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‘‘नेतृत्व तो सर्वव्यापी है बस दिखता नहीं है’’

पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी कांग्रेस के उस 'ग्रुप 23(जी-23)’के नेता रहे हैं जिसने 2020 में सोनिया गांधी को पत्र लिखकर पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठाए थे. कौशिक डेका के साथ बातचीत में वे बता रहे हैं कि क्यों कांग्रेस को वैचारिक और संगठनात्मक ढांचा फिर से तैयार करना चाहिए .

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मनीष तिवारी मनीष तिवारी

बातचीतः मनीष तिवारी

प्र. कांग्रेस को राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर बीते आठ साल में कोई सफलता क्यों नहीं मिल पाई है ?

यही वह वजह है जिसके लिए चिंतन और मंथन जरूरी हैं. 2004 से 2014 के बीच जब यूपीए सत्ता में रहा तो दस साल पार्टी नेतृत्व की सामूहिक ऊर्जा को काफी खर्च किया. पार्टी संगठन पर, खासकर यूपीए के मंत्रियों की तरफ से पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया.

अगर कांग्रेस पार्टी और सरकार में कांग्रेस के लोगों के बीच बेहतर समन्वय होता तो 1991 से 2004 के बीच पार्टी में जो कमजोरियां आई थीं, उनको दूर किया जा सकता था. इसके अलावा यह बात भी है कि 2011 से पार्टी के शीर्ष स्तर पर जो पीढ़ीगत बदलाव शुरू किया गया उसके भी अच्छे नतीजे नहीं आए.

पार्टी में निष्पक्ष, पारदर्शी और विश्वसनीय चुनावी प्रक्रिया की जरूरत है. जो लोग संगठन में 30-40 साल बिता चुके हैं और भाजपा के दिग्गजों से 24X7 दो-दो हाथ करने को तैयार हैं, उन्हें आगे आना चाहिए. दूसरी पार्टियों से लाने और उनकी बड़े पदों पर तैनाती रोकने की जरूरत है.

 कांग्रेस एक स्पष्ट राजनैतिक विचारधारा नैरेटिव लोगों के सामने रखने में असफल हो चुकी है. कभी वह न्याय के जरिए आर्थिक समावेशीकरण की बात करती है तो कभी नरम हिंदुत्व की ओर झुकाव दिखाने लगती है.

किसी भी संगठन के लिए पांच बुनियादी तत्वों की जरूरत होती है, जो अपने आप में गतिमान होते हैं लेकिन चुनावों में और राष्ट्रीय स्तर पर संगठन को प्रासंगिक बनाने के लिए समन्वय के साथ काम करते हैं. ये तत्व हैं—विचारधारा, नैरेटिव (विचारधारा को अभिव्यक्त करने का तरीका), संगठन, संसाधनों तक पहुंच और नेतृत्व. कांग्रेस के मामले में आज इन पांचों मोर्चों पर चुनौती है.

 कांग्रेस पर आरोप लगाया जाता है कि वह अल्पसंख्यकों या मुसलमानों की तरफदारी करती है लेकिन आज मुसलमान भी पार्टी को वोट नहीं दे रहे. ऐसा क्यों?

पिछले आठ साल की यह असल त्रासदी रही है. बदकिस्मती से हर बात को हिंदू-मुस्लिम की बाइनरी (दो पक्षों) से जोड़ने का काम किया गया है. अभी की सत्तारूढ़ व्यवस्था का मानना है कि वह समाज के एक हिस्से को लगातार हाशिए पर रखते हुए और धार्मिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देते हुए हमेशा में सत्ता में बने रहेंगे.

यह अदूरदर्शी राजनीति इस देश को कई टुकड़ों में बांट देगी. यह एक मिथ है कि कांग्रेस एक समुदाय की कीमत पर दूसरे की तरफदारी करती है. हालांकि अगर हम इस बात से इनकार करें कि विरोधी हमारी इस तरह की छवि बनाने में सफल रहे हैं तो यह खुद को धोखे में रखना होगा. कांग्रेस को अपने 'आइडिया ऑफ इंडिया’के प्रति सच्चा रहना चाहिए जो कहता है कि हर भारतीय चाहे वह किसी भी क्षेत्र, जाति, धर्म या फिर किसी रूप में शारीरिक रूप से अक्षम है, भारतीय गणतंत्र में बराबरी का हिस्सेदार है.  

 कांग्रेस को जमीनी स्तर पर अपना संदेश पहुंचाने के लिए इस स्तर पर मजबूत संगठन बनाने की जरूरत है लेकिन वह ऐसा करने में असफल क्यों है ?

कांग्रेस में पदाधिकारी हैं, लेकिन राजनैतिक पार्टी का अर्थ यह नहीं होता. कुछ विशेष स्तर बना देना, उन्हें विशेष नाम दे देना, संगठन इसके आगे बहुत कुछ होता है. 

 क्या आपको लगता है कि कांग्रेस किसी ऐसे नेता को आगे बढ़ाने में असफल रही है जो लोकप्रियता में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टक्कर दे सके?

2024 में नेतृत्व का सवाल सबसे अहम है. नेतृत्व पूरी तरह से मौजूद है लेकिन वह दिख किसी को नहीं रहा. चाहे हम अलग-अलग देखें या संयुक्त रूप से, विपक्ष के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है. 2022 का राष्ट्रपति चुनाव विपक्ष को अपना एक  संयुक्त उम्मीदवार खड़ा करने का मौका देगा, संभव है कि यही उम्मीदवार 2024 में प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार भी बन जाए. 

लेकिन इसकी पूर्व शर्त है कि विपक्ष किसी एक वरिष्ठ राजनेता को चुने और सभी पार्टियों के लिए स्वीकार्य हो. अगर विपक्ष राष्ट्रपति चुनाव के लिए कोई संयुक्त उम्मीदवार चुनने में असफल रहता है तो भी उसके पास एकजुट होने के लिए सालभर का वक्त रहेगा. 

 क्या कांग्रेस क्षेत्रीय पार्टियों के नेताओं की महत्वाकांक्षाओं के चलते उनसे किनारा कर रही है या फिर इसके पीछे खुद कांग्रेसी नेताओं का अहम आड़े आ रहा है? 
 
विपक्ष के नेताओं को एक बुनियादी सवाल का जवाब देना चाहिए—वे किस लक्ष्य के लिए लड़ रहे हैं? संविधान के जरिए बनाए गए भारत के लिए या फिर सरकार में होने से जुड़े फायदों के लिए? एक बार वे इसका जवाब खोज लेंगे तो फिर बाकी सब ठीक हो जाएगा. इसमें दो राय नहीं कि कांग्रेस को नेतृत्व के मसले पर बड़प्पन और लचीलापन दिखाने को तैयार रहना चाहिए.

 बीते दो साल में कई युवा नेता कांग्रेस को छोड़ चुके हैं.

इसके पीछे दो कारक हैं. पहला है विचारधारा को लेकर प्रतिबद्धता की कमी. कांग्रेस में स्पष्ट दर्शन या विचारधारा का जो आधार है वह बीते सालों के दौरान उखड़ा है इसके चलते पार्टी कुछ लोगों के लिए वह जरिया बन गई जिससे वे सरकारी महकमों में ऊंची जगह पा सकें.

ऐसे में नई पीढ़ी के वे लोग जिनमें वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं थी और जो सिर्फ सत्ता के विचार से चलते थे उन्हें लगा कि छोटे से अंतराल में उनकी महत्वकांक्षाएं पूरी नहीं हो सकतीं और उन्होंने पाला बदल लिया. दूसरा कारक है उम्मीद खत्म होना. उम्मीद खत्म होती है तो बेचैनी बढ़ती है और लोग अपने हितों के बारे में सोचने लगते हैं. इससे भी नई पीढ़ी के लोग डरे और उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी. ठ्ठ

''निष्पक्ष, पारदर्शी और विश्वसनीय चुनाव प्रक्रिया की जरूरत है, जो लोग भाजपा के दिग्गजों से 24X7 दो-दो हाथ करने को तैयार हैं उन्हें आगे आना चाहिए’’.

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