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अर्थात्ः ज्यों ज्यों बूड़े श्याम रंग

यह भ्रष्टाचार व्यक्तिगत है ही नहीं. राजनैतिक उच्च पदों पर भ्रष्टाचार अब अवसरों की पेचीदा बंदरबांट का है, अन्य फायदे तो अदृश्य हैं.

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अर्थात्
अर्थात्

ने ता सिर्फ पांच साल में खरबपति कैसे हो जाते हैं? पिछले माह, जब इस सवाल के साथ सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से करीब 289 सांसदों-विधायकों की इस उद्यमिता का रहस्य पूछा था तो बहुत लोगों की उक्वमीद जगी कि अब तो 2014 के चुनावी वादे याद आ ही जाएंगे जिन में मुट्ठियां लहराते राजनीति को साफ करने का संकल्प किया गया था.

प्रधानमंत्री ने पिछले साल नोटबंदी के दौरान सभी सांसदों-विधायकों से अपने बैंक खातों की जानकारी पार्टी को देने को कहा था. जानकारी जरूर आई होगी लेकिन घंटों लाइन में लगने वाली जनता को यह पता नहीं चला कि नोटबंदी के दौरान उनके माननीय नुमाइंदों के बैंक खातों में क्या हो रहा था? बताते चलें कि साल बीतने को है लेकिन बीते सप्ताह तक प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर 92 में केवल 29 मंत्रियों की संपत्ति के ब्यौरे उपलब्ध थे.

भ्रष्टाचार और इलेक्ट्रॉनिक्स में एक अनोखी समानता है. दोनों जितने नैनो यानी सूक्ष्म होते जाते हैं, उनकी ताकत उतनी ज्यादा बढ़ती जाती है और  राजनीति इसमें डूबकर और उजली (ज्यों ज्यों बूड़े श्याम रंग, त्यों त्यों उज्वल होय) होती जाती है. भ्रष्टाचार की ताकत बढऩे और उसके उज्ज्वल होने का मतलब उसका संस्थागत होते जाना है.

भ्रष्टाचार की बढ़ती सूक्ष्मता पूरी दुनिया में सबसे बड़ी चुनौती है, लड़ाई इसलिए कठिन होती जा रही है कि जब तक लोग भ्रष्टाचार को समझकर और जागरूक होकर या इसके विरुद्ध लामबंद हो पाते हैं, तब तक यह संस्थागत हो जाता है.

संस्थागत होते ही भ्रष्टाचार अपराध की जगह सुविधा, आदत, मजबूरी, परंपरा और कभी-कभी नियम तक बन जाता है. आर्थिक फैसलों में तो विभाजक रेखाएं इतनी धुंधली हैं कि प्रत्यक्ष तौर पर साफ-सुथरे दिखने वाले नीतिगत फैसलों में महीन व्यापक भ्रष्टाचार छिपा होता है.

भ्रष्टाचार के जटिल व संस्थागत होने को कुछ उदाहरणों से समझा जा सकता है:

1. राजनैतिक दलों को मिलने वाला चंदा लोकतंत्र में भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी संस्था है. सभी दल इसे मजबूरी मानने लगे, इसे बदलना तो दूर इसे पारदर्शी बनाने की कोशिशें भी हाशिए पर हैं. चंदे संस्थागत हो गए. चुनाव आयोग और अदालतें भी इसे ठीक करने में कुछ खास नहीं कर सकीं. हमें यह मालूम है कि चंदों के बदले सत्ता के फायदों में हिस्सेदारी होती है लेकिन यह भ्रष्टाचार सूक्ष्म और 'नीतिसंगत' है. हमें यह मान लेना पड़ता है कि सत्ता में आने वाली हर नई सरकार अपने पसंदीदा कारोबारियों को अवसरों से नवाजेगी. विकास की यह कीमत हमें भुगतनी पड़ेगी.

2. राजनेता या अधिकारी सरकार में पदों और रसूख का फायदा उठा सकते हैं. सांसद-विधायक संपत्ति की घोषणा तो करते हैं लेकिन अपने कारोबारी या वित्तीय संपर्कों की नहीं. 2015 में तंबाकू उत्पादों पर चेतावनी का फैसला करने वाली समिति में बीड़ी उद्योग से जुड़े दो सांसद थे. सांसदों, विधायकों और मंत्रियों को लेकर इस मामले में नियम इस कदर अधूरे हैं कि यह भ्रष्टाचार एक तरह से संस्थागत हो गया.

जब हमें अपने नुमाइंदों के बारे में ही जानकारी नहीं मिलती तो उनके परिवारों के बारे में कौन पूछेगा? एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स की याचिका पर देश की सर्वोच्च अदालत का अचरज सही था कि केवल पांच साल में कुछ सांसदों की संपत्ति 500 फीसदी कैसे बढ़ सकती है.  

3. बैंकों से कंपनियों को कर्ज, सरकारों से उद्योगों को जमीन, खदान, स्पेक्ट्रम आवंटन जाहिरा तौर पर साफ-सुथरे आर्थिक व्यवहार हैं लेकिन जरा यह उदाहरण देखिए कि कंपनियों ने सरकार से स्पेक्ट्रम खरीदा, इसके लिए बैंको से कर्ज ले लिया गया लेकिन घाटा होने पर फीस की माफी, बैंक कर्ज को टालने का पैकेज, क्या यह सब कुछ साफ-सुथरा है? बैंकों के बकाया कर्ज की वजहें आर्थिक विफलताएं ही नहीं हैं. इस सूक्षम संस्थागत भ्रष्टाचार की बड़े पैमाइश पर सफाई मुश्किल है.

भ्रष्टाचार के मामले में हम अक्सर यह मान लेते हैं कि शीर्ष पर बैठे एक-दो साफ सुथरे लोग पूरी व्यवस्था में स्वच्छता का चमत्कार कर देंगे. लेकिन यह भ्रष्टाचार व्यक्तिगत है ही नहीं. राजनैतिक उच्च पदों पर भ्रष्टाचार अब अवसरों की पेचीदा बंदरबांट का है, अन्य फायदे तो अदृश्य हैं.

अब भ्रष्टाचार को लेकर व्यक्तिगत संघर्ष दूर तक नहीं जा पाते. कई बार साफ-सुथरे नेतृत्व भी अपने पीछे भयानक कालिख छोड़ जाते हैं. उच्च पदों पर संस्थागत भ्रष्टाचार के खिलाफ सफलताएं हमेशा संस्थाओं (कानून, अदालत, ऑडिटर) की मदद से ही मिली हैं. क्या पिछले तीन साल में भारत में भ्रष्टाचार से लडऩे वाली संस्थाएं मजबूत और विकसित हुई हैं? नहीं तो फिर जब तक बंद है तब तक आनंद है, जब खुलेगा तब खिलेगा.

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