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सिनेमाः तो क्या महामारी बदल देगी पूरा किस्सा

महामारी ने पटकथा लेखकों को भी झकझोर कर रख दिया है. उम्मीद है कि उनके भीतर पलते द्वंद्व से दिलचस्प किस्से निकलेंगे.

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 रेशुनाथ पटकथा लेखक रेशुनाथ पटकथा लेखक

महामारी के दौरान पिछले साल अमेजन प्राइम वीडियो पर आई सीरीज अनपॉज्ड में एक कहानी थी ग्लिच. राज ऐंड डीके निर्देशित इस साइंस फिक्शन में कोरोना के समय की एक प्रेम कथा है: वायरस से खौफ के चलते एक आदमी घर से बाहर तक निकलने से डरता है.

पर यही शख्स एक ऐसी लड़की के प्यार में पड़ जाता है जो हर रोज वायरस से लड़ रही है. इसकी पटकथा लिखने वाली रेशुनाथ कहती हैं, ''आप 2019 में इस तरह की कहानी नहीं लिख सकते थे. कोरोना महामारी ने मेरी ही क्या, सारे ही पटकथा लेखकों की सोच को बदलकर रख दिया है. एक अदृश्य वायरस हमारे सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों में बैठ गया है. इसको इतनी जल्दी सोच से निकाल पाना आसान न होगा.’’

कोरोना ने मनोरंजन की दुनिया को अंदर-बाहर से पूरी तरह बदलकर रख दिया है. ऐसे में सिनेमा की किसी भी रचना की बुनियाद माने जाने वाले पटकथा लेखकों पर इसका असर कैसे न पड़ता. पूरी तरह से बदल चुकी दुनिया की हकीकत और कल्पना के मेल से वे बिल्कुल नए किस्से गढ़ने में लग गए हैं. और उसका रंग फिलहाल ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दिखने लगा है.

आम लोगों की तरह रेशु ने भी महामारी के दौरान इनसानियत की ऊंचाइयों और छल-छद्म, लालच की पराकाष्ठा को भी नजदीक से देखा-जाना. वे मानती हैं कि ''यथार्थ को आत्मसात करने में थोड़ा समय लगेगा लेकिन इसने जिस तरह से हमें झकझोरा है, हमारा दिमाग बदलने लगा है.’’ वैसे तो दिल्ली में लेडी श्रीराम कालेज से अंग्रेजी स्नातक और जामिया मिल्लिया इस्लामिया से फिल्ममेकिंग में एमए रेशु ने पामेला रुक्स निर्देशित डांस लाइक ए मैन में बतौर सहायक निर्देशक सिनेमा में पारी की शुरुआत की थी.

उन्होंने फैशन के लिए काम किया, डॉक्युमेंटरी बनाईं और कुछ दूसरी पटकथाएं भी लिखीं. ओटीटी पर उनका पहला शो था राजकुमार राव की मुख्य भूमिका वाला बोस-डेड/अलाइव. पर आठेक साल पहले अपने सपनों के साथ मायानगरी पहुंची बिहार के आरा की इस प्रतिभा के लिए सच और कल्पना की जुगलबंदी से महामारी के विजुअल्स रचने का यह बिल्कुल नया ही अनुभव था.

उनके जेहन में लॉकडाउन के दौरान की ढेर सारी घटनाएं कैद हैं. जैसे हजारों किलोमीटर पैदल चलने वाले प्रवासी मजदूरों की मदद करते सोनू सूद. इसी के बरअक्स ऑक्सीजन और दवा की कालाबाजारी करने वाले भी लोग. अभी वैसे वे संजय लीला भंसाली की पीरियड फिल्म हीरा मंडी और एक राज ऐंड डीके निर्देशित एक दूसरी फिल्म के लिए काम कर रही हैं. पर उन्हीं के शब्दों में, ‘‘महामारी के समय के जो कथ्य और तथ्य मेरे जेहन में बैठे हुए हैं वे कालांतर में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मेरे काम में दिखेंगे ही.’’

वेब सीरीज पाताल लोक के पटकथा लेखक सागर हवेली इस असर को थोड़ा अलग तरह से देखते हैं. उनका कहना है कि महामारी की वजह से लेखक ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया का जिंदगी को देखने का नजरिया बदल गया है. ''कुछ लोग ज्यादा भावुक हो गए हैं तो कुछ लोग अतियथार्थवादी. लोगों में यह भी भावना आ गई है कि किसी के साथ कभी भी, कुछ भी हो सकता है. इसलिए अपने ढंग से जी लें.’’ अभी वे दो फिल्में और एक वेब सीरीज पर काम कर रहे हैं.

महामारी कहानी को आखिर बाहर से कैसे बदल रही है? इस पर वे स्पष्ट करते हैं, ''इसकी वजह से चूंकि शूटिंग के तौर-तरीके बदल गए हैं, इसलिए प्रोड्यूसर भी भीड़ वाले दृश्य नहीं चाहते. अब ऐसे में किरदार गढ़ते समय हमें इस पहलू का ध्यान रखना ही होगा.’’ वे यहां एक दिलचस्प पहलू की ओर इशारा करते हैं, वह यह कि ईरान में सियासी प्रतिबंधों और दबावों के चलते वहां के लेखकों ने अपनी बात रूपक वाले विजुअल्स में कहने का एक नया ढंग ईजाद कर लिया.

सागर कहते हैं कि यहां भी उम्दा कहानियां निकलकर आ रही हैं. हाल में आई मलयालम फिल्म कुरुथि महामारी के दौरान ही बनी है. इसके लिए शहर से दूर की, बस 5-6 किरदारों वाली कहानी बुनी गई क्योंकि उसे बनाना आसान था. युद्ध पर फिल्म बनाना मुश्किल है.

महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के एक किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले सागर कृषि की पढ़ाई करके खेती करना चाहते थे मगर एमबीए के बाद विज्ञापन का काम करते हुए उनकी दुनिया बदल गई और वे अपने पहले प्रोजेक्ट पाताल लोक से जुड़े. बकौल सागर, ''मेरी कहानी भले ही महामारी के बारे में न हो पर कथानक और दृश्य लिखते वक्त उस बारे में तो सोचता ही हूं, सोचना जरूरी है. उस हिसाब से पक्के तौर पर कहानी बदल रही है. यह आज का सच है. कल पता नहीं क्या होगा.’’

इस महामारी ने पटकथा लेखन के व्याकरण को किस तरह से बदला है, इसे एक और लेखक संजीव के. झा अपने ढंग से खोलते हैं, ‘‘महामारी से उपजे हालात ने ओटीटी के रूप में लेखक को एक वैकल्पिक माध्यम दे दिया, जिसके लिए लिखते वक्त स्टार को नहीं बल्कि किरदार को महत्व दिया जाता है. यह पटकथा लेखन के क्षेत्र में एक बड़ी आजादी थी.’’

बिहार में मोतिहारी के रहने वाले संजीव दो प्रयासों में भी एफटीआइआइ में प्रवेश न मिल पाने से निराश थे. फिर दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पढ़ाई करके मुंबई आ पहुंचे. 2019 में उनकी दो फिल्में जबरिया जोड़ी और बारोत हाउस (जी5 पर) रिलीज हुईं. उसके बाद लॉकडाउन लग गया. बकौल संजीव, ''लेखक को जो चीज सबसे ज्यादा प्रभावित करती है वह है मानवीय संबंध. परीक्षा की घड़ी में हम एक-दूसरे के लिए किस तरह से खड़े हुए.

इसी तरह से डॉक्टर और मरीज के तथा सरकार और जनता के बीच के रिश्तों की सबसे परीक्षा होती है.’’ संजीव का भी मानना है कि कोई पटकथा महामारी के बारे में न हो तो भी कहानी में उसकी झलक आने वाली है. रिश्तों का अनुभव, किसान आंदोलन, लड़कियों का विरोध प्रदर्शन, प्रवासी मजदूरों का पलायन, आदमी के स्वभाव में बदलाव ये सब पहलू तो कहानियों में झलकेंगे ही.

ओटीटी की कामयाबी और उसमें कहानियों की केंद्रीय भूमिका रहने से पटकथा लेखकों के सामने भी ताजा कथानक लेकर आने की चुनौती खड़ी हो गई है. और वे इसे अवसर में बदलने में लग गए हैं. हाल में ओटीटी पर रिलीज मिमी और हेलमेट जैसी फिल्मों के पटकथा लेखक रोहन शंकर का मानना है कि अब ''बहुत सारी कहानियां इमोशन से कहने का वक्त आ गया है. इस पहलू पर मैं ज्यादा गंभीर हूं.

अब मैं जिन दो कहानियों पर काम रहा हूं उनमें से एक महाराष्ट्र पर आधारित है. उसमें मेरी सोच में आए बदलाव की झलक तो रहेगी ही. साथ ही उसमें वास्तविकता, गहराई और इमोशन को ज्यादा से ज्यादा कहने की कोशिश करूंगा.’’ महामारी पर बात करते हुए रोहन भावुक हो जाते हैं. इसने उनके एक दोस्त की जिंदगी ले ली. उनके हिसाब से महामारी ने दुनिया ही बदल दी है. इसने जिंदगी, फिटनेस और रिश्तों की अहमियत बताई है.

मिमी और हेलमेट से वाहवाही लूटने वाले रोहन की सूरज पे मंगल भारी (निर्देशक अभिषेक शर्मा) और लुका छुपी (लक्ष्मण उतेकर) भी दर्शकों के दिलों पर छाई हुई थी. रोहन बताते हैं, ''मिमी और हेलमेट मैंने कोविड से पहले लिखी थी. इसमें जज्बात भी हैं और ह्यूमर भी. दूसरे, हम लोगों ने साल भर में ओटीटी पर दुनिया भर के कंटेंट देख लिए हैं. मैं मराठी हूं तो मेरे लिए तो साउथ इंडियन मूवी भी फॉरेन कंटेंट है. देखकर पता चल रहा है कि दक्षिण के लेखक कमाल का काम कर रहे हैं.’’

यह सब देखकर दर्शकों-लेखकों सभी की अपेक्षाएं बढ़ गई हैं. रोहन का मानना है कि कॉमेडी सबसे ज्यादा चलेगी. ''महामारी को भूलने के लिए लोग हंसना चाहते हैं. ओटीटी पर महामारी से जुड़ी कुछ कहानियां आई हैं. फिर भी बेरोजगारी, जनाक्रोश, मानवीय रिश्ते जैसे मुद्दे भी कहानी में आएंगे ही. पर मैं किसी फॉर्मूले में बंधना नहीं चाहता. मैं अपनी कहानी स्वाभाविक अंदाज में कहूंगा.’’

यह सच है कि महामारी ने जिस तरह से पटकथा लेखकों की सोच पर असर डाला है उससे उनके भीतर गहरे द्वंद चलने शुरू हो गए हैं. जाहिर है इस द्वंद के गर्भ से देर-सवेर ऐसे दिलचस्प किस्से निकलेंगे जो दर्शकों का एक नया तबका खींचकर लाएंगे. और मनोरंजन उद्योग को यही तो चाहिए.

रेशुनाथ
पटकथा लेखक
''महामारी के दौरान जो कथ्य-तथ्य मेरे जेहन में बैठे वे मेरे काम में दिखेंगे ही.’’

रोहन शंकर, 36 वर्ष
पटकथा लेखक
''अब कहानियां पूरी तरह जज्बात से कहने का वन्न्त आ गया है और मैं इसे लेकर गंभीर हूं.’’

सागर हवेली, 40 वर्ष
पटकथा लेखक
‘‘बदले हालात में प्रोड्यूसर भीड़ वाले दृश्य नहीं चाहते. हमें उस हिसाब से कथानक बदलना होगा.’’

संजीव के. झा,
33 वर्ष
पटकथा लेखक
‘‘महामारी में ओटीटी पर आए कंटेंट में कहानी केंद्र में रही. ऐसे में लेखकों की चुनौती बढ़ गई है.’’

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