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...कुछ कसर रह गई मुझसे ही: इरफान खान

''मैं अपनी जमीन से हटके दूसरे की जमीन पे नाचूं और वो जमीन मेरे पैरों को सपोर्ट न करे तो उस नाच का मैं मजा नहीं ले पाऊंगा.''

इरफान से बातचीत में यह खतरा हमेशा बना रहता है कि उनके सच्चे-सीधे भाव भरे जवाब सुनने के आनंद में कहीं आप अपने सवाल ही न भूल जाएं. यूं ही, कहीं भी फरमाइश पर अभिनय करने लगना उनके सिस्टम में नहीं. लेकिन उनसे बतियाना ही उनके साथ एक अप्रत्याशित-से, नाटकीय सफर पर चलने जैसा सुख देता है. हाल ही में वे 12वें ओसियान सिनेफैन फिल्म फेस्टिवल में शिरकत करने दिल्ली आए थे, हमराह और पटकथा लेखिका सुतापा सिकदर साथ थीं. उसी दौरान इंपीरियल होटल के अपने कमरे में उन्होंने असिस्टेंट एडीटर शिवकेश के साथ सिनेमा के अपने कुछ ताजा अनुभव साझा किए.

हाल के दिनों में कोई नई चीज क्या जुड़ी है आपकी जिंदगी में?
पानसिंह (तोमर) की कामयाबी. सिर्फ इसलिए नहीं कि यह एक अच्छी फिल्म है बल्कि इसलिए कि बहुत आयाम हैं उसमें. एक आदमी का उस तरह की .जिंदगी जीना और हमारे लिए कहानी छोड़ जाना. किसी डिवाइन (रूहानी ताकत) का हाथ लग रहा था, जैसे वह चाहती थी कि उस कहानी को शेयर किया जाए, और कैसे उस समय की कहानी आज रेलिवेंट हो जाती है. एक और चीज...कुछ चैलेंजिंग रोल्स हैं, जिन्हें मौका मिलने पर मैं और कई बार करना चाहूंगा. मुझे लगता है, मैं शायद पूरी तरह से (परफॉर्मेंस) दे नहीं पाया. पता नहीं क्या वजहें रहीं उसके पीछे...कुछ डिमांड किया गया मुझसे जो मैं...यू नो...कसर रह गई
...यानी जो रोल्स आप कर चुके हैं?
जैसे लाइफ ऑव पाइ (निर्देशकः ऐंग ली). बहुत ज्‍यादा चैलेंजिंग थी. काम करने का मेरा जो सिस्टम है, उसमें कहीं भी नहीं आ रही थी. डायरेक्टर मुझ्से डिमांड कर रहा था, मुझे कंप्लीट्ली एक फॉरेन टेरिटरी में ले जाके, मुझ्से कुछ परफॉर्मेंस चाह रहा था जो मेरे लिए बहुत ही नई थी. उसके बारे में जानना चाहता हूं कि फाइनली क्या (हुआ) होगा उसका.
द अमेजिंग स्पाइडरमैन (निर्देशकः मार्क वेब) में आपको लिए जाने पर बड़ी चर्चा हुई थी लेकिन फिल्म में आपका नाममात्र का रोल देखकर हैरत हुई. आपकी राय?
मुझे शुरू से पता था कि ये मेरा इंपॉर्टेंट रोल है लेकिन कहानी इसकी नहीं है. हां, जितने सीन थे, उसमें से कुछ कट गए. वह 500 करोड़ रु. से ज्‍यादा की फिल्म है. उसके अंदर उनका इंटरेस्ट मेन कहानी को पुख्ता बनाना है. उसमें काट-छांट होगी ही, उसमें कई बार आप भी चपेटे में आ जाते हैं. मेरे लिए यह एक अच्छे डायरेक्टर के साथ काम करने का एक्सपीरिएंस था. वह मेरे काम की इज्‍जत करता है. देखेंगे आगे क्या होता है.
लेकिन कुछ एक्टर्स कहते हैं कि हमें वेस्ट के ट्रैप में नहीं फंसना चाहिए.
ट्रैप है कहां? वह तो आपके पास आ नहीं रहा है. वहां जाना अपने आप में बहुत बड़ी जद्दोजहद है. यहां का एक्टर तैयार ही नहीं है वहां के लिए. हॉलीवुड यहां के मार्केट को इनकैश करना चाहता है.

उनके सिस्टम में फिट होने वाला टैलेंट जो दिखेगा, उसको जरूर वे पिकप करेंगे. (ए.आर.) रहमान को उन्होंने पिकप किया. मुझे गाहे-बगाहे ले लेते हैं. आने वाली जेनरेशन में बहुत सारे लोग होंगे, जिनको वे लेंगे. (हॉलीवुड फिल्मों का) फ्रांस का, यूके का मार्केट खत्म हो गया. अब इंडिया की बारी है.
आप इस वक्त हॉलीवुड में सबसे ज्‍यादा मौजूदगी रखने वाले हिंदुस्तानी एक्टर हैं. वे क्या चीजें है जो आपको वहां काम करने के लिए इंस्पायर करती हैं?
वहां की फिल्में मुझे जिस तरह का चैलेंज देती हैं, जैसा राग, जैसा सुर छेड़ने को बोलती हैं, वह मौका मुझे और कहीं नहीं मिलता. वही मेरा इंटरेस्ट है. मेरे लिए वह सरवाइवल की जंग नहीं, (बल्कि) एक लग्जरी है. वहां से पैसा मुझे यहां का दसवां हिस्सा भी नहीं मिलता होगा, कई फिल्मों में. ली ने मुझसे जो डिमांड किया, मुझे नहीं लगता, दुनिया में और कोई डायरेक्टर मुझसे वो डिमांड करेगा. तो इससे मेरी फैकल्टीज चैलेंज होती हैं.
मार्च में जब पानसिंह तोमर हिट हुई और टीम के लोग मुंबई में उसका मजा ले रहे थे तब आप ड़ेढ़ महीने तक हरियाणा, पंजाब, हिमाचल के दूरदराज के गांवों में अनूप सिंह की फिल्म (किस्सा) की शूटिंग करते रहे. कैसा था वह अनुभव?
मिस किया उस सक्से.ज को. पानसह (की कामयाबी) ने मुझे किस्सा की कहानी से थोड़ा-सा बाहर खींच लिया. मेरे दो पार्ट हो गए. इंटरेस्टिंगली वह कहानी भी पार्टीशन की थी. और मैं उस पार्टीशन को लिटरली जी रहा था.
हिंदी सिनेमा में आपको डेढ़ दशक हो गया. अभिनय में आपने एक मुकाम बनाया लेकिन अभी भी आप उन एक्टर्स में शामिल नहीं हो पाए हैं, जो अपने दम पर 100-100 करोड़ रु. का कारोबार करवा सकें.
मेरी दौड़ वह है ही नहीं. मैं 500 करोड़ रु. की फिल्म कर रहा हूं (लाइफ ऑव पाइ). बहुत अच्छा होगा जब मेरी फिल्म 100 करोड़ रु. का बिजनेस करेगी, लेकिन वह मेरी किस्म की फिल्म होनी चाहिए. मैं अपनी जमीन से हटके दूसरे की जमीन पे नाचूं और ढोल पीटूं और वो जमीन मेरे पैरों को सपोर्ट न करे तो उस नाच का मैं मजा नहीं ले पाऊंगा.
लेकिन जब आप शाहरुख, सलमान और अक्षय कुमार की फिल्मों को 100 करोड़ रु. से ज्‍यादा कमाता देखते हैं तो क्या ख्‍याल आते हैं आपके मन में?
कभी लगता है कि ऑडियंस ऐसा चाहती है और ये लोग सक्सेजफुल हैं ऑडियंस को एंटरटेन करने में. फिर आप उस तरह की फिल्म करते भी हैं तो लगता है कि आप कितना एंटरटेन हो रहे हैं उससे? और क्या आप ऐसा करते रहना चाहेंगे? इतने सालों से आप उस गेम को देख रहे हैं. उसमें कोई नया रिवीलेशन नहीं है आपके लिए. हर आदमी का अपना-अपना गेम है. आपको अपनी जमीन जरश.ज बनानी है, बजाए इसके कि आप कंपैरि.जन करते रहो.
डायरेक्टर्स के एक तबके में अभी तक भी अंदेशा था कि कोई कॉमर्शियल फिल्म पूरी तरह से आपके कंधे पर रखकर नहीं बनाई जा सकती. पानसिंह ने इस मिथक को तोड़ा है?
.फिल्म इंडस्ट्री के लिए तोड़ा है. लेकिन इसी इंडस्ट्री के पास क्या ऐसे लोग हैं जो दूसरी पानसिंह या उस तरह की फिल्में बना दें? उस तरह की जनरेशन आ रही है. वह आएगी, दौर बदलेगा तो वैसे प्रोड्यूसर्स भी आएंगे. पर मैं अपनी तरह की फिल्में अपनी शर्तों पर करता रहा हूं, चाहे वह म.कबूल  हो, नेमसेक  हो, हासिल हो, रोग हो. हां ये है कि जिस दिन मेरी फिल्म ज्‍यादा पैसा कमाएगी तो उस तरह की कहानी करने की मेरे पास ज्‍यादा च्वाइस होगी. वो मैं चाहता हूं.
आपकी नई फिल्मों में क्या नया है?
अभी मैं जिन .फिल्मों का हिस्सा बन रहा हूं, उन .फिल्मों का एक तरह का उदय है यहां. वे कोलैबोरेशन वाली फिल्में हैं. .किस्सा के चार मुल्कों के प्रोड्यूसर हैं और लंच बॉक्स (निर्देशकः रितेश बत्रा; इस फिल्म की शूटिंग 4 अगस्त को मुंबई में शुरू हुई) के भी 3-4 कंट्रीज के प्रोड्यूसर हैं. ये सिर्फ हॉलीवुड मार्केट के लिए नहीं, यूरोपियन मार्केट भी है इनका, जिसका कि मैं पहले हिस्सा नहीं था. आइ थिंक, ये फिल्में मेरे लिए दूसरा एक रास्ता खोलेंगी.
आप मुंबई में रहते हैं. पिछले दिनों आपने दिल्ली के संभ्रांत तबके के सांस्कृतिक संगठन इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की सदस्यता ली. इसकी जरूरत क्यों महसूस हुई?
ताकि कल्चरल आदान-प्रदान होता रहे, कुछ ले सकें, कुछ दे सकें. बड़े शहरों में कल्चरली इंस्पायर रहने के लिए कोशिश करनी पड़ती है, नहीं तो अंदर से मुर्दनी छाने लगती है. 

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