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सिनेमाः मुसीबतों को न्यौता

बिट्टू की मुख्य पात्र उस दुनिया में अलहदा होने की हिम्ममत करती है जहां लड़कियों को नियम-कायदों में रहने और किसी तरह की मुसीबत नहीं पैदा करने के लिए कहा जाता है.

बिट्टू की मुख्य पात्र उस दुनिया में अलहदा होने की हिम्ममत करती है जहां लड़कियों को नियम-कायदों में रहने और किसी तरह की मुसीबत नहीं पैदा करने के लिए कहा जाता है बिट्टू की मुख्य पात्र उस दुनिया में अलहदा होने की हिम्ममत करती है जहां लड़कियों को नियम-कायदों में रहने और किसी तरह की मुसीबत नहीं पैदा करने के लिए कहा जाता है

करिश्मा देव दुबे की शॉर्ट फिल्म बिट्टू की नन्ही मुख्य पात्र आम लड़कियों की तरह नहीं है. आठ साल की यह लड़की आसानी से मुश्किलों में पड़ जाती है और ये मुश्किलें ही हैं जो आखिरकार उसे त्रासदी से बचाती हैं. देहरादून के नजदीक सुदूर गांव कोटि में शूट की गई इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत दुबे की जानदार किस्सागोई, उनकी बहन श्रेया देव दुबे का खूबसूरत कैमरावर्क और दो नन्ही बच्चियों, 9 साल की रानी और 6 साल की रेणु, की आपसी खुशमिजाजी है.

रानी और रेणु मुख्य पात्र जरूर हैं पर अभिनेत्रियां नहीं हैं. बिट्टू ने हाल ही में ऑस्कर अवार्ड देने के लिए मशहूर एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर्स आर्ट्स ऐंड साइंसेज का स्टुडेंट एकेडमी अवार्ड फॉर बेस्ट नैरेटिव जीता है. इस सक्वमान की बदौलत बिट्टू बेस्ट शॉर्ट (लाइव ऐक्शन) फिल्म के लिए एकेडमी अवार्ड के दावेदारों में आ गई. टेलुराइड और पाम स्प्रिंग्ज फिल्म समारोह में दिखाए जाने के बाद यह फिल्म लंदन फिल्म फेस्टिवल के चयन के तौर पर 16 अक्तूबर तक बीएफआइ प्लेयर पर मौजूद रहेगी.

न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी टिश स्कूल ऑफ आर्ट्स से एमएफए दुबे ने बिट्टू में थोड़ा-सा खुद को भी पिरो दिया है. दिल्ली में जन्मी और देहरादून के वेल्हम गल्र्स स्कूल से पढ़ी 30 वर्षीय दुबे कहती हैं, ''सत्ता के साथ मेरा अजीब रिश्ता था. जब आप थोड़े से अलहदा होते हो और आपसे निपटना मुश्किल होता है, तब वे बस आपसे कतई नहीं निपटते.’’

दुबे का इरादा अपने बचपन के वर्षों की जगहों पर फिर लौटने का था, वैसे फिल्म की शूटिंग पहाड़ों के जिस हिस्से में हुई वह उतना रूमानी नहीं था. वे कहती हैं, ''मैं इसे हिमालय की तलहटियों के भूले हुए हिस्से की तरह महसूस करना चाहती थी जहां आप हमेशा तंगहाली में होते हैं.’’

फिल्म की शूटिंग जरूर भारत में हुई, लेकिन इसके लेखन और पोस्ट-प्रोडक्शन का काम अमेरिका में हुआ जहां दुबे 2014 से रह रही हैं. लॉस एंजेलिस से वे कहती हैं, ''मैं दोनों जगहों के बीच होना चाहती हूं’’ लॉस एंजेलिस में ही वे अपनी पहली फीचर फिल्म लिख रही हैं और कुछ प्रोजेक्ट एडिट कर रही हैं.

भारतीय सिनेमा भी उनके दिमाग पर बहुत हावी है. अपने प्रिय फिल्मकारों में हंसल मेहता, जोया अख्तर और चैतन्य ताम्हणे जैसे कुछेक नाम लेते हुए दुबे स्वीकार करती हैं कि वे बॉलीवुड फिल्मों के कुछ डायलॉग सुना सकती हैं.

अपनी दो शॉर्ट फिल्में भारत में बनाने के बाद वे यहां काम करने की मौज-मस्ती का जिक्र करती हैं, ''यहां कागजों पर लिखे से कहीं बहुत ज्यादा मुंहजबानी होता है और गलतियों और जादू की कहीं बहुत ज्यादा गुंजाइश होती है.’’ यही वजह है कि उनकी पहली फीचर फिल्म की पृष्ठभूमि भी यहां की है. वे कहती हैं, ''यह मेरे परिवार पर आधारित है जो उनके बारे में मेरे लिखने से अब आजिज आ गए हैं.’’

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