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‘‘40 साल का कोई आदमी कांग्रेस अध्यक्ष क्यों नहीं हो सकता?’’

पूर्व केंद्रीय वित्त और गृह मंत्री तथा कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य पी. चिदंबरम पार्टी के प्रमुख नीति निर्माताओं में शामिल हैं. कार्यकारी संपादक कौशिक डेका के साथ खास बातचीत में इस वरिष्ठ नेता ने समझाया कि युवा नेताओं का विकास करना क्यों पार्टी की जरूरत है

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 पी. चिदंबरम पी. चिदंबरम

बातचीतः पी. चिदंबरम

प्र. कांग्रेस के सामने अस्तित्व का संकट क्यों है? 

कांग्रेस स्वाभाविक शासनकर्ता दल है. हम सरकार चलाना जानते हैं. लेकिन जब हम सरकार चलाते हैं तो हम पार्टी चलाने में असफल हो जाते हैं. अधिकांश वरिष्ठ नेताओं को सरकार में शामिल कर लिया जाता है और उन्हें पार्टी के काम के लिए मुक्त नहीं किया जाता. जब नरसिंह राव और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे, तब हमने पार्टी संगठन पर ध्यान नहीं दिया. पार्टी के काम पर ध्यान न देने से जब हम विपक्ष में हैं, तो संगठन ने जिम्मेदारियों को नहीं संभाला या वह पार्टी के संदेश और नैरेटिव को आगे नहीं बढ़ा सका. 

 अब जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में पार्टी लगभग नगण्य है और तमिलनाडु तथा महाराष्ट्र की सत्ता में कनिष्ठ सहयोगी है, इसके पुनरुद्धार के लिए आप कैसी योजना बना रहे हैं? इन राज्यों में करीब 300 सीटें हैं.

उत्तर प्रदेश, बिहार तथा  पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में कांग्रेस का पराभव नरसिंह राव के कार्यकाल से भी पहले की बात है. इन राज्यों में गिरावट की वजह बहुत अलग है. वर्तमान हालात में मैं राज्यों को तीन श्रेणियों में बांटूंगा—वे राज्य जहां कांग्रेस, भाजपा का मुख्य विपक्ष है, वे राज्य जहां कोई दूसरी पार्टी भाजपा का प्रमुख विपक्ष है और कांग्रेस उसकी सहयोगी है, और अंत में वे राज्य जहां कोई दूसरी पार्टी भाजपा का प्रमुख विपक्ष है और कांग्रेस का उसके साथ गठबंधन नहीं है. 

मुख्य चुनौती पहली और तीसरी श्रेणी के राज्यों में है. हमें राज्यों की इन तीनों श्रेणियों के लिए अलग-अलग रणनीतियां बनानी होंगी. श्रेणी एक के राज्यों में मैं कांग्रेस को खारिज नहीं करूंगा. उदाहरण के लिए राजस्थान में हमने विधानसभा चुनाव जीता लेकिन लोकसभा चुनाव में हर सीट हार गए. मप्र में भी हमने राज्य का चुनाव जीता लेकिन संसदीय चुनावों में एक को छोड़कर सभी सीट हार गए.

इसका मतलब यह नहीं है कि हम इन राज्यों में दोबारा विधानसभा चुनाव नहीं जीत सकते. हमें हर राज्य के लिए अलग-अलग और स्पष्ट रूप से परिभाषित रणनीतियों की आवश्यकता है. हम किसी एक अखिल भारतीय रणनीति पर काम नहीं कर सकते क्योंकि पिछले 30-40 वर्षों में राज्यों में भारतीय राजनीति अलग किस्म की हो गई है. 

 क्या मतदाताओं ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा के सामने राहुल गांधी को कांग्रेस के प्रतीक के रूप में खारिज कर दिया है?

मैं इस प्रतीक चिन्ह वाले सिद्धांत को स्वीकार नहीं करता. सेनापति अहम होते हैं, पर युद्ध जीतना उनका काम नहीं, सैनिकों का होता है. 2019 में हमने केरल, तमिलनाडु और पंजाब में लोकसभा की जितनी सीटों पर चुनाव लड़ा, व्यावहारिक रूप से सभी पर जीत हासिल की. तब भी पार्टी के प्रतीक चिन्ह राहुल गांधी थे.

 क्या उत्तर के राज्यों में, जहां भाजपा बहुत मजबूत है, कांग्रेस अपना आख्यान सामने रखने में नाकाम रही है?

जब विपक्ष का आख्यान अर्थव्यवस्था, सामाजिक न्याय, विकास, विदेश नीति, आंतरिक सुरक्षा और रक्षा आदि पर मुख्यधारा की नीतियों पर केंद्रित था, तब कांग्रेस का आख्यान चुनाव लड़ने और जीतने के लिए लिहाज से काफी अच्छा था. लेकिन हमारा आख्यान इतना धारदार नहीं रहा है कि वह मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा के बेहद ध्रुवीकृत आख्यान का मुकाबला कर सके.

 क्या कांग्रेस में नेताओं की कमी है, खासकर राज्यों में?

मैं हर राज्य की स्थिति से परिचित नहीं हूं. लेकिन मैं कन्हैया कुमार, जिग्नेश मेवाणी और हार्दिक पटेल जैसे युवा नेताओं को उभरते हुए देख सकता हूं.

 वे सभी बाहर से आए हैं; अन्य युवा नेताओं जैसे ज्योतिरादित्य सिंधिया, आर.पी.एन. सिंह और जितिन प्रसाद ने पार्टी छोड़ दी है. ये सभी नेता हिंदी भाषी क्षेत्रों से हैं.

वे सुविधा से जीने के अभ्यस्त हैं. वे सत्ताधारी पार्टी की शक्ति और उसके प्रभाव के सुविधा-क्षेत्र के बाहर नहीं रह सकते. 

 हाल ही में आपने कहा था कि वरिष्ठ नेताओं को सेवानिवृत्त हो जाना चाहिए.

बिल्कुल. जब मैं युवा था, मुझे लगा कि मैं पार्टी की जिम्मेदारियां लेने के लिए फिट हूं और मैंने जिम्मेदारियां लीं. अब 30-40 साल बाद, मैं यह क्यों मानूं कि 30-40 वर्ष आयु के पुरुष और महिलाएं पार्टी की जिम्मेदारियों को स्वीकार करने और उनका निर्वहन करने के योग्य नहीं हैं? जवाहरलाल नेहरू 40 वर्ष की आयु में कांग्रेस अध्यक्ष बने थे. ब्लॉक, जिला और राज्य स्तर पर पार्टी के सभी पदों पर 50 वर्ष से कम आयु के लोगों को होना चाहिए.

 क्या गांधी परिवार को दूसरे नेताओं के लिए जगह बनानी चाहिए?

उन्होंने अन्य नेताओं को बहुत जगह दी है; वे सभी पदों पर काबिज नहीं हैं.

 लेकिन सारे फैसले वे ही ले रहे हैं.
 
यह बात सही नहीं है—राज्य स्तर के 95 प्रतिशत निर्णय स्थानीय नेता लेते हैं.

 शीर्ष कांग्रेस नेतृत्व की धीमी निर्णय प्रक्रिया की भारी आलोचना हो रही है.

भाजपा में सभी निर्णय एक व्यक्ति या उसके चुने हुए प्रतिनिधि की ओर से लिए जाते हैं. कांग्रेस में अध्यक्ष हालांकि सैद्धांतिक रूप से कोई भी निर्णय लेने का अधिकारी है, लेकिन वे (सोनिया गांधी) व्यापक परामर्श और आम सहमति से निर्णय लेने में विश्वास करती हैं.

 प्रशांत किशोर के साथ बातचीत क्यों टूट गई? क्या वे कोई खास पद चाहते थे?

जिन तीन दिनों में मैंने उनसे बातचीत की थी, उन्होंने कोई पद नहीं मांगा था. मैं उनके आंकड़ों और तार्किक विश्लेषण से प्रभावित हुआ जिससे कुछ निष्कर्ष निकले. एक बार निष्कर्ष पर पहुंचने के बाद, सवाल यह है कि हम उन कदमों को कैसे लागू करते हैं. इस संबंध में अधिकार-संपन्न कार्य समूह बनाने का सुझाव देते हुए हमने उन्हें स्पष्ट रूप से परिभाषित जिम्मेदारियों के साथ उस समूह का सदस्य बनने के लिए आमंत्रित किया. उन्होंने साफ मना कर दिया.

 अखिल भारतीय उपस्थिति के साथ, कांग्रेस को विपक्षी एकता की धुरी होना चाहिए. बजाए इसके, ममता बनर्जी, केसीआर और अरविंद केजरीवाल नई कांग्रेस बनने की कोशिश में हैं.

वे कितने भी महत्वाकांक्षी हों, पर वे कांग्रेस को कभी भी पछाड़ नहीं सकते. इनमें से हरेक एक राज्य तक सीमित है. अकेले दम पर ये पार्टियां अधिकतम 48 सीटें जीत सकती हैं. ठ्ठ

''हमें हर राज्य के लिए अलग और परिभाषित रणनीतियों की आवश्यकता है न कि किसी एक अखिल भारतीय रणनीति की क्योंकि पिछले 30-40 वर्षों में राज्यों की राजनीति बहुत अलग हो गई है".

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