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भोजपुरी सिनेमाः हेरा गइल बोलिया!

भोजपुरी फिल्मों और संगीत में फैले फूहड़पन और अश्लीलता के खिलाफ फिल्मकार अनुभव सिन्हा ने खोला मोर्चा तो सिनेमा, संगीत और सियासत क्षेत्र की कई शख्सियतें इस अभियान में उतरीं उनके साथ. पर क्या वे कामयाब होंगे?

भोजपुरी फिल्मों के गायक भोजपुरी फिल्मों के गायक

इसी हक्रते उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने जब ग्रेटर नोएडा में सपनों की फिल्म सिटी बनाने का ऐलान किया तो एक अभिनेता-रंगकर्मी ने फेसबुक पर दिलचस्प टिप्पणी की: ''...बहुत अच्छी खबर है. बोल रहे हैं कि मुंबई से टक्कर लेंगे. बस ध्यान रखना...हिंदी फिल्म का स्तर भोजपुरी जैसा न हो जाए...’’ यही वह धारणा है जिसने फिल्मकार अनुभव सिन्हा को यह कहने पर मजबूर किया कि देश में अगर किसी भाषा पर सबसे ज्यादा अत्याचार हुआ है तो वह भोजपुरी है.

इस मीठी भाषा पर अत्याचार के लिए वे देवर साला आंख मारे, जींस वाली भौजी, मार दा सटा के लोहा गरम बा और हमरा लहंगा के अंदर वाई फाई छाप भोजपुरी सिनेमा और गानों को कठघरे में खड़ा करते हैं. इन हथकंडों ने निर्माताओं-निवेशकों की जेबें तो भरीं लेकिन 17 देशों में फैले 20 करोड़ से ज्यादा लोगों के बीच प्रचलित भोजपुरी भाषा को अश्लीलता और फूहड़ता का तमगा दिलाकर उसे जमाने भर में रुसवा कर दिया.

हाल ही में रिलीज अपने भोजपुरी रैप बंबई में का बा के खासे चर्चित होने से उत्साहित अनुभव अब इस प्रयोग को दूसरे तल पर ले जाना चाहते हैं. वे कह रहे हैं कि इस भाषा से ''अश्लीलता का टैग हटाने के लिए अब एक आंदोलन की जरूरत है.’’ यूपी, बिहार और दूसरे क्षेत्रों से आए लेकिन भोजपुरी से वास्ता रखने वाले बड़े-छोटे कलाकारों का भी उन्हें इस मुद्दे पर समर्थन मिल रहा है. 2004 में रिलीज और भोजपुरी सिनेमा के तीसरे अच्छे दौर की शुरुआत साबित हुई फिल्म ससुरा बड़ा पइसावाला के स्टार और भाजपा सांसद मनोज तिवारी भी मौजूदा दौर से क्षुब्ध हैं.

उन्हें लगता है, ''पिछले कुछ वर्षों में इसमें ऐसे डायरेक्टर आ घुसे हैं जिन्होंने भोजपुरी संस्कृति को या तो समझा नहीं या समझने की कोशिश नहीं की और टुच्चे किस्म के फायदों के लिए उसमें अश्लीलता परोसते गए.’’ उनके हिसाब से इसमें कुछ ऐक्टर ही ऐसे हैं, जिनको लगता है कि नंगई ठेली और बेची जा सकती है, ऐसे लोगों को इस भाषा को जहालत में ले जाने का दोष भी अपने ऊपर लेना चाहिए.

कभी वह दौर था जब देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने फिल्मकार नाजिर हुसैन को भोजपुरी फिल्म बनाने के लिए प्रेरित किया था और जिन्होंने गंगा मैया तोहरे पियरी चढ़इबो जैसी ऐतिहासिक फिल्म बनाई. हिंदुस्तानी सिनेमा में भोजपुरी तो ब्लैक ऐंड व्हाइट के जमाने से ही ठसके के साथ मौजूद रही है. 1943 में तकदीर फिल्म में दो भोजपुरी ठुमरी नरगिस की मां जद्दनबाई के कहने पर शामिल की गई थीं. रंगमहल में दस दरवाजा, ना जानी खिरिकिया खुली थी, इस भोजपुरी गीत के बाद आपको राजकपूर की सत्यम शिवम सुंदरम का लता मंगेशकर का गाया गीत याद आया?

रंगमहल के... बेशक, पहले फिल्मों में भोजपुरी किरदार भी गढ़े-लिखे जाते थे. गंगा मैया... के बाद तो भोजपुरी जैसे हिंदी के समकक्ष खड़ी हो गई थी. और आज हालत यह है कि भोजपुरी सिनेमा जैसे भौंडेपन और अश्लीलता का पर्याय बन गया है. इस छवि को बदलने के लिए अमिताभ बच्चन, हेमा मालिनी और अजय देवगन जैसे हिंदी सिनेमा के बड़े कलाकारों ने भी भोजपुरी फिल्मों में काम किया.

लेकिन नए जमाने के दर्शकों के बीच वे फिल्में कामयाब न हो सकीं. अभिनेता आमिर खान अपनी हिंदी फिल्म पीके में एक तवायफ का हाथ पकड़कर अपने अंदर भोजपुरी भाषा को ग्रहण करते हैं. इसे आज के दौर वाली भोजपुरी की छवि के रूप में ही देखा जाता है. अगर आमिर चाहते तो भोजपुरी का स्तर बढ़ा सकते थे.

भोजपुरी फिल्मों और एल्बमों ने भैया और भाभी सरीखे संबोधनों को भी लिजलिजा बना डाला. भोजपुरी के सुपरस्टार रहे भाजपा सांसद रवि किशन भी स्पष्ट करते हैं, ''भोजपुरी गानों के एल्बम और नए कलाकारों के कारण भैया जैसा प्यारा शब्द गाली के रूप में इस्तेमाल होने लगा.’’ भोजपुरी में अश्लीलता के खिलाफ हमेशा मुखर रहने वालीं लोकगायिका शारदा सिन्हा इस रुझान से खासी व्यथित हैं, ''भोजपुरी पर हो रहे अत्याचार को नजरअंदाज किया जा रहा है.

इसके सिनेमा और गानों से पैसा कमाने के लिए सेक्स बेचा जा रहा है. ऐसी फिल्मों की वजह से समाज में भाभी सरीखे रिश्ते के स्थान को गिरा दिया गया है. इस सबके लिए फिल्में बनाने और देखने वाले दोनों जिम्मेदार हैं.’’ भोजपुरी सिनेमा के महानायक रहे कुणाल सिंह इसमें किसी और की बजाए खुद जिम्मेदारी लेने पर जोर देते हैं. ''हमारा युवा दर्शकों वाला तबका ड्रग एडिक्ट की तरह अश्लीलता का शिकार है. और हमने अश्लीलता परोसने की छूट दी. आज हमारे घरों की महिलाएं भोजपुरी सिनेमा देखने सिनेमाघरों में जाने से कतराती हैं.’’

शारदा का तो मानना है कि फूहड़ कलाकारों और उनकी फिल्मों का दर्शक ही जब तक बहिष्कार नहीं करेंगे, छवि बिगाडऩे का सिलसिला खत्म नहीं होगा. ''कुछ गिने-चुने आर्टिस्ट स्टारडम के पीछे भागते हैं. वे कैसे भी अपना काम हिट कराने की होड़ में रहते हैं. यह भोजपुरी के लिए खतरनाक है.’’

लेकिन इसी बीच नेहा सिंह राठौर के रूप में बिहार के कैमूर जिले की एक युवा गायिका एकाएक उठती है और सामाजिक सरोकार वाले भोजपुरी गानों के जरिए लाखों लोगों का दिल जीत लेती है. प्रवासी मजदूरों की वापसी के दौरान कारखाना बंद होइ गइले हमार पिया घरे न अइले हो जैसे उनके गीतों ने हर श्रोता की आत्मा को छुआ. वे कहती हैं, ''भोजपुरी में शादी-ब्याह के ही गीत नहीं हैं, लोक जीवन की चुनौतियां भी उसमें पिरोई जाती रही हैं. यह भिखारी ठाकुर, विद्यापति और महेंदर मिसिर की भाषा है.’’

कभी लोहा सिंह भी भारत-चीन युद्ध के दौरान अपने भोजपुरी गीतों से ललकार लगाते थे. लोकप्रिय गायिका मैथिली ठाकुर भी कहती हैं, ''मैं भोजपुरी के रामजी के भजन और उनके विवाह के इतने सारे सुंदर प्रसंग इसीलिए सुनाती हूं ताकि धीरे-धीरे लोगों का नजरिया बदले.’’

पटकथा-संवाद लेखक आनंद भारती का आकलन है कि भोजपुरी सिनेमा के इस तीसरे दौर (पहला दौर—1963-76;  दूसरा 1977-2000; तीसरा 2001 से) में गांव-गांव में लड़के-लड़कियां फूहड़ गानों का एल्बम इसलिए बनाते हैं ताकि सिनेमा में मौका मिल जाए. ''पवन सिंह, निरहुआ, खेसारी लाल यादव और कई अन्य गा-गाकर हीरो बने हैं. नए लड़कों को समझ में आ गया कि  नाच-गाकर गांव-गांव में पॉपुलर बनो और सिनेमा में पहुंचो.

हालांकि, इस फूहड़ता के खिलाफ भोजपुरी इलाके में चार-पांच साल पहले आंदोलन भी हुआ पर असर कुछ दिन ही रहा.’’ भोजपुरी सिनेमा के शोमैन अभय सिन्हा ने मनोज तिवारी, रवि किशन और दूसरे कलाकारों के साथ 75 से ज्यादा फिल्में बनाई हैं. उनका दावा है कि आठ-दस फिल्मों को छोड़ दें तो उनकी फिल्मों में गंदगी नहीं है. भोजपुरी पर अत्याचार के लिए वे खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश की सरकारों को ज्यादा दोष देते हैं. ''ये सरकारें भोजपुरी के लिए न तो सहूलतें दे रही हैं, न काम कर रही हैं.’’

यह भी कड़वा सच है कि 8-10 साल पहले इसी इंडस्ट्री में अभिनेत्रियों को सताने और उनका शोषण किए जाने की खबरें आम हो गई थीं. रानी चटर्जी, रानी चतुर्वेदी और रितु पांडेय वगैरह ने इस तरह की शिकायतें की थीं. 16 साल की ही उम्र में 70-80 एल्बमों का हिस्सा रह चुकी गोरखपुर की एक नृत्यांगना का बेतिया में शारीरिक शोषण और फिर उसके साथ धोखे की खबरें चर्चा में आई थीं. दरअसल, उस समय भोजपुरी फिल्मों की सफलता को देखते हुए दबंग नेता, ठेकेदारों और नवधनाढ्यों का एक तबका ग्लैमर का सुख लेने की नीयत से इधर आने लगा था.

बहरहाल, एक मुद्दा मल्टीप्लेक्स में भोजपुरी फिल्में रिलीज न किए जाने का भी है. अभय का तर्क है कि आज भोजपुरी को छोड़कर सभी क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्में मल्टीप्लेक्स में लगती हैं. ''हमारी सरकारों का कोई स्टैंड ही नहीं. नीतीश कुमार ने हमारे साथ बैठकर बिदेसिया देखी थी. उनसे पूछिए, फिल्म वल्गर लगी क्या?’’

भोजपुरी की दुर्गति के लिए सरकार का सौतेला रवैया भी जिम्मेदार है. तभी तो उसे आज तक संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं किया गया है, जबकि उससे कम भूभाग और आबादी में बोली जाने वाली मैथिली 2004 में ही उसमें जगह बना चुकी है. इस मुद्दे पर 2012 में तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने संसद में खड़े होकर भोजपुरी में कहा था कि ''हम रउआ सबके भावना के समझतानी.’’

पर समझ कोई न पाया. भाषा विज्ञानी जी.ए. ग्रियर्सन ने 1903 में छपे अपने लिंगुइस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया में भोजपुरी भाषा के बारे में कई प्रामाणिक तथ्य सामने रखे थे. तब यह 50,000 वर्ग मील के इलाके में बोली जाती थी. और देश की तब की 29.43 करोड़ की आबादी में से भोजपुरी भाषाभाषियों की तादाद दो करोड़ थी. आनंद का तर्क है कि गुजराती और मराठी आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने के बाद उन भाषाओं में अच्छी फिल्में बनने लगीं क्योंकि ऐसी भाषाओं की कृतियों को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के लिए भेजा जाता है.

भोजपुरी भाषा के नायकों में से एक भिखारी ठाकुर के नाटक बिदेसिया से पहचान बनाने वाले चर्चित रंगकर्मी संजय उपाध्याय भी इस मुद्दे पर अपना वजन डालते हैं. ''किसी भाषा के आठवीं अनुसूची में शामिल होने से उसे एक राष्ट्रीय गरिमा मिलती है, देश भर में उसे सम्मान और जिज्ञासा के साथ देखा जाता है. अभी तो भोजपुरी में ठीक से पढ़ाई भी नहीं होती.

लेकिन शारदा सिन्हा इससे पूरी तरह सहमत नहीं. उनकी राय में आठवीं सूची में शामिल किए जाने का अश्लीलता से क्या लेना-देना! ''इसमें शामिल होने से क्या लोगों की भड़ास खत्म हो जाएगी? हां, इससे भोजपुरी का शैक्षणिक पक्ष जरूर मजबूत हो सकता है.’’

दसेक साल पहले तक 3,000 करोड़ रु. के कारोबारी आंकड़े को चूमने वाले भोजपुरी सिनेमा में अब कमाई कम हो गई है और यह दम तोडऩे की स्थिति में है. अभय बताते हैं कि अब डिजिटल और सैटेलाइट पर फिल्में बिकती हैं लेकिन थिएटर में हालत बहुत खराब है. कोरोना काल से पहले 50 फिल्में सालाना बनती थीं, जिसमें से 10-15 ठीकठाक होती थी. साल का 50 से 75 करोड़ रु. का बिजनेस होता था.

अच्छी पिक्कचर हो तो 50 लाख से एक करोड़ तक मिल जाता रहा है. तिवारी याद करते हैं कि उनके स्टारडम के दिनों में थिएटर का कलेक्शन पांच से 50 करोड़ रु. तक हुआ करता था. उनके शब्दों में, ''आज आप किसी भी प्रोड्यूसर से पूछ लीजिए, थिएटर का कलेक्शन 10 लाख रु. भी नहीं हो रहा.’’ फिल्म बनाने में अगर 70-80 लाख रु. लग रहे हैं तो निकलता कहां से है? डिजिटल राइट्स से. यह सिनेमा इस वक्त डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मौजूद दर्शकों के भरोसे चल रहा है और वहीं अश्लीलता परोसी जा रही है.

लेकिन अश्लीलता के इसी अंधड़ में मनोज वाजपेयी और नेहा सिंह राठौर सरीखे कलाकारों से उम्मीद की एक रोशनी भी दिख रही है. वाजपेयी के गाए भोजपुरी रैप सांग बंबई में का बा के अलावा नेहा के सामाजिक सरोकारों वाले गानों को जिस तरह से पसंद किया जा रहा है, उससे लगता है कि भोजपुरी में बदलाव आ सकता है. तिवारी कहते हैं, ''मैं तो खुद मनोज वाजपेयी के गाने को फैलाने में लगा हूं. इसमें कुछ पॉलिटिकल बातें हैं लेकिन इसमें भोजपुरी की आत्मा है.’’

शारदा भी तारीफ कहती हैं, ''मनोज वाजपेयी ने रैप में ज्वलंत समस्या को सामने रखा. इसको हिट करने के लिए आइटम गर्ल की नहीं, जरूरत पड़ी एक अच्छे गीतकार की जो समसामयिक विषय पर बात कर सके.’’ शौचालय, बेरोजगारी और किसान गीतों के जरिए लाखों श्रोताओं तक पहुंचीं नेहा अपनी बात कहती हैं, ''दोहरे अर्थ वाले गानों के खिलाफ तो हम बोलेंगे, पर भोजपुरी गायिकी को एक नया आयाम मिले, ऐसे गीत भी गाए जा रहे हैं. मैं अपनी तरफ से यह सोचकर छोटा योगदान दे रही हैं कि देश-विदेश में लोग भोजपुरी सम्मान के साथ सुन सकें.’’

बहरहाल, रवि किशन और तिवारी उत्तर प्रदेश में फिल्म सिटी की प्रस्तावना से खासे उत्साहित हैं. किशन कहते हैं, ''इसके बाद हम वहां सेंसर बोर्ड भी बनवाएंगे. और भोजपुरी को मान-सक्वमान दिलाएंगे.’’ तिवारी ने सरेआम फूहड़ता परोस रहे लोगों के खिलाफ कार्रवाई के लिए उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के मुख्यमंत्रियों को चिट्ठी लिखी है. उपाध्याय भी कहते हैं, ''बॉलीवुड में नशेबाजी के खिलाफ चल रहे सफाई अभियान की तर्ज पर भोजपुरी में अश्लीलता के खिलाफ अभियान चल जाए तो क्या बुरा है?’’

अनुभव सिन्हा, फिल्मकार
‘‘देश में अगर किसी भाषा पर सबसे ज्यादा अत्याचार हुआ है तो वह भोजपुरी के साथ हुआ है’’

शारदा सिन्हा, गायिका
‘‘भोजपुरी सिनेमा और गीतों का स्तर गिराने के लिए दर्शक-श्रोता और निर्माता दोनों दोषी हैं’’

मनोज तिवारी, सांसद, गायक
‘‘फूहड़ता परोसने वालों के खिलाफ तीन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को चिट्ठी लिखी है’’

रवि किशन, सांसद, अभिनेता
‘‘यूपी में फिल्म सिटी बनने के बाद सेंसर बोर्ड भी बनवाएंगे और भोजपुरी को सम्मान दिलाएंगे’’

नेहा सिंह राठौर, भोजपुरी गायिका
‘‘सामाजिक सरोकार के गीतों से मैं योगदान दे रही हूं जिससे देश-विदेश के लोग सम्मान से सुन सकें’’

साथ में नवीन कुमार

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