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तेजस्वी यादव-मेरे ट्वीट से डरते हैं नीतीश कुमार

राष्ट्रीय जनता दल के मुखिया लालू प्रसाद यादव चुनाव प्रचार नहीं कर रहे हैं. उनके 29 वर्षीय बेटे तेजस्वी यादव एनडीए के खिलाफ विपक्षी गठबंधन की अगुआई कर रहे हैं

तेजस्वी यादव तेजस्वी यादव

बिहार में लोकसभा की 40 सीटें इसे बेहद अहम राज्य बना देती हैं. दूसरे, 1977 के बाद पहली बार राष्ट्रीय जनता दल के मुखिया लालू प्रसाद यादव चुनाव प्रचार नहीं कर रहे हैं. वे चारा घोटाले के मामलों में सजा सुनाए जाने के बाद रांची में न्यायिक हिरासत में हैं. उनकी गैरमौजूदगी में उनके 29 वर्षीय बेटे तेजस्वी यादव एनडीए के खिलाफ विपक्षी गठबंधन की अगुआई कर रहे हैं. अमिताभ श्रीवास्तव के साथ इंटरव्यू के अंशः

प्र. आप राजद प्रमुख के बेटे हैं. सियासी और निजी दोनों स्तरों पर लालू प्रसाद यादव की कमी कितनी खलती है?

आप लालू जी को बिहार से दूर रख सकते हैं, पर आप बिहारियों को लालू जी से दूर नहीं रख सकते. उन्हें इसलिए प्रताड़ित किया जा रहा है क्योंकि वे सामाजिक न्याय और सेकुलरिज्म के लिए समर्पित हैं और भाजपा इन्हीं दोनों चीजों से डरती है. यह पहला चुनाव है जब वे स्वयं साथ नहीं हैं. पब्लिक मीटिंग में मैं जब भी लालू जी के बारे में बोलता हूं, मैं देखता हूं, लोग उनके लिए कितने चिंतित हैं. निजी तौर पर उदासी का एहसास है, पर हकीकत हम जानते हैं. वे राजनैतिक प्रतिशोध की वजह से (यह सब) झेल रहे हैं. हम जानते हैं कि ये कौन-सी सियासी ताकतों ने उनके खिलाफ साजिश की पर उनकी इच्छाशक्ति तोडऩे में नाकाम रहे.

आप इसे 'राजनैतिक प्रतिशोध' क्यों कहते हैं? यह तो कानूनी प्रक्रिया थी...

मैं 6 अप्रैल को रांची उनसे मिलने गया तो मिलने नहीं दिया गया, कोई कारण भी नहीं बताया गया, बावजूद इसके कि वह शनिवार का दिन था जो जेल प्रशासन ने मुलाकातों के लिए तय किया है. मुझे पत्रकारों और डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें मेडिकल जांच की जरूरत थी तो रांची मेडिकल कॉलेज के कैंपस के भीतर ही बगल की बिल्डिंग में ले जाने के लिए डॉक्टरों के सामने सुरक्षा की आड़ में दिक्कतें पैदा की गईं. लालू जी वहां इलाज के लिए ही हैं, पर वह भी उन्हें नहीं दिया जा रहा. यही नहीं, प्रशासन ने उनसे सभी मिलने आने वालों पर 20 अप्रैल से रोक लगा दी है. राजनैतिक विरोध ठीक है, पर यह अमानवीय है.

महागठबंधन के नेता के नाते आपको नीतीश, सुशील मोदी, रामविलास पासवान सरीखों के मुकाबले खड़ा किया गया है. इस तरह शुरुआत तो बड़ी कठिन..

(तंज कसते हुए) हां, (नीतीश कुमार) बहुत बड़े हैं, इसीलिए तो मेरे ट्वीट से डरते हैं.

शायद मैं पहला शक्चस हूं जिसके खिलाफ 29 की उम्र में ही सीबीआइ, ईडी और आयकर विभाग एक साथ टूट पड़े हैं. कई नेताओं को करियर के आखिर में इसका सामना करना पड़ता है, मेरे करियर की शुरुआत में ही वे पीछे पड़ गए हैं. इससे मैंने बहुत कुछ सीखा.

जमीन पर राजद 31 फीसदी मुसलमानों और यादवों के मजबूत वोट बैंक के साथ शुरुआत कर रहा है. मगर बिहार की 40 में से 19 सीटों पर लड़ रहा है. गठबंधन के भागीदार जीतनराम मांझी, मुकेश सहनी और उपेंद्र कुशवाहा अभी आजमाए नहीं गए हैं. मुमकिन है वे अपने वोट ट्रांसफर न करवा पाएं. कुशवाहा, मांझी 2015 में नाकाम हुए थे.

2015 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को धूल चटाई थी और वह चुनाव महागठबंधन ने भारी बहुमत से जीता था. मांझी जी पूर्व मुख्यमंत्री और दलित नेता हैं. कुशवाहा जी अति पिछड़ी जातियों के रहनुमा हैं. सहनी जी अपना पहला चुनाव लड़ रहे हैं. मगर नतीजे उनकी काबिलियत साबित कर देंगे.

लग यह रहा है कि राजद अपने वोट सहयोगी दलों को ट्रांसफर कर रहा है, पर वे राजद के लिए ऐसा नहीं कर पा रहे.

मुझे उम्मीदवारों और स्वतंत्र स्रोतों से लगातार फीडबैक मिल रहा है, सबका कहना है कि न सिर्फ वोट ट्रांसफर हो रहे बल्कि गठबंधन के भागीदार भी पूरे तालमेल से काम कर रहे हैं.

नीतीश कुमार की तरफ से सुलह की पेशकश स्वीकार न कर पाने पर आपको अफसोस होगा? 2015 के चुनाव में हम देख चुके हैं कि राजद-जेडी(यू) की ताकत अजेय है.

अफसोस क्यों? आप देखे ही कि क्या हुआ. नीतीश जी ने पाला बदल लिया. भाजपा ने उन्हें मजबूर कर दिया था. उन्हें बहाने की जरूरत थी, तो हमारे खिलाफ भ्रष्टाचार के नए मामले दर्ज किए गए. उन्हें अपनी छवि का बहुत ख्याल रहता है. लेकिन वे हमेशा से जानते थे कि लालू जी के पास उनके खिलाफ मामले थे. तो भी उन्होंने विधानसभा चुनाव के लिए हमसे हाथ मिलाया और फिर जुलाई 2017 में हमें धोखा दिया क्योंकि भाजपा सृजन घोटाले में उनके खिलाफ कार्रवाई कर सकती थी.

2014 में तिकोना मुकाबला था. 2019 का चुनाव एनडीए बनाम गठबंधन की लड़ाई है. इसमें 31 फीसदी यादव-मुसलमान वोट काफी नहीं भी हो सकते.

हमारी पार्टी सबके लिए है. 2014 के फैसले के आधार पर विश्लेषण करने से आप गलत नतीजों पर पहुंचेंगे. 2014 में नीतीश जी का फैस वैल्यू था. तो भी एनडीए और राजद-कांग्रेस गठबंधन के खिलाफ चुनाव लड़ा तो उनके करीब 30 उम्मीदवारों ने जमानतें गंवाईं. लोग यह भी देख चुके हैं कि मोदी सरकार ने एक सपना दिखाया था और सामने आया दुस्वप्न. बिहार पैकेज कहां है? नौकरियां कहां हैं? 2014 में वोट लेने के लिए वे पिछड़े वर्गों के हक में बोलते थे पर काम उन्होंने कुलीनों के लिए किया. भाजपा नेता आजीविका, नौकरियों, लोकतंत्र और पिछड़ों को ताकतवर बनाने के सवालों पर चुप हैं. लोग उन्हें अपने वादों से मुकरने की सजा देंगे.

राजद प्रत्याशियों के खिलाफ दो प्रत्याशी उतारे हैं आपके भाई तेज प्रताप ने.

अगर लोग चुनाव लडऩा चाहते हैं तो वे लड़ेंगे. पार्टी और वे (तेज प्रताप) भी, दोनों भाजपा को हराना चाहते हैं. बात बस इतनी है कि उन्हें यकीन है, कोई दूसरा उम्मीदवार ऐसा करने में ज्यादा असरदार होगा. लेकिन पार्टी किसी दूसरे में यकीन करती है. लोकतंत्र में तो ऐसा होता है.

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