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रील के दिन बीते रे भैया

सैटेलाइट वितरण के जरिए नई फिल्मों को हजारों सिनेमाघरों में एक ही दिन रिलीज करने की तकनीक लाकर यूएफओ ने सिनेमा कारोबार की तस्वीर बदली

ग्राफिक्सः असित रॉय ग्राफिक्सः असित रॉय

हाल के महीनों में 6,000 से ज्यादा स्क्रीन पर रिलीज होने वाली फिल्मों भारत और साहो की आधे से ज्यादा रिलीज बिना रील के यानी डिजिटल माध्यम से हुई. इसके अलावा गली ब्वॉय, बटला हाउस, कबीर सिंह और दे दे प्यार दे जैसी फिल्मों को 2,000-2,000 से ज्यादा परदों पर डिजिटली रिलीज किया गया था. पाइरेसी से पस्त हो चुके हिंदुस्तानी सिनेमा के लिए यह सचमुच बड़ा रुझान था. फिल्म उद्योग से जुड़े निर्माता से सिनेमाघर मालिक तक सभी ने इससे राहत की सांस ली है.

फिल्म वितरण में इस रुझान को आकार देने वाले उपक्रमों में यूएफओ मूवीज इंडिया लिमिटेड का अहम रोल रहा है. पहले प्रोजेक्टर पर घूमती रील से फिल्म परदे पर उतरती थी. महंगी रीलों के महानगरों से घूमते हुए छोटे शहरों-कस्बों तक पहुंचने में महीनों लग जाते थे. पर अब डिजिटली एक ही दिन में 2,000-3,000 सिनेमाघरों में पहुंचने से फिल्म कारोबार का पूरा नक्शा ही बदल गया है. इस बदलाव के सूत्र खोलते हुए यूएफओ के सीईओ राजेश मिश्र बताते हैं, ''हमने फिल्म के प्रिंट की कीमत और पाइरेसी वाली कमजोर कड़ी को पकड़ा, जिसने इंडस्ट्री की हालत खराब कर रखी थी.

एक प्रिंट की कीमत 60,000 रु. बैठती थी. 50,000 रु. तो अमेरिका से मंगाई जाने वाली कोडक की रील पर और 10,000 रु. लैब खर्च. यानी 500 प्रिंट निकाले तो तीन करोड़ रु. इसी पर खर्च. प्रिंट के महंगा होने के कारण एक ही शुक्रवार को कम ही सिनेमाघरों में फिल्म रिलीज हो पाती थी. दूसरा झटका पाइरेसी का. अमिताभ बच्चन की फिल्म के लिए भी दर्शक इंतजार न करके पाइरेटेट कॉपी देख लेते थे. पाइरेसी वाले इसका फायदा उठा रहे थे. हमने रील का खर्च खत्म करके सिर्फ लैब खर्च वाले हिस्से में ही काम करने पर फोकस किया.'' इस तरह यूएफओ आज सैटेलाइट से डिजिटली 5,000 से ज्यादा सिनेमाघरों में फिल्में दिखा रहा है.

संजय गायकवाड़ ने सैटेलाइट आधारित, देश के सबसे बड़े वितरण ऑपरेटर यूएफओ मूवीज को जब 2005 में एक स्टार्टअप की शक्ल में शुरू किया तो उनकी इस तकनीक को बेवकूफी भरा कदम कहा गया. यूएफओ की सोच यह थी कि एक ही दिन सारे थिएटर में फिल्म पहुंच गई तो पाइरेसी की कमर टूट जाएगी. दर्शकों को पहले शुक्रवार को ही साफ-सुथरी और अच्छी आवाज में फिल्म देखने को मिल रही होगी. अब पाइरेसी न के बराबर है. और इस तकनीक में इसे पकडऩा आसान है. 3-4 लोगों के साथ 10 करोड़ रु. की पूंजी से शुरू यूएफओ आज 1,300 कर्मचारियों की 450 करोड़ रु. की कंपनी हो गई है.

राजेश समझाते हैं, ''इस तकनीक के तहत हर सिनेमाघर के अंदर एक प्रोजेक्टर, एक सर्वर, एक वीसैट लगाना पड़ता है. कंटेंट वीसैट के जरिए सर्वर में जाकर स्टोर रहता है पर जब तक हम लाइसेंस न दें, प्ले नहीं हो सकता. डिस्ट्रीब्यूटर हमें गुरुवार की रात प्रति सिनेमाघर प्रति शो के हिसाब से ऑर्डर देते हैं, हम उसी हिसाब से लाइसेंस देते हैं. हम बस डिजिटल डिलिवरी मैकेनिज्म हैं.''

यूएफओ ने सैटेलाइट से फिल्म वितरण का जो तरीका ईजाद किया है, वह दुनिया में और कहीं नहीं है. देश के करीब 9,000 सिनेमाघरों में से 5,300 से ज्यादा उसी के पास हैं. सैटेलाइट डिलिवरी सिस्टम से भोजपुरी, मराठी और पंजाबी सिनेमा इंडस्ट्री को भी फायदा हुआ है. इन भाषाओं की फिल्में अब 250-300 सिनेमाघरों में दिखाई जाती हैं. राजेश के शब्दों में, ''पहले भारत में साल भर में 800 फिल्में बनती थीं. आज करीब 1,800 बन रही हैं. ऐसे में इनके लिए 9,500 सिनेमाहॉल कम पड़ते हैं. यहां कम से कम 20,000 सिनेमाघर चाहिए. दूसरी ओर लाइसेंस सिस्टम की वजह से नए सिनेमाघर बन नहीं रहे.''

लेकिन इस सिस्टम से ज्यादा मुनाफा न होने की वजह से यूएफओ ज्यादातर सिनेमाघरों को विज्ञापन बेचकर कमाई करता है.

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