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हुनर सिनेमा सजाने का

थोक में शूट की गई कहानी को करीने से सजाकर चुस्त-दुरुस्त फिल्म का रूप दे रही, चुपचाप बैठकर काम करने वाली एडिटर्स की नई पीढ़ी

नितिन बैद नितिन बैद

आपको "हू तू तू'' फिल्म की याद है? बतौर निर्देशक खुद गुलजार इसे अपनी सबसे बुरी फिल्म मानते हैं. वजहः इसकी खराब एडिटिंग. आखिर एडिटिंग में ऐसा क्या है कि फिल्मकार अपनी ही फिल्म को बुरा बता दे?

असल में अलग-अलग फिल्माए गए कहानी के टुकड़ों को करीने से सजाकर एक  खूबसूरत रूप देना होता है जिसे फिल्म एडिटिंग कहा जाता है. यह एक अलग तरह की रचनात्मक तकनीक है जो फिल्म की कहानी को एक सहज गति प्रदान करती है.

आज बॉलीवुड में कई फिल्म एडिटर हैं जो फिल्म को बेहतरीन बनाने के लिए आधुनिक तकनीक के साथ काम कर रहे हैं. नई तकनीक के साथ फिल्म एडिटर अपनी दिमागी कैंची का भी भरपूर इस्तेमाल कर रहे हैं.

नए दौर के एडिटरों में मसान के अलावा राजी फिल्म के एडिटर नितिन बैद कहते हैं, "किसी भी फिल्म के लिए एडिटर सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है. फिल्म एडिट करते समय दर्शकों के दिमाग को समझना पड़ता है.

उन पर फिल्म का मनोवैज्ञानिक प्रभाव किस तरह से पड़ेगा, यह जानना जरूरी है.'' वे बताते हैं कि एडिटिंग के समय यह देखना पड़ता है कि कहां पर कितना इमोशन निचोडऩा है. शूटिंग पूरी होने के बाद फिल्म में किसी ऐक्टर की कमजोरी को कैसे संभालना है, यह भी एडिटर का ही काम है.

कोलकाता के रहने वाले 31 वर्षीय नितिन ने सुभाष घई के इंस्टीट्यूट ह्सिलिंग वूड्स इंटरनेशनल से निकलने के बाद अनुराग कश्यप की फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर के एडिटिंग टेबल पर खुद को तराशा.

फिर अपनी काबिलियत के दम पर उन्होंने मसान फिल्म की स्वतंत्र रूप से एडिटिंग की. वे अपना अनुभव साझा करते हुए कहते हैं, "एडिटिंग के दौरान फिल्म में कभी-कभी ऐसा सीन क्रिएट करना पड़ता है जो पूरी तरह से फिल्म में नहीं है.

मसान फिल्म में विकी कौशल दुख में रोता है. लेकिन मन कस्तूरी...गाने में उसे रुलाना नहीं था. इसलिए हमने फैसला किया कि उसे रुलाने की जगह नम फीलिंग लाते हैं और ऐसा ही किया गया.''

फिल्म एडिटर का काम महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि डायरेक्टर फिल्म की शूटिंग डेढ़-दो सौ घंटे की करते हैं. डिजिटल में दो कैमरा शॉट होता है. फुटेज अनाप-शनाप आते हैं. कैमरा सेटअप ज्यादा होता है, डायरेक्टर के पास समय कम होता है और फिल्म का बजट भी होता है.

लोकेशन पर वापस नहीं आना है तो शॉट्स सारे एंगल से ले लिया जाता है. एक-एक सीन में दस-दस कैमरे लगते हैं. एडिटर का काम अब इन सारे फुटेज में से बेहतरीन शॉट्स छांटने का होता है.

बकौल नितिन, एडिटिंग के समय स्क्रिप्ट ही दिमाग में रहती है. किसी भी फिल्म का आधार पटकथा होती है. कभी-कभी पटकथा पढऩे में अच्छी लगती है लेकिन शूटिंग के दौरान काफी चीजें बदल जाती हैं. एडिटिंग में स्क्रिप्ट के मोशन को अचिव करना होता है और स्टोरी टेलिंग भी करेक्ट की जाती है.

वे मानते हैं कि अगर फिल्म की एडिटिंग अच्छी है तो फिल्म की लंबाई का असर नहीं पड़ता. लगान और टॉयलेट-एक प्रेमकथा जैसी लंबी फिल्मों को दर्शक मिले.

बॉक्स ऑफिस का कोई नियम नहीं है. बरेली की बर्फी की रिलीज के बाद पता चला कि दर्शकों की साइकोलॉजी क्या हो सकती है.

मार्टेन और श्वेता वेंकट जैसे एडिटर को पसंद करने वाले नितिन मानते हैं कि फिल्मों में अलग-अलग संस्कृति और भाषा होने के बावजूद एडिटिंग में परेशानी नहीं होती.

द कोर्ट में असमिया भाषा का इस्तेमाल था तो उसी के हिसाब से एडिटिंग करनी थी. नितिन मानते हैं कि एक फिल्म एडिटर को साहित्य पढऩे से फायदा होता है, खास तौर से किस्सागोई के लिए यह जरूरी भी है.

35 साल की मोनिशा आर बल्दवा फोटो के जरिए कथानक बनाने की प्रक्रिया से आकर्षित हुईं, जिसके बाद उन्होंने एफटीआइआइ से फिल्म एडिटिंग का कोर्स किया.

वे फिल्म एडिटर श्रीकर प्रसाद की असिस्टेंट रहीं और एडिटिंग की बारीकियों को समझा. इसके बाद उन्होंने मुंबई आकर डाक्युमेंटरी, वीडियो आर्ट इन्फॉर्मेशन, फिक्शन और नॉन फिक्शन जैसे अलग-अलग जॉनर में काम किया.

वे कहती हैं, "फिल्म एडिटिंग का कोई मापदंड नहीं है. आलमारी को सजाकर रखो तो चीजें खूबसूरत दिखती हैं. एडिटिंग में कथा की गहराई को देखना पड़ता है.

डायरेक्टर के विजन के साथ फिल्म उभरकर आती है.'' उनका कहना है, "सिनेमा में किसी को अलग-अलग क्रेडिट नहीं दे सकते. हरेक का जुड़ाव होता है. डायरेक्टर के विजन और कथानक के इमोशन से एडिटर जुड़ जाते हैं.''

मोनिशा बताती हैं कि डायरेक्टर का अपने एडिटर पर भरोसा होता है. फिल्म की शूटिंग के बाद जब हम पहला कट बनाते हैं तो डायरेक्टर के साथ उसे देखते हैं.

हर सीन पर चर्चा होती है. एडिटिंग के समय साउंड डिजाइनर के साथ भी चर्चा होती है. वे कहती हैं, "मेरा डॉक्युमेंटरी का अच्छा बैकग्राउंड है, इसलिए ज्यादा फुटेज देखकर तकलीफ नहीं होती.''

हिटलर की जीवनी मीन काम्फ और कहो ना प्यार है फिल्म ने बिहार के नालंदा जिले के असता गांव के राजीव उपाध्याय की जिंदगी ही बदल दी. उन्होंने पटना के रंगमच में खुद को तराशा और तकनीक समझने के बाद मुंबई में आकर जाना कि फिल्म के लिए एडिटिंग टेबल कितनी अहम है. अपनी काबिलियत दिखाने के लिए उन्होंने इसका कोर्स भी कर लिया. वे शॉर्ट फिल्म, डॉक्युमेंटरी और अन्य फिल्मों की मेकिंग से जुड़े.

राजपाल यादव की अता पता लापता फिल्म में उन्हें एसोसिएट एडिटर के रूप में काम करने का मौका मिला. उन्होंने गुजरात में सरोगेट मदर के बिजनेस पर एक डॉक्युमेंटरी की एडिटिंग की. वे कहते हैं, "फिल्म में स्क्रिप्ट हीरो होती है लेकिन डॉक्युमेंटरी में स्क्रिप्ट नहीं होती इसलिए वहां एडिटर का काम बड़ा हो जाता है.''

उन्होंने हॉरर फिल्म चुड़ैल स्टोरी और कुटुंब जैसी फिल्मों की एडिटिंग की. वे बताते हैं कि पहले फिल्म की शूटिंग के लिए 4 मिनट का एक रोल (रील) होता था. अब डिजिटल में शूट होने से फिल्म की लागत कम होती है. कैमरे में चिप लगा होता है, जितना चाहो शूट करो.

श्रीकर प्रसाद, असीम सिन्हा और नम्रता राव की एडिटिंग से प्रभावित राजीव कहते हैं, "एडिटिंग का सबसे बड़ा काम कहानी को सही नजरिए से देखना है. एडिटर को कहानी कहने का गुर आना चाहिए. स्क्रिप्टिंग और एडिटिंग के समय स्टोरी तराशी जाती है.'' वे मानते हैं कि आजकल एडिटिंग पर तकनीक हावी है.

एडिटर को ऑपरेटर नहीं बनना चाहिए. कॉपी-पेस्ट न करके डायरेक्टर के नजरिए से फिल्म कैसे और बेहतर बने, इस पर एडिटर को काम करना चाहिए. फिल्म की फुटेज बताती है कि आपको किस राह पर चलना है. फिल्म का पहला दर्शक एडिटर ही होता है.

17 साल की छोटी उम्र में गुजरात से मुंबई आने वाले अशफाक मकरानी को मेहुल कुमार की फिल्म तिरंगा में काम करने का मौका मिला. यूसुफ शेख से उन्होंने एडिटिंग सीखी. साथ ही उन्हें डेविड धवन और ए मुथू का भी सान्निध्य मिला. 100 से ज्यादा फिल्मों में काम करने वाले अशफाक की बतौर स्वतंत्र एडिटर पहली फिल्म खिलाड़ी 420 थी. बाद में वे गदर फेम डायरेक्टर अनिल शर्मा के ग्रुप में शामिल हो गए. इस समय वे अनिल शर्मा की फिल्म जीनियस कर रहे हैं.

42 वर्षीय अशफाक कहते हैं, "डिजिटल में एडिट करने में समय ज्यादा लगता है. पहले छोटे-छोटे शॉट होते थे. अब मल्टीकैमरा सेटअप हो गया है. वेराइटी और क्रिएटिविटी ज्यादा हो गई है.''

बकौल अशफाक, दर्शकों को ढाई घंटे की फिल्म ऐसे परोसनी है कि झूठी कहानी उन्हें असली लगे.

डिजिटली शूट करने के फायदे के बारे में वे कहते हैं कि अब डिजिटल फॉर्मेट के कारण कंप्यूटर पर काम होता है.

एडिटिंग के समय एनिमेशन वाले मदद करते हैं. एविड और एसटीपी सॉफ्टवेयर पर काम करते हैं. हॉलीवुड में एविड का इस्तेमाल पहले से होता रहा है. बॉलीवुड में अब इस सॉफ्टवेयर के लेटेस्ट वर्जन पर काम करते हैं.

वे कहते हैं, "स्क्रिप्ट फिल्म की मदर बुक है. शूटिंग में राइटर या डायरेक्टर से कुछ गलत हो जाता है तो एडिटिंग टेबल पर उसे ठीक करते हैं. शॉट अपने आप बोलता है कि हम यहीं पर अच्छे हैं.''

स्निप फिल्म से एडिटिंग में नेशनल फिल्म अवार्ड पाने वाले अपूर्व एम. इसराणी मुंबई के हैं लेकिन वे इंडस्ट्री से बाहर के हैं. अपूर्व बताते हैं कि रामू ने उन्हें सत्या फिल्म से एडिटर के रूप में मौका दिया.

40 वर्षीय अपूर्व कहते हैं, "तकनीक नहीं, किस्सागोई असली काम है. एडिटर एक कुक होता है. जिसमें पता होना चाहिए कि व्यंजन किस तरह से पकाया जाए और पेश किया जाए ताकि दर्शकों को पसंद आए.''

वे बताते हैं कि अब डिजिटल में शूट होने की वजह से कि फायत बरतना कोई पहलू नहीं. इससे एडिटर को मटीरियल मिल जाता है. "हंसल मेहता जैसे डायरेक्टर एडिटर पर खूब भरोसा करते हैं, इससे मेरे जैसे एडिटर को बेहतर स्टोरी टेलिंग का मौका मिलता है.''

अपूर्व कहते हैं, "एडिटिंग से पहले मैं स्क्रिप्ट पढ़ता हूं और देखता हूं कि मेरा योगदान हो सकता है या नहीं. कुछ चीजें छूट तो नहीं गईं. एक कट करके डायरेक्टर को दिखाता हूं. वे अपनी पसंद-नापसंद बताते हैं. तीसरी बार एडिटिंग करता हूं और फर्स्ट कट में दिखता है एडिटर का कमाल.''

ये एडिटर मानते हैं कि हर एडिटर के पास किस्सा कहने का अपना अंदाज होना चाहिए. यह अंदाज खुद का खोजा हुआ भी हो सकता है या पहले से आजमाया हुआ भी. अगली बार जब आप फिल्म देखें और तारीफ करें, तो उन लोगों के बारे में भी सोचिएगा जिन्होंने उन बेतरतीब शूट किए टुकड़ों को सिलकर, तराशकर फिल्म को चमकाया होगा.

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