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‘‘लॉकडाउन में कई दरवाजे खुले भी’’

अपने समय की समृद्ध अनुभव वाली अभिनेत्रियों में से एक अमृता सुभाष से एसोसिएट एडिटर शिवकेश मिश्र की बातचीत:

अमृता सुभाष अमृता सुभाष

मुझे लगता है, मैं एक स्टार बनने के रास्ते पर हूं.’’ 2005 में मई की एक शाम पुणे के अपने घर पर इंडिया टुडे से बातचीत में यूं ही मजाकिया अंदाज में बोल गई थीं अमृता सुभाष. तब वे यही कोई 25 की थीं. आज बेशक वे मराठी सिनेमा और रंगमंच की स्टार हैं. और हिंदी सिनेमा तथा रंगमंच के दर्शकों के माइंडस्केप में भी वे तेजी से जगह बना रही हैं. पिछले साल की चर्चित फिल्म गली बॉय में मुराद (रनवीर सिंह) की मां रजिया का अपेक्षाकृत ज्यादा उम्र का किरदार उम्दा ढंग से निभाने के लिए उन्होंने फिल्मफेयर अवार्ड (सहायक भूमिका/स्त्री) जीता.

2002-03 में सागर सरहदी की चौसर उनके और नवाजुद्दीन सिद्दीकी के लीड में होने के बावजूद रिलीज तक न हो सकी थी, पर उन्हीं नवाज के साथ वेब सीरीज सैक्रेड गेम्स-2 की खुर्राट रॉ एजेंट कुसुम देव यादव के भेस में उन्होंने खासी हलचल मचाई. अनुराग कश्यप की हाल ही रिलीज चोक्ड की वे शरवरी ताई थीं. ‘स्टार’ वाले उस बयान के 15 साल बाद, मुंबई में बांद्रा के अपने फ्लैट से बतियाते हुए वे सिर्फ सीखने की बातें करती हैं.

मक्के और बाजरे की भाकरी बनाना सीख लेने पर उन्हें अभिनेत्री मां ज्योति सुभाष से शाबाशी भी मिली है. रंगकर्मी पति संदेश कुलकर्णी के साथ घर में ही सिनेमाटोग्राफी सीखकर उन्होंने कैडबरी का ऐड भी बना डाला. साथी रंगकर्मी ओम भुतकर से उर्दू सीखनी शुरू की है. ''निर्मला (मुंशी प्रेमचंद का उपन्यास) को फिल्माते वक्त (2004 में) गुलजार साहब ने बहुत कहा था सीखने को पर तब छोटी थी, ध्यान ही नहीं दे पाई.’’ रंगकर्म के उनके गुरुओं सत्यदेव दुबे, विजय तेंडुलकर और नसीरुद्दीन शाह से मिले सबक अब किसी रहस्य की तरह उनके सामने खुल रहे हैं. मराठी और हिंदी दोनों में वे अनुवाद भी कर रही हैं. अपने समय की समृद्ध अनुभव वाली अभिनेत्रियों में से एक अमृता से एसोसिएट एडिटर शिवकेश मिश्र की बातचीत:

● लॉकडाउन के दौरान खासकर सिनेमा की दुनिया के लिए यह वक्त धीरे-धीरे डरावना बनने लगा है? काम आपका भी रुका हुआ है, व्यस्त रहने की आपने क्या युक्ति निकाली है?

हां, लोगों की नौकरियां जा रही हैं. सचमुच बड़ा डरावना वक्त है. लेकिन मैं मेडिटेशन करके कोशिश करती हूं कि सकारात्मक बनी रहूं. मैंने सोचा क्यों न कुछ नया सीखा जाए. संदेश (पति) को कैडबरी का एक ऐड बनाने को मिला था. लॉकडाउन में मैंने सिनेमाटोग्राफी सीखी. अविनाश अरुण (निर्देशक, मराठी फिल्म किला, 2014) को फोन लगाकर फ्रेमिंग के बारे में पूछा. और घर पर ही आइफोन से शूट करके वह विज्ञापन बना डाला.

इसके अलावा ट्राइपॉड पर प्रॉपर कैमरा लगाना, लेंस और फिल्टर बदलना, खुद का विग लगाना, खुद का अच्छे से मेकप करना, सब सीखा. रसोई में भाकरी (मराठी व्यंजन) भी बनाई. ड्राइवर गांव गया है तो अब शायद ड्राविंग भी करनी पड़े. तो कोरोना ने एक तरह से काफी आत्मनिर्भर बना दिया. और कुछ नहीं तो किताबें पढ़ती रहती हूं. अभी एलिया कजान की एक बायोग्राफी हाथ लगी है. मेरे अफेयर्स ऐसे ही चलते रहते हैं (खिलखिलाते हुए). दूसरी ही दुनिया में खो जाती हूं. कहीं बाहर जाते हुए संदेश मुझसे कहता है, ‘‘तू किसी और दुनिया में चली जाती है.’’

● लॉकडाउन के दौरान नेटफ्लिक्स पर रिलीज, नोटबंदी पर बनी अनुराग (कश्यप) की चोक्ड ने राहत दी होगी.

ये तो प्लीजेंट सरप्राइज था. शरवरी ताई का मेरा किरदार लोगों को अच्छा लगा. पिछले साल शूटिंग के वक्त हमने सेट पर बहुत हंसते-खेलते काम किया था. कुछ चीजों के लिए अचरज भी हुआ. आपने देखा होगा, एक शॉट में मैं रोती हूं और रोना छोड़के एकदम से...वह शॉट करके मैंने नवाजुद्दीन (सिद्दीकी) को फोन किया. रमन राघव 2.0 में उसका ऐसा ही शॉट था, जिसमें वह रोते-रोते खिड़की से बाहर देखता है और अचानक...मुझे लगा मैंने वैसा कुछ किया क्या. अनुराग की दूसरी फिल्मों की तरह इसके किरदार भी ग्रे शेड वाले हैं.

● इसके स्त्री किरदार, लगता है पार्टनर इन क्राइम हैं!

हां वो भी है. हमारे मराठी में एक शब्द है भटक भवानी. मेरे एक दोस्त ने बोला कि तुम सारी आपस में भटक भवानी थीं.

●लॉकडाउन के दौरान ओटीटी पर अभी आपकी और कौन-सी फिल्में या वेब सीरीज आने वाली हैं?

एक बड़ी निर्देशिका के साथ सीरीज की है पर उसका खुलासा नहीं कर सकती. उसका किरदार गली बॉय से भी अलग है. मैं खुशकिस्मत हूं कि डायरेक्टर मुझे स्लॉट नहीं कर रहे हैं. किरदार पूरा अलग हो तो फ्रेशनेस रहती है. इसके लिए मुझे डांस सीखना पड़ा. कभी किया नहीं था. बहुत डर लगा. लेकिन डर लगते रहना चाहिए आपको. इससे आप कंफर्ट जोन से बाहर आते हैं. आप चौकन्ना होकर चलते हैं कि भई गिर न पड़ूं कहीं.

●और एक फिल्म भी तो आने को है?

हां, अक्षय बालसराफ की मराठी फिल्म है परिणति. यह भी किसी ओटीटी पर आएगी. एक एल्कोहलिक औरत की भूमिका है. इसमें मुझे सिनेमा इंडस्ट्री की की सबसे उम्दा डांसर्स में से एक सोनाली कुलकर्णी (नटरंग वाली) के साथ डांस करना पड़ा. अक्षय भी फर्स्ट टाइम डायरेक्टर हैं.

●लगता है मराठी फिल्मों के डेब्यू डायरेक्टर्स की आप पसंदीदा अभिनेत्री हैं.

हां, यह भी एक संयोग है. श्वास (2004 में ऑस्कर के लिए भारत की आधिकारिक प्रविष्टि/ राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता) संदीप सावंत की पहली फिल्म थी, वडू (2008) उमेश कुलकर्णी की और किला (2014) अविनाश अरुण की. इसी तरह से अक्षय. ये जो नए लड़के आ रहे हैं सिनेमा में, उम्र में छोटे-छोटे लगते हैं, लेकिन उन्हें कितनी बड़ी बात और अलग बात कहनी है. वे वह नहीं कहेंगे जो हर कोई सुनना चाहता है. हमारे समाज में तो एल्कोहलिक औरत को अब भी बुरा मानते हैं. लेकिन भाई उसके भी कुछ दुख हैं, वह क्यूं जा रही है उस रास्ते पर. हमारी इंडस्ट्री में ये नई प्रतिभाएं बहुत ढाढस (उम्मीद) पैदा कर रही हैं. देखना है लोग इसे कैसे लेते हैं.

●आप तो शुरू से सिनेमा और थिएटर के दिग्गजों के साथ काम करती आई हैं. सागर सरहदी, कुंदन शाह, सत्यदेव दुबे, वामन केंद्रे. मराठी थिएटर के समकालीन मिथक डॉ. श्रीराम लागू का आपके घर आना-जाना था. अब अनुराग कश्यप और जोया अख्तर. इन लोगों से वे क्या चीजें मिली हैं जो आपको खुद में खास महसूस कराती हैं?

इसमें दो नाम और जोड़ूंगी: एक तो नसीरुद्दीन शाह और दूसरे विजय तेंडुलकर. संयोग से नसीर सर और मेरी मां राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में एक बैच (1973) में थे और मैं और नसीर सर की बेटी हिबा एक बैच (1999) में. वे जब पढ़ाने आते तो बताते कि बेटा, सब चीजें तय मत करो. एक मिस्ट्री रखो ना. सामने वाला कोएक्टर कुछ और कर दे तो फिर उस हिसाब से रिएक्ट करके भी तो उसका मजा ले सकते हो. सब तय कर लोगे तो मजा कैसे लोगे? ये बात हमें पिछले दिनों पृथ्वी थिएटर में अपने नाटक फिर से हनीमून का शो करते वक्त समझ आई.

उनको मैंने मैसेज किया. तेंडुलकर साहब मेरी जिंदगी को पटरी पर लाने वाले शख्स थे. पिताजी को अल्झाइमर्स डिटेक्ट होने पर मैं डिप्रेशन से गुजर रही थी. उन्होंने साइकोथेरेपी का रास्ता दिखाया. उसने लॉकडाउन में भी मेरी मदद की है. वे बताते थे कि ‘बेटा, जब दुख आता है तो उसके सामने खड़े रहो और उससे बड़े हो जाओ.’ तब वह मुझसे नहीं हो पाता था पर अब समझ पाती हूं. इसी तरह से दुबे जी की बातें. इन लोगों की दी हुई चाभियां मेरे पास पहले से थीं लेकिन उनसे दरवाजे अब खुलने शुरू हुए हैं. ऐक्टिंग को अब मैंने एन्जॉय करना शुरू किया है वर्ना पहले तो टेंशन रहती थी. अब क्यूरियस रहती हूं.

●भाषाओं में आपकी रुचि धीरे-धीरे बढ़ती गई है.

लॉकडाउन के दौरान मैंने अपने एक को-ऐक्टर ओम भुतकर से उर्दू सीखनी शुरू की है. मराठी फिल्म अस्तु (2013, जिसमें चेन्नम्मा की भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला) में मेरी भूमिका कन्नड़ औरत की थी. उससे प्रभावित होकर कई लोग मुझसे कन्नड़ में बात करने लगते. भाषाओं का लहजा मैं फटाफट सीख सकती हूं.

मुझे मजा आता है. गुलजार साहब तो कबसे कह रहे थे उर्दू सीखने को, पर तब एक कान से सुन लिया, दूसरे से निकाल दिया. निर्मला की शूटिंग के वक्त वे उर्दू के कई शब्द ऐसे बोलते जो मुझे समझ नहीं आते थे तो मैं पूछती थी, ‘क्या बोले आप?’ अपने ग्रुप के नाटक फिर से हनीमून के मराठी से हिंदी में अनुवाद मैंने उन्हीं से सलाह-सुझाव लेकर किया.

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