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बातचीतः अर्थव्यवस्था एक बड़ी चुनौती से दो-चार है पर उससे निबटने की हमारी तैयारी पूरी है

कोविड की दूसरी लहर के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था भले फिर से गहरे संकट में नजर आ रही हो लेकिन केंद्रीय वित्त मंत्री  निर्मला सीतारमण के आत्मविश्वास को देखकर लगता है कि स्थिति पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में है. ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा बिजनेस टुडे के संपादक राजीव दुबे के साथ एक एक्सक्लूसिव बातचीत में वे अर्थव्यवस्था में नई जान डालने की योजना का खुलासा करती हैं. उसी बातचीत के अंश:

केंद्रीय वित्त मंत्री  निर्मला सीतारमण केंद्रीय वित्त मंत्री  निर्मला सीतारमण

कोविड की दूसरी लहर के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था भले फिर से गहरे संकट में नजर आ रही हो लेकिन केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के आत्मविश्वास को देखकर लगता है कि स्थिति पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में है. ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा बिजनेस टुडे के संपादक राजीव दुबे के साथ एक एक्सक्लूसिव बातचीत में वे अर्थव्यवस्था में नई जान डालने की योजना का खुलासा करती हैं. उसी बातचीत के अंश:

 जीडीपी सहित सभी बड़े आर्थिक सूचकांक गोता लगा रहे हों तो बतौर वित्त मंत्री आपको कैसा लगता है? क्या आंकड़ों को देख आपका दिल नहीं बैठ जाता?

देखिए, मैं इसे बड़ी चुनौती की तरह देखती हूं, जो यह आश्वस्त करने के लिए अच्छी-खासी एकाग्रता की मांग करती है कि हम हर पल ऐसे कदम उठाने के काबिल हैं, जिससे लोगों की मदद हो. मैं यह बिल्कुल नहीं कहना चाहती कि इस तरह के आंकड़े मुझे परेशान नहीं करते, मगर मुझे लोगों की दुख-तकलीफ और अनेक परिवारों पर टूट पड़ी त्रासदियों के बारे में भी सोचना है. तो, यही मेरे दिल पर एक बोझ की तरह है. मुझे इसके साथ कुछ इस ढंग से पेश आना है कि चाहे यह पूरी तरह न मिटाया जा सके पर उसकी ओर कदम बढ़े.

 कोविड की दूसरी लहर को लेकर मोदी सरकार की गफलतों के बारे में काफी आलोचना हुई है.

मैं इसके लिए किसी को दोष नहीं देती. समस्या इतनी भयावह थी, जिस तेजी से दूसरी लहर ने हमला बोला, लोगों को गहरे, त्रासद अनुभव से गुजरना पड़ा, यह स्वाभाविक था कि सरकार पर सवाल उठते. हमें फौरन लोगों की मदद को आगे आना पड़ा और पक्का करना पड़ा कि व्यवस्था सुधरे.

 वित्त वर्ष 21 में चौथी तिमाही में अपेक्षाकृत उत्साहजनक नतीजों के बावजूद देश की जीडीपी कुल मिलाकर 7.3 फीसद तक नीचे गई. दूसरी लहर के वक्त कई राज्यों में लॉकडाउन के अर्थव्यवस्था पर असर के बारे में आपका आकलन क्या है? इस गर्त से निकलने के लिए देश में जरूरी आर्थिक वृद्धि को लेकर आप कितनी आश्वस्त हैं?

एक तो दूसरी लहर के असर का आकलन करना अभी जल्दबाजी होगी. यह पिछली बार से अलग है, इसका प्रबंधन राज्य अलग-अलग तरह के लॉकडाउन के जरिए कर रहे हैं. दूसरी लहर की व्यापकता और प्रचंडता पहली से अलग है. दूसरी बात, हमने आत्मनिर्भर पैकेज के जो ऐलान किए थे और कुछ का तो केंद्रीय बजट से ठीक पहले ही हुआ था, उसके नतीजे दिखे हैं.

बजट ऐसे समय तैयार हुआ था जब हमारे सामने कोविड ग्रस्त अर्थव्यवस्था थी लेकिन हम आसन्न दूसरी लहर से वाकिफ नहीं थे. इसलिए बजट महामारी के नुक्सान की भरपाई के लिए था. बजट में इन्फ्रास्ट्रक्चर के मद में, और उसी तरह स्वास्थ्य इन्फ्रास्ट्रक्चर पर पूंजीगत खर्चों में काफी बढ़ोतरी है.

 आखिर वह कौन-सी बात है जो आपको यकीन दिलाती है कि अर्थव्यवस्था पर कोविड की दूसरी लहर के असर के बावजूद बजट 2021 मकसद पूरा करेगा?

बजट बड़ी शिद्दत से तैयार किया गया है, सभी संबंधित पक्षों से काफी जानकारियां ली गईं और सही प्राथमिकताएं तय की गईं. अगर पूरे साल के संदर्भ में सही अर्थों में अमल हुआ तो बजट कोविड से संबंधित और उससे उपजने वाली अनेक समस्याओं का हल करने में कामयाब रहेगा. इसके अलावा हम राज्यों और उद्योग जगत से सलाह-मशविरे का सिलसिला लगातार बनाए रखेंगे, ताकि जाना जा सके कि कहीं बजट के दायरे में ही मेरे लिए कुछ और करने की दरकार तो नहीं है.

यह स्वीकारना जरूरी है कि पहली तिमाही (वित्त वर्ष 21) में जीडीपी काफी सिकुड़ गई. मुझे बताया गया कि किसी और देश की जीडीपी 23 फीसद तक नहीं सिकुड़ी. लेकिन मैं प्रधानमंत्री की बेहद शुक्रगुजार हूं कि वे सभी संबंधित पक्षों से सलाह-मशविरा करते रहे और हमारे साथ बैठकर समाधान निकालते रहे.

हम पांच अलग-अलग (प्रोत्साहन) पैकेज लेकर आए. चौथी तिमाही में ही हमने नकारात्मक वृद्धि पर काबू पा लिया. सकारात्मक आंकड़ों की ओर बढ़ना संभव नहीं हुआ होता, अगर लोगों ने पैकेजों का लाभ नहीं उठाया होता. सबसे बढ़कर लोगों ने प्रधानमंत्री और मोर्चे पर हर वक्त आगे रहने के उनके तरीके पर भरोसा जताया.

 कोविड के प्रकोप के पहले ही जीडीपी वृद्धि में गिरावट दर्ज हो रही थी. तो, कोविड के अलावा क्या वह व्यवस्थागत या ढांचागत खामी है, जिसे दुरुस्त करना है?

जीडीपी जैसे मामलों पर बात करते समय जरा एक दीर्घकालिक नजरिया अपनाते हैं. आप इस पहलू पर गौर कीजिए कि खासकर 1991 में अर्थव्यवस्था को खोलने के बाद से जीडीपी में कैसे उतार-चढ़ाव आते रहे हैं. और अगर आप 2018 और 2019 में ही देखना चाहते हैं तो यह भी देखिए कि हम अर्थव्यवस्था के 'नाजुक पांच’ वाले क्लब में थे, जो हमें 2014 में विरासत में मिला. इसमें दो राय नहीं कि कुछ हद तक जीडीपी वृद्धि चक्रीय है. वह कभी सिर्फ ऊपर ही ऊपर नहीं चढ़ती रही है. हालांकि मैं तो चाहती थी कि ऐसा ही होता.

 कोविड की लहरों से बड़े पैमाने पर नौकरियां और रोजगार खत्म हुए हैं, कुछ विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस बीच 2 करोड़ से ज्यादा लोग बेरोजगार हो गए. दूसरा बड़ा झटका यह है कि दशकों से गिरते गरीबी के आंकड़े बढऩे लगे हैं और नए गरीब पैदा हो गए हैं. क्या आप उनके लिए कोई प्रोत्साहन या नकद मदद के प्रस्ताव पर सोच रही हैं?

जैसा कि मैंने पहले कहा, बजट दूसरी लहर की जानकारी के बिना, कोविड के बाद के दौर में आर्थिक बहाली के मद्देनजर तैयार किया गया था. हमने इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए बड़े प्रावधान किए, जिसका रोजगार पर फर्क पड़ेगा. फिर स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्च बढ़ाया गया जिसका स्वास्थ्य सूचकांक पर असर पड़ेगा.

किसानों के लिए पीएम किसान सम्मान निधि योजना के लाभ के अलावा हमने इस साल प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण विधि से एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर गेहूं और धान की इतनी खरीद की, जितनी पहले कभी नहीं हुई थी. इसका मतलब है कि पैसा किसानों के हाथ में जा रहा है, जिसका ग्रामीण अर्थव्यवसथा पर फर्क पड़ेगा. इसके अलावा हम लोगों को ईपीएफओ (कर्मचारी भविष्य निधि) से पैसा निकालने की इजाजत दे रहे हैं और महामारी में अनाथ हुए बच्चों के भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए उनके खाते में ठीकठाक एकमुश्त रकम डाल रहे हैं.

 विशेषज्ञों की राय है कि ग्रामीण और शहरी दोनों गरीबों को नकद मदद दी जाए. इस पर सरकार की राय क्या है?

आप यह जानने पर जोर दे रहे हैं कि विपक्ष ने एक तरह से लोगों के खाते में कैश ट्रांसफर का जो सुझाव दिया है, उसके बारे में सरकार क्या करना चाहती है.

 विपक्ष ही नहीं बल्कि विशेषज्ञों ने भी इस तरह की सिफारिश की है.
देखिए, क्या किया जा सकता है, यह सब जानने के लिए हम इस पर गहन अध्ययन करते हैं और फिर इस बारे में फैसला करते हैं कि आगे किस तरह से वित्तीय प्रोत्साहन दिया जाए. अगर आप मुझे दो-टूक यह कह रहे हैं कि लोग आपसे मदद नकदी के रूप में हस्तांतरित करने की बात कर रहे हैं तो मेरा जवाब है कि मैं बहुत सारे लोगों को सुनती हूं जो तरह-तरह के सुझाव देते हैं.

 कुछ विशेषज्ञ संसाधनों में इजाफे के लिए रुपए छापने की वकालत कर रहे हैं.
अगर आप यह विचार मुझे दे रहे हैं तो मैं स्वीकार करूंगी.

 विनिवेश कार्यक्रम के बारे में क्या है?
विनिवेश कार्यक्रम पटरी पर है. हमने बजट में जो कहा है, उस पर हम प्रतिबद्ध हैं.

 मतलब आपने बजट में निजीकरण और ऐसेट मॉनेटाइजेशन के जिन साहसिक कदमों की बात की है, उससे कदम पीछे खींचने की कोई बात नहीं है?
सवाल ही नहीं उठता. आप मुझसे एयर इंडिया, बीपीसीएल के बारे में पूछ सकते हैं—आप कैबिनेट से मंजूर पूरी सूची पढ़ सकते हैं. मैं कहूंगी कि सब कुछ सही दिशा में चल रहा है.

 स्वदेशी जागरण मंच जैसे संगठनों के दबाव के बावजूद निजीकरण से पांव पीछे नहीं खींचे गए हैं?
यह पूरी तरह से पटरी पर चल रहा है. यह सब तो बजट में बाकायदा उल्लिखित है और संसद से इसे मंजूरी मिल चुकी है. मैं उस पर कायम हूं. यह हमारा बजट है.

 फिक्की के ताजा सर्वे से पता चलता है कि कारोबारी भरोसा गिर गया है. उसके सुझावों में मध्यम वर्ग के लिए कर राहत और कारोबार के लिए परोक्ष कर घटाने की बात है. आपका इस पर क्या विचार है?

मैं समझती हूं कि 'मध्य वर्ग’ को लेकर यह फिक्र बार-बार आगे कर दी जाती है. क्या किसानों में मध्य वर्ग सरकारी खरीद से लाभान्वित नहीं होता? क्या मध्य वर्ग को किफायती और मध्य आय आवास परियोजनाओं का निर्माण पूरा करने के खातिर विशेष खिड़की (एसडब्ल्यूएएमआइएच) जैसे कार्यक्रमों से लाभ नहीं मिलता?

इसी तरह एमएसएमई क्षेत्र के लिए इमरजेंसी क्रेडिट गारंटी लिक्विडिटी स्कीम है, जिसके तहत उनके बकाया कर्ज के 20 फीसद तक बिना किसी जमानत के नया कर्ज दिया जाता है, उसके लिए सरकार ही गारंटर होती है. इसे अब 20 फीसद से बढ़ाकर 40 फीसद कर दिया गया है. क्या मध्य वर्ग के लोग उन्हें नहीं चलाते?

 लगता है, फिलहाल सरकारी पूंजीगत खर्च में खासकर इन्फ्रास्ट्रक्चर ही वृद्धि का इंजन बना हुआ है क्योंकि निर्यात, निजी निवेश और खपत तो सिकुड़ ही गए हैं. दूसरे इंजनों को भी चालू करने के उपाय क्या हैं?

एक तो मैं यह चाहती हूं कि सभी लोग 'चार इंजनों’ वाली इस अवधारणा से बाहर निकलें. इसमें दो राय नहीं कि वृद्धि के चार इंजनों को चलना चाहिए. बाकी तीन की कीमत पर बस एक की ही बात करना अब कहीं से भी जायज नहीं रहा. आप कह सकते हैं कि उनमें तेजी आनी चाहिए, लेकिन यह कहना कि तीन बैठ चुके हैं और एक ही चल रहा है, यह बिल्कुल ठीक नहीं.

सितंबर 2019 के बाद से कोई नहीं जानता था कि क्या होने जा रहा है. कॉर्पोरेट टैक्स घटा दिया गया और मुझ पर कई लोगों ने आरोप मढ़ा कि मैं कॉर्पोरेट का पक्ष ले रही हूं. ऐसी बातें हो रही थीं कि इन कॉर्पोरेट्स ने काफी बचा लिया, अपना कर्ज चुकता कर रहे हैं लेकिन मुनाफे का बंटवारा नहीं कर रहे. इसमें मुझे कोई दिक्कत नहीं कि वे अपने कर्ज निबटा रहे हैं या मुनाफे का इस्तेमाल अपने शेयरधारकों की ओर से मंजूर तरीकों से कर रहे हैं.

लेकिन यह भी सही है कि उस कदम के बाद से आप कइयों को बड़ी विस्तार योजनाओं, संयुक्त उपक्रम के लिए एफडीआइ की तलाश करते देखेंगे. विलय और अधिग्रहण की घटनाओं को देखें, यह देखें कि मध्य वर्ग के कितने लोग शेयर बाजार का रुख कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लग रहा है कि कम जोखिम के साथ बैंक के बचत खाते में पैसा रखने की बजाए पारदर्शी, साफ-सुथरे प्रबंधन वाली कंपनियों में निवेश क्यों न किया जाए?

जहां तक खपत की बात है तो बजट के पहले और आज ग्रामीण भारत में खपत के आंकड़े देखें. अप्रैल की शुरुआत में यह थोड़ी घटी जरूर थी लेकिन ट्रैक्टर तथा कृषि उपकरणों और एफएमसीजी वस्तुओं की बिक्री बदस्तूर बनी हुई है. मैं यह नहीं कह रही कि सब चंगा है, लेकिन हमें सब कुछ भुला नहीं देना चाहिए.

 क्या आप चिंतित हैं कि कोविड-19 की दूसरी लहर के गांवों में फैलने का गंभीर नतीजा हो सकता है?

इस साल भी ग्रामीण भारत काम पर लगा रहा है. इसी वजह से आपके यहां कई फसलों की अच्छी-खासी पैदावार हो रही है और अगली फसल की बुआई की तैयारी चल रही है. मंडियां पूरी हरकत से सक्रिय हैं. प्रधानमंत्री ने इसके पहले (मुख्यमंत्रियों से) कहा कि ध्यान रखें कि कोविड गांवों में न पहुंचे. ग्रामीण इलाकों में उसके प्रकोप की चिंताएं पहले से ही हैं, इसलिए सावधानियां बरती जा रही हैं.

 क्या आप दूसरी लहर के मद्देनजर बजट के आंकड़ों पर दोबारा विचार करेंगी?
बिल्कुल नहीं. हम अभी बजट के दूसरे महीने में ही हैं.

 ज्यादातर विशेषज्ञों का कहना है कि एक और महामारी के झटके से बचने के लिए लोगों को तेजी से टीके लगाने की जरूरत है. मगर केंद्र सरकार को अपनी वैक्सीन नीति को लेकर यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट से भी आलोचना झेलनी पड़ी है. यह भी कहा गया कि पर्याप्त टीकों का ऑर्डर देने में देरी हुई और राज्यों को अपनी जरूरत की वैक्सीन खरीदने के लिए कहने से गफलत पैदा हुई.

वैक्सीन मैन्युफैक्चरर्स के साथ बातचीत पिछले साल अक्तूबर से ही चल रही थी. प्रधानमंत्री खुद गांधीनगर, पुणे और हैदराबाद स्थित वैक्सीन निर्माताओं की फैक्ट्रियों में गए और उनका हौसला बढ़ाया. उनके पास जो स्टॉक था, उसने 16 जनवरी से टीके लगाने का अभियान शुरू करने और तमाम फ्रंटलाइन वर्करों और 60 साल से ऊपर के लोगों को टीके लगाने में बड़ी मदद की. केंद्र ने ये वैक्सीन खरीदीं और मुफ्त में बांटीं. अप्रैल में हमने टीका अभियान को 45 से ऊपर के लोगों के लिए खोल दिया, यह भी सरकारी अस्पतालों में मुफ्त था. ये टीके भी सरकार ने खरीदे और भेजे.

जनवरी से ही चीख-पुकार मचने लगी कि केंद्र को यह क्यों करना चाहिए और यह राज्यों के ऊपर छोड़ देना चाहिए. मैं उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहरा रही हूं, लेकिन यह विश्वसनीय, बार-बार उठ रही और मुखर आवाजें थीं. तो नीति इस तरह बनाई गई कि हम मौजूद वैक्सीन में से 50 फीसद लें और उन्हें मुफ्त में देना जारी रखें, और बाकी 50 फीसद राज्य ले लें और उनका जो चाहे करें.

और इसमें अगर छोटी-सी मात्रा उन बड़े अस्पतालों के लिए छोड़ दी जाए जो इसे खरीदना और अपने मरीजों को लगाना गवारा कर सकें, तो (इसे) खोल देना चाहिए—ठीक यही तो किया गया है. यह बदलाव राज्य सरकारों की तरफ से मुखर और साफ आवाजों के बाद किया गया.

 काफी पहले ऑर्डर देने के बारे में क्या कहेंगी, जैसा कि अमेरिका सरीखे देशों ने किया?

जहां तक पहले ऑर्डर देने की बात है, वैक्सीन निर्माताओं के पास रखा पूरा पिछला भंडार या स्टॉक नहीं आता तो हम 16 जनवरी से वैक्सीन भला कैसे दे सकते थे? वे जो बना रहे हैं, वह लिया जा रहा है, और साथ ही साथ उसे बढ़ाया भी जा रहा है. हम नई-नई, बेकार पड़ी क्षमताएं खोज रहे हैं, जिनका इस्तेमाल उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए किया जा सके, और इसी के चलते हमें जून में और जुलाई में भी ज्यादा वैक्सीन मिल रही है. हम घरेलू उत्पादन के लिए वैक्सीन आयात भी कर रहे हैं जैसे कि स्पुतनिक-5.

 सार्वभौम टीकाकरण कार्यक्रम के लिए भी केंद्र ही वैक्सीन खरीदता और राज्यों को बांटता था. तो यह बदलाव क्यों? बदलाव (का नतीजा) अब जबकि राज्य वैक्सीन खरीदने के लिए एक-दूसरे से होड़ कर रहे हैं, ऐसे में मौका देखकर निर्माता कीमतें बढ़ा सकते हैं.

तर्क अच्छा है, लेकिन यह आपको मुझसे पूछना चाहिए या उन लोगों से, जिन्होंने कहा था कि केंद्र को भला क्यों खरीदनी चाहिए वैक्सीन!

 आपने उनकी बात क्यों सुनीं?
अगर मैं नहीं सुनती, तो आप मुझसे फेडरलिज्म को लेकर सवाल करते. यह फैसला करना मेरे ऊपर नहीं है, खासकर उस वक्त जब राज्यों ने इसके लिए कहा और हमने उन्हें सुना और उनकी बात मानी.

 केंद्र ऐसा क्यों नहीं करता कि फिर इसे अपने हाथ में ले ले और गफलत खत्म करे?
आपने मुझसे कहा है और मैं इसे सुझाव की तरह लेती हैं.

 सरकार को बढ़ती महंगाई और खासकर ईंधन की कीमतों को लेकर भी आलोचना झेलनी पड़ रही है. क्या ईंधन की कीमतों में कटौती का विकल्प है?

दलहन, खाद्य तेल और दूसरी जरूरी चीजों की कीमतों में महंगाई के मामले में मंत्रियों का एक समूह नियमित रूप से इसके पीछे की वजहों को देख रहा है और आयात की इजाजत देने पर चर्चा कर रहा है, इस बात का ध्यान रखते हुए कि कीमतों के धड़ाम से गिरने का नुक्सान किसानों को न उठाना पड़े. समूह यह भी पक्का कर रहा है कि सप्लाइ चेन की परेशानियां या जमाखोरी न हो.

ईंधन के मामले में, भारतीय कीमतें करीब-करीब वैश्विक कीमत के बराबर ही तय की गई हैं. जहां तक करों की बात है, केंद्र सरकार यह कीमतों के हिसाब से नहीं करती; यह तय दर है, फिर तेल की कीमत चाहे जो हो. राज्यों को जो मिलता है, वह कीमत के हिसाब से मिलता है; तेल की कीमत बढ़ने पर हर बार उनका राजस्व भी बढ़ जाता है. तो केंद्र और राज्य के बीच तेल की कीमत के मुद्दे की कई परतें हैं. सबसे पहले तो हमें यह याद रखना होगा कि केंद्र कीमतें तय नहीं करता; ये कीमतें बाजार की ताकतों से तय होती हैं.

 आपने अर्थव्यवस्था में जबरदस्त मुद्रा झोंकी लेकिन इससे मुद्रास्फीति भी पैदा हुई. तो 'इधर कुआं, उधर खाई’ की इस स्थिति में, जहां अर्थव्यवस्था को मुद्रा की पर्याप्त उपलब्धता भी चाहिए पर महंगाई भी तेजी से बढ़ रही है, आपके सामने आखिर विकल्प क्या हैं?

कारोबार जब मुश्किलों से उबरने की कोशिशों में लगे हैं, तरलता जरूरी है. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) तरलता को संभालता है. मैं उनके साथ विचार-विमर्श करती रहती हूं. आर्थिक मामलों का विभाग (डीईए) उनके साथ नजदीक से मिलकर काम करता है. हमारा रिजर्व बैंक के साथ करीबी तालमेल है ताकि तरलता के अचानक सूखने का असर परवान भरते कारोबारों पर न पड़े.

बैंकों को पर्याप्त गुंजाइश दी गई है ताकि वे कारोबारियों के आने पर उधार दे सकें. बैंकों की स्थिति और उनके खाता-बही में निश्चित रूप से सुधार आया है, इसलिए वे इन चीजों के लिए प्रावधान करने की हालत में हैं. उधारी भी संप्रभु गारंटी के साथ दी जा रही है. बैंक जानते हैं कि वे बदतर हालत में नहीं हैं और उन्हें ईसीजीएलएस के मुताबिक कर्ज देना होगा, जिसे हमने अब और ज्यादा सेगमेंट के लिए खोल दिया है.

 ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के लिहाज से, 'टैक्स टेररिज्मÓ को लेकर शिकायतें थीं कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के अलावा केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) और केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) उद्यमियों के बीच डर का माहौल पैदा कर रहे थे. आपने यह धारणा कैसे बदली?

हमने सीवीसी, सीबीआइ, ईडी और बैंकों के साथ लगातार बैठकें कीं और उन्हें बताया कि हमें करदाताओं से निबटते वक्त बहुत ज्यादा प्रोफेशनल होना होगा. बैंकों को भी एहसास हुआ कि सच्चे व्यावसायिक फैसलों को समझना होगा और अगर कुछ गड़बड़ हो गई है तो उसे सुलझाना ग्राहक और उस बैंक के ऊपर है. तो इससे न केवल राजस्व बढ़ाने में मदद मिली बल्कि साफ तस्वीर बनाने में भी कि इस सरकार की मंशा क्या है.

साथ ही, जैसा कि प्रधानमंत्री ने वादा किया था, हम करदाताओं के लिए फेसलेस एसेसमेंट (चेहराविहीन आकलन) और फेसलेस अपील (की व्यवस्था) लेकर आए, और यह सब इसलिए कि हमने टेक्नोलॉजी को पूरी तरह से अपनाया. यहां तक कि जब आप अपील के लिए जाते हैं, आपको पता नहीं होता कि कौन-सा अफसर आपका एसेसमेंट करेगा.

इस बजट में हमने एक अहम बदलाव यह किया कि छह साल से पहले का कोई भी इनकम टैक्स एसेसमेंट रिकॉर्ड खोला नहीं जा सकता. लोगों ने देखा कि प्रधानमंत्री ने टैक्स टेररिज्म यानी कर आतंकवाद को खत्म करने के संबंध में जो कुछ कहा, वह कई तरीकों से वास्तव में जमीन पर हुआ है. मेरे ख्याल से अब यह आम धारणा है कि हम गंभीर और इरादों के पक्के हैं और यहां लोगों को परेशान करने के लिए बिल्कुल नहीं हैं.

 क्या जीएसटी (माल और सेवा कर) संग्रह में उछाल इसलिए आया  कि लोगों में छापों का डर बैठ गया है और वे स्वेच्छा से कर चुका रहे हैं?

यह सच है कि हमारे अफसर डेटा की छानबीन के लिए और यह देखने के लिए कि कर चोरी कहां हो रही है, आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल कर रहे हैं. हम अब न केवल पकड़ पा रहे हैं कि समस्या कहां है बल्कि उन कडिय़ों का पीछा भी कर पा रहे हैं.

एक ही बार में आप उस शेल कंपनी का पता लगा सकते हैं जिसने कोई कर चोरी की है या व्यवस्था को चकमा दिया है. उसके बाद तो टेक्नोलॉजी के जरिए सुराग अपने आप सामने आने लगते हैं और आप उन लोगों को पता लगा सकते हैं जो ऊपर से एक दूसरे से जुड़े नहीं मालूम देते. इससे लोगों को एहसास हुआ कि वे छिपे नहीं रह सकते और इससे ज्यादा राजस्व उगाहने में मदद मिली.

 क्या आपको लगता है कि कोविड ने संघवाद की भावना में सेंध लगाई है, खासकर जीएसटी के मामले में तकरार को देखते हुए?

कैसी तकरार? मैं चाहूंगी कि मीडिया जीएसटी काउंसिल सरीखे संघीय निकाय के बारे में बेहतर जानकार बने. जब राज्यों के वित्त मंत्री, और उनमें से कुछ तो यह पोर्टफोलियो संभाल रहे मुख्यमंत्री हैं, मिलते हैं, तो चर्चाएं, खंडन-मंडन और तर्क-वितर्क होंगे, पर यह फोरम इसी के लिए तो है. क्या यह तकरार या संघवाद में सेंध है?

जीएसटी परिषद संघीय ढांचे के तहत चर्चा का ही निकाय है. जब हम कहते हैं कि मंत्रियों का एक समूह कोविड के इलाज से जुड़ी चीजों को कर से छूट देने के बारे में फैसला करेगा, तो यह हल निकालने का मैत्रीपूर्ण तरीका है या शत्रुतापूर्ण? जीएसटी परिषद के हरेक सदस्य को श्रेय देना होगा कि वे पूरी तरह एक अगुआ की तरह व्यवहार कर रहे हैं.

 क्या ईसीजीएलएस और दिए गए प्रोत्साहनों तथा मोहलतों के बाद एनपीए की बाढ़ आ गई है? क्या बैंक और वित्त मंत्रालय चिंतित है?

नहीं, अगर आप हमारे उठाए गए कदमों को देखें. हमने ऐसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी (एआरसी) मॉडल इस तरह बनाया कि एनपीए (गैर निष्पादित संपत्तियां) एक धारक कंपनी के पास चली जाएंगी, जो पूरे सोच-विचार के बाद ऐसेट इनवेस्टमेंट फंड को आमंत्रित करेगी कि वे आएं और बोली लगाएं और उसे ले लें.

तो हमने जिस तरह इसकी योजना बनाई है, वह यह है कि बैंकों को यकीन है कि पिछले काफी समय से चले आ रहे एनपीए—कोविड से संबंधित नहीं—अपना हल खोज लेंगे और कुछ हद तक पहली बार में फिर आखिरी चरण में उसके बेचे जाने पर अपना वाजिब हिस्सा हासिल कर लेंगे. बाकी बचा हिस्सा बैंकों के पास आ जाएगा.

अब 2020 के दौरान हमने ऋणशोधन अक्षमता और दिवाला संहिता (आइबीसी) की इन धाराओं को निलंबित कर दिया, इसलिए कोई भी लोगों को कोविड से जुड़ी नाकामियों की वजह से इनसॉल्वेंसी (ऋणशोधन अक्षमता) के लिए नहीं पकड़ सकता. इससे काफी मदद मिली और अब हमारे लिए यह साफ है कि आइबीसी, ईसीजीएलएस और दी जा रही अतिरिक्त सहायताओं के बल पर उनमें से कई बचे रह सकेंगे और बेहतर दिनों की तरफ बढ़ेंगे.

बैंक व्यावसायिक कामकाज में दबाव के स्तर की लगातार निगरानी करते हैं. मैं कंपनी मामलों के मंत्रालय से भी कह रही हूं कि वे कंपनियों को देखें और बाजार में उनके ऊपर पड़ने वाले दबाव के स्तर को समझें. तो कंपनी मामलों के मंत्रालय और बैंकों के जरिए मंत्रालय रियल-टाइम निगरानी कर रहे हैं. इससे हम इस परेशानी को हल कर पा रहे हैं और लोगों को अचानक नाकाम होने से बचा पा रहे हैं.

‘‘नौकरियों पर भारी असर डालने वाले बुनियादी ढांचे के लिए हमने बड़े बजट का प्रावधान किया है. इसी तरह से स्वास्थ्य के क्षेत्र में सार्वजनिक खर्च के लिए भी, जिससे स्वास्थ्य से जुड़े मानकों पर इसका बड़ा असर पड़ने वाला है’’

‘‘पूरे वर्ष को शब्दों और भावों के सच्चे अर्थ में रखकर देखें तो आप पाएंगे कि बजट 2021 में कोविड से उत्पन्न और उससे जुड़ी तमाम समस्याओं से निबटने की क्षमता है. यह जानने के लिए हम राज्यों और उद्योगों से भी निरंतर संवाद में रहेंगे कि आगे और क्या किए जाने की जरूरत है’’

‘‘टैक्स के आतंकवाद से छुटकारे के बारे में प्रधानमंत्री ने जो कहा था उसे लोगों ने (खत्म होते हुए) देखा. उनमें यह भाव पैदा हुआ है कि हम काम करके दिखाते हैं और हमारा काम लोगों को प्रताड़ित और परेशान करना नहीं है’’

‘‘विनिवेश कार्यक्रम पूरी तरह से पटरी पर है. बजट में जो भी हमने कहा है, हम उस पर प्रतिबद्ध हैं. आप मुझसे एयर इंडिया, बीपीसीएल के बारे में पूछिए, कैबिनेट से मंजूरी पूरी लिस्ट पढ़ लीजिए, सब कुछ पूरी तरह से पटरी पर चल रहा है’’

जनवरी से ही यह बात कही जा रही थी कि इसे (वैक्सीन की खरीद और वितरण) राज्यों पर ही छोड़ दिया जाए; सवाल था कि केंद्र को यह काम क्यों करना चाहिए...हम (राज्यों को) जिम्मेदारी नहीं ठहरा रहे लेकिन यह बात चर्चा में लगातार और जोरों से उठती आ रही थी

‘‘दालों, खाद्य तेलों और दूसरी आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ने के मुद्दे पर मंत्रियों का एक समूह इनके पीछे के कारणों की पड़ताल कर रहा है. इसके अलावा, आयात पर चर्चा करते हुए वह इस बात को भी पक्का कर रहा है कि दाम टूटने से किसानों को किसी तरह का नुक्सान न होने पाए’’

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