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आवरण कथाः धीमी मौत को अग्रसर

सिनेमाघर उद्योग पहले ही लुंज-पुंज हाल में था, महामारी में उसे पूरी तरह लकवा मार गया.

बंद हुए कपाट मुंबई का सेंट्रल प्लाजा थिएटर बंद हो गया बंद हुए कपाट मुंबई का सेंट्रल प्लाजा थिएटर बंद हो गया

सिंगल-स्क्रीन थिएटर (एक पर्दे वाले) तो कोविड के आने के बहुत पहले से ही संघर्ष कर रहे थे. मार्च में प्रकाशित भारत के मीडिया और मनोरंजन क्षेत्र पर फिक्की-ईवाइ की रिपोर्ट के अनुसार, सिनेमाघरों की कुल संख्या 6,651 से घटकर 6,327 रह गई है और 2018 में सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों का राजस्व 6,000 करोड़ रुपए से घटकर 5,300 करोड़ रुपए रह गया. रिपोर्ट कहती है, ''सिंगल-स्क्रीन सिनेमाघरों की संख्या में कमी मुख्यत: हिंदीपट्टी में सिनेमाघरों के लगातार बंद होने से आई क्योंकि फिल्में उच्च वर्ग/ मल्टीप्लेक्स दर्शकों के लिए बनाई जाती रहीं.’’

लॉकडाउन ने तो बस हालात को हाथ से बाहर कर दिया है. अनलॉक 4.0 दिशानिर्देशों के अनुसार सिनेमाघर अभी भी बंद हैं. वितरण और प्रदर्शनी उद्योग के सदस्यों ने सेक्टर की दुर्दशा को उजागर करने के लिए #सपोर्टमूवीथिएटर्स #सेवसिनेमासेवजॉब्स जैसे हैशटैग के साथ ट्वीट किए हैं.

एक अनुमान के मुताबिक, 14 मार्च से सिनेमाघरों को बंद करने का आदेश दिए जाने के बाद से सिनेमा प्रदर्शन के उद्योग को 9,000 करोड़ रुपए का नुक्सान हुआ है. सिंगल स्क्रीन और मल्टीप्लेक्स को मिलाकर इस उद्योग से करीब 20 लाख लोगों को आजीविका मिलती है जो खतरे में है. सिनेमा ओनर्स ऐंड एग्जिबिटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने सुझाव दिया है कि अगर सिनेमाघरों को जल्द ही दोबारा खोलने की अनुमति नहीं दी गई तो भारत के लगभग आधे सिंगल-स्क्रीन थिएटर बंद हो जाएंगे.

चेन्नै और मुंबई में कुछ लोग पहले ही बंद करने की घोषणा कर चुके हैं. बंद की ये घोषणाएं उस फिल्म उद्योग के लिए एक अंधकारमय भविष्य का इशारा करता है, जिसने 2019 में सिनेमाघरों से 11,500 करोड़ रुपए का राजस्व अर्जित किया था जो डिजिटल (2,210 करोड़ रुपए) और टीवी सैटेलाइट (1,900 करोड़ रुपए) के अधिकारों से बहुत अधिक है. 

ओटीटी प्लेटफॉर्मों की लोकप्रियता और सदस्यता में वृद्धि थिएटर मालिकों के लिए बड़ी चिंता का सबब बन रही है. इसके अलावा निर्माताओं की ओर से फिल्मों के डिजिटल प्रीमियर के निर्णय थिएटर मालिकों की चिंता को कई गुना बढ़ा रहे हैं. बड़ा सवाल है कि क्या सिनेमाघरों के फिर से खुल जाने के बाद दर्शक लौटेंगे? सिंगल-स्क्रीन की घटती संख्या बड़े स्क्रीन को एक लग्जरी बना देगी जो कि शहरों में पहले से ही देखी जा रही है.

केस स्टडी
शरद दोषी, 62 वर्ष
पार्टनर, सेंट्रल प्लाजा थिएटर, मुंबई

आठ अगस्त को अंतत: 84 साल पुराने मुंबई के सेंट्रल प्लाजा थिएटर को बंद करने का ऐलान कर दिया गया. रखरखाव शुल्क, कर्मचारियों का वेतन देने में मालिकों की असमर्थता, संपत्ति कर तथा पानी-बिजली बिल में कोई राहत न मिलने के बाद यह निर्णय करना पड़ा. 80 कर्मचारियों की छुट्टी कर दी गई.

थिएटर के मालिक शरद दोषी सिनेमा ओनर्स ऐंड एग्जिबिटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष भी हैं. अब उनके सामने एक नई चुनौती है. नियमों के अनुसार, कोई सिनेमाघर बंद होने पर उसकी जगह नए व्यवसाय में एक थिएटर बनाना ही होगा और पुरानी व्यवस्था में से कम से कम 33 प्रतिशत सीटें बनाए रखनी होंगी. दोषी कहते हैं, ''न वे हमारी मदद करना चाहते हैं और न ही मुक्त. राज्य सरकार से बार-बार अनुरोध के बावजूद कुछ नहीं हुआ है.’’

‘‘महाराष्ट्र में सिंगल स्क्रीन सिनेमा उद्योग की तबाही के लिए यहां की राज्य सरकार जिम्मेदार है’’
क्षेत्र का कुल आकार
9,527
सिंगल स्क्रीन और मल्टीप्लेक्स
रोजगार
20
लाख

जीडीपी में हिस्सेदारी
अनुपलब्ध
परेशानी का पैमाना
भारी मुसीबत

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