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इरफान : डिब्बे पर बड़ा दांव

पिछले साल पान सिंह तोमर के ऑस्कर के लिए न जा पाने से आहत इरफान नई फिल्म द लंचबॉक्स की दावेदारी को लेकर बेहद सतर्क

अभिनेता इरफ़ान इन दिनों कॅरिअर में एक दिलचस्प जद्दोजहद से गुजर रहे हैं. 2013 उन्हें अब तक सबसे ज्यादा शोहरत दिलाने वाला साल साबित हुआ है. पानसिंह तोमर के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. लाइफ ऑफ पाइ की दुनिया भर में धूम रही. उनके अभिनय वाली फिल्म द लंचबॉक्स ने मई में विश्व के सबसे प्रतिष्ठित कांस फिल्म फेस्टिवल में दर्शकों की खास पसंद वाला अवार्ड हासिल किया. दुनिया भर के फिल्म संस्थानों, आयोजनों में उनसे बात-मुलाकात के सत्र हो रहे हैं. ट्विटर पर उनके डेढ़ लाख से ज्यादा फॉलोअर्स में बुद्धिजीवियों की अच्छी-खासी जमात है.

इन उपलब्धियों पर बैठकर थोड़ा खुश होने की बजाए वे लंचबॉक्स को ऑस्कर की दौड़ में पहुंचाने की कोशिश में जी-जान से जुट गए हैं. बिना किसी झिझक और संकोच के. फिल्म इसी 20 सितंबर को रिलीज हो रही है. पिछले साल पान सिंह तोमर को भारत से ऑफिशियल एंट्री न बनाए जाने की बात उनके जेहन में है. सो वे बेहद चौकन्ना हैं. पिछले पखवाड़े दिल्ली के सीरीफोर्ट सभागार में फिल्म की खास स्क्रीनिंग के मौके पर उन्होंने दिल की बात कह भी दीः बाकी दुनिया के मुकाबले भारत में यह फिल्म पहले रिलीज करनी पड़ रही है क्योंकि ऑस्कर की विदेशी फिल्मों की श्रेणी में देश विशेष में सितंबर तक ही रिलीज फिल्मों पर विचार किया जाता है.

पर अभिनय और पॉपुलरिटी के तमाम चालू फंडों से दूर रहते आए इरफान के लिए अब ऑस्कर की मारामारी क्यों? ‘‘देखिए, जब हिंदुस्तान की फिल्म उस स्तर पर एक्नॉलेज होती है तो यह सिर्फ उस फिल्म के लिए नहीं, पूरी जनरेशन के लिए इंस्पिरेशन होता है.’’ उन्हें पता है कि भारत से ऑफिशियल एंट्री न बनने पर फिल्म की दौड़ खत्म हो जाएगी. मजमून दिल को छूने पर ही वे फिल्म के सहनिर्माता बने थे. अब दुनिया भर के फिल्मोत्सवों में दर्शकों की प्रतिक्रिया देखने के बाद लंचबॉक्स के पकवानों पर उनका भरोसा और भी बढ़ गया है. ऐसे में वे कोई चूक नहीं रहने देना चाहते.

निर्देशक रितेश बत्रा की यह पहली फिल्म खुद ही अपनी संभावनाओं का पता देती है. एक छोटे-से किस्से की परतें धीरे-धीरे खुलती हैं और दर्शक को अपनी लपेट में लेने लगती हैं. मुंबई में दशकों से नौकरीपेशा लोगों का लंच ऑफिस पहुंचाते आ रहे डिब्बा वालों के काम से जोड़कर इस फिल्म में एक प्रेम कहानी बुनी गई है. इरफान के साथ नवाजुद्दीन सिद्दीकी और निमरत हांडा तीनों अपने खालिस अभिनय के बूते, त्रासदियों से भरी इस प्रेम कथा को यादगार बनाकर छोड़ते हैं. इरफान की मितव्ययिता तो देखते ही बनती है. प्रवासी भारतीय लेखक सलमान रुश्दी ने भी इसे एक उत्सव में देखने के बाद ट्वीट कियाः ‘‘अरसे बाद एक उम्दा भारतीय फिल्म आई. ऑस्कर में विदेशी फिल्मों की कैटेगरी में यह तगड़ी दावेदार होगी.’’

यह भी दिलचस्प है कि फिलहाल इरफान के पास कोई फिल्म नहीं है. और वे बेफिक्र हैं. लंचबॉक्स  को छोड़ दें तो बातचीत और पूरी देहभाषा में वह बेफिक्री साफ नजर आती है. गलाकाट स्पर्धा वाली सिनेमा इंडस्ट्री में भी जैसे ध्यान में मुस्कराता बैठा कोई बौद्ध भिक्षु. जैसे उनके लिए अब कोई कर्म नहीं, जो है बस लीला है. मजाक में पूछिए कि समाधि की दशा में तो नहीं पहुंच गए? वे पूरी गंभीरता से जवाब देने लगते हैः ‘‘उस ओर बढ़ रहा हूं.’’ तभी उनके अंदर के अभिनेता ने कैथरीन बिगेलो के ऑस्कर विजेता होने की रत्ती भी परवाह न करते हुए पिछले साल ज़ीरो डार्क थर्टी  ठुकरा दी. और ‘पर्याप्त समय न होने’ की वजह से क्रिस्टोफर नोलन जैसे बड़े फिल्मकार की फिल्म छोड़ दी.

हां, कहानी भा गई तो दोस्त ब्रिटिश निर्देशक आसिफ कपाडिया की ओर से भेजी कटिंग फॉर स्टोन की स्क्रिप्ट में डूब-उतरा रहे हैं. भारतीय मूल के अब्राहम वर्गीज के इसी नाम के उपन्यास का खूबसूरत स्क्रीनप्ले स्कॉट टीम्स ने लिखा है. इसके अलावा दो और कहानियों को वे फाइनल टच देने में लगे हैं. लेकिन एक क्लासिक पर वे कुर्बान हैं और उसे परदे पर लाने का फैसला कर चुके हैं. हालांकि उस बारे में अंतिम फैसला हो जाने तक वे कुछ भी उगलने को तैयार नहीं.

उन्हें उकसाइएः अलग तरह का काम बहुत कर लिया. अब ‘बड़े’ अभिनेताओं से दो-दो हाथ करेंगे? जवाबः ‘‘मैं अपने तरह की कहानियां कर रहा हूं, टकराव की गुंजाइश नहीं.’’ लेकिन उनका कोई फैन होटल में टकरा जाए, रास्ता रोककर तारीफ करने लगे तो वे पूरी नरमी के साथ कहते हैः ‘‘मेरी नई फिल्म जरूर देखिएगा, लंचबॉक्स.’’ 

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