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''रेलवे का ढांचा आधुनिक बनाने के लिए निजी क्षेत्र को साथ ला रहे हैं''

हमारी निगाह निर्यात की तरफ है. इन इकाइयों के निगमीकरण से यह मंजिल हासिल करने में मदद मिलेगी. हमें अपने मजदूर संगठनों और कर्मचारियों के साथ रचनात्मक संवाद करना होगा

नवगठित रेलवे बोर्ड के सीईओ विनोद कुमार यादव नवगठित रेलवे बोर्ड के सीईओ विनोद कुमार यादव

नवगठित रेलवे बोर्ड के सीईओ विनोद कुमार यादव ने रेलवे में नई जान डालने को सार्वजनिक-निजी क्षेत्र की भागीदारी की संभावनाओं पर अनिलेश एस. महाजन से बात की. पेश हैं उसके चुनिंदा अंश:

प्र. यात्री ट्रेन चलाने के लिए निजी खिलाडिय़ों को आमंत्रित करने का फैसला रेलवे सुधारों और नियामक की स्थापना की जरूरत की ओर ध्यान दिलाता है. योजना क्या है?

रेलवे की क्षमता 2024 तक बढ़ानी होगी और इसलिए हमने निजी क्षेत्र के साथ साझेदारी की ओर कदम बढ़ाए हैं. लेकिन यह रेलवे का निजीकरण नहीं है. हम डिब्बों और इंजनों के निर्माण में और निवेश की उम्मीद कर रहे हैं. जहां तक नियामक का प्रश्न है, मई 2017 में रेल विकास प्राधिकरण के गठन को लेकर एक नोटिफिकेशन आया था. इसका काम चल रहा है. मार्च 2023 से निजी ट्रेनों का पहला जत्था पटरियों पर दौडऩे लगेगा. तब तक हम नियामक गठित कर लेंगे.

निजी ट्रेनों में किराए कैसे तय होंगे?


माल भाड़ा और यात्री किराए रेलवे बोर्ड के सदस्य (यातायात) ही तय करते हैं. इस सार्वजनिक-निजी उपक्रम में एक बोली प्रक्रिया है. हमने अर्हता आवेदन के दस्तावेज (आरएफक्यू) में कहा है कि निजी खिलाडिय़ों को प्रति किमी के हिसाब से ढुलाई शुल्क के रूप में निश्चित राशि का भुगतान करना होगा. हां, वे किराया, खानपान, विज्ञापन आदि की दरें खुद तय कर सकते हैं. उन्हें कमाई का एक हिस्सा रेलवे को देना होगा. निजी ट्रेनों के किराए भारतीय रेल की ट्रेनों के अनुपात में ही रखने होंगे.

माल ढुलाई के क्षेत्र में आप निजी पूंजी के प्रवाह को कैसे बढ़ाएंगे?
 

रेलवे के साथ क्षमता की कमी की समस्या रही है. एक बार पूर्वी और पश्चिमी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर तैयार हो जाएं तो हम वहां कई ऑपरेटर ला सकते हैं. इसलिए हमें दोनों ऑपरेशन की देखभाल के लिए नियामक की जरूरत है. हम बुनियादी ढांचे के आधुनिकीकरण में निजी क्षेत्र को शामिल करने के लिए धीरे-धीरे कदम बढ़ा रहे हैं.

राइट्स (आरआइटीईएस) रेलवे के मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों के निगमीकरण के लिए रोडमैप तैयार कर रहा था. उसकी क्या स्थिति है?
 

पहली बात, हमारी मैन्युफैक्चरिंग इकाइयां क्षमता बढ़ाने के लिए काफी कोशिश कर रही हैं. पिछले कुछेक सालों में उन्होंने न सिर्फ गुणवत्ता बढ़ाई बल्कि अपना उत्पादन भी सुधारा है. हम पहले से ज्यादा कोच और इंजनों का उत्पादन कर रहे हैं. चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स 6,000 एचपी के इंजन बनाता था. एल्स्टॉम की मदद से हमने 12,000 एचपी के इंजन बनाने शुरू कर दिए. इस साल यहां स्वदेशी 9,000 एचपी के इंजन का विकास किया गया है.

दूसरी बात, हम विविधता लाते हुए मेट्रो के कोच भी बनाना चाहते हैं. तीसरी बात, हमारी मैन्युफैक्चरिंग इकाइयां अपनी प्रत्याशित क्षमता से दोगुने का उत्पादन कर रही हैं, इसलिए अब हमारी निगाह निर्यात की तरफ है. इन इकाइयों के निगमीकरण से यह मंजिल हासिल करने में मदद मिलेगी. हमें अपने मजदूर संगठनों और कर्मचारियों के साथ रचनात्मक संवाद करना होगा.

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