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फुसरतः एक और बनारसी

पत्रकार से फिल्मकार बने जैगम इमाम हिंदू-मुस्लिम कनेक्ट वाली फिल्मों के बाद अब शिक्षा में नकल पर एक व्यंग्यात्मक फिल्म ला रहे हैं.

जैगम इमाम जैगम इमाम

पत्रकार सैयद जैगम इमाम (37) ने मास कम्युनिकेशंस की पढ़ाई के बाद जब 2004 में एक प्रमुख हिंदी अखबार के नोएडा ऑफिस में रिपोर्टर के रूप में ज्वाइन किया था तो फिल्म निर्माता-निर्देशक बनने का ख्याल उनके जेहन में दूर-दूर तक नहीं था. लेकिन एक कहानी उनके दिलोदिमाग में तब भी घूमती रहती थी. 2006 में लैपटॉप खरीदना उनकी जिंदगी के निर्णायक लम्हों में से एक बना. टुकड़ों में लिखी अपनी इस कहानी को उन्होंने इसी लैपटॉप पर डिजिटल फॉर्मेट में उपन्यास की शक्ल दे डाली.

इस तरह उनका पहला उपन्यास दोजख तैयार हुआ, जिस पर उन्होंने इसी नाम से पहली फिल्म बनाई जो 2015 में रिलीज हुई. दोजख का केंद्रीय पात्र बनारस का एक मुस्लिम बच्चा है जिसमें उसका मौलवी पिता कुरान और नमाज को लेकर बार-बार उलाहना देता है और अंत में एक हादसे में बच्चे की मौत के बाद उसे गंगा के घाट पर जलाता है. इस अंत की वजह से उन्हें सेंसर बोर्ड से काफी उलझना भी पड़ा था. दोजख के अलावा अलिफ (2017) और नक्काश (2019) के रूप में जैगम ने अब तक तीन फिल्में बनाई हैं. तीनों में भारतीयता ही उनकी थीम रही है और इनमें रूढि़वादिता, कट्टरता के खिलाफ कड़ा संदेश दिया गया है.

इन तीनों ही फिल्मों को देश की सांस्कृतिक राजधानी बनारस को केंद्र में रखकर बनाया गया है और एकाध अपवाद को छोड़कर सभी की शूटिंग भी बनारस में ही हुई है. जैगम का तर्क है, ''बचपन से बनारस को देखा और आज भी मुझे मुंबई से ज्यादा बनारस पसंद है.'' दिलोदिमाग पर छाए बनारस की वजह से ही शायद इस फिल्मकार की कर्मभूमि बनारस ही बनता चला गया. अलिफ की कहानी मदरसा सिस्टम पर सीधा प्रहार करती है. फिल्म में जया बच्चन नैरेटर हैं. इस फिल्म का संदेश यह है कि इल्म का मतलब दुनिया का इल्म है, जिसे स्कूल में पढ़कर हासिल किया जा सकता है न कि मदरसे में.

जैगम अपनी कहानियों में मुस्लिम-हिंदू कनेक्शन ढूंढकर लाते हैं और उसे भारतीयता के धरातल पर जोड़ते हैं. उनकी पिछले साल आई नक्काश सोशल पॉलिटिकल थ्रिलर है. इसमें एक मुस्लिम कारीगर की कहानी है जो बनारस के मंदिरों में गर्भगृह में नक्काशी करने का काम करता है. इस फिल्म के लिए अमेरिका के इंडियन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ बोस्टन में जैगम को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का सम्मान मिला. सत्यजीत रे और ईरानी फिल्मकार माजिद मजीदी से प्रभावित जैगम ने अपने तजुर्बों को फिल्म में स्थान दिया. उनकी फिल्में समीक्षकों की कसौटी पर खरी रहीं. रिपोर्टिंग के दिनों में नोएडा की गलियों की खाक छानकर खबरें निकालना हो या यूरोप, पश्चिम एशिया और एशिया के 20 से ज्यादा देशों की यात्रा—जैगम को जमीनी अनुभव ज्यादा प्रेरित करते रहे.

अब उन्होंने शिक्षा प्रणाली की ओर रुख किया है. नकल जैसे कोढ़ पर चोट करती उनकी फिल्म नकलची इसी साल बड़े परदे पर आने को तैयार है. जैगम अपने दूसरे उपन्यास मैं मुहब्बत पर एक वेब सीरीज प्लान कर रहे हैं. इसके अलावा सौ साल पुरानी एक बायोपिक को परदे पर उतारने की बात उनके दिमाग में घूम रही है. उनकी इसी फितरत ने 2013 में उन्हें एक टीवी प्रोडक्शन हाउस की नौकरी छोड़कर पूरी तरह से फिल्म निर्माण में कूद पडऩे को विवश कर दिया. इससे पहले वे दिल्ली-एनसीआर में अखबार से लेकर न्यूज चैनलों की खाक छानते आए थे. छद्म नाम से सीरियल भी लिखते रहे. पटकथा लेखन, सीरियल और टीवी प्रोडक्शन की अच्छी जानकारी ने उन्हें फिल्म बनाने का आत्मविश्वास दिया.

फिल्म से आजीविका चल जाती है? जैगम कहते हैं, ''फिल्म सिनेमाघरों के अलावा दूसरे प्लेटफॉर्मों से भी पैसे दिलवा देती है. मेरी फिल्में इरोज, हॉटस्टार जैसे ओटीटी प्लेटफॉर्म और टीवी पर भी हैं जिससे पैसा मिला. जरूरतें सीमित रहें तो पैसा पर्याप्त लगता है.'' उनकी दो फिल्मों को यूपी सरकार से भी मदद मिली. जैगम को देखकर लगता है कि मेहनत और कोशिशें वक्त के साथ कामयाबी दे जाती हैं.

टीवी न्यूज, सीरियल प्रोडक्शन और लेखनी ने जैगम इमाम को फिल्म बनाने का आत्मविश्वास और जोश दिया.

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