर की पहली पत्नी शबनम आनंद से हुआ बड़ा बेटा राहुल कभी भी इंद्राणी से अच्छे रिश्ते नहीं बना सका लेकिन शीना के साथ उसकी दोस्ती तुरंत हो गई. बाद में दोनों डेट करने लगे&यह एक अजीबोगरीब रिश्ता था जिसने मुखर्जी परिवार में काफी तनाव पैदा कर दिया.

इस जटिल पारिवारिक जाल के बीच ही पीटर और इंद्राणी ने 2007 में आइएनएक्स मीडिया की शुरुआत करने का फैसला किया जिसमें सांघवी को न्यूज एक्स का विश्वसनीय चेहरा बनाकर उतारा गया तो 9एक्स के प्रोग्रामिंग हेड का कार्यभार खुद इंद्राणी ने संभाला. इस पद पर दिलीप घोष हुआ करते थे जिन्हें चैनल लॉन्च होने से कुछ महीने पहले हटा दिया गया था.
कौन बनेगा करोड़पति जैसे कार्यक्रमों से भारतीय टीवी की दुनिया बदल देने वाले पीटर को 2006 में दरकिनार कर दिया गया था जब स्टार को जी ने खरीद लिया था. वे उसके बाद उससे अलग हो गए.

 अंदर के लोग बताते हैं कि आइएनएक्स के निवेशकों में बड़ा अजीब घालमेल था. एक शीर्ष कारोबारी प्रतिष्ठान की अनुषंगी कंपनियों का इसमें निवेश था. इसके अलावा सिंगापुर स्थित टेमासेक होल्डिंग्स का इसमें निवेश था. अमेरिकी कारोबारी रजत गुप्ता से जुड़ी न्यू सिल्क रूट का भी इसमें निवेश था जिन्हें बाद में इनसाइडर ट्रेडिंग का दोषी पाया गया था. इनके अलावा न्यू वर्नान प्राइवेट इम्यूटी और कोटक महिंद्रा कैपिटल की इसमें हिस्सेदारी थी.

चैनल 9एक्स और संगीत चैनल 9एक्सएम के लॉन्च होने के कुछ समय बाद ही इस बात का एहसास हो गया कि अपेक्षा के मुताबिक यह पैसे नहीं बना पाएगा. भारत के टीवी उद्योग में यह दौर विशिष्ट था जिसे 2000 के दशक के डॉटकॉम बुलबुले से खास अलग नहीं कहा जा सकता. पीटर के पुराने सहयोगी समीर नायर स्टार को छोड़कर एनडीटीवी इमेजिन लॉन्च करने चले गए थे और वायाकॉम18 अपने नए उद्यम कलर्स में भारी निवेश कर रहा था. इन तमाम चैनलों को उम्मीद थी कि विज्ञापन और उच्च मूल्यांकन से भारी पैसा आएगा, लेकिन उनकी कल्पना से कहीं आगे बाजार ज्यादा ठहरा हुआ था इसलिए तीनों में सिर्फ कलर्स ही बचा रह सका.

9एक्स की रेटिंग गिर रही थी और न्यूज एक्स अब भी शुरू नहीं किया जा सका था क्योंकि उसके वितरण के बजट पर विवाद हो गया था और फर्जी बिल तथा हवाला सौदों के माध्यम से पैसे के हेरफेर के आरोप सतह पर आ चुके थे. सरकार ने 2008 में जांच का आदेश दिया लेकिन यह जांच वास्तव में कभी शुरू नहीं हो पाई. आंकड़ों के हिसाब से देखें तो अंदर बैठे लोगों के मुताबिक, 9एक्स का प्रोग्रामिंग बजट सालाना 350 करोड़ के आसपास था, वितरण बजट 150 करोड़ रु. था और विपणन बजट 100 करोड़ रु. था. आइएनएक्स मीडिया के 2009 में इंडी मीडिया के हाथों बिकने के बाद कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के अधीन सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस (एसएफआइओ) द्वारा 2013 में की गई एक जांच में सामने आया था कि उस वक्त “फर्जी सौदे” से 168.5 करोड़ रु. बनाए गए थे. यह आरोप है कि अधिकतर पैसा पीटर और इंद्राणी को गया, उन्हें टीवी जगत का “बंटी और बबली” तक करार दिया गया, लेकिन अब तक कोई सीधा सबूत नहीं है कि इस फर्जीवाड़े का लाभ उन्हीं को मिला है. इस बात के भी सबूत नहीं हैं कि उन्होंने इन सौदों से कोई रकम विदेशी खातों में भेजी हो.

इंद्राणी की कहानीआइएनएक्स के साथ अपना रिश्ता खत्म हो जाने के बाद मुखर्जी दंपती मुंबई के धनाढ्य तबके में हाशिए पर चले गए और बाद में विदेश में जाकर बस गए. वे ब्रिस्टल चले गए जहां विधि पढ़ रही थी और कभी-कभार ही वर्ली स्थित अपने मकान में कुछ हफ्तों के लिए आते थे. इस दौरान शीना ने 2011 में रिलायंस एडीएजी की इकाई मुंबई मेट्रो वन में सहायक प्रबंधक की नौकरी कर ली, जिसके एक साल बाद उसकी कथित हत्या हो गई.

अब तक चली आ रही इंद्राणी की शानदार दास्तान में इस साल की शुरुआत में एक काला अध्याय अचानक आया जब मुंबई पुलिस को मेरठ से एक अज्ञात शख्स ने फोन किया कि शीना, जिसके बारे में इंद्राणी का कहना था कि अमेरिका चली गई है, वह तीन साल से लापता है. इस शख्स की पहचान अब तक नहीं हो सकी है. इस सुराग पर मारिया ने जांच शुरू की और इंद्राणी के ड्राइवर श्याम राय को 21 अगस्त को कथित रूप से आक्वर्स ऐक्ट के तहत गिरफ्तार कर लिया जिससे हुई पूछताछ ने परदे के पीछे की कहानी को सामने ला दिया. इसके बाद इंद्राणी की गिरफ्तारी हुई और बाद में उसके पूर्व पति खन्ना को गिरफ्तार किया गया, जो अचानक इंद्राणी की जिंदगी में दोबारा शायद आखिरी दांव आजमाने के लिए दस्तक दे चुका था.
मामला हर दिन नया मोड़ ले रहा है. कौन किसकी बेटी है और किसका किससे रिश्ता है, इन तमाम सवालों से इतर कहीं ज्यादा अहम मसले और हैं जिन्हें बताया जाना बाकी है, मसलन, हत्या का उद्देश्य क्या था, हत्या कैसे की गई और खुद हत्या की गुत्थी.

अभियोजन पक्ष का सारा दारोमदार पुलिस के फॉरेन्सिक साक्ष्यों पर टिका हुआ है और उस लाश की डीएनए परीक्षण रिपोर्ट पर बहुत कुछ निर्भर करता है जिसे रायगढ़ से खोदकर निकाला गया है. फिलहाल स्थिति यह है कि मृतक की पहचान भी नहीं हो सकी है. यह मानकर चलते हैं कि खन्ना और राय के सामने बैठाए जाने पर भी इंद्राणी अपने बचाव में अगर इस बात पर कायम रही कि शीना अमेरिका में है, तो उसकी मौत को स्थापित करना पहला अहम कदम होगा. डीएनए रिपोर्ट से इस बात की पुष्टि हो जाएगी कि इंद्राणी वास्तव में शीना की मां है या नहीं. लाश को दफनाए जाने के तीन साल बाद किया गया डीएनए परीक्षण कितना साफ आता है और पोस्ट-मॉर्टम कैसा रहता है, उस पर निर्भर करेगा कि हत्या कैसे की गई थी.
दूसरा अहम साक्ष्य वह कंप्यूटर होगा जिससे शीना का इस्तीफा उसकी हत्या के बाद कथित तौर पर भेजा गया था. शीना का सेलफोन भी अहम सबूत होगा जिससे 11 संदेश राहुल को यह कहते हुए भेजे गए कि वह उसे नहीं खोजेगा. कथित हत्या के एक दिन पहले खन्ना और इंद्राणी के बीच 11 बार फोन पर हुई बात के कॉल रिकॉर्ड और शीना की हत्या के बाद फोन के टॉवर की सूचना जो इनके रायगढ़ में उस वक्त होने को साबित कर सके, यह भी अभियोग के लिए अहम है. इसी तरह शीना का पासपोर्ट भी एक अहम सबूत है जो देहरादून में राहुल के मकान से बरामद किया गया है और इस बात की गवाही देता है कि वह विदेश में नहीं है.

तीसरा बिंदु गवाहों के बयान होंगे. मुख्य गवाहों में एक राहुल है जिसने खार थाने में गुमशुदगी की रपट दर्ज कराने की कोशिश की थी. दूसरा गवाह ड्राइवर है जो उम्मीद है कि सरकारी गवाह बन जाएगा. तीसरा गवाह पीटर हैं जिन्हें हत्या की साजिश से खुद को बेदाग साबित करने की जरूरत होगी. चौथा गवाह मिखाइल है जिसका दावा है कि उसे भी मारने की एक साजिश रची गई थी. पुलिस पूरी कहानी में खाली स्थानों को किसी भी व्यक्ति या चीज की गवाही से भरने की कोशिश कर रही है ताकि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को पुष्ट किया जा सके. हत्या में इस्तेमाल किए गए उपकरण को बेचने वाले दुकान के कर्मचारियों से लेकर पोस्ट मॉर्टम करने वाले डॉक्टर तक, वर्ली के होटल हिलटॉप के वे सीसीटीवी फुटेज जो दिखा सकें कि इंद्राणी और खन्ना मिलकर साजिश को अंजाम दे रहे थे और 2012 में रायगढ़ से अज्ञात लाश की बरामदगी के बाद एफआइआर दर्ज न करने वाले पुलिसवालों तक&अभी कहानी में कई पेच हैं.

कहानी चाहे जिस ओर करवट ले, पुलिस सूत्र बताते हैं कि इंद्राणी दूसरे आरोपियों से बिल्कुल अलग किस्म की है. सांताक्रूज के महिला लॉकअप में कैद इंद्राणी की आंखों में जबरदस्त आत्मविश्वास है. पुलिस की जांच के दौरान एक मिनट भी उसने अपनी पलकें नहीं झपकाई हैं. वह बहुत कठोर है और उसकी जिद है कि वह अपने वकीलों के सामने ही बयान देगी. वह तब तक कहती रही कि शीना उसकी बहन थी जब तक कि खन्ना को पुलिस ने उसके सामने लाकर खड़ा नहीं कर दिया. उस वक्त उसने एक पल को अपनी नजर झपकाई और दोबारा उसी आत्मविश्वास में लौट आई.

इस केस पर काम कर रहे एक आला पुलिस अधिकारी कहते हैं, “उसे मुगालता था कि उसने पूरी सफाई से जुर्म किया है लेकिन अपने धंधे में हम जानते हैं कि ऐसा कोई जुर्म होता ही नहीं है.” एक अन्य उच्च पदस्थ पुलिस सूत्र का हत्या के कारण के बारे में कहना था, “पैसे के अलावा और क्या हो सकता है.” कितना पैसा? “इतना ही पैसा जिससे इस हत्या में शामिल लोगों को हत्या करने के लिए राजी किया जा सकता रहा हो, बस इतना ही!”

हकीकत, फसाने और थ्योरी के बीच की खाई को अब भी पाटा जाना बाकी है जबकि ऐसा लग रहा है कि पुलिस और मीडिया का एक तबका खुद ही नतीजे गढऩे और गवाहों को खोजने में एक-दूसरे से होड़ किए जा रहा है. मसलन, पुलिस से पहले प्रेस ने ही मिखाइल को गुवाहाटी में और सिद्धार्थ दास को कोलकाता में खोज निकाला. दूसरी ओर पुलिस खार में आरोपियों से पूछताछ करने के लिए कैमरों के सामने तकरीबन रोजाना उनसे खुलेआम कदमताल करवा रही है. इस सबके बीच राकेश मारिया क्रॉफर्ड मार्केट स्थित पुलिस मुख्यालय से एक सफेद एसयूवी में अचानक नाटकीय तरीके से थाने में गुम हो जाते हैं.

इस तमाशे के बीच इंद्राणी चुपचाप बैठी हुई है और उसके सिर पर तलवार लटक रही है. अंत में सवाल बस यही रह जाता है कि क्या इंद्राणी ने अपने बच्चे की हत्या की है या फिर उसने कुछ ज्यादा ही महत्वाकांक्षा पाल ली थी. क्या इंद्राणी की इस दास्तान में हम उस महत्वांकाक्षी राष्ट्र का अक्स देख सकते हैं जो पैसे और ताकत की प्यास बुझाने के लिए कामयाबी की अंधेरी गलियों के पीछे पगलाया हुआ है? इंद्राणी की ही बात पर खत्म करें, तो वह सौ के बीच इकलौती भेड़ होना चाहती थी जो दूसरी ओर देख रही थी. कहीं यह भ्रम तो नहीं था? क्या वह भेड़ों के बीच हमेशा एक भेडिय़ा थी?

(साथ में कौशिक डेका गुवाहाटी से, दमयंती दत्ता कोलकाता से और गायत्री जयरामन मुंबई से)

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