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बातचीतः सब कुछ थोड़ा-थोड़ा

तूफान में बॉक्सिंग कोच और हंगामा 2 में असुरक्षित शौहर—66 की उम्र में परेश रावल ने अपने पसंदीदा निर्देशकों के साथ संतुलन साधना सीख लिया है. उन्होंने गुजराती सिनेमा में अपनी वापसी और ऋषि कपूर की मृत्यु के बाद शर्माजी नमकीन में उनका निभाया किरदार अदा करने का ऐलान किया

तूफान में बॉक्सिंग कोच की भूमिका पररेश रावल को आकर्षक लगी तूफान में बॉक्सिंग कोच की भूमिका पररेश रावल को आकर्षक लगी

तूफान में बॉक्सिंग कोच और हंगामा 2 में असुरक्षित शौहर—66 की उम्र में परेश रावल ने अपने पसंदीदा निर्देशकों के साथ संतुलन साधना सीख लिया है. उन्होंने गुजराती सिनेमा में अपनी वापसी और ऋषि कपूर की मृत्यु के बाद शर्माजी नमकीन में उनका निभाया किरदार अदा करने का ऐलान किया

तूफान में वह क्या था जिसने आपको आकर्षित किया?

बॉक्सिंग कोच बनना तो दिलचस्प था ही, लेकिन इस किरदार का मर्म बेहद आकर्षक था. फिल्म के दौरान उसकी परतें बहुत धीरे-धीरे खुलती हैं कि किस तरह वह अपनी तकदीर या आसपास के हालात से साबका बिठाता है. मैं राकेश मेहरा के साथ काम करना चाहता था, क्योंकि वे विषय को नजाकत से पेश करने के लिए इतनी परेशानियां उठाते हैं. मैं फरहान (अख्तर) और उनके जज्बे से हमेशा मोहित रहा हूं.

खेल के तौर पर बॉक्सिंग में कभी आपकी दिलचस्पी थी?

एक किस्म से मेरी दिलचस्पी तो थी, पर मेरे स्वभाव के लिहाज से यह खासा बर्बर खेल है. घूसों की आवाजें सुनते ही मेरे पेट में मरोड़-सी उठने लगती है. सिर पर लगातार मुक्कों की वजह से मैंने मुक्केबाजों को बुढ़ापे में डिमेंशिया होते देखा है.

आपने शर्माजी नमकीन पूरी की है...

हां, यह इतना दुखद था कि ऋषि कपूर यह फिल्म पूरी नहीं कर सके. इसलिए और भी कि शर्माजी नमकीन की पटकथा खूबसूरत है और दर्शक उन्हें बिल्कुल अलहदा किरदार में देख पाते. मैं प्रोड्यूसरों को वाकई सलाम करता हूं कि वे इस फिल्म को इतने अनूठे तरीके से पूरा करना चाहते हैं, वर्ना एक अच्छी पटकथा बेकार चली जाती.

आपकी अदाकारी से सजी प्रियदर्शन की हंगामा 2 भी रिलीज हो रही है. क्या तय है कि वे कोई भी फिल्म लेकर आएं तो आप करेंगे?

नहीं, मैं कहानी और किरदार देखना चाहूंगा. लेकिन अगर कुछ ऐसा है भी जो मुझे पंसद नहीं है, तब भी मैं जानता हूं कि प्रियनजी आखिर प्रियनजी हैं, वे इसे संभाल ही लेंगे और आखिर में अच्छी मनोरंजक फिल्म बनाएंगे. हालांकि उन्होंने कांचीवरम और मरक्कर सरीखी फिल्में भी बनाई हैं. मरक्कर तो अब तक की सबसे महंगी मलयालम फिल्म थी. इतने ईमानदार शख्स के साथ काम करके हमेशा मजा आता है.

करीब 40 साल बाद आप गुजराती फिल्मों में भी लौट रहे हैं!

हां, यह डियर फादर पर आधारित है. दुनिया भर में इस नाटक के 400 से ज्यादा प्रदर्शनों में मैंने काम किया है. यह खूबसूरत कहानी है. इस इमोशनल थ्रिलर के जरिए हम परिवार के भीतर रिश्तों की थाह लेते हैं.

गुजराती रंगमंच जीता-जागता है. फिल्म उद्योग वहां उतना नहीं बढ़ा. वहां का होने के नाते आपकी राय में क्या बदलने की जरूरत है?

पश्चिम एशिया, अफ्रीका, अमेरिका और यूके में गुजराती रंगमंच का फलक बहुत जीता-जागता है. बदकिस्मती से यह सिनेमा में रूपांतरित नहीं हुआ. उम्मीद है कि फिल्मकारों की नौजवान पीढ़ी तैयार दर्शकों का फायदा उठाएगी.

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