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सिनेमाः जाति के संघर्ष का सच 

55 साल पहले अमोल पालेकर ने पहली बार सत्यदेव दुबे की प्रशंसित मराठी फिल्म शांताता! कोर्ट चालू आहे से बड़े पर्दे पर कदम रखा था. हालांकि सर जेजे स्कूल ऑफ आर्ट से स्नातक अभिनेता-निर्देशक ने हाल के वर्षों में खुद को पेंटिंग में व्यस्त रखा है, लेकिन अब वे ज़ी5 की फिल्म 200- हल्ला हो के साथ पर्दे पर वापस लौटे हैं. 

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अमोल पालेकर अमोल पालेकर

55 साल पहले अमोल पालेकर ने पहली बार सत्यदेव दुबे की प्रशंसित मराठी फिल्म शांताता! कोर्ट चालू आहे से बड़े पर्दे पर कदम रखा था. हालांकि सर जेजे स्कूल ऑफ आर्ट से स्नातक अभिनेता-निर्देशक ने हाल के वर्षों में खुद को पेंटिंग में व्यस्त रखा है, लेकिन अब वे ज़ी5 की फिल्म 200- हल्ला हो के साथ पर्दे पर वापस लौटे हैं.

 दो दशकों से अधिक समय के अंतराल के बाद यह आपकी फिल्म है. आपने फिल्मों से दूरी क्यों रखी?
अपने सुनहरे दिनों में भी, मैं हर उस भूमिका को करने में रुचि नहीं दिखाता था जो मुझे ऑफर की जाती थीं. मैंने उन्हीं फिल्मों में भूमिकाएं की जिनमें अभिनेता के रूप में चुनौती नजर आई.

मैंने 1986 में आखिरी फिल्म खामोश की थी जिसके बाद मैंने समांतर (2009) को छोड़कर किसी फिल्म में अभिनय नहीं किया. अगर मुझे बस 'किसी के पिता’ का रोल दिया जाता है जिसमें अभिनय के लिए ज्यादा गुंजाइश न हो, तो भले ही मुझे 10 लाख डॉलर दिए जा रहे हों, मैं वह फिल्म नहीं करूंगा. 

 200- हल्ला हो में ऐसा क्या है कि आप हिस्सा बनने को राजी हो गए?
अछूत कन्या (1936), सुजाता (1959), अंकुर (1974), फैंड्री (2013) और सैराट (2016) जैसे कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो भारतीय सिनेमा से जाति का मुद्दा नदारद रहा है. यहां तक कि जब फिल्म का विषय जाति से संबंधित रहा है, तब भी ध्यान उत्पीड़न पर केंद्रित किया जाता है.

इस स्क्रिप्ट में दलितों और महिलाओं के रूढ़िवादी सामाजिक उत्पीड़न से परे एक विषय को प्रस्तुत किया गया है. यह फिल्म एक महिला के जाति और पितृसत्ता के अत्याचारों के आगे झुकने से इनकार का उत्सव है. यह एक 'लड़के के लड़की से मेल-जोल’ वाली प्रेम कहानी भी नहीं है; निर्देशक के रूप में मैंने ऐसी फिल्में बनाने के प्रयास किए जो उस चलताऊ खांचे से अलग थीं.

इस फिल्म की स्क्रिप्ट ने तत्काल मेरे मन के तारों झंकृत किया क्योंकि इसमें महिला के संघर्ष का काल्पनिक वर्णन नहीं, संघर्ष की सच्ची कहानी थी. इसके अलावा, एक सेवानिवृत्त दलित न्यायाधीश के रूप में फिल्म में मेरा चरित्र बहुस्तरीय है. वह सत्यनिष्ठ व्यक्ति है जो संविधान की शपथ लेता है; वह एक नायक है जिसने वास्तव में एक मूकदर्शक होने के बजाए विद्रोह में भाग लिया था. 

 इसके बाद आप और क्या करने जा रहे हैं?
मैं अपनी दिनचर्या में बहुत व्यस्त और मस्त हूं. 2018 में, मैंने स्टेज पर एक सामाजिक थ्रिलर कुसूर में अभिनय और उसका निर्देशन भी किया. मैंने पूरे भारत में उसका प्रदर्शन किया. यह उस युवा पीढ़ी को थिएटर अभिनेता के रूप में अपने अभिनय कौशल की एक झलक दिखाने का मेरा प्रयास था, जो थिएटर में मेरे किसी भी योगदान से परिचित नहीं हैं.

2015 से, मैं पेंटिंग में लौट आया हूं, जो मेरा पहला प्यार है. मैं हर सुबह अपने स्टूडियो जाता हूं. चारों तरफ ऑयल कलर्स, चारकोल की स्टिक्स और क्रेयॉन मेरे अंदर नए सिरे से जोश भरते हैं; फेफड़ों में भरती तारपीन या अलसी के तेल की तेज गंध मुझे बहुत लुभाती है. 
—करिश्मा उपाध्याय

अमोल पालेकर
स्क्रीन पर वापसी कर रहे हैं जी5 की  फिल्म 200-हल्ला हो से, जिसमें वे रिटायर्ड जज की भूमिका निभा रहे हैं.

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