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सिनेमाः नया सुपरस्टार

ओटीटी प्लेटफॉर्म पर एक के बाद एक रिलीज से अभिनेता मनोज बाजपेयी इस नए बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार बनकर उभरे हैं.

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मनोज बाजपेयी मनोज बाजपेयी

मनोज बाजपेयी कहते तो यही हैं कि उन्हें स्टारडम की तमन्ना नहीं है, ''मुझे बस काम देते रहो और सुपरस्टार का यह तमगा दूसरों को दो. मुझे अच्छे काम की चाह है. मैं इस लिहाज से लालची हूं कि कोई मुझसे मेरा एक भी अच्छा किरदार न ले जाए.’’ अदाकर की विनम्रता और समर्पण प्रेरक हैं, मगर शायद यह भी दर्ज किया जाना चाहिए कि महामारी ने स्टारडम की परिभाषा ही बदल दी है.

सिनेमाघर दर्शकों को लुभाने की जद्दोजहद कर रहे हैं और 100 करोड़ रुपए की फिल्म नामुमकिन सपना मालूम देती है. ऐसे में वेब शो के धुरंधरों को बोलबाला है. बाजेपेयी के द फैमिली मैन (2019) के दोनों सीजन आम राय से हिट करार दिए गए हैं, लिहाजा वे अब लोकप्रिय अदाकार भर नहीं, घर-घर में जाना-पहचाना नाम हैं.

इस हफ्ते वे थ्रिलर फिल्म डायल 100 लेकर ओटीटीस प्लेटफॉर्म जी5 पर लौटे हैं. ओटीटी प्लेटफॉर्म पर एक के बाद रिलीज से बाजपेयी इस नए बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार बनकर उभर रहे हैं. इनमें पिछले महीने नेटफ्लिक्स पर आई एंथोलॉजी फिल्म रे भी शामिल है, यह सत्यजित रे के काम पर आधारित है.

बाजपेयी कहते हैं कि डायल 100 से वे मायूस नहीं हैं. यह फिल्म सिनेमाघरों के लिए बनी, पर डिजिटल पर रिलीज हो रही है. वे कहते हैं, ''मुझे लगता है कि एक नया दर्शकवर्ग उभरा है, जिसकी मेरा काम देखने में दिलचस्पी है. मेरे (पहले के) काम में उनकी दिलचस्पी अभिभूत करने वाली है.’’

कहा जा सकता है कि डिजिटल प्लेटफॉर्मों के उभार ने पंकज त्रिपाठी (मिर्जापुर, 2018), के.के. मेनन (स्पेशल ऑप्स, 2020), जयदीप अहलावत (पाताल लोक, 2020) और बाजपेयी सरीखे कलाकारों को खास फायदा पहुंचाया. हां, उनकी अदाकारी की साख पर कभी कोई संदेह नहीं था, पर फिल्मों में जोरदार भूमिकाएं पाने के लिए उन्हें कभी हाथ-पैर मारने पड़ते थे.

जब मिलने भी लगे, तो स्टार-केंद्रित वितरण व्यवस्था ने उनसे दर्शक चुरा लिए. बाजपेयी कहते हैं कि द फैमिली मैन की बदौलत वे 'चुनने का मौका’ हासिल कर पाए. ओटीटी ने भौगोलिक रुकावटें मिटाने में मदद की, लिहाजा बाजपेयी को भरोसा है कि और ज्यादा दर्शक उनके काम की तलाश कर लेंगे.

वे आंखों-देखा सबूत बताते हैं. उत्तराखंड में एक फिल्म की शूटिंग करते वक्त उन्होंने देखा कि लोग अपने मोबाइल पर वेब सीरीज देखने में मशगूल थे, ''जरा कल्पना करें कि पांच साल बाद ओटीटी की क्या संभावनाएं होंगी, कि यह सब कहां जा सकता है.’’

बाजपेयी ने 1998 में पर्दे पर धूम मचा दी. उस साल उनकी तीन फिल्में आईं—सत्या, शूल और कौन. 2000 के दशक में यह नेशनल अवार्ड विजेता कई बिसरा दी जाने लायक फिल्मों में आया. बाजपेयी के लिए ये नाकामियां 'चूल्हा जलाए’ रखने का तरीका भर थीं. वे कहते हैं, ''कइयों को लगता है कि यह मुश्किलों या मायूसी का दौर था. नहीं था. मैंने खुद पर काम किया. मैं नाकामी या नामंजूरी को निजी तौर पर नहीं लेता.’’ वैसे उस बुरे दौर ने उन्हें सिखाया कि मनपंसद भूमिकाएं तो उन्हें खोजनी ही होंगी. वे ऐसे डायरेक्टरों से मिले जो उनकी पसंद की फिल्में बना रहे थे. जल्दी ही प्रकाश झा ने उन्हें राजनीति (2010), अगुराग कश्यप ने गैंग्स ऑफ वासेपुर (2012) और नीरज पांडेय ने स्पेशल 26 (2013) में लिया.

अब बाजपेयी को पीछे दौड़ने की जरूरत नहीं रह गई है. उन्हें बस पक्का करना होता है कि अपने यकीन के मुताबिक पीछे दौड़ने वाले खासकर स्वतंत्र फिल्मकारों को पूरा वक्त और तवज्जो दें. बीते दशक में आखिर ये इंडी डायरेक्टर ही थे जिन्होंने उन्हें उनके करियर की पहचान बनाने वाले रोल दिए—हंसल मेहता के साथ अलीगढ़ (2015) और देवाशीष मखीजा के साथ भोंसले (2018). दोनों फिल्मों में सधी, सटीक और संवेदनशील अदाकारी के लिए उन्होंने एशिया पैसिफिक स्क्रीन अवार्ड हासिल किया.

बाजपेयी कहते यही हैं कि वे 'मुख्यधारा और स्वतंत्र सिनेमा में फर्क’ नहीं करते, पर आने वाली फिल्मों से स्वतंत्र सिनेमा के साथ उनका याराना जाहिर होता है. हाल में उन्होंने कन्नड़ फिल्म तिथि (2015) के लिए जाने जाने वाले राम रेड्डी, दिलचस्प फैमिली ड्रामा तितली (2014) के निर्देशक कनु बहल की फिल्में पूरी कीं.

सोनचिरैया (2019) और रे (2021) के बाद वे अभिषेक चौबे के साथ फिर काम कर रहे हैं. राज और डीके के अपने तयशुदा काम निपटा लें, तो बाजपेयी उनके साथ द फैमिली मैन का काम फिर शुरू करेंगे. वे एक और वेब सीरीज के आने का इशारा भी करते हैं. कहते हैं, ‘‘अच्छी बात यह है कि इन डायरेक्टरों से मेरी पटती है और वे मुझे समझते हैं.’’

लंबी छुट्टी के बाद, जिसमें कोविड-19 की पारी भी है, बाजपेयी को परवाह नहीं है कि ये फिल्में कहां और कैसे रिलीज होती हैं. वे कहते हैं, ''अभिनेताओं से प्लेटफॉर्म या जॉनर के प्रति पूर्वाग्रह रखने की उम्मीद नहीं की जाती. उनकी दिलचस्पी बस अदाकारी में होनी चाहिए. यही मैं करता हूं.’’ बाजपेयी सरीखे कुछ ही हैं जो इतनी सहजता से किरदारों में जान डाल देते हैं.

मनोज बाजपेयी कहते हैं कि द फैमिली मैन की बदौलत वे प्रोजेक्ट चुनने का मौका हासिल कर पाए
 

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