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भोजपुरीः बंबई में भोजपुरी उम्मीद 

प्रवासियों की पीड़ा को केंद्र में रखकर रचे गए इस गाने ने सनसनी मचा दी है. इसमें अभिनय और गायन मनोज वाजपेयी का है

बम्बई में का बा भोजपुरी रैप निर्देशक: अनुभव सिन्हा बम्बई में का बा भोजपुरी रैप निर्देशक: अनुभव सिन्हा

नवीन कुमार

अभिनेता मनोज वाजपेयी के गाए पहले भोजपुरी रैप सांग बंबई में का बा ने रिलीज होते ही जिस तरह से धूम मचाई है, ऐसे में इसे भोजपुरी म्युजिक में मील का पत्थर माना जा रहा है. इस पर मिल रही प्रतिक्रियाओं से वाजपेयी खुद भी अचंभित हैं.

इस गाने में प्रवासी मजदूरों के दुख-दर्द को बड़े ही भावनात्मक अंदाज में पिरोया गया है. लॉकडाउन के दौरान सड़क पर निकल पड़े प्रवासियों की व्यथा ने सभी को झकझोर दिया था. उसी दर्द को प्रोड्यूसर-डायरेक्टर अनुभव सिन्हा ने वाजपेयी की आवाज में वीडियो ऐल्बम की शक्ल में जारी किया.

बकौल अनुभव, ''मैं बहुत पहले से प्रवासी मजदूरों पर भोजपुरी गाना बनाने की सोचे हुए था, लेकिन संयोग से ऐसा मौका बन गया कि यह ज्यादा मौजूं बन गया.’’ बनाने के पीछे उनका तर्क यही था कि प्रवासी ऑटो चलाने यहां आते थे तो पहले लोग बोलते थे कि ऑटो चलाना नहीं आता, सिग्नल ठीक से नहीं देखते. ''धीरे-धीरे यहां के लोगों को समझ में आने लगा कि हमारे जैसा अनुशासन तो उसने बचपन से न सीखा और न सीखना है.

उस बेचारे की रोटी की समस्या है. साल दो साल तक बीवी-बच्चों से मिल तक नहीं पाता. नहीं मालूम उसको पेंटहाउस, उसका करेगा भी क्या! उसको तो सिर्फ रोटी खानी और खिलानी है. पर उस बेचारे को जड़ से उखाड़ के महानगर में ला पटकते हैं. यहां की सभ्यता उसको आती नहीं, उसको सीखनी भी नहीं. यह मुझे बहुत त्रासद लगता है.’’

प्रवासी मजदूरों की जिंदगी के दर्द को अनुभव 7-8 साल से सीने में दबाकर रखे हुए थे और इस ताक में थे कि वह भोजपुरी म्युजिक के जरिए आम लोगों तक पहुंचे. पर सबसे ज्यादा समस्या तो गीत की रही. ''लिखवाऊं किससे? भोजपुरी अलग तरीके से लिखी जाती है. मैं जिस तरीके से लिखवाना चाहता था, वैसी समझदारी वाले लोग मिल नहीं रहे थे. मुझे वैसी भोजपुरी आती नहीं.

फाइनली लॉकडाउन के दौरान मेरी बात हिंदी उपन्यासकार विमलचंद्र पांडे से हुई. उन्होंने कहा कि मैं आपको एक आदमी से मिलवाता हूं. उन्होंने मेरी मुलाकात जेएनयू के डॉ. सागर से करवाई. उन्होंने इसे लिखा. असमिया संगीतकार अनुराग सैकिया भोजपुरी की ट्रेडिशन से बंधा था नहीं. उसने संगीत रचा. अंग्रेजीदां लोगों के लिए पत्रकार शंकर्षण ठाकुर से सबटाइटल लिखवाए.’’ 

इस रैप सांग का वीडियो बनाने का अनुभव भी खासा रोचक है. अनुभव भोजपुरी गायक की बजाए किसी थिएटर वाले की तलाश में थे. उनका मानना है कि रैप में सिंगर की जरूरत नहीं है. मनोज वाजपेयी को लेकर उन्हें अंदेशा था कि वे इसे करेंगे या नहीं. संयोगवश एक सुबह वाजपेयी ने एक भोजपुरी गाना अनुभव के पास सुनने को भेजा. ''मैंने बोला कि मैं नहीं सुनूंगा.

उसने कहा कि सुन के देख, अच्छा है. फिर मनोज ने फोन किया तो मैंने कहा कि मैं एक गाना भेज रहा हूं, सुनके बताओ, कैसा है. उसको अच्छा लगा. मैंने पूछा कि गाएगा? उसने कहा कि वह रिहर्सल करके देखना चाहता है कि गा पाएगा या नहीं. मैंने कहा कि उसमें मुझे कोई शक नहीं. एक-दो दिन बाद स्टोरी आ गई, फिर हमने डबिंग की. और दो दिन बाद शूटिंग भी हो गई.’’

और क्या वाजपेयी के मन में कभी रैप सिंगर बनने का ख्याल आया था? उन्हीं से सुनिए, ''कतई नहीं. इसमें मेरा योगदान अभिनय का ही है. मैं गायक तो हूं नहीं, नाटक किए होने की वजह से ताल और सुर की थोड़ी समझ रही है, उसी दायरे में रहकर कोशिश की. लेकिन चूंकि मैं उस सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था को समझता हूं, जहां से मैं आता हूं, शायद उसी को सामने रखकर और खासकर मातृभाषा में गाने में मुझे बड़ा मजा आया और उसको सही ढंग से रख भी पाया.’’

इससे पहले उन्होंने नेटुआ नाम के एक नाटक में भोजपुरी में गाया था पर उन्हीं के मुताबिक, ''वह गंभीरता से लेने लायक कतई नहीं. इस रैप सांग में प्रभाव है म्युजिक डायरेक्टर अनुराग और गीतकार सागर का, वह अपने आपमें भाव विह्वल कर देने वाला है. यह आज की स्थिति पर, परिस्थिति पर, प्रवासी की व्यथा पर लिखा गया है. वही चीजें लोगों को बहुत ज्यादा भा रही हैं.’’

लॉकडाउन के दौरान ही कमालिस्तान स्टुडियो में एक दिन में ही इसकी सारी शूटिंग हुई. डॉक्टर समेत पूरे कोविड प्रोटोकॉल के साथ सेट पर बस 50-60 लोग. मास्क से लैस. बस मेकप की वजह से मनोज लगा नहीं सकते थे. वाजपेयी बताते हैं, ''बड़ा डरावना अनुभव था. डर रहा था कि घर में छोटी बच्ची है, बीवी है. कुछ हो गया तो मुश्किल हो जाएगी.’’ वाजपेयी ने वहां कहा भी कि आज कोरोना नहीं हुआ तो फिर कभी नहीं होगा. संयोग से अभी तक टीम से ऐसी कोई खबर नहीं आई.

वाजपेयी इसमें छिपे अर्थ की ओर इशारा करते हैं, ''मैं इतना ही कहना चाहता हूं कि माइग्रेंट जो वापस गए, उनकी वह व्यथा, वह दर्द, जिससे वे गुजरे हैं, हमने उसी को बताने की कोशिश की है. हम खुद प्रवासी हैं. और हम इस दर्द को समझते हैं. 1,000-1,500 किमी पैदल चल पडऩा कोई मामूली बात है!

और शहर कोई भी हो, हमेशा विदेश ही रहता है. हम कभी भी उस जगह के नहीं हो पाते. हमेशा अपने गांव की याद आती रहती है. क्योंकि आराम छोड़ के हम रोजी-रोटी की तलाश में यहां आए. पर मेरे ख्याल से यह रैप से भी आगे जाकर हमारे समय पर एक सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक टिप्पणी भी है.’’

लेकिन अनुभव अब रुकने वाले नहीं. ''मैं महीने में दो गाने बनाऊंगा. हर गाना राजनैतिक नहीं होगा. मस्ती वाले गाने भी होंगे. घर में पार्टी हो तो उस मौके पर भी नाचने के लिए गाना होना चाहिए न. खुश रहने के लिए भी गाना चाहिए. सब कुछ बनाऊंगा. जब तक मैं सौ गाने नहीं बना लूंगा और सौ गाने बनाके लगेगा कि मैं हार गया तो बंद कर दूंगा, नहीं तो बंद नहीं करूंगा.’’

मनोज भी कहते हैं, ''इस रैप को सुनने तक सीमित न रखें. इसे फैलाएं. जब फैलेगा, घर-घर, गांव-गांव, खेत-खेत लोग सुनेंगे तो बाजार उत्साहित होता है इसी तरह का अच्छा काम करने के लिए. बाजार को उत्साहित करने का काम जनता के हाथ में है. वह जिस तरह की चीजें सुनेगी, पसंद करेगी, वही चीज बाजार उत्साहित होकर बनाएगा या बनवाएगा.

यह आवश्यक है कि इसको इतनी बड़ी और शानदार सफलता प्रदान करें ताकि यह न सिर्फ आज के समय का कमेंट हो बल्कि बाजार के लिए भी एक बड़ा उदाहरण हो कि इसको पसंद करने वाले हैं यहां पर, जिनके लिए हम बढिय़ा, ट्रेडिशनल, सोशल, कल्चरल गाना, फिल्में बना सकते हैं.’’ और बनाना चाहिए.

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