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''हम मुल्क के लिए पहले भी पैशनेट थे, आज भी हैं और आगे भी रहेंगे’’

पूर्व क्रिकेटर इरफान पठान ने जम्मू-कश्मीर के क्रिकेटरों के मेंटॉर बनकर राज्य में क्रिकेट की तस्वीर ही बदल दी. रासिख सलाम डार सरीखे नौजवानों के लिए तो जैसे देवदूत बन गए. इंडिया टुडे ग्रुप के खेल पत्रकार केतन मिश्रा ने उनसे तफसील के साथ बातचीत की और इस सीमावर्ती राज्य के क्रिकेट में क्रांतिकारी बदलाव की इस कहानी को बारीक ब्यौरों के साथ सामने लेकर आए.

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नई नर्सरी जम्मू-कश्मीर में तैयार हुई क्रिकेटरों की नई पौध नई नर्सरी जम्मू-कश्मीर में तैयार हुई क्रिकेटरों की नई पौध

प्र. जम्मू-कश्मीर के युवा क्रिकेटर रासिख सलाम डार के साथ आपका जुड़ाव कैसे बना? आपने उन दिनों में रासिख के साथ काम किया जब कागजी तामझाम के चलते उनके बुरे दिन चल रहे थे. तब आप किस तरह से उनके पथप्रदर्शक बने रहे?

रासिख के साथ उन दिनों में जो भी हुआ वह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण था. लेकिन मेरा फोकस इस पर था कि उसे आगे कैसे ठीक किया जाए. इसलिए मैंने सबसे पहले उसके परिवार से बात की, मां-बाप को सारी चीजें बताईं जिससे उनके सामने तस्वीर साफ हो और वे घबराएं नहीं. मैं रासिख से उन दो सालों में लगातार बात करता रहा. मुंबई इंडियंस (आइपीएल की टीम) को भी क्रेडिट मिलना चाहिए. उन्होंने इस लड़के का साथ नहीं छोड़ा.

टीम ने दो साल उसका बहुत ध्यान रखा. राहुल संघवी (मुंबई इंडियंस के टीम मैनेजर) से मेरी बात हुई. मैंने कहा: 'यह लड़का पहली बार इस लेवल पर खेला है, प्लीज ध्यान रखिएगा कि कहीं खो न जाए.’ उन्होंने पूरा साथ दिया. रासिख कश्मीर से ज्यादा मुंबई में रहता, ट्रेनिंग करता और जब-जब मैं मुंबई जाता था, उससे मिलता था. मैं उसका मेंटॉर था तो मेरी जिम्मेदारी थी कि उसे अकेला न छोड़ा जाए. हम साथ डिनर करते, इधर-उधर की बातें करते.

मेरी कोशिश थी कि उसका मन हल्का रखा जाए क्योंकि जो झटका उसे लगा था, वह इतनी कम उम्र में उस लेवल पर खेलने वाले लड़के के लिए बड़ी बात होती है. दो साल में लोगों के करियर खत्म हो जाते हैं. मैं उसे लगातार यही बताता था कि आगे उसे बहुत सारा क्रिकेट खेलना है, उसमें वह दम-खम है जो उसे खूब आगे ले जाएगा. भगवान ने उसे शानदार कलाई दी है. वो दोनों ओर गेंद को स्विंग करवाता है.

 रासिख पर पहली बार नजर कब गई?

श्रीनगर में मैंने पहली बार रासिख को देखा था. मेंटॉरशिप के सिलसिले में मैं वहां अलग-अलग जिलों में जाता था. वहां सेलेक्शन कैंप था अंडर-19 का. करीब 100 बच्चे थे उस दिन मेरे पास. कोई अनंतनाग से आ रहा था, कोई कुलगाम से आया था. वैसे भी मैं इधर-उधर जाता ही रहता था. लगातार ऐसे कैंप लग रहे थे. इन्हीं में से एक में रासिख मुझे दिखा.

उस दिन हुआ यह कि मैंने बस उसकी दो गेंदें देखीं और उसको मना कर दिया कि मत फेंको. मुझे समझ में आ गया था कि यह स्पेशल है. जो स्पेशल होता है, वो सबमें अलग दिख जाता है. तो उसको लगा कि 'आज भी सेलेक्शन नहीं हुआ.’ पहले भी वह कई जगह गया था पर सेलेक्ट नहीं किया गया था. थोड़ी देर में मैंने देखा कि वह जा रहा था. मैंने रुकने को कहा.

मैं हाथ में कागज-पेन लेके घूमता था. उस दिन लिस्ट में पहला नाम उसी का लिखा था. मैंने उससे बात की और समझाया. वह आया तो था अंडर-19 के लिए लेकिन कुछ ही दिन में हमारा सीनियर्स का कैंप शुरू होना था, तो मैंने उसे सीधा सीनियर कैंप में 30 लड़कों की फेहरिस्त में डाल दिया. एसोसिएशन से बात करके उसे श्रीनगर के होटल में सीनियर्स के साथ रुकवा दिया.

वहां वह मैचों में अच्छा परफॉर्म करने लगा. हमने उसे रणजी ट्रॉफी से पहले विशाखापत्तनम में खेलाया. उसने अच्छा किया. मैं पक्का हो गया कि अब इसके 7-8 मैच हो गए हैं, सही कर रहा है, तो उसे विजय हजारे (ट्रॉफी) में भेजना चाहिए. इस तरह वह विजय हजारे में दिखा. 

लेकिन! सबसे बड़ा ब्रेकथ्रू मिला मुंबई एयरपोर्ट पर. मैं वहीं बैठा था और मुझे राहुल संघवी दिखे. उन्होंने कहा 'यार, जम्मू-कश्मीर में हो, क्या चल रहा है?’ उस वक्त मैं खेल ही रहा था. तो हम अपने बारे में तो बात कर नहीं सकते थे. मैंने इस लड़के का वीडियो दिखाया और कहा कि लड़का अच्छा है, कैंप में जरूर बुलाओ. उन्होंने भी हां कह दी. एक-डेढ़ महीने बाद उनका फोन आया कि 'लड़के को भेजो.’ वह ट्रायल में गया, सबको पसंद आया. श्रीधर सर, जहीर खान, रोहित (शर्मा), सभी को पसंद आया. फिर ऑक्शन में उसका नाम आ गया.

 ऑक्शन में आना और उसके बाद?

मेरा ऑक्शन में आने का वह आखिरी साल था. मैंने उसके बाद कभी अपना नाम ऑक्शन में नहीं डाला. उस ऑक्शन में मेरा सेलेक्शन नहीं हुआ पर इस लड़के का हो गया. उस रात मैं इतना खुश था. बहुत सुकून के साथ सोया. रासिख का फोन आया और उसने 30 सेकंड में जो बातें कीं, मेरी आंखें भर आईं. वह मेरे जीवन का सबसे बड़ा ऑक्शन था. 2011 में अपने ऑक्शन में मुझे 7 करोड़ रु. से ज्यादा मिले थे, तब मुझे उतनी खुशी नहीं हुई थी.

 आप ऐसे इलाके में क्रिकेट पर काम कर रहे थे जहां इससे पहले लोग नहीं जाते थे. या जाते थे तो खबर नहीं बनती थी. वहां आप हर संभव लेवल पर नए-पुराने खिलाडिय़ों के साथ जुड़े. उस पूरे प्रॉसेस के बारे में कुछ बताइए.
 
मेरी एक मीटिंग हुई थी. उससे पहले बड़ौदा की टीम छोड़ते वक्त मेरे पास करीबियन प्रीमियर लीग का कॉन्ट्रैक्ट हाथ में था, टी-10 लीग और एक और लीग का. 3-4 करोड़ रुपए के आराम से थे. पर मैंने साइन नहीं किया. तो दिल्ली में मेरी मीटिंग हुई जिसमें कपिल देव साब, आसिफ बुख़ारी और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस सी.के. प्रसाद थे.

वे लोग चाहते थे कि कपिल पाजी के साथ मिलकर हम थोड़ा क्रिकेट की फील्ड में काम करें. कपिल पाजी ने कहा कि ''इरफान आप यह काम करो. पैसा तो आता रहेगा लेकिन जो आप क्रिकेट को वापस दे पाओगे, जम्मू-कश्मीर क्रिकेट और इंडियन क्रिकेट को सपोर्ट करके, जो संतुष्टि मिलेगी वह किसी लीग में नहीं मिलेगी.’’

उसी पल मैंने सारे कॉन्ट्रैक्ट छोड़ने का मन बना लिया. अब जब हमने अपना काम शुरू किया तो वहां के लोगों के अपने मसले थे. जम्मू-कश्मीर स्टेट भी इतना बड़ा. वहां के चैलेंज ने मुझे इतना कुछ सिखा दिया है कि आगे कभी मुझे एडमिनिस्ट्रेटिव जिम्मेदारी दी जाती है तो मैं बड़े आराम से निभा सकूंगा.

 जम्मू-कश्मीर में शुरुआती समस्याएं क्या थीं? वहां के लोगों ने आपको कैसे रिसीव किया?

अगर आपको किसी के बीच जाकर अच्छा काम करना है तो सबसे पहले आपको लड़कों का, आस-पास के लोगों का विश्वास जीतना होता है. यह करने में मुझे काफी महीने लग गए. क्योंकि यह इतना आसान नहीं है. अगर मेरे से बड़ा भी कोई नाम वहां गया तो उसे भी उतनी ही मेहनत करनी पड़ेगी. शायद उससे भी ज्यादा.

इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है वहां का इतिहास. किसी भी मुल्क में जितने भी बॉर्डर वाले इलाके होंगे, वहां के लोग भरोसा करने में बहुत वक्त लगाएंगे. तो सबसे पहले आपको पूरी साफगोई के साथ सभी के हक का फैसला करना होता है. हर दिन. आपको सीधे शब्दों में उन्हें बताना होगा कि आखिर आप वहां हासिल क्या करना चाहते हैं.

शुभम खजूरिया आज डोमेस्टिक सर्किट में सबसे टैलेंटेड लड़का है. लेकिन विजय हजारे टूर्नामेंट के पहले छह मैच में रन ही नहीं बना पा रहा था. एक भी पचास नहीं कर पाया. असल में रन कोई भी नहीं बना पा रहा था. पिचें ही ऐसी थीं. बड़ी-बड़ी टीमें चेन्नै में 110-120 पर आउट हो रही थीं. खजूरिया के अलावा शुभम पुंडीर और परवेज रसूल भी थे. मैंने कुछ मैचों के बाद इन 3-4 लड़कों को बुलाया.

मेरे कमरे में मैंने उनसे बस इधर-उधर की बातें कीं. अगले दिन ये गए. आगे सभी ने बढ़िया क्रिकेट खेला. वह मीटिंग मैंने इसीलिए रखी थी क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि वे अपना आत्मविश्वास खो दें. खराब दौर में खिलाड़ियों को यही लगता है कि 'कल मुझे टीम में जगह नहीं मिलेगी.’ अगले मैच में खजूरिया ने 50 रन मारे. उस शाम वह मेरे पास आया और बोलने लगा कि 'अगर यह दो साल पहले की बात होती तो दो मैच के बाद मैं चेन्नै में नहीं बल्कि अपने घर पर बैठा होता.’ उसके बाद वह परफॉर्म करता गया.

मुद्दा माइंडसेट का है. कई बार हमने देखा कि पुराने लोग हमारी योजना और मेथड को सपोर्ट करने के मूड में नहीं थे. जम्मू के लड़कों और कश्मीर के लड़कों में जेहनी तौर पर बहुत अंतर है. ऐसे में आपको उन्हें साथ लेकर आगे बढ़ना होता है. और हम जम्मू ऐंड कश्मीर नहीं बल्कि जम्मू-कश्मीर कहते थे. हमें उन सभी को हर संभव तरीके से दिखाना था कि सभी एक राज्य के लिए खेल रहे थे.

 छह साल के बाद जम्मू-कश्मीर को आउटराइट जीत मिल रही थीं. यह आपके आने के बाद हुआ. इसका टीम और खिलाड़ियों पर कितना असर पड़ा?

यह पहली दफा था जब हमने आउटराइट लिया और फिर यह होता गया. हमारा लक्ष्य यही था कि हम सिर्फ टीम के बारे में सोचें. कोई सालो-साल 24 के एवरेज से खेले जा रहा था क्योंकि उसने कुछ साल पहले कुछ ठीक रन बना दिए थे. हमें यह सब बदलना था. आप परफॉर्म करें तो यंग हों या सीनियर, टीम का हिस्सा रहेंगे. वर्ना बाहर जाना पड़ेगा. 

मुझे किसी को असुरक्षित महसूस नहीं करवाना था पर यह जरूर बताना था कि हमने कहां जाने का लक्ष्य बनाया हुआ था. समय और नींद की पाबंदी, सारा अनुशासन, उन सीमाओं में रहकर हम सभी एंजॉय करते थे. पर एक बार मैदान में उतर जाने पर सब भूलकर आपको एक साथ लग जाना था.

लेकिन रंग तो आना शुरू हुआ अगले साल जब हमने रणजी ट्रॉफी में क्वार्टर फाइनल के लिए क्वालिफाइ किया. क्वार्टर फाइनल भी कर्नाटक से कम ही अंतर से हारे थे.

वहां भी एक बढ़िया कहानी हुई. उन दिनों भी हम एक लड़के को तैयार कर रहे थे. नाम था मुज्तबा यूसुफ. बढ़िया लेफ्ट आर्म मीडियम पेसर था लेकिन उसकी गेंद अंदर नहीं आती थी. वह बस बाहर की ओर निकालता था. हमें उसके फॉलो-थ्रू पर काम करना था.

दो महीने तो हमने उसे बाहर की गेंद ही फेंकने नहीं दी. मैं आता, उससे बात करता और जो ड्रिल बताई थी, उसे पूरे दिन वही करनी होती थी. दो महीने बाद मैंने उससे लंबी बॉलिंग करवानी शुरू की. उसने नेट्स में एक महीना खर्च किया. फिर जो पहला मैच खेला उसमें पांच विकेट निकाले. तो लड़कों ने मेहनत की और उस मेहनत का फल हमें अगले साल से मिलने लगा.

 आप कॉन्फ्लिक्ट जोन में थे और एक समय पर आपको वह प्रदेश छोड़कर आनन-फानन में निकलना पड़ा. आपने टीम को बड़ौदा बुलाया और वहां कैंप शुरू किया. क्या फर्क है कॉन्फ्लिक्ट जोन के क्रिकेट और देश के बाकी क्रिकेट में?

एक बड़ा फर्क माइंडसेट का होता है. वहां के पुराने क्रिकेटरों ने अजीब माहौल बनाकर रखा हुआ था. नए लड़कों को उन्होंने ऐसा डराकर रखा था कि जैसे उनके बगैर इनका काम ही नहीं होना था. इस स्थिति को बदलना था. हमने ऐसे लोगों को मार्क किया जो रन बनाने और मेहनत करने को तैयार न थे. उनसे सीधे बात की और तस्वीर साफ कर दी कि टीम में जगह तभी मिलेगी जब आप कुछ करेंगे.

दूसरा, देश के बाकी हिस्से में आपको मैटिंग क्रिकेट नहीं दिखेगा, टर्फ क्रिकेट दिखेगा. हमारे बड़ौदा जैसे छोटे शहर में भी आपको हर जगह टर्फ दिखेगी. लेकिन जम्मू-कश्मीर के ज्यादातर जिलों में आपको मैटिंग विकेट दिखती थी. मैटिंग पर खेलने का अंदाज बिल्कुल अलग है. मैटिंग पर खेलने वाला पेस बहुत अच्छा खेलेगा लेकिन बॉल के ग्रिप होते ही उसकी हालत खराब हो जाएगी.

आप पाएंगे कि कश्मीर से ज्यादातर गेंदबाज आए हैं और जम्मू से बैटर्स क्योंकि जम्मू के लड़के ऑफ सीजन में प्रैक्टिस के लिए बेंगलूरू या और कहीं चले जाते थे. लेकिन कश्मीर में बारिश वगैरह होती थी और वहां के लड़कों को प्रैक्टिस का ज्यादा मौका मिलता नहीं था, खासकर 4-5 महीने जब बर्फ गिरती है. यही सब देख-समझ के मैं उन्हें वहां से निकालकर लाया. पूरी टीम बड़ौदा आई. कश्मीर बंद हो गया था तो निकलना ही था.

 और वहां के लड़कों में फिटनेस को लेकर क्या सोच है? कैसे मैनेज होता है?

यह बड़ी दिलचस्प बात है क्योंकि फिटनेस में बस एक ही पहलू तो होता नहीं कि आप कितना भाग सकते हो. दूसरे सीजन में मैं वहां वीपी सुदर्शन (पूर्व टीम इंडिया ट्रेनर) को लेकर आया. मुझे समझ में आया कि यह लड़के सीधा भागने में तो उस्ताद हैं लेकिन चपलता की बात आने पर मामला कमजोर पड़ जाता था.

क्रिकेट में तो आपको साइड में डाइव भी लगानी है, एक रन के बाद दूसरा भी निकालना है. इन लड़कों के दिल बड़े मजबूत हैं लेकिन पैर की जो छोटी मांसपेशियां होती हैं, वे थोड़ी कमजोर थीं. क्योंकि ये हमेशा सीधा भागने की ही प्रैक्टिस करते थे. यो-यो टेस्ट में एक-दो लड़कों को छोड़कर बाकी बहुत पीछे थे. तो फील्डिंग के लिए अलग-अलग ड्रिल्स लाए. बड़ौदा के मिलाप मेवाड़ा हमारे कोच थे. उन्होंने बहुत मदद की. उन्होंने इंडिया अंडर-19 खेला था तो वे हमारी बहुत मदद करते थे.
 
हमने तय किया कि कोई भी लड़का आकर नॉर्मल नेट प्रैक्टिस नहीं करेगा. वह नेट में आएगा, एक बॉल खेलेगा और तुरंत एक रन लेगा. यही काम सामने वाला बल्लेबाज करेगा. 

 और उनकी मेंटल फिटनेस?

उस पर तो बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़ी. क्योंकि वहां पुराने लोगों ने दिमाग में भर रखा था कि आप बस एक पॉइंट तक ही खेल सकते हो. उससे आगे जाना है नहीं. हमें तो उनके दिमाग में उस बैरियर को तोड़ना था और यह बहुत जरूरी था. हमें बच्चों को बताना था कि 'आप शिखर पर खड़े हो जाओ और कूदो वहां से. हम नीचे खड़े हैं, हम आपको पकड़ लेंगे. लेकिन आपको उड़ने की कोशिश करनी है. अगर आप गिरे तो हम हैं.’

वक्त के साथ वे कूदने लगे और नीचे गिरने की बजाए उड़ने लगे. उनके जेहन में डालना जरूरी था कि आप गलती करो, हम हैं इधर. पर आपका इरादा ठीक होना चाहिए. ध्यान में रखो कि आप अपने लिए परफॉर्म करोगे तो आपको कोई नहीं पूछेगा. लेकिन जम्मू-कश्मीर टीम क्वालिफाइ करेगी तो सबकी नजर आपके ऊपर रहेगी. और आप ज्यादा आगे जाओगे.

क्वालिफाइ करने और बड़े लेवल पर पहुंचने पर बड़े लोग बड़ा मीडिया आता है. सेलेक्टर्स भी आकर मैच देखते हैं. ऐसे में ही खिलाड़ी को फायदा होगा. कोई यह कहे कि वह चार विकेट लेकर या 40-50 रन बनाकर, अपनी जगह पक्की करके खुश है तो उसे ऐसा कतई नहीं सोचना चाहिए. टीम के लिए रन बनाओ, अपने लिए नहीं. लड़कों के जेहन को बड़ा करना बेहद जरूरी था और इसके लिए हमने रेगुलर तमाम तरह की ऐक्टिविटी जारी रखीं.

 आखिर में थोड़ा पर्सनल सवाल. कई बार आपको सोशल मीडिया पर, आपकी पहचान की वजह से भद्दी बातें सुनने को मिली हैं. कितनी कोफ्त होती है? कैसे निबटते हैं? आप खिलाड़ियों को मेंटरिंग करते हैं, ऐसे समय में आपका मेंटॉर कौन होता है?

(हंसते हुए) यह बढ़िया बात कही. मेरे लिए बहुत हद तक मेंटॉर मेरी फैमिली है. चाहे वह मेरा बड़ा भाई हो, चाहे मेरी बीवी हो (इरफ़ानन की व्हाट्सैप डीपी में बस दो हाथ दिखते हैं. उनके हाथ को उनकी पत्नी ने थामा हुआ है) या मेरे वालिद हों. शुरू-शुरू में चीजें मैनेज करनी पड़ती थीं. जब सोशल मीडिया को बेबाक अपनाना शुरू किया था, तब मुझे जरूरत पड़ी थी.

अभी तो आइ डोंट गिव अ डैम! मुझे लगता है कि किसी चीज के बारे में बोलना चाहिए तो मैं बोलता हूं. घूम-फिर के मेरी चीजें या तो मेरे मुल्क के बारे में होती हैं, या तो मुल्क के लोगों के लिए, या उसमें कोई इनसानियत वाली बात होती है. न तो मैं झगड़ा करने की बात करता हूं, न किसी को उकसाता हूं. मैं तो बस पॉजिटिव चीजों की ओर जाता हूं. जो लोग आकर मेरे बारे में नेगेटिव बात करते हैं, मेरा यही कहना है कि मेरी चमड़ी अब बहुत मोटी हो चुकी है, मुझे फर्क नहीं पड़ता.

दूसरी बात, मेरा सोशल मीडिया मेरे लिए है. मुझे किस तरह से इस्तेमाल करना है, यह दूसरे नहीं बताएंगे. मैं अपने हिसाब से सोशल मीडिया इस्तेमाल करता था, करता हूं, करता रहूंगा. 

हम जैसे लोग मुल्क के लिए बहुत पैशनेट होते हैं. वर्ल्ड कप जीता तो हमने यह नहीं देखा कि सामने कौन सी टीम कितनी मजबूत है. हमें जीतने से मतलब था. मैं इंडिया अंडर-15 खेला तो इरादा बना. और मजबूत हुआ जब इंडिया अंडर-19 खेला. फिर इंडिया के लिए खेला. आज रिटायरमेंट के बाद भी इंडिया के लिए काम करने का इरादा उतना ही मजबूत है. हम ऐसे ही खेलते रहेंगे, मरते दम तक.

लेकिन इस सब के बीच हम इतने पैशनेट हैं कि हमारे वालिद के नए दफ्तर में लगने वाले झंडे को लेकर मेरी और यूसुफ की कई दिनों तक बहस चली. फिर मेरी बीवी ने अपनी बात रखी और झंडा उनके हिसाब से लगा. हमारे ऑफिस की वह जान है. मैं यह सब कुछ इसलिए नहीं कह रहा हूं कि 'देखो हम ऐसा कर रहे हैं.’ यह हमारा हर दिन का हिस्सा है.

खैर, हम मुल्क के लिए पहले भी पैशनेट थे. आज भी हैं. और आगे भी रहेंगे. न तो इस पर कोई सवाल पूछ सकता है, न तो किसी की इतनी औकात है कि वह हमारे माइंडसेट पर सवाल उठा सकता है. 

''आइपीएल में मुंबई इंडियंस के लिए रसिक सलाम के ऑक्शन पर मेरी आंखें भर आईं. 2011 में सात करोड़ रु. से ज्यादा के अपने ऑक्शन पर मुझे इतनी खुशी नहीं हुई थी’’

''कश्मीर से ज्यादातर गेंदबाज आए हैं और जम्मू से बैटर्स क्योंकि जम्मू के लड़के ऑफ सीजन में प्रैक्टिस के लिए कहीं और चले जाते थे और कश्मीर वाले वहीं रह जाते थे’’

''हमारे वालिद के नए बन रहे दफ्तर में लगने वाले तिरंगे के फ्रेम को लेकर हमारी कई दिनों तक बहस चली. आखिर में मेरी बीवी की राय के हिसाब से झंडा लगाया गया’’.

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