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''छोटे-मोटे में न फंसो, मोटी मछलियां पकड़ो’’

नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) के महानिदेशक सत्य नारायण प्रधान ने ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा से बातचीत में दो-टूक बताया कि उनकी एजेंसी ने आखिर क्यों आर्यन खान के खिलाफ लगे आरोप हटाने का फैसला किया और व्यवस्था में किस तरह के सुधार की जरूरत है. प्रमुख अंश:

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 सत्य नारायण प्रधान सत्य नारायण प्रधान

 इतनी हाइ-प्रोफाइल गिरफ्तारी के बाद, एनसीबी ने आर्यन खान और अन्य पांच लोगों के खिलाफ आरोप क्यों हटा दिए?

अनिवार्य रूप से, प्रत्यक्ष आपराधिक साक्ष्य होना चाहिए, हम ठोस और परिस्थितिजन्य सबूत के बिना अपराध तय नहीं कर सकते. पहले ही ऐसे मामलों को अदालतों ने कड़ाई से खारिज किया है जिनमें बिना ठोस आधार के अपराध तय किए गए और उनकी जांच में अटकलबाजी के कुछ पहलू घर कर गए.

हम किसी तरह की अटकलबाजी नहीं चाहते हैं. हम चाहते हैं कि हर सबूत, हर आरोप ठोस सबूत पर आधारित हो. हमने इसे सुप्रीम कोर्ट की ओर से रेखांकित उस सिद्धांत तक विस्तार दिया कि सबूत उचित संदेह से परे होने चाहिए. आर्यन खान समेत उन छह लोगों पर आरोपपत्र नहीं पेश किया जा सकता क्योंकि उन पर आरोप लगाने के लिए उचित संदेह से परे सबूत नहीं थे. न ही इसे किसी ठोस सबूत से जोड़े जाने की संभावना थी.

 आखिर किस बात ने आपको यह कदम उठाने को राजी किया?

 

यह कोई भावनात्मक फैसला नहीं था, बल्कि पेशेवर और कानूनी सिद्धांतों के आधार पर था. पीड़ितों के साथ किस तरह का बर्ताव करें, इसको लेकर अगर एनसीबी मानक और सीमा निर्धारित नहीं करता है, तो कोई भी नहीं करेगा. मैं इसको लेकर स्पष्ट था कि अगर हमें एनसीबी के फैसले की आलोचना झेलनी पड़े, तो भी यह सही होगा, क्योंकि हम कम से कम कानूनी सिद्धांतों के सीधे और महीन रास्ते पर होंगे.

 क्या इस प्रकरण से एनसीबी की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची है?

 

अगर आपको किसी संगठन में थोड़ी-सी भी पेशेवर कुशलता वापस लानी है, तो उसमें सुधार कर उसे पटरी पर लाना आवश्यक है. अगर इसमें वे बड़े नाम शामिल नहीं होते, तो मुंबई का मामला साधारण प्रकरण होता. हम यहां छोटे-छोटे मामलों के पीछे पड़ने नहीं आए हैं. हमें पानवाले पेडलर्स को पकड़ने में अपना वक्त नहीं गंवाना चाहिए.

हमारा काम पूरे देश में संचालित होने वाले कार्टेल सरीखी बड़ी मछलियों, यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय कार्टेल को पकड़ना है. इसलिए मैंने आदेश जारी किए हैं कि एनसीबी को छोटे-छोटे मामलों से बचना चाहिए और केवल बड़े कार्टेल और पेडलर्स पर ध्यान देना चाहिए.

 क्या हमें एनडीपीएस कानून पर फिर से विचार करने की जरूरत है?

 

एनडीपीएस कानून में सुधार को लेकर उच्चतम स्तर पर गंभीर विचार हो रहा है. फिलहाल, मैं बस यही कह सकता हूं कि इस बात पर व्यापक सहमति है कि सेवन को अपराध की श्रेणी से हटाने के लिए कुछ किया जाना चाहिए. लेकिन इस सहमति में थोड़ी भिन्नता भी है, इसलिए इसके बारे में अलग-अलग राय है कि कैसे आगे बढ़ा जाए.

इसमें शामिल सांस्कृतिक और मेडिकल मसलों के कारण इसे अपराध की श्रेणी से हटाने की जरूरत है. एनसीबी का रुख यह है कि क्रमिक प्रतिक्रिया की जरूरत है, जिसमें कम से कम कुछ मामले दर्ज किए जाने चाहिए और अपराध की श्रेणी से पूरी तरह से हटाने के बजाए क्रमिक चेतावनी की व्यवस्था होनी चाहिए. एक रोडमैप भी तैयार किया जाना चाहिए, जिसमें अखिल भारतीय पुनर्वास नेटवर्क की स्थापना भी की जा सकती है. 

 एनसीबी और अन्य संबंधित पक्षों ने आर्यन खान के मामले से और क्या बड़े सबक सीखे हैं?

 

नशीली दवाओं (ड्रग्स) का सेवन करने वालों और नशीली दवाओं के सेवन या पेडलिंग के अपराध पर नजर रखने वालों, दोनों के लिए सबक हैं. पहली बात, मैं यह कहूंगा कि माता-पिता, शिक्षकों और अभिभावकों को यह समझ लेने की जरूरत है कि हम जितना मानते हैं, नशीली दवाएं उससे भी ज्यादा आम हो गई हैं. और यह (खतरा) बहुत तेजी से बढ़ता जा रहा है.

जहां तक नशीली दवाओं के संपर्क में आने और उसके सेवन की बात है, देशभर के माता-पिता शायद यह नहीं जानते कि उनके बच्चों के साथ क्या हो रहा है. चिंता की बात यह है कि अब विभिन्न चीजों को मिलाकर भारत में नशीली दवाएं बनाई जा रही हैं, जिसमें सिंथेटिक दवाओं का मिश्रण शामिल है. अगर आपके यहां 8 से 10 करोड़ ड्रग एडिक्ट या संभावित ड्रग एडिक्ट हैं, तो यह कैंसर सरीखी समस्या है और हमें इसको लेकर कुछ कदम उठाने चाहिए. पहला कदम सामाजिक स्तर का है, समस्या को लेकर जागरूक बनें. 

 इस तरह के मामलों को संभालने के तौर-तरीकों में एनसीबी सरीखी एजेंसियों को क्या बदलाव करने की जरूरत है?

 

एनडीपीएस एक सख्त कानून है, ऐसे में हमारी जिम्मेदारी दोगुनी हो जाती है. क्योंकि अगर आपकी जांच पेशेवर नहीं है तो आप बेकसूर लोगों को जेल में डाल सकते हैं. गिरफ्तार किए गए लोगों में अधिकतर 20 या 30 साल की उम्र के होंगे, ऐसे में आप कई जिंदगियों को गंभीर रूप से बर्बाद कर सकते हैं. इसलिए हमें अपनी जांच प्रक्रियाओं और सख्ती में बदलाव करने की जरूरत है, वरना हम समाज का नुक्सान कर रहे हैं.

 क्या राज्य पुलिस नशीले पदार्थों के मामलों को संभालने के  लिए तैयार हैं?

 

फिलहाल, नशीले पदार्थों की जांच राज्य पुलिस की प्राथमिकता नहीं है. अब वक्त आ गया है कि राज्य पुलिस नशीले पदार्थों के खिलाफ जंग को प्रमुखता दे क्योंकि यह सभी अपराधों की जड़ है—पैसा यहीं से आता है, यहां तक कि हथियारों और इनसानों की तस्करी भी ड्रग तस्करी की अर्थव्यवस्था के जरिए फलती-फूलती है. मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि राज्य पुलिस और नशीले पदार्थों की जांच के लिए समर्पित एजेंसियां पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित नहीं हैं या मामलों को संभालने के लिए अनुकूल नहीं हैं. और, यह गंभीर चिंता का विषय है.

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