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विधानसभा की कार्यवाही की न्यूनतम समयसीमा तय होः ओम बिरला

राजस्थान के कोटा संसदीय क्षेत्र से दूसरी बार सांसद और संसदीय समितियों से जुड़े रहे बिरला सदनों की कार्यवाही सुचारु रूप से चलाए जाने को लेकर भी फिक्रमंद हैं.

ओम बिरला ओम बिरला

दिल्ली की देहरी पर किसानों ने डेरा डाला हुआ है. संसद में कथित रूप से हड़बड़ी में पारित किए गए कृषि कानूनों को लेकर किसान आंदोलित हैं. इतनी गरमागर्मी के बावजूद संसद का शीतकालीन सत्र बुलाया ही नहीं गया. मिनी संसद मानी जाने वाली संसदीय समितियों में भी राजनैतिक विभाजन बढ़ता दिख रहा है. इस बीच विधानसभाओं के पीठासीन अधिकारियों की तटस्थता-निष्पक्षता पर भी बार-बार सवाल उठे हैं, खासकर दलबदल कानून से जुड़े फैसलों को लेकर.

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की संसद के निचले सदन लोकसभा के अध्यक्ष होने के नाते ओम बिरला का इन मुद्दों से गहरा वास्ता है. राजस्थान के कोटा संसदीय क्षेत्र से दूसरी बार सांसद और संसदीय समितियों से जुड़े रहे बिरला सदनों की कार्यवाही सुचारु रूप से चलाए जाने को लेकर भी फिक्रमंद हैं. इंडिया टुडे के संपादक अंशुमान तिवारी और असिस्टेंट एडिटर सुजीत ठाकुर के साथ ऐसे कई मसलों पर उन्होंने सुचिंतित ढंग से बातचीत की. सदनों की कार्यवाही लगातार बाधित होने के संदर्भ में उनका सुझाव था कि कार्यवाही चलने की न्यूनतम समयसीमा तय होनी चाहिए. प्रस्तुत हैं उनसे बातचीत के प्रमुख अंश:

केवडिय़ा (गुजरात) में पिछले दिनों विधानसभा अध्यक्षों का सम्मेलन हुआ. उनकी निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठते आ रहे हैं. मामला अदालत तक पहुंचता है. पीठासीन अधिकारियों से आपकी चर्चा हुई, उन्हें क्या सुझाव दिए आपने?
दरअसल, दलबदल कानून संविधान की दसवीं अनसूची का है. पीठासीन अधिकारियों ने अपना-अपना पक्ष रखा. ज्यादातर लोगों का मत था कि इस कानून को लेकर हमारे पास असीमित अधिकार होने से कई बार अदालतें टिप्पणी करती हैं और हमारी निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं. राय बनी कि इसके लिए पीठासीन अधिकारियों की एक कमेटी बनाई जाए.

जो सबसे बातचीत करके जाने कि पीठासीन अधिकारियों की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए क्या बदलाव होने चाहिए. सीपी जोशी इसके अध्यक्ष हैं. पीठासीन अधिकारियों के अधिकार सीमित करने के भी सुझाव आए कि कोई पेटिशन आने पर उसका एक तय समय में निबटारा होना चाहिए. अभी विवाद इसलिए होता है क्योंकि कोई पेटिशन जल्द निबटा दी जाती है और कोई लटक जाती है.

यह कमेटी कब तक रिपोर्ट देगी?
उम्मीद है, पीठासीन अधिकारियों के अगले सम्मेलन तब रिपोर्ट आ जाएगी, फिर हम सरकार से रिपोर्ट मंजूर कर उसके लिए बिल लाने का आग्रह करेंगे.

सम्मेलन में संसद और विधानसभाओं में कोई नई परंपरा या व्यवस्था शुरू करने पर चर्चा हुई जिससे लगे कि भागीदारी और पारदर्शिता के लिहाज से हमारा संसदीय लोकतंत्र समृद्ध हो रहा है?
पीठासीन अधिकारियों की पिछले साल की देहरादून बैठक में चर्चा का विषय था कि संसद और विधानसभाओं की कार्यवाही किस तरीके से चले. पक्ष और विपक्ष में असहमति हमारे लोकतंत्र की विशेषता है लेकिन सब अपनी बात कहें, कोई व्यवधान, नारेबाजी न हो, तख्तियां न दिखाई जाएं. कई विधानसभाओं ने इसके लिए कानून बना रखे हैं.

मसलन, छत्तीसगढ़. यानी जैसे ही कोई सदस्य वेल में आएगा, वह अपने आप सस्पेंड हो जाएगा. चूंकि हर विधानसभा अपने आप में स्वायत्त है इसलिए कानून बनाने का अधिकार उनका है. लेकिन हमने कुछ ऐसे नियम बनाने की कोशिश की है जो सभी विधानसभाओं में लागू हों. इसके लिए उत्तर प्रदेश के विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई है, जिसकी रिपोर्ट अगले साल जनवरी-फरवरी में आने की उम्मीद है. फिर हम उस पर चर्चा करेंगे.

अक्सर देखा जाता है कि सरकारें ही कार्यवाही चलाने के पक्ष में नहीं होतीं. विधायी कार्य जल्द निबटाकर सत्र खत्म करवाने की सी मंशा रहती है.
यह हम सबके लिए चिंता का विषय है. विधानसभाएं राज्य में लोकतंत्र का मंदिर हुआ करती हैं. वहां विधायक अपने-अपने क्षेत्र की समस्याओं पर चर्चा करते हैं. इसलिए जरूरी है कि विधानसभा एक निश्चित समयावधि के लिए तो चले ही. पीठासीन अधिकारियों से अब तक की चर्चा में सहमति बनी है कि कार्यवाही चलने की एक न्यूनतम समय सीमा तय हो.

यानी हम मानें कि आपके नेतृत्व में विधानसभाओं की कार्यवाही चलने की न्यूनतम समय सीमा तय होगी.
इसका फैसला तो सरकार लेगी, लेकिन हम राज्य सरकारों से आग्रह करेंगे कि विधानसभा चलने की न्यूनतम समयसीमा तय की जाए.

किसान आंदोलन चल रहा है. यह देखा गया कि नए कृषि कानून को लेकर संसद में विस्तारपूर्वक चर्चा नहीं हुई और बिल पास कर दिए गए. कई बार चर्चा पूरी हुए बिना देर रात को संसद की कार्यवाही खत्म कर दी गई. क्या इससे बचने का कोई रास्ता है?
आप कई बिलों को लेकर बात कर रहे होंगे. किसान बिल को लेकर भी, जम्मू-कश्मीर में 370 को लेकर भी. लेकिन मैं कहना चाहूंगा कि एक दिन में एक बिल पर चर्चा के लिए चार घंटे का समय आबंटित होता है. हमने इस पर 5.36 घंटे चर्चा की. अन्य विधेयकों पर भी तय समय से अधिक बल्कि कई पर तो दोगुना समय तक चर्चा हुई. तो हमें लगता है कि सदन में हमने पर्याप्त समय दिया.

यह भी देखने में आया है कि सरकारें कई बिल मनी बिल के रूप में पेश कर पास करा लेती हैं. फिर विशेषज्ञ उस पर सवाल उठाते हैं. क्या आप यह परंपरा बढ़ते हुए देख रहे हैं? 
संविधान के अनुच्छेद 110 में बिल्कुल स्पष्ट है कि कौन-सा मनी बिल होना चाहिए, कौन-सा नहीं. उससे बाहर जाकर कोई किसी भी बिल को मनी बिल नहीं बना सकता. 


किसी सांसद को जब सदन से बाहर किया जाता है तो आप स्पीकर के रूप में कैसा महसूस करते हैं?
मेरे लिए वह सबसे पीड़ा का क्षण होता है जब किसी सदस्य को बाहर करने के लिए कहना पड़ता है क्योंकि एक-एक माननीय सदस्य सदन में लाखों लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं. मेरी अपेक्षा रहती है कि वे सदन में अपनी बात रखें, चर्चा करें और एक आदर्श सांसद के रूप में काम करें.

आप सांसदों के कस्टोडियन भी हैं लेकिन सार्वजनिक जीवन में अपने कार्यों और बयानों आदि के चलते कई सांसदों का आचरण बहुत खराब रहता है. इस बारे में आप क्या सोचते हैं?
यह व्यक्ति-अभिव्यक्ति की बात है लेकिन मेरा मानना है कि देश में सांसदों को अपने आचरण का ध्यान रखना चाहिए और एक आदर्श सांसद के रूप में खुद को प्रस्तुत करना चाहिए.

संसदीय समितियों के कामकाज से आप कितने संतुष्ट हैं? चर्चा होती रही है कि संसदीय समितियां अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभा पातीं, उनमें गहरे राजनैतिक विभाजन भी दिखते हैं. आश्वासन समिति की सिफारिशें लागू नहीं होतीं, 75 से 80 फीसद सिफारिशें तो लंबित रह जाती हैं.
लोकतंत्र में संसदीय समितियों की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका है. एक तरह से वे मिनी पार्लियामेंट हैं. उनमें दल और विचारधारा से ऊपर उठ कर चर्चा होती है. कई समितियों में हम जनता को भी बुलाते हैं, उनकी राय लेते हैं. मुझे लगता है कि इस बार स्थायी समिति का रिपोर्ट चार्ट सबसे बहेतर रहा है. लोकसभा की संसदीय समितियों की 269 बैठकें हुईं. इसमें 305 विषय चुने गए थे, 128 रिपोर्ट पेश की गईं, 1,397 सिफारिशें की गई.

पर सवाल यही है कि सिफारिशें लागू ही नहीं हो पातीं. कृषि को ही लें, इस मामले में जितनी सिफारिशें की गईं उसका 75-80 फीसद माना ही नहीं गया.
ऐसा नहीं है. 75-80 फीसद सिफारिशें मानी जाती हैं. सरकार अधिकतम सिफारिशें मानती है. जिन सिफारिशों को नहीं माना जाता, समिति उन पर दोबारा चर्चा करती है. सरकार की तरफ से सिफारिशें न मानने की वजह बताई जाती है और उन वजहों से समिति के सहमत न होने तक चर्चा चलती है.

सदनों में प्रश्नकाल को लेकर अजीब स्थित देखने को मिल रही है. कई क्षेत्रों को प्रश्नकाल से बाहर कर दिया जाता है. आपको नहीं लगता कि संसद में प्रश्नकाल का समय बढ़ाया जाना चाहिए? दूसरे, प्रश्नों के चयन में लॉटरी सिस्टम को लेकर भी विवाद रहता है और निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं.
मुझे नहीं लगता कि संसद में इस पर सवाल उठे हैं क्योंकि हमारे यहां पारदर्शी व्यवस्था है. संसद के अंदर लॉटरी खुलते समय कोई न कोई माननीय सदस्य मौजूद रहता है. कोई प्रश्न स्वीकार न किए जाने पर उसकी वजह बतानी होती है. रही बात प्रश्नकाल का समय बढ़ाने की तो प्रश्नकाल के अलावा भी कई विकल्प हैं जैसे ध्यानकर्षण प्रस्ताव, शून्यकाल. इनमें भी सांसद सवाल और मुद्दे उठाते हैं. पहले 377 के तहत आए प्रश्नों का उत्तर लंबे समय तक नहीं मिलता था, अब महीने भर में मिल जाता है.

एक बात और जो सीएजी की रिपोर्ट में ही आ रही है कि बजट पर संसद का नियंत्रण धीरे-धीरे कम होता जा रहा है. सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि जो वोटेड एक्सपेंडिचर है और चार्ज्ड एक्सपेंडिचर है, उसमें फासला बढ़ रहा है. सरकार कंसॉलिडेटेड फंड से एक्सपेंडिचर चार्ज कर फंड निकाल लेती है. वोटेड एक्सपेंडिचर कम होता जा रहा है. दूसरा यह है कि जीएसटी के साथ कई जगह विशेषज्ञों ने सवाल उठाए कि टैक्सेशन की पूरी व्यवस्था, जो डेमोक्रेसी का फंडामेंटल सिस्टम है कि रिप्रजेंटेटिव और टैक्सेशन साथ-साथ चलते हंल वह प्रक्रिया संसद के नियंत्रण से बाहर होकर एक काउंसिल के पास पहुंच गई है.


मुझे नहीं लगता कि मेरे कार्यकाल में कभी ऐसा हुआ. हमारी कोशिश रहती है कि वित्त विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा हो. इसलिए आप देखेंगे कि जब कंसोलिडेटेड फंड से निकलना हो, ज्यादा देर तक चर्चा की, सारी प्रक्रियाओं को नियमित करने का प्रयास किया. हमने यह पूरी कोशिश की कि सदन की जो भी वित्तीय प्रक्रिया हो उसका पालन किया जाए.

आप लोकसभा अध्यक्ष होने के साथ ही सांसद भी हैं. आप अपने क्षेत्र की जनता के साथ न्याय कैसे कर पाते हैं?
देखिए, हमें जनता ने चुनकर भेजा है, इसलिए उनका हक सबसे पहले है. अपने संवैधानिक दायित्व निभाने के अलावा मैं क्षेत्र की जनता के विकास के लिए काम करता हूं. उनके सुख-दुख में उनके घर पहुंचता हूं.

लोकसभा में पिछले दिनों यह दिखा कि सांसद और मंत्री मोदी-मोदी के नारे लगा रहे हैं. इसको आप व्यन्न्तिगत रूप से और स्पीकर के रूप में कैसे देखते हैं?
संसद के अंदर सदन गरिमा के साथ चलना चाहिए. हम कोशिश करते हैं कि चाहे सîाा पक्ष के लोग हों या विपक्ष के, वे संवैधानिक मर्यादाओं का ध्यान रखें, संसद की मर्यादा के तहत आचरण करें.

लोकतंत्र में विपक्ष की बहुत बड़ी भूमिका है. स्पीकर को विपक्ष के अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए. लेकिन खासकर विधानसभाओं में दिखता है कि स्पीकर विपक्ष की जगह सरकार के साथ खड़े दिखते हैं, विपक्ष के अधिकारों का संरक्षण नहीं होता, इसलिए वह अपनी बात सड़क पर जाकर कहता है. यह संतुलन बनाने में आपको कितनी दिन्न्कत आती है?
जब उस आसन पर बैठते हैं तो उसकी अपनी मर्यादा है. सभी पीठासीन अधिकारियों को उस आसन की मर्यादा के अनुसार काम करना चाहिए. सत्तापक्ष हो या विपक्ष, सारा सदन स्पीकर से अपेक्षा करता है कि उसके अधिकारों का संरक्षण करे. उनको अपनी बात कहने का पर्याप्त अवसर मिले. आसन का आचरण न्यापूर्ण हो भी और न्यायपूर्ण दिखे भी.

हर लोकसभा अध्यक्ष की यह मंशा रहती है कि वह आने वाली पीढ़ी के लिए कोई मिसाल कायम करके जाए. आपकी ऐसी क्या ख्वाहिश है?
संसद लोकतंत्र का मंदिर है. इस पर लोगों का भरोसा बढऩा चाहिए. मेरी हमेशा कोशिश रहती है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति लोगों का भरोसा और बढ़े. मैं चाहता हूं कि जनता से चुनकर आए प्रतिनिधियों को जनता की बात रखने का पर्याप्त मौका मिले. 

‘‘दलबदल कानून के मामले में पीठासीन अधिकारियों के पास असीमिति अधिकार होने से निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं. निष्पक्षता बनाए रखने के लिए बदलाव सुझाने को एक समिति बनाई गई है’’

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