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फुरसत-वादी के कड़वे सच के वास्ते

कश्मीर में शूट करना आसान नहीं था. वहां का माहौल ऐसा हो गया है कि भाई-भाई पर शक करता है

अश्विन कुमार (निर्देशक नो फादर्स इन कश्मीर) अश्विन कुमार (निर्देशक नो फादर्स इन कश्मीर)

कश्मीर से ताल्लुक रखने वाले लेखक-निर्देशक अश्विन कुमार की नई फिल्म नो फादर्स इन कश्मीर भी कश्मीर की पृष्ठभूमि पर आधारित है. हालांकि, इसे पारिवारिक दर्शकों के सामने परोसने के लिए उन्हें सेंसर बोर्ड से महीनों जद्दोजहद करनी पड़ी. अंत में फिल्म सर्टिफिकेशन अपीलेट ट्रिब्यूनल के आदेश पर वे यूए सर्टिफिकेट हासिल करने में कामयाब रहे. अब राहत की सांस लेते हुए वे बताते हैं कि ''इस फिल्म में दो किशोरों की प्रेम कहानी के साथ घाटी की वास्तविकताओं को दिखाने की कोशिश की गई है. सीधा-सा मकसद है कि देश के युवा कश्मीर के नौजवानों से संवाद कर सकें ताकि वहां की समस्याओं को नजदीक से जानने-समझने में मदद मिले."

सेंसर बोर्ड के साथ हुई तकरार के चलते अश्विन उसकी कामकाज की शैली पर उंगली रखना चाहते हैं. इसे वे न्यूजीलैंड में दो मस्जिदों पर हुए ताजा हमले से जोड़कर देखते हैं, ''अब देखिए न्यूजीलैंड में जिस तरह से हमले हुए और 50 लोग मारे गए. उस वाकए को सीधे यूट्यूब पर दिखा दिया गया. उसके बाद सेंसर बोर्ड का क्या मतलब बचता है? बोर्ड ने सच को सामने आने से रोकने के लिए नो फादर्स इन कश्मीर को बैन करने की कोशिश की."

अश्विन ने अपनी इस फिल्म के लिए लोगों से थोड़ा-थोड़ा करके फंड जमा किया है, जिसमें लंदन में रहने वाले कश्मीरियों ने भी सहयोग किया है.

अश्विन की शॉर्ट फिल्म लिट्ल टेररिस्ट (2004) ऑस्कर के लिए नामांकित हुई थी. इसके अलावा वे इंशाअल्लाह फुटबॉल और इंशाअल्लाह कश्मीर के लिए दो राष्ट्रीय पुरस्कार पा चुके हैं. इससे पहले उन्होंने इरफान खान को लेकर रोड टु लद्दाख बनाई थी. बकौल अश्विन, ''नो फादर्स इन कश्मीर में सेंसर बोर्ड को ऐतराज आर्मी को लेकर था. उसका मानना था कि इसमें आर्मी का पक्ष गलत ढंग से दिखाया गया है. लेकिन मेरा तर्क यह था कि वह हकीकत है. इस बात को ट्रिब्यूनल ने भी माना है. लेकिन आखिरकार फिल्म को रिलीज करने के मकसद से कुछ सीन और डायलॉग काटने पड़े."

असल में उनकी यह फिल्म मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट पर आधारित है. घाटी में एक जगह है जहां लाशें दफनाई गई हैं. इनमें कइयों के बारे में पता नहीं है कि वे किनकी लाशें हैं. नो फादर्स इन कश्मीर कहानी दो किशोरों की है. एक कश्मीरी मूल की ब्रिटिश लड़की है और स्थानीय कश्मीरी लड़का है. वे अपने वालिद को ढूंढने निकले हैं. उसी दौरान उनको एक-दूसरे से प्यार हो जाता है. उनके वालिद को आर्मी ने उठाया था और उसके बाद से वे गायब हैं. अंदेशा है कि उनकी हत्या कर दी गई है. फिल्म की कहानी आगे बढ़ती है. आर्मी वाले दोनों को पकड़ते हैं पर लड़की को छोड़ देते हैं. अश्विन आगे का किस्सा नहीं बताते.

फैशन डिजाइनर रितु कुमार के पुत्र अश्विन का कश्मीर से पुराना रिश्ता है. उनके दादा कश्मीर घाटी के ही बाशिंदे थे. अश्विन ने कश्मीर को दस साल नजदीक से देखा और काफी अनुभव बटोरे. कश्मीर से जुड़ी संवेदनशीलता का पहलू भी उनके दिमाग में अच्छी तरह है. तभी वे कहते हैं, ''फिल्म में आर्मी के बारे में गलत बताना मेरा मकसद नहीं है. मैंने हकीकत दिखाई है." बकौल अश्विन, ''फिल्म पूरे कौम की, पूरे गांव की कहानी है. वहां के आम लोगों की जिंदगी को दिखाने की हमने कोशिश की है. कश्मीर कभी मिलिटेंट्स तो कभी पत्थरबाजी तो कभी कुछ और वजहों से चर्चा में रहता है. इस तरह के हालात में वहां के आम जन आखिर किस तरह जिंदगी जीते हैं,  उन पर क्या बीतती है, उसे भी दर्शाना सिनेमा की जिम्मेदारी है."

इस फिल्म को उसकी कहानी के असल लोकेल यानी कश्मीर में ही शूट करना खासा मुश्किल काम था. वे बताते हैं, ''यकीन कीजिए, यह आसान नहीं था. माहौल ऐसा बना रखा है कि भाई, भाई पर भरोसा नहीं कर सकता. परिवार के लोग एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करते. इतना शक पैदा कर दिया गया है कि वहां हर कोई एक-दूसरे पर शक करता है. फौज कश्मीरी पर शक करती है और कश्मीरी खुद कश्मीरियों पर. शक की वजहः कोई भी, कभी भी किसी भी हालत में लापता हो सकता है.

ऐसे में मेरे लिए भी वहां सौ लोगों के क्रू को ले जाकर शूट करना कितना रिस्की हो सकता था, आप समझ सकते हैं. उसके बावजूद हमने किया है. पर हमने फिल्म का नाम बदलकर शूटिंग की. फिल्म का नाम नूर रखा था. मतलब किसी को शक न हो कि हम क्या कर रहे हैं." पिछले 30 साल से वहां जो हो रहा है उससे वे दुखी हैं. ''हमारे देश में एक ऐसी जगह है जहां खुले तौर पर एक-दूसरे से बात नहीं कर सकते. जो सोचते हैं उसे कह नहीं सकते. काफी ऐसे लोग हैं जो दबाने की कोशिश करते हैं, मार भी देते हैं.

ऐसे माहौल में भी फिल्मकार सिर्फ कश्मीर की खूबसूरती को कैद करने नहीं जाते बल्कि वहां की समस्याओं पर फिल्म बना रहे हैं."

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