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बातचीतः दुनिया के मालदार मुल्क पैसे के मामले में दी गई जबान पूरी करने में नाकाम रहे

हमने अपनी ऊर्जा की 50 प्रतिशत जरूरत अक्षय ऊर्जा स्रोतों से पूरी करने की प्रतिबद्धता जताई है, और जब भारत वह लक्ष्य हासिल कर लेगा तो स्वाभाविक तौर पर कोयले जैसे जीवाश्म ईंधन पर उसकी निर्भरता घट जाएगी

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव

ग्लासगो में हाल ही संपन्न जलवायु परिवर्तन सम्मेलन की पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इस बात के लिए खासी आलोचना की कि उसने दुनिया को बचाने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए. लेकिन कुछ बड़ी पहलकदमियों के लिए इसकी तारीफ भी हुई. इस सम्मेलन में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका रही. केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव वहां पर भारत के मुख्य वार्ताकार थे. ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा के साथ एक खास बातचीत में उन्होंने सम्मेलन में हासिल उपलब्धियों पर विस्तार से चर्चा की और यह भी बताया कि क्या कुछ था जो हाथ आने से रह गया. पेश हैं बातचीत के चुनिंदा अंश:

प्र. ग्लासगो जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में भारत का नजरिया क्या था? क्या भारत वह सब हासिल कर सका जो वह चाहता था?

हमारा नजरिया था कि हमारा ग्रह एक ही है, न कि कोई 'ए' या 'बी' ग्रह, और इसका बचाव करना हमारा कर्तव्य है. लेकिन हमारा कर्तव्य भी हमारी परिस्थितियों से बंधा है. यही कारण है कि भारत हमेशा 'साझा लेकिन एक-दूसरे से अलहदा किस्म की जिम्मेदारियों (सीबीडीआर)' वाले सिद्धांत का पक्षधर रहा है जो 2015 में पेरिस समझौते में मंजूर किया गया था. हमने कहा कि इस बार के समझौते के पाठ में भी 'राष्ट्रीय परिस्थितियां और गरीबी उन्मूलन' को होना चाहिए. हमने ग्लासगो में सभी को साफ कर दिया कि पर्यावरण सिर्फ संवाद का मुद्दा नहीं बना रह सकता, साफ नजरिए के साथ इस पर कार्रवाई होनी चाहिए.

हमने अपने 'राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान' (एनडीसी) में जो भी लक्ष्य हासिल करने की प्रतिबद्धता जताई है, उन्हें हासिल करने की राह पर हैं. हमने दिखाया है कि हम और भी बहुत कुछ करने को तैयार हैं. ग्लासगो में उद्घाटन सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन पांच नए लक्ष्यों की घोषणा की जिन्हें हमने अपने लिए 'पंचामृत' के रूप में निर्धारित किया है. भारत ने 2030 तक 500 गीगावाट अक्षय ऊर्जा के उत्पादन का लक्ष्य तय किया है. तब तक इसने कुल ऊर्जा जरूरतों का 50 प्रतिशत अक्षय ऊर्जा स्रोतों से पूरा करने की प्रतिबद्धता जताई है.

साथ ही भारत ने इस दशक के अंत तक अपने ग्रीनहाउस गैस (जीएचजी) उत्सर्जन को एक अरब टन तक कम करने का आश्वासन दिया है. भारत ने कहा कि वह अर्थव्यवस्था की कार्बन इंटेंसिटी को घटाकर 45 प्रतिशत से कम के स्तर पर लाएगा. यह भी कि भारत 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन स्तर तक पहुंच जाएगा. प्रधानमंत्री ने 'जीवन' के लिए एक नया मुहावरा गढ़ते हुए इसे 'पर्यावरण-हितैषी जीवन शैली' के रूप में व्यक्त किया और कहा कि यह ऐसी जरूरत है जिसे अब पूरी दुनिया को अपना लेना चाहिए. भारत ने भविष्य की ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए भी एक बड़ी पहल की है, जिसमें ग्लासगो में शुरू की गई 'ग्रीन ग्रिड पहल—एक सूर्य, एक विश्व, एक ग्रिड'—शामिल है.

ग्लासगो शिखर सम्मेलन में सबसे निराश करने वाली बातें क्या थीं?

देखिए, जलवायु परिवर्तन संबंधी जिम्मेदारियों को अगर आप न्यायसंगत बनाना चाहते हैं तो आपको विकासशील देशों को पैसा और टेक्नोलॉजी देनी होगी. इस समय वातावरण में मौजूद अधिकांश कार्बन उत्सर्जन के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार औद्योगीकृत राष्ट्र हैं. पेरिस समझौते के तहत यह ऐतिहासिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए उन्हें 2020 से विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निबटने में मदद के लिए सालाना 100 अरब डॉलर देने थे. अब तक नहीं दिए उन्होंने.

अमीर देश वादे के मुताबिक रकम दें, क्या भारत यह दबाव बना पाने में कामयाब हुआ?

प्रधानमंत्री ने अपने उद्घाटन भाषण में इस मुद्दे पर विकासशील देशों की चिंताओं को उठाते हुए कहा कि सालाना जरूरत सौ अरब डॉलर की नहीं, एक खरब डॉलर की है. इसने पहली बार प्रेसिडेंसी ऑफ द कमेटी ऑफ पार्टीज (सीओपी) से 'गहरे अफसोस' के साथ टिप्पणी लिखवाने में सफलता पाई कि विकासशील देशों को जलवायु के वास्ते रकम देने का आश्वासन पूरा नहीं किया गया. अध्यक्षीय आसन को स्वीकारना पड़ा कि विकसित देशों को प्रतिबद्धता का सम्मान करना होगा. दूसरे, 'जलवायु वित्त' को परिभाषित करने का विषय निर्णय के लिए स्थायी समिति के पास भेजा गया.

तीसरे, सम्मेलन ने 2025 के बाद की अवधि के लक्ष्यों को परिभाषित करने के लिए 'नवीन सामूहिक मात्रात्मक लक्ष्य' पर तदर्थ समिति की नियुक्त की. चौथे, विकसित देश चाहते थे कि उनकी दीर्घकालिक देनदारियां 2027 तक खत्म हो जाएं, लेकिन विकासशील देशों के दबाव में उन्हें इसकी निरंतरता को स्वीकार करना पड़ा. पांचवीं बात, छोटे देशों में क्षमता निर्माण और उन्हें वित्त मुहैया कराने की जरूरत को भी स्वीकारा गया. ग्लोबल एन्वायरनमेंट फैसिलिटी (जीईएफ) को भी एन्हांस्ड ट्रांसपेरेंसी फ्रेमवर्क (ईटीएफ) के तहत लाया गया.

ऊर्जा के लिए कोयले के इस्तेमाल को 'चरणबद्ध तरीके से बंद करने' की बजाए उसे 'चरणबद्ध तरीके से कम करने' के रूप में स्वीकार किए जाने पर जोर देकर भारत के ग्लासगो संधि को कमजोर करने के विवाद पर आपका क्या कहना है?

पेरिस समझौते का मूल सीबीडीआर सिद्धांत में निहित है. निर्णय लिया गया था कि हर देश अपनी राष्ट्रीय परिस्थितियों के आधार पर अपने लक्ष्य तय करेगा. उसमें भी यह निर्णय लिया गया था कि सभी जीवाश्म ईंधनों का उपयोग उत्तरोत्तर बंद कर दिया जाना चाहिए, लेकिन इसमें किसी एक ऊर्जा स्रोत को लक्ष्य नहीं किया गया था. ग्लासगो में जताई गई प्रतिबद्धता के अनुरूप जब हम अपनी ऊर्जा जरूरतों का 50 प्रतिशत अक्षय स्रोतों से प्राप्त करने का लक्ष्य हासिल कर लेंगे तो स्वाभाविक रूप से जीवाश्म ईंधन स्रोतों पर भारत की निर्भरता कम होगी. अधिकांश विकासशील देशों की यही स्थिति है. हमने तर्क दिया कि कोयले के उपयोग जैसी प्रतिबद्धताओं को राष्ट्रीय परिस्थितियों के आधार पर तय किया जाना चाहिए, सो हमने चरणबद्ध तरीके से कमी लाने की बात की.

ऐसी आलोचना भी हुई कि भारत को अवरोधक के रूप में देखा जा रहा है जबकि कोयले के सबसे बड़े उपभोक्ता चीन ने बिना किसी आलोचना के अपनी बात मनवाने को हमारा इस्तेमाल कर लिया.

नहीं. अगर आप बैठक स्थगित होने पर प्रस्ताव की भाषा देखेंगे तो पाएंगे कि भारत और चीन दोनों ने 'अध्यक्षीय सहमति के साथ' वाक्यांश का उपयोग किया था. इससे पता चलता है कि आम सहमति बन चुकी थी. उपस्थित सभी लोग इसका हिस्सा थे. चूंकि सीओपी प्रेसिडेंसी के कथन में परिवर्तन किया जाना था, इसलिए यह आम सहमति के आधार पर होना था. सिर्फ भारत और चीन ही नहीं, कई विकासशील देशों ने इस मुद्दे को उठाया.

पर भारत शब्दावली में बदलाव लाने का प्रस्ताव चीन से करवा सकता था?

पहले उन्होंने इसे प्रस्तावित किया और फिर हमने. दक्षिण अफ्रीका, ईरान, क्यूबा, नाइजीरिया और कई अन्य विकासशील देशों ने भी इस मुद्दे को उठाया.

ग्लासगो संधि में 'कोयले के उपयोग में चरणबद्ध कमी' से संबंधित शब्दावली भारत के लिए इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?

आप रातो-रात कोयले का इस्तेमाल बंद नहीं कर सकते. यह काम 2070 तक धीरे-धीरे किया जाएगा. आज भी अमेरिका और इंग्लैंड ने कोयला उत्पादन बंद नहीं किया है जबकि वे सबसे विकसित देशों में से हैं. अगर उन्हें अपना नेट-जीरो लक्ष्य 2050 तक प्राप्त करना है, तो उन्हें 2030 तक कोयले का उपयोग बंद करने का लक्ष्य प्राप्त करना चाहिए. लेकिन विकसित देश अभी भी इस लक्ष्य को प्राप्त करने में असमर्थ हैं. भूलिए मत कि हमें गांवों में बिजली पहुंचानी है. हम केवल एक स्रोत पर निर्भर नहीं, बल्कि नवीकरणीय ऊर्जा के लिए और अधिक प्रयास करेंगे. भारत पहले ही कुछ क्षेत्रों में ऐसा कर चुका है. रेलवे में कोयले का उपयोग बहुत पहले समाप्त हो चुका है. रेलवे ने विद्युतीकरण भी लगभग पूरा कर लिया है. हमने 36 करोड़ एलईडी बल्ब बांटने का लक्ष्य हासिल किया. भारत की अपनी उपलब्धियां और लक्ष्य हैं.

विकासशील देशों को स्वच्छ प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के लिए विकसित देशों की प्रतिबद्धताओं के बारे में क्या कहेंगे?

जलवायु वित्त, अनुकूलन के लिए एक समिति का गठन, दीर्घकालिक वित्त और नवीन सामूहिक मात्रात्मक लक्ष्यों से संबंधित मुद्दों की पहचान की गई है, लेकिन मुझे लगता है कि इन्हें तत्काल स्वीकार किया जाना चाहिए क्योंकि ऐसा होने पर ही सीओपी की विज्ञान और प्रौद्योगिकी उप-समिति अधिक प्रभावी ढंग से काम कर सकेगी.

ग्लासगो सम्मेलन के प्रमुख मुद्दों में से एक था कार्बन ट्रेडिंग के लिए नियम पुस्तिका को अंतिम रूप देना. क्या यह काम प्रभावी तरीके से किया जा सका?

भारत हमेशा से तर्क देता रहा है कि क्योटो सीओपी के तहत लागू किए गए सर्टिफिकेट ऑफ एमिशन रिडक्शन (सीईएमआर) और स्वच्छ विकास प्रबंधन (सीडीएम) परियोजनाओं के प्रावधान यथावत रहने चाहिए, वरना संगठन की विश्वसनीयता खतरे में पड़ जाएगी. उन प्रावधानों को जारी रखना स्वीकार किया गया, और इससे एक तरह से कई भारतीय कंपनियों को लाभ मिला है. मेरा मानना है कि हमारे प्रधानमंत्री के नेतृत्व में यह एक बड़ी उपलब्धि है.

भारत ने मीथेन का उपयोग चरणबद्ध तरीके से कम करने के समझौते पर हस्ताक्षर क्यों नहीं किया?

मीथेन संबंधी जिम्मेदारी उन लोगों की है जिनकी जीवनशैली में मांस खाना शामिल है. इसके लिए पश्चिमी जीवनशैली अधिक जिम्मेदार है और इसीलिए प्रधानमंत्री ने पर्यावरण-हितैषी जीवनशैली पर जोर दिया. मीथेन के मुद्दे को हमारी प्राथमिकताओं से नहीं जोड़ा जा सकता. एनडीसी के तहत सभी देश कार्बन उत्सर्जन लक्ष्यों को पूरा करने से जुड़े अपने क्षेत्रों का चयन करने के लिए स्वतंत्र हैं. जब हम इस स्वतंत्रता का प्रयोग कर रहे हैं, तो इसका मतलब है कि हम दुनिया के साथ सहयोग कर रहे हैं. हम कभी समस्या पैदा नहीं करेंगे; हम हमेशा समाधान का रास्ता चुनेंगे.

भारत ने वनीकरण समझौते पर हस्ताक्षर क्यों नहीं किया?

हम अपने वन क्षेत्र को 33 प्रतिशत तक बढ़ाने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं और पिछले पांच वर्षों के दौरान हमने पहले से अधिक क्षेत्र का वनीकरण किया है. हम अपने वन क्षेत्रों की जैव विविधता की रक्षा के लिए भी प्रतिबद्ध हैं. और भविष्य में अगर किसी वन भूमि का उपयोग परिवर्तन किया जाता है, तो उसकी भरपाई के लिए अनिवार्य रूप से वनीकरण किया जाएगा.

ग्लासगो सत्र के बाद अब विभिन्न देशों को क्या करना चाहिए?

एकसमान परिस्थितियां पैदा की जानी चाहिए. विकसित देशों को पैसे और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर सरीखे वादे निभाने चाहिए. यह किसी की मदद करने का नहीं बल्कि जिम्मेदारी और कर्तव्य निर्वाह का मामला है. अगर दुनिया को बचाना है, तो जिन्होंने अतीत में सबसे ज्यादा ग्रीनहाउस गैस वायुमंडल में छोड़ी है, उन्हें अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी. दूसरे, हर देश को जलवायु परिवर्तन से निबटने की दिशा में अपनी क्षमताओं और गतिविधियों का विकास करना चाहिए. भारत दुनिया के लिए इसका आदर्श उदाहरण है.

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