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पर्दे की नई उर्वर जमीन

गर्भावस्था पर केंद्रित पटकथाएं बॉलीवुड में न केवल भारी धन बटोर रही हैं बल्कि इस विषय पर खुली बातचीत का सूत्रपात भी किया है

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बधाई हो में अयुष्मान खुराना और नीना गुप्ता, जिसमें 50 के लगभग उम्र वाली मां के गर्भवती होने से उसके युवा बेटे को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा बधाई हो में अयुष्मान खुराना और नीना गुप्ता, जिसमें 50 के लगभग उम्र वाली मां के गर्भवती होने से उसके युवा बेटे को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा

दिसंबर 2019 में गुड न्यूज रिलीज हुई तो मुंबई के ग्रांट रोड पर डॉ. जतिन शाह के फर्टिलिटी और आइवीएफ क्लिनिक से इसका कोई वास्ता नहीं था. सरोगेसी या किराए की कोख के लिए शाहरुख खान, करण जौहर और सोहैल खान सहित बॉलीवुड के पंसदीदा डॉक्टर शाह के यहां ऐसे जोड़ों की कतार लग गई जो यह जानने को उत्सुक थे कि उलटबांसियों से हास्य उपजाने वाली राज मेहता की इस फिल्म की तरह कहीं उनके शुक्राणु भी किसी और के पास तो नहीं चले गए. उनको उन्हें भरोसा दिलाना पड़ा कि ऐसा नहीं हुआ. करीना कपूर-खान, अक्षय कुमार, दिलजीत दोसांझ और कियारा आडवाणी की अदाकारी से सजी गुड न्यूज में दो दंपतियों की परेशानियां बयान की गई हैं, जिनकी जिंदगी फर्टिलिटी क्लिनिक की गड़बड़ियों की वजह से उलट-पुलट जाती है. शाह के मरीजों के लिए यह संभावना हालांकि मजेदार नहीं थी.

गुड न्यूज ने बॉक्स ऑफिस पर 196 करोड़ रुपए बटोरे. मगर गर्भावस्था पर आधारित यह अकेली फिल्म नहीं है जिसने लोगों का ध्यान खींचा और खूब पैसे बटोरे. एक साल पहले बधाई हो ने भी अपनी खट्टी-मीठी कहानी से दर्शकों को मन मोहा था, जिसमें 50 साल के आसपास की महिला (नीना गुप्ता अभिनीत) दुर्घटनावश गर्भवती होकर करीब 20 बरस के अपने बेटे (आयुष्मान खुराना) के लिए शर्मिंदगी और पड़ोसियों तथा रिश्तेदारों के बीच गपशप का विषय बन जाती है. आश्चर्य यह कि 2021 गर्भावस्था से जुड़ी पटकथाओं के लिए खासकर फलदायी रहा.

कीर्ति सेनन नेटफ्लिक्स की फिल्म मिमी में आईं, जिसमें किराए पर कोख देने वाली युवती की जिंदगी तब पूरी तरह उलट जाती है जब कोख किराए पर लेने वाले विदेशी दंपती का मन बदल जाता है और वे बच्चा लेने से मना कर देते हैं. जी5 पर रश्मि रॉकेट में तापसी पन्नू गर्भावस्था को धाविका के तौर पर अपनी महत्वाकांक्षा की राह का रोड़ा नहीं बनने देतीं. अमेजन प्राइम पर हॉरर फिल्म छोरी में नुसरत भट्टाचार्य ने भूतों और दकियानूस मानसिकता से लड़ने वाली गर्भवती का किरदार निभाया.

सृजन की अहमियत

2022 में भी ऐसी कई फिल्में आने वाली हैं. साल की शुरुआत यशराज फिल्म्स की जयेशभाई जोरदार से होगी, जिसमें रणवीर सिंह का किरदार अपनी गर्भवती पत्नी (शालिनी पांडेय) और उसकी कोख में पल रही बच्ची के पक्ष में खड़ा होता है, जिससे लड़के की चाह रखने वाले उसके रौबदार पिता (बोमन ईरानी) गुस्से से लाल-पीले हो जाते हैं. गर्भावस्था और 'सेव द गर्ल चाइल्ड' थीमों के अलावा निर्देशन में कदम रख रहे दिव्यांग ठक्कर को उम्मीद है कि यह फिल्म हिंदी सिनेमा में ऐक्शन हीरो को नए मायने देगी. वे कहते हैं, ''जरूरी नहीं कि 'मार-धाड़' ही हो, यह अपने पिता के सामने तनकर खड़े होने और 'मैं यह लड़की चाहता हूं' कहने सरीखी छोटी-सी बात भी हो सकती है. वह पैडमैन सरीखा शख्स भी नहीं है जो दुनिया बदलना चाहता हो. वह ऐसा शख्स है जो अपने सफर में पुरुष होने का मतलब हासिल करता है.''

पटकथा लेखिका ज्योति कपूर के लिए गुड न्यूज लिखना जज्बाती तौर पर निचोड़ देने वाला अनुभव था. इसकी शुरुआत उनके 'गर्भवती होने' और ''हमारी निजी जिंदगियों में दखल देने वाले रिश्तेदारों और अजनबियों के अंतहीन सवालों'' से निबटने के संघर्ष से हुई और हास-परिहास 'मुश्किल कहानी बयान करने' का बेहतरीन हथियार बन गया. उन्हें उम्मीद थी कि दर्शक उन 'तमाम अच्छे, बुरे और बदसूरत अनुभवों पर हंस-हंसकर लोटपोट' हो जाएंगे जिनसे वे गुजरी थीं.

गुड न्यूज इस लिहाज से भी दिलेर फिल्म थी कि उसमें करीना कपूर का किरदार सेक्स के विषय में खुलकर बात करता है जब वह अपने पति (अक्षय) को लताड़ लगाता है कि वह जल्दी थक जाता है और बच्चे के लिए पूरी कोशिश नहीं करता. ज्योति को यह विरोधाभास 'रहस्यमय' नजर आता है कि एक तरफ तो भारतीयों के सिर पर बच्चे पैदा करने की सनक सवार है और दूसरी तरफ सेक्स पर बात करना उन्हें अटपटा लगता है. वे कहती हैं, ''मेरी मॉम ने सेक्स के बारे में या ठीक-ठीक कहूं तो यौन आसनों के बारे में पहली बार मुझे, यानी अपनी 38 साल की बेटी को, तब समझाया जब मैं गर्भ धारण करने की कोशिश कर रही थी. हम कई गाइनेकोलॉजिस्ट के पास गए और एक ने भी हमारी सेक्स लाइफ के बारे में नहीं पूछा; वे हमेशा बस यही पूछते कि कितनी बार 'रिश्ता' बनाते हो. फिर भी चीजें धीरे-धीरे बदल रही हैं. हम छोटे-छोटे कदम उठा रहे हैं.''

गर्भ में लंबा वक्त

लंबे वक्त बाद आखिरकार बॉलीवुड ने गर्भावस्था दिखाने को लेकर अपनी झिझक त्याग दी है. मेरी आवाज सुनो (1981) और सौतन (1983) के 'आत्म-धिक्कार और आत्मपीड़न' में निहित 'यंत्रणादायी पोर्न' और 'परपीड़न के स्रोत' का हवाला देते हुए आइआइटी मद्रास में फिल्म अध्ययन और साहित्य की प्रोफेसर आयशा इकबाल विश्वमोहन बताती हैं कि हिंदी फिल्मों में गर्भावस्था को किस तरह ''उदात्त से लेकर अतिनाटकीय तक और फूहड़ से लेकर हास्यास्पद तक भी'' दिखाया गया है. 1993 में ही दूसरी दुल्हन में किराए की कोख की अवधारणा से दर्शकों का तआरुफ करवाया गया, जिसमें शर्मिला टैगोर और विक्टर बनर्जी ने ऐसे दंपती का किरदार निभाया जो बच्चा हासिल करने के लिए वेश्या (शबाना आजमी) को ले आते हैं. यह अतिनाटकीयता 1990 के दशक में भी फली-फूली. बेहद कामयाब फिल्म हम आपके हैं कौन...! (1994) में रेणुका शहाणे का किरदार सामूहिक खुशी से लेकर चरम त्रासदी तक उपजाता है, जबकि प्रेम ग्रंथ (1996) में माधुरी दीक्षित का रोल रेप से जन्मे बच्चे को रखने के लिए भर्त्सना का भागी बनता है.

आयशा कहती हैं कि अंतरराष्ट्रीय सिनेमा और ओटीटी प्लेटफॉर्म के संपर्क में आने से सिनेमा में गर्भावस्था के प्रति प्रगतिशील और दोटूक रवैया आया. सहस्राब्दी का पहला नटखट दशक आते-आते गर्भवती महिला नायिका बन गई. कुंदन शाह की क्या कहना (2000) में प्रीति जिंटा का किशोर किरदार बिनब्याही मां बनता है. मेघना गुलजार की निर्देशित पहली फिल्म फिलहाल (2002) ने एक बार फिर सरोगेसी के विषय को छुआ, हालांकि वह दर्शकों का मन छूने में नाकाम रही. जिंटा ने सलाम नमस्ते (2005) में फिर गर्भवती का किरदार निभाया, इस बार ऑस्ट्रेलिया में अपने लिव-इन-पार्टनर (सैफ अली खान अभिनीत) के साथ, जो पिता की नई भूमिका स्वीकार करने को उत्सुक नहीं है. कहानी (2012) में सुजॉय घोष ने नायिका की बेचारगी को उभारने के लिए उसके गर्भवती होने का सहारा लिया.

आयशा कहती हैं कि चाहे वे कपूर बहनों—करिश्मा और करीना या कल्कि केकलां की लिखी किताबें हों या सोशल मीडिया, फिल्म उद्योग ने ''सरोगेसी के जरिए मातृत्व-पितृत्व'' का अनुमोदन करके और 'पारंपरिक या गैर-पारंपरिक गर्भावस्था के विमर्श को मुख्यधारा' में लाकर इस अफसाने को आगे बढ़ाया. 

विराट अपेक्षाएं

कहा नहीं जा सकता कि गर्भावस्था के साथ बॉलीवुड का लगाव कब तक टिकेगा. इस बीच फिल्मों में गर्भवती महिलाओं को महज एक और किरदार के तौर पर आते देखकर उत्साह बढ़ता है. डिज्नी+ हॉटस्टार पर हाल ही में रिलीज अ थर्सडे से ऐसा ही हुआ. इस थ्रिलर की शूटिंग के वक्त नेहा धूपिया असल में गर्भवती थीं. गर्भावस्था अब रूपक से कहीं ज्यादा है और दर्शकों को मनोदशा के उतार-चढ़ावों और शरीर में आ रहे बदलावों के साथ निजी महत्वाकांक्षाओं का तालमेल बिठाती महिलाएं देखने को मिल रही हैं.

अब भी बहुत कुछ करना बाकी है. डॉ. जतिन शाह जानते हैं कि वास्तविकता पर मनोरंजन हावी है और इसलिए वे फिल्मकारों से 'मजबूत वैज्ञानिक विषय सामग्री' की उम्मीद नहीं करते. 3 ईडियट में प्रसव का दृश्य उदाहरण है. वे कहते हैं, ''शुक्राणुओं में घालमेल या एक शुक्राणु से दर्जनों शिशु पैदा होते दिखाने वाली फिल्में आइवीएफ को खराब रोशनी में पेश करती हैं.'' उन्हें अच्छा लगेगा अगर फिल्में बांझ दंपतियों की तकलीफें दिखाएं और यह भी कि आइवीएफ कैसे उन्हें बच्चा और आत्मविश्वास दे सकता है, अंडों को फ्रीज करके कैसे देर से गर्भधारण किया जा सकता है और सरोगेसी की बदौलत कैसे गरीब महिलाएं अपने बच्चों को खाना और शिक्षा दे सकती हैं. अगर शाह के विचारों के मुताबिक चलें तो यह क्षेत्र के गर्भ में भरपूर संभावनाएं हैं. 

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