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सिनेमाः मिल गई सांस लेने की मोहलत

एक बार फिर पंकज त्रिपाठी हमें अपनी नई फिल्म से मुग्ध करने वाले हैं लेकिन अब वे थोड़ी राहत की सांस लेने वाले हैं

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पंकज त्रिपाठी अभिनीत मिमी किराये की कोख पर आधारित कॉमेडी ड्रामा है पंकज त्रिपाठी अभिनीत मिमी किराये की कोख पर आधारित कॉमेडी ड्रामा है

पंकज त्रिपाठी आज घर-घर में जाना-पहचाना नाम हैं. हमेशा ऐसा नहीं था. कुछेक वेब शो में उनकी यादगार अदाकारी, मसलन मिर्जापुर (2018) के कालीन भैया, क्रिमिनल जस्टिस (2019) के माधव मिश्र, और बरेली की बर्फी (2017) और स्त्री (2018) सरीखी फिल्मों में दिलकश भूमिकाओं से पहले उनकी प्रतिभा को अनदेखा करना आसान था. गुंडे (2014), सिंघम रिटर्न्स (2014) और दिलवाले (2015) सरीखी पहले की फिल्मों में पलक झपकाते ही वे गायब हो जाते.

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से ग्रेजुएट त्रिपाठी जानते थे कि अच्छे ढंग से गढ़े गए किरदार उन्हें जल्द नहीं मिलेंगे. वे कहते हैं, ''मैं कोई मनसूबा लेकर (मुंबई) नहीं आया था. मुझे पता नहीं था कि मैं क्या चाहता हूं, इसलिए मेरी कोई खास पसंद नहीं थी. मुझे कोई भूमिका मिल रही थी जिससे मैं किराया चुका सकूं या मुझे किसी दूसरे शहर जाकर कुछ काम करने को मिल रहा था, तो यह घर बैठने से अच्छा था.'' त्रिपाठी गुंडे में अपने किरदार के मरने का दृश्य याद करते हैं, ''मुझे गोली मार दी गई तो मैं तेजी से जमीन पर गिर गया, जैसे कोई असल जिंदगी में गिरता है. अली (अब्बास जफर, निर्देशक) ने पहले मुझे घुटनों के बल गिरने को कहा. 'थिएटर छोड़ और रियलिज्म में मत घुस.'' यह त्रिपाठी के लिए तालीम थी. मसलन, सबसे पहले गुंडे में ही उन्होंने हाई-स्पीड शॉट्स के बारे में सीखा. ''दिमाग का एंटीना खुला रखोगे तो तुम बहुत कुछ सीख लोगे.''

त्रिपाठी जिंदगी को गौर से देखते हैं, फिल्में नहीं. वे कहते हैं, ''मैंने इतनी सारी चीजें देखी-सुनी हैं कि मैं भूल जाता हूं मैंने क्या कल्पना की और क्या वाकई देखा है.'' उन्होंने असल और दिलकश लोगों और अतीत की मुलाकातों को दिल में उतारने का खासा अभ्यास किया है. किरदारों को यादगार बनाने के लिए वे यही तरीका आजमाते हैं. सरोगेसी यानी किराए की कोख पर आधारित कॉमेडी ड्रामा मिमी में उनका किरदार एक ही पंक्ति या शब्द को अक्सर दो बार बोलता है और हर बार उसके मायने बदल जाते हैं. त्रिपाठी कहते हैं कि यह बिहार में उनके पैतृक गांव बेलंसड के एक शख्स की शान में उनका कसीदा है. मिमी 30 जुलाई को नेटफ्लिक्स और जियोसिनेमा पर रिलीज हो रही है.

त्रिपाठी के निर्देशक अदाकार की मन की तरंगों को न रोककर खुश ही होते हैं. वे उन्हें अपने संवादों के बीच या बाद में कुछ देर मौन या अवकाश की इजाजत देते हैं. त्रिपाठी कहते हैं, ''चुप्पी का मजा ही कुछ और है. टेक्स्ट (मूलपाठ) तो हम सब समझ सकते हैं, लेकिन सबटेक्स्ट (निहितार्थ) केवल मौन के जरिए पकड़ा जा सकता है.'' मिर्जापुर, पावडर (2010 का टीवी शो, अब नेटफ्लिक्स पर है) और गुडग़ांव (2016) में त्रिपाठी अपने किरदारों को ज्यादा रहस्यमयी और भविष्यदृष्टा बनाने के लिए संवादों के साथ मौन का इस्तेमाल करते हैं, जबकि बरेली की बर्फी और स्त्री में मौन या विराम उनकी कॉमिक टाइमिंग में इजाफा करते हैं. वे कहते हैं, ''यथार्थवादी अभिनय की तलाश में हमें रस से हाथ नहीं धो बैठना चाहिए.''

त्रिपाठी के करियर को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है. 2017 से पहले और उसके बाद. हालांकि उन्होंने मसान (2015) और नील बटे सन्नाटा (2015) में भी दर्शकों को लुभाया था, पर यह न्यूटन (2017) ही थी जिससे त्रिपाठी ने अपने झंडे गाड़े. जब काम के प्रस्तावों की झड़ी लगने लगी तो त्रिपाठी के लिए इनकार कर पाना मुश्किल था. वे कहते हैं, ''भूख दबके लगी हो, तो ओवरईटिंग हो ही जाती है.'' अंधाधुंध रफ्तार से काम करते हुए 2018 और मार्च 2020 के बीच वे एक से दूसरे प्रोजेक्ट तक भागते रहे.

ताबड़तोड़ काम करने का असर सेहत पर पड़ा. वे कहते हैं, ''सृजन के लिहाज से मैं भले न टूटा होऊं, पर मानसिक तौर पर टूटने की कगार पर था.'' वे लगातार थकान महसूस करते. एक बार तो उन्हें अस्पताल में भर्ती भी होना पड़ा. अलबत्ता काम की बहुतायत के बावजूद मंच के उनके तजुर्बे ने अदाकारी की सीमाओं को झलकने नहीं दिया. वे कहते हैं, ''आप एक दूसरे स्तर का फोकस बढ़ा लेते हैं. ध्यान के लिए हिमालय जाने की जरूरत नहीं. चुनौती यह है कि आप व्यस्त चौराहे के बीचोबीच यह करें.''

कोविड महामारी ने त्रिपाठी को जरूरी मोहलत दी. बीते 16 महीनों में उनके कई वेब शो और फिल्में रिलीज हुई—मिर्जापुर, क्रिमिनल जस्टिस, गुंजन सक्सेना—दि करगिल गर्ल, लूडो, शकीला (2020) और कागज (2021). मिमी के बाद '83 आएगी, जिसमें उन्होंने 1983 का विश्व कप जीतने वाली क्रिकेट टीम के मैनेजर का किरदार निभाया है. अपना वक्त हिंदी साहित्य पढऩे और मुंबई में मड आईलैंड स्थित अपने घर के आसपास हरे-भरे परिवेश में बिताया.

त्रिपाठी कहते हैं कि इससे उनके ज्ञानचक्षु इस तरह खुले कि वे आध्यात्मिक वक्ताओं की तरह बोलने लगे हैं, ''जीवन क्षणभंगुर है. हम सब खाली हाथ जाएंगे.'' उन्होंने इस साल महज तीन हफ्ते शूटिंग की. ''कोई तकाजा नहीं है, संतोष है.''

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