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पाकिस्तानी डायरेक्टर और प्रोड्यूसरों की किस्सागोई की ताकत की याद दिलाती फिल्म 'केक'

केक में दो मजबूत महिला किरदारों की पुरजोर मौजूदगी ने भी खासी हलचल पैदा की है. मर्द संवेदनशील और खोट से भरे हैं. वे किस्से को आगे नहीं बढ़ाते, पर उसे ऊंचा उठाए रखते हैं

इल्म से भरी फिल्म इल्म से भरी फिल्म

वेकराची में पले-बढ़े. हम ठिठोली करते कि असीम अब्बासी पाकिस्तान के करण जौहर होंगे. पर उन्होंने तो कुछ बेहतर ही किया है. उन्होंने नकल की बजाए कुछ नया रचा है. उनकी पहली फिल्म केक पाकिस्तान में 30 मार्च को रिलीज हुई.

यह समकालीन पाकिस्तानी सिनेमा में एक नई शैली गढ़ती है और बड़े बजट की बॉलीवुड फिल्म बनने को आतुर फिल्मों और फटाफट कला फिल्मों के बीच कहीं सुकुनबख्श जगह पर ठहरती है.

यह परेशानियों से घिरी दो सहोदर बहनों की कहानी है जिन्हें अपने माता-पिता की बढ़ती उम्र का सामना करना पड़ता है. किस्सागोई, चरित्र चित्रण और सिनेमेटोग्राफी के लिहाज से यह पाकिस्तानी सिनेमा में नई जमीन तोड़ती है. अपनी इस फिल्म के लिए अब्बासी को यूके एशियन फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट डायरेक्टर का अवॉर्ड मिल चुका है.

अब्बासी हमेशा बॉलीवुड के बड़े मुरीद हुआ करता थे. जब वे लंदन में निवेश बैंकर बन गए, उन दिनों भी 18-18 घंटे काम करके लौटने के बाद कई-कई घंटे बॉलीवुडनुमा पटकथाएं लिखने में बिताते, जो कूल्हे मटकाती नायिकाओं और दिलकश नायकों से भरी होतीं.

केक को बनाने में खासा लंबा वक्त लगा. इसके पहले उन्होंने कई शॉर्ट फिल्में बनाईं, जिनमें उसका हाथ लगातार मंजता गया, और दो पटकथाएं लिखीं जिनसे प्रोड्यूसरों ने इसलिए पनाह मांग ली क्योंकि वे या तो "बहुत ज्यादा सियासी'' थीं या "पर्याप्त व्यावसायिक नहीं'' थीं.

फिर वे लंदन के कारोबारी सैयद जुल्फिकार बुखारी से जुड़ गए. उसने वे जादुई लफ्ज बोले जो अब्बासी सुनने को बेचैन थेः "वह फिल्म बनाओ जो तुम बनाना चाहते हो.'' नतीजा वह कलाकृति है जो नए मानक कायम करती है. एक बहन का किरदार अदा करने वाली सनम सईद कहती हैं, "केक पाकिस्तानी डायरेक्टर और प्रोड्यूसरों को किस्सागोई की ताकत की याद दिलाएगी. हमारे दर्शकों में बेअक्ल तरीके से दिल बहलाए जाने से कहीं ज्यादा कूवत है.''

केक में दो मजबूत महिला किरदारों की पुरजोर मौजूदगी ने भी खासी हलचल पैदा की है. आमिना शेख और सईद ने झगड़ालु बहनों के किरदार निभाए हैं और बेओ जफर ने उनकी खब्ती मां के किरदार में सबसे ज्यादा वाहवाही बटोरी है.

मगर पुरुष किरदारों को अब्बासी ने बिल्कुल नए-नवेले तरीके से उकेरा है, जो मीटू हैशटैग के जमाने में और भी ज्यादा ध्यानाकर्षण के हकदार हैं.

दबंग पिताओं और आक्रामक प्रेमियों के आम किरदारों से उन्होंने तौबा कर ली है. केक के मर्द कोमल, संवेदनशील और खोट से भरे हैं.

वे किस्से को आगे नहीं बढ़ाते, पर उसे ऊंचा उठाए रखते हैं. शेख कहती हैं, "ये इतने मजबूत मर्द हैं कि मजबूत औरतों को प्यार कर सकते हैं और यह ऐसी बात है जो पाकिस्तानी मर्दों और उनकी मांओं को जरूर देखनी चाहिए.''

और दूसरों को भी. पाकिस्तानी फिल्मों के पुनर्जागरण की धारणा हाल के वर्षों में बनी है और इसका श्रेय बढ़ती तादाद में फिल्मों की रिलीज को जाता है.

मगर खूबी के बगैर तादाद से यह नहीं होगा. अब्बासी की फिल्म इसे बदलने में मदद करेगी.

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