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सिनेमाः महामहिम के खानदान से

बिहार में पली-पढ़ी श्रेया ने साहित्य और रंगमंच से जुड़ाव के कारण दिल्ली आकर एक्ट वन ग्रुप के साथ थिएटर करते हुए अभिनय कला को तराशा.

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श्रेया नारायण श्रेया नारायण

बॉलीवुड की ग्लैमरस दुनिया बड़ी बेरहम है. पहुंच और रसूख के सहारे आप यहां कदम तो रख लें लेकिन गलाकाट स्पर्धा और जबरदस्त प्रोफेशनलिज्म के बीच जगह बना पाना बहुत मुश्किल होता है. और रसूखदार पृष्ठभूमि का होने के बावजूद अगर आप उसे जाहिर न करना चाहें तो चुनौती और भी बढ़ जाती है.

मुंबई में संघर्ष कर अपने पैर जमा रहे श्रेया नारायण और सोहराब खंडेलवाल से बेहतर यह बात भला कौन जानता होगा! श्रेया देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की पड़नातिन लगती हैं और सोहराब पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के पड़नाती.

राजेंद्र बाबू एक-दो बार मुंबई फिल्म समारोह में शरीक हुए थे. वहीं पर बात-मुलाकात के दौरान फिल्मकार नाजिर हुसैन से उन्होंने भोजपुरी में फिल्म बनाने को कहा. हुसैन ने उन्हीं की प्रेरणा से पहली भोजपुरी फिल्म गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो (1963) बनाई.

राजेंद्र बाबू के बड़े भाई महेंद्र प्रसाद के कुटुंब से श्रेया का रिश्ता है पर संयुक्त परिवार की वजह से राजेंद्र बाबू से भी संबंध जुड़ता है. श्रेया इस पर साफ कहती हैं, ‘‘इस रिश्ते के बारे में मैं इंडस्ट्री में किसी से कुछ नहीं कह सकती थी. यहां आने का फैसला लेने पर परिवार ने साफ कह दिया था कि वे इसमें कोई मदद नहीं करेंगे. मैंने जो भी हासिल किया, खुद के बूते पर.’’

बिहार में पली-पढ़ी श्रेया ने साहित्य और रंगमंच से जुड़ाव के कारण दिल्ली आकर एक्ट वन ग्रुप के साथ थिएटर करते हुए अभिनय कला को तराशा. फिर वे मुंबई आ गईं. नॉकआउट, राजनीति, तनु वेड्स मनु, रॉक स्टार सरीखी फिल्मों में उन्हें छोटे-छोटे रोल मिले. निरंग देसाई की आने वाली फिल्म ताबीर में भी वे रोशनी की भूमिका में हैं. कुछ विज्ञापनों में भी काम किया.

लेकिन खुद पर भरोसे के चलते बार-बार ठुकराए जाने पर भी शुरू में वे घबराई नहीं. आखिर में अतुल सबरवाल ने यशराज फिल्म्स के बैनर पर, अपने निर्देशित टीवी सीरीज पाउडर (2010) में उन्हें जूली नाम के किरदार में लिया. श्रेया बताती हैं, ''उस सीरीज को देखकर ही मुकेश छाबड़ा समेत कई कास्टिंग डाइरेक्टर्स की मुझ पर नजर गई.

छोटे-छोटे रोल मिले पर वे आगे बढ़ने में बहुत काम आए.’’ तिग्मांशु धूलिया की साहेब बीवी और गैंगस्टर (2011) में वे महुआ के किरदार में थीं. बाद में धूलिया ने यारा में भी उन्हें लिया.

अपनी शुरुआती फिल्म एक दस्तक में उन्हें गाने का भी मौका मिला था. गुलाब गैंग (2014) में माधुरी दीक्षित पर फिल्माने के लिए शर्म लाज मोह मार कर गाना उन्होंने लिखा भी. महामारी के दौरान उन्होंने अफीम की खेती पर आधारित एक वेबसीरीज में एक गुंडी का रोल किया. श्रेया को छोटे रोल मिलने का कोई मलाल नहीं है.

वे कहती हैं, ''मैंने अपना सपना खुद पूरा किया वर्ना परिवार का तो वही सपना था जो एक आम बिहारी परिवार के ख्वाम में होता है. ऐक्टिंग के साथ मैं अपनी मिट्टी से भी जुड़ी हुई हूं. बीच में मैंने बाढ़ पीड़ितों की भी मदद की.’’ जीरादेई यानी राजेंद्र बाबू के गांव के लोगों की चाहत है कि वे राजनीति में आएं. ‘‘इस पर मैं गंभीरता से सोच रही हूं.’’ उनका जवाब साफ है.

इसी तरह से पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के पड़नाती सोहराब भी इंडस्ट्री में संघर्ष कर रहे हैं. बॉलीवुड में पंजाबियों का बोलबाला रहा है, इस तथ्य से भी उन्हें कोई खास मदद नहीं मिली. सोहराब के शब्दों में, ''इस इंडस्ट्री में इतनी जद्दोजहद है कि ज्ञानी जी से अपने रिश्ते की बात किसी से कहने का ख्याल मेरे जेहन में ही नहीं आया.

अभी मेरी ही लिखी, बनाई, निर्देशित और अभिनीत फिल्म के सेरा सेरा रिलीज होने को है, उस सिलसिले में कहीं से लोगों को उनसे मेरे रिश्ते की बात पता चली. उनसे मेरा एक रिश्ता है, यह मेरी खुशकिस्मती है लेकिन इंडस्ट्री में अपने हिस्से की मेहनत मुझे ही करनी पड़ेगी. यहां किसी के नाम पर मुझे कोई मौका नहीं देने वाला.’’

हां, परिवार से मदद के मामले में सोहराब श्रेया से थोड़ा बेहतर स्थिति में हैं. एयरफोर्स में सेवारत पिता और डॉक्टर मां ने बेटे का हौसला बढ़ाने के साथ मंजिल तक पहुंचने के लिए सहारा भी दिया. बकौल सोहराब, ''पुणे से इंफोसिस की कंप्यूटर इंजीनियर की नौकरी छोड़कर जब मैं मुंबई आया तो परिवार के लोग डर गए थे कि कैसे मैं जगह बना पाऊंगा. लेकिन मेरी लगन और मेहनत से उन्हें भरोसा हो गया.’’

परिवार की मदद से ही उन्होंने के सेरा सेरा पूरी की जिसे पिछले दिनों लंदन के बाफ्टा क्वालिफाइंग कारमाथेन बे फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट फीचर फिल्म का अवार्ड मिला. अब इसे ओटीटी प्लेटफार्म पर रिलीज करने की तैयारी है. यह अंग्रजी फिल्म है लेकिन सोहराब का दावा है कि मामूली-सी अंग्रेजी जानने वाले भी इसे आसानी से समझ सकेंगे.

चंडीगढ़ के और पढ़ाकू सोहराब ने नाटकों के अपने दोस्तों से अभिनय की बारीकियां सीखने के लिए  रंगमंच को अपनी प्रयोगशाला बनाया. फिर मुंबई आकर मशहूर पटकथा लेखक अंजुम रजब अली की वर्कशॉप ली. फिल्मकार आनंद महेंद्रू के सहायक भी बने.

उन्हें अभिनेता विजयराज की यह सलाह भी काफी पसंद आई कि 'यहां मजे करो और जहां मौका मिले, ऐक्टिंग करो.’ राजनीति से दूर, सत्यजीत रे से प्रभावित सोहराब अब महामारी को लेकर एक फिल्म पर काम कर रहे हैं.

पर सोहराब को सबसे पहले हॉकी खिलाड़ी प्रिथीपाल सिंह (2015) में अभिनय और सहायक निर्देशक का काम मिला था. इसके बाद उन्होंने जग्गा जासूस, अनटचेबल्स, अकूरी, अपस्टार्स और हाल ही आई सरदार का ग्रैंडसन में छोटे-छोटे रोल किए.

लेकिन के सेरा सेरा के जरिए लीड रोल निभाने का उनका सपना भी पूरा हुआ. सोहराब को ''नेता नहीं अभिनेता बनना है.’’ दोनों प्रतिभाओं की दृष्टि साफ है.
 

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