scorecardresearch
 
डाउनलोड करें इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन का लेटेस्ट इशू सिर्फ 25/- रुपये में

बातचीतः सत्य आयोग बनाओ, मैं दोषी निकलूं तो मुझे फांसी पर चढ़ा दो- फारुख अब्दुल्ला

विवेक अग्निहोत्री की फिल्म कश्मीर फाइल्स  जम्मू और कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. फारूक अब्दुल्ला का नाम लिए बगैर उनकी छवि प्रभावित करती है. इससे बेहद आहत और नाराज अब्दुल्ला ने घाटी से कश्मीरी पंडितों के पलायन और समुदाय की समस्याओं के स्थायी समाधान के बारे में ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर (पब्लिशिंग) राज चेंगप्पा के साथ बातचीत की. बातचीत के प्रमुख अंश:

X
पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. फारूक अब्दुल्ला पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. फारूक अब्दुल्ला

विवेक अग्निहोत्री की फिल्म कश्मीर फाइल्स जम्मू और कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. फारूक अब्दुल्ला का नाम लिए बगैर उनकी छवि प्रभावित करती है. इससे बेहद आहत और नाराज अब्दुल्ला ने घाटी से कश्मीरी पंडितों के पलायन और समुदाय की समस्याओं के स्थायी समाधान के बारे में ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर (पब्लिशिंग) राज चेंगप्पा के साथ बातचीत की. बातचीत के प्रमुख अंश:

प्र. कश्मीर फाइल्स फिल्म और उसके असर के बारे में आप क्या सोचते हैं?

यह प्रोपेगेंडा मूवी है. इसने 1990 की त्रासदी को उधेड़ दिया. उस त्रासदी को, जिसने राज्य के हर शख्स को प्रभावित किया, न केवल घाटी छोड़कर चले गए हिंदू भाइयों को, बल्कि मुस्लिम बहुसंख्यकों को भी. यह दुखद स्थिति थी जो नस्ली सफाये में दिलचस्पी रखने वाले कुछ तत्वों की वजह से पैदा हुई थी.

बेशक उन्हें बेनकाब करने की जरूरत है. मगर क्या मुसलमानों के खिलाफ देश में इतना प्रचार करना जरूरी है? जम्मू और कश्मीर के मुसलमानों को छोड़ दीजिए, भारत के बाकी मुसलमान भी वह दंश झेल रहे हैं जिससे उनका कुछ लेना-देना नहीं था. यह प्रोपेगेंडा मुल्क को बर्बादी की तरफ ले जाएगा क्योंकि 80 फीसद आबादी और 20 फीसद आबादी के बीच नफरत विनाशकारी होगी.

 तत्कालीन मुख्यमंत्री होने के नाते कोई कार्रवाई नहीं करने और दरअसल ढिलाई बरतने और हालात को हाथ से निकल जाने देने के लिए फिल्म कुछ हद तक आपको दोषी ठहराती लगती है...

मैं नहीं समझता कि यह सच है. लोग आपको तरह-तरह की कहानियां सुनाएंगे, पर सच्चाई जानने के लिए, जो बहुत कड़वी होगी, आपको एक ईमानदार, इज्जतदार सेवानिवृत्त जज की और एक सत्य आयोग बनाने की जरूरत है. तभी लोगों को पता चलेगा कि कौन जिम्मेदार है. अगर अब्दुल्ला जिम्मेदार है तो वह देश में कहीं भी फांसी पर चढ़ने के लिए तैयार है.

मैं उस जांच से गुजरने को तैयार हूं, पर उन लोगों को दोष न दें जो जिम्मेदार नहीं हैं. मैं चाहता हूं कि आयोग घाटी में सिखों और मुसलमानों की हत्याओं और कुपवाड़ा में कश्मीरी महिलाओं के साथ बलात्कार की ईमानदारी से जांच करे. वक्त आ गया है कि देश सच्चाई सुने और उसके साथ जिए.

 तो कौन दोषी है?

रुबैया सईद के अपहरण (दिसंबर 1989 में) को लीजिए. मैं तब मुख्यमंत्री था और भारत सरकार की अगुआई भाजपा के समर्थन से वी.पी. सिंह कर रहे थे. उनकी रिहाई के एवज में वे उन पांच लोगों को छोड़ देना चाहते थे जिन्हें हमने पकड़ा था, मगर मैंने उन्हें रिहा करने से इनकार कर दिया. मैंने उनसे कहा कि हमें उन दहशतगर्दों के आगे घुटने नहीं टेकने चाहिए जो मानते हैं कि अगर रूसियों को अफगानिस्तान से बाहर निकाला जा सकता है तो वे भारत को कश्मीर से निकालकर बाहर फेंक सकते हैं.

मैंने उनसे कहा कि ऐसा न करें क्योंकि यह देश के लिए भयावह त्रासदी होगी और भविष्य में हमें भारी कीमत चुकानी होगी. उन्होंने नहीं सुना, इस हद तक कि मुझसे कहा गया कि अगर मैंने यह नहीं किया तो मुझे बर्खास्त कर दिया जाएगा. मैंने उनसे कहा कि मुझे लिखकर दो कि उनके मंत्रिमंडल ने इसके लिए कहा है क्योंकि अब जो होगा, वह भारत के ताबूत में आखिरी कील होगी और तुम इसके लिए जिम्मेदारी होगे. 

 तब  फिर वह घाटी में निर्णायक मोड़ था?

दूसरा (निर्णायक मोड़) उसके बाद जल्द जनवरी 1990 में राज्यपाल (जगमोहन) की नियुक्ति थी. मैंने केंद्र सरकार के अनेक बड़े नेताओं से कहा कि उन्हें मत भेजिए क्योंकि उनकी मानसिकता बंटवारे की थी और यह जख्मों को भरने की मानसिकता नहीं हो सकती थी. मैंने उनसे यह भी कहा कि वे पाकिस्तान के साथ जंग लड़ रहे हैं और बीच में अवरोध के तौर पर मैं था, लेकिन अगर यह बीच का (अवरोध) चला जाता है तो वे पाकिस्तान से सीधे लड़ रहे होंगे.

मैंने कहा कि हम जीतेंगे पर उसके लिए मुझे उनकी मदद की जरूरत है. और अगर उन्होंने उन्हें नियुक्त किया तो मैं छोड़कर चला जाऊंगा. जब उन्होंने जगमोहन की नियुक्ति की तो मैंने इस्तीफा दिया और चला गया. राज्यपाल शासन के पहले ही दिन डाउनटाउन श्रीनगर में 30 लोग मार दिए गए. फिर पंडितों को बसों में भर-भरकर घाटी से निकाल दिया गया, राज्यपाल के (आदेश पर), जिन्होंने उनसे कहा कि वे ताकत के बल पर इन उपद्रवियों को खत्म कर देंगे.

मगर फिर वे बदले की कार्रवाई कर सकते हैं, इसलिए बेहतर है कि पंडित यहां से चले जाएं और सब कुछ ठीक-ठाक होने पर वे उन्हें वापस ले आएंगे. 32 साल हो चुके हैं. क्या पंडित लौटे? अब वे कह रहे हैं कि फारूक अब्दुल्ला जिम्मेदार है. फारूक अब्दुल्ला था कहां? दिल्ली में तुम्हारी सरकार थी और यहां तुम्हारा राज्यपाल था.

 कश्मीरी पंडितों के खिलाफ हमलों में जेकेएलएफ की कथित भागीदारी के बावजूद आपकी राय में यासीन मलिक और बिट्टा कराटे पर अभी तक मुकदमा क्यों नहीं चला?

बिट्टा कराटे को क्या नेशनल कॉन्फ्रेंस ने रिहा किया या भारत सरकार ने किया? और उन्होंने उसे किस आधार पर रिहा किया? फिर जब आइसी 814 अपहरण करके कंधार ले जाया गया (दिसंबर 1999 में), तो यात्रियों को रिहा करवाने की खातिर मौलाना मसूद अजहर (जैश-ए-मोहम्मद के सरगना) और दो अन्य को कौन लेकर गया? मैंने उनसे कहा कि वे उनके खेल के आगे हथियार डाल रहे हैं. मैंने उनसे गुजारिश की कि ऐसा न करें और कहा कि यह देश के लिए बड़ा खतरा और त्रासदी होगी, पर उन्होंने नहीं सुना.

 कई लोगों का कहना है कि 1987 के राजीव गांधी-फारूक अब्दुल्ला समझौते के बाद घाटी में करवाए गए चुनाव में फर्जीवाड़ा हुआ, जिसके नतीजतन कई कश्मीरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भरोसा खो बैठे और उग्रवाद से जुड़ गए...

अगर वे कहते हैं कि 1987 के चुनाव में फर्जीवाड़ा हुआ, तो मैं इस देश से पूछता हूं कि ये आरोप लगाने वाले लोग इसके विरोध में चुनाव आयोग या सुप्रीम कोर्ट में क्यों नहीं गए. क्या अदालत ने 1975 में चुनावी कदाचार के लिए श्रीमती इंदिरा गांधी को सत्ता से बाहर नहीं कर दिया था? तीन या चार सीट पर कुछ गड़बड़ियां हुई हो सकती हैं, जैसे भारत में दूसरी जगहों पर होती हैं, पर उन्हें चुनौती दी जा सकती थी.

 2008 से 2014 के बीच सत्ता में होने पर आपकी पार्टी ने कश्मीरी पंडितों के लिए क्या किया?

मनमोहन सिंह जी की बदौलत जो उस वक्त प्रधानमंत्री थे, हमारी सरकार कश्मीरी पंडितों को 3,000 से ज्यादा नौकरियां दे सकी जो उनके लिए बनाई गई थीं. हमने ट्रांजिट अकॉमोडेशन बनाकर उनके परिवारों को घाटी में वापस लाने के बारे में सोचा, ताकि वापसी की प्रक्रिया शुरू की जा सके.

दूसरी चीज हमने यह की कि उनका वजीफा, उनका राशन बढ़ाया और जहां भी वे थे, उन्हें हर तरह से राहत पहुंचाई. क्या मोदी सरकार ने सत्ता में रहते हुए इन तकरीबन आठ सालों में अब तक इनमें से कुछ भी किया है? मैं यह स्वीकार करने वाला पहला शख्स होऊंगा कि हमने सब कुछ नहीं किया. यह परेशानी इससे कहीं ज्यादा बड़ी है. मगर हमने हालात को इससे बदतर तो नहीं बनाया.

 मोदी सरकार यह दलील दे सकती है कि उसने अनुच्छेद 370 खत्म करके घाटी को पंडितों की वापसी के लिए ज्यादा महफूज बनाया है...

हाल में केमिस्ट (माखन लाल) बिंद्रू की हत्या के नतीजतन वापस आया हरेक हिंदू कर्मचारी रातोरात भागकर जम्मू लौट गया. आर्टिकल 370 के खात्मे से क्या यह हासिल हुआ है? इस फौज के बल पर जो यहां उनके पास है, वे उन्हें भागने से रोक क्यों नहीं पाए? अगर स्थिति सामान्य होती तो क्या वे भागते? और जरा सोचिए, उन्होंने जो बजट पेश किया, हमारे राज्य का बजट, उसमें 80 फीसद सुरक्षा के लिए दिया और 20 फीसद विकास के लिए. 20 फीसद से आप कितने विकास की उम्मीद कर सकते हैं और उन लोगों के लिए जो देश के साथ खड़े हैं?

 आपकी राय में अनुच्छेद 370 खत्म करने का असर क्या रहा है?

उन्होंने कहा कि इन त्रासदियों के पीछे अनुच्छेद 370 है और एक बार यह खत्म हो गया तो आतंकवाद का सफाया हो जाएगा. मैं भारत सरकार से और गृह मंत्री से, जिन्होंने यह ऐलान किया था, पूछना चाहता हूं: क्या उग्रवाद चला गया? क्या अब लोग नहीं मर रहे हैं? क्या कहीं कोई बम नहीं चल रहे हैं?

ये चीजें अब भी हो रही हैं और उग्रवादी केवल पाकिस्तान से ही नहीं आ रहे हैं. वे यहां से, हमारे लोगों (के बीच) से भी हैं. वह क्या है जो उनसे यह सब करवा रहा है? वे इतने अलग-थलग क्यों महसूस क्यों कर रहे हैं कि अपनी जान तक देने पर तुले हैं? वक्त आ गया है कि हमें वजह खोजकर उसका इलाज करना चाहिए, बजाए इसके कि इसे तब तक घिसटने दें, जब तक कि यह इतना खतरनाक बन जाए कि किसी को पता न हो कि अंजाम  होगा.

 प्रधानमंत्री कश्मीरी नेताओं से मिले, जिनमें आप भी थे, क्या उसके बाद चीजें बदली हैं?

मैंने तब प्रधानमंत्री से साफ कहा कि हमें आपके ऊपर भरोसा नहीं है और आपको हमारे ऊपर भरोसा नहीं है, तो आइए वह भरोसा पैदा करने की कोशिश करें जो हमारे देश के भविष्य का निर्माण करेगा. उन्होंने अपने भाषण में हमसे वादा किया कि वे इस 'दिल की दूरी और दिल्ली की दूरी को खत्म करने की कोशिश करेंगे. मगर उस दिशा में कुछ हुआ नहीं. बात विकास की नहीं है.

बात यह नहीं है कि आप सोना भेजते हैं या चांदी. बात यह है कि आप दिलों के जख्म कैसे भरते हैं. सड़कें और पुल बनाकर दिलों के जख्म नहीं भरे जा सकते. उससे भी बढ़कर कुछ है: भरोसा. हमें एक दूसरे में भरोसे का निर्माण करना होगा, ताकि हम लोगों के बीच दुश्मनी पैदा करने के बजाए साथ जी सकें, साथ रह सकें, साथ आगे बढ़ सकें और साथ खुश रह सकें.

 क्या इसमें विधानसभा चुनाव करवाना और राज्य का दर्जा बहाल करना भी शामिल है?

हां. मैं समझता हूं कि यह पहला उदाहरण है, शायद पूरी दुनिया में, जहां जिस राज्य को देश का ताज होना था, उसे दो टुकड़ों में बांट दिया गया. यही नहीं, देखिए कि परिसीमन आयोग ने हमारी सीटें किस तरह बांटी हैं. वे भाजपा की हुकूमत थोपना चाहते हैं.

 क्या आप यह कह रहे हैं कि भाजपा  जेऐंडके में हुकूमत करने के लिए हिंदू मुख्यमंत्री लाना चाहती है?

वे कुछ भी कर सकते हैं. यह प्रयोग भी उन्हें आजमा लेने दीजिए. वे जम्मू-कश्मीर को ऐसे हाथों में धकेल रहे हैं कि भगवान ही मदद करे.

 क्या आप राज्य में हिंदू मुख्यमंत्री स्वीकार करेंगे?

अगर ईमानदार परिसीमन और चुनाव हों, तो मेरे लिए यह मायने नहीं रखता कि कौन मुख्यमंत्री बनता है, क्योंकि उसे लोगों ने चुना होगा. वह उन पर थोपा नहीं गया होगा. हाल में महाराजा गुलाब सिंह की मूर्ति का उद्घाटन करने के लिए केंद्रीय मंत्री कोटवाल कठुआ आए. मैं उनसे पूछना चाहता था कि महाराजा गुलाब सिंह का राज्य कहां है. अगर वह मौजूद नहीं है, तो इस राज्य के प्रवेश बिंदु पर उनकी मूर्ति क्यों लगा रहे हैं? मेहरबानी करके इस राज्य के लोगों और बाकी देश के लोगों के सामने यह स्पष्ट कीजिए.

 आखिर में, आपकी राय में कश्मीरी पंडितों की समस्याओं के अंत के लिए किस किस्म के समाधान की जरूरत है?

आगे का रास्ता यही है कि लोगों के दिल जीतें. एक भी कश्मीरी मुसलमान आपसे यह नहीं कहेगा कि वह कश्मीर में हिदुओं को लौटते देखना नहीं चाहता. मगर  यह फिल्म कश्मीरी पंडितों के वापस लौटने को बढ़ावा देगी? यही मेरा सवाल है उनसे. 

''आगे का रास्ता यही है कि लोगों का दिल जीतें. कोई भी कश्मीरी मुसलमान आपसे यह नहीं कहेगा कि वह हिंदुओं को वापस लौटते नहीं देखना चाहता 

''मैं चाहता हूं कि  सत्य आयोग बने और वह घाटी में सिखों और मुसलमानों की  हत्याओं और कुपवाड़ा में कश्मीरी महिलाओं के साथ हुए बलात्कार की ईमानदारी से जांच करे.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें