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अर्थातः पाखंड के आर-पार

शायद पाखंड ही भारतीय राजनीति की सबसे मजबूत अदृश्य बहुदलीय शपथ है

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ऐसा कहां होता होगा कि भारतीय बैंक 2016 से जिन राजनैतिक लोगों को खाता खोलने और सेवाएं देने के लिए भी किस्म-किस्म की पड़ताल कर रहे हैं, उन्हीं लोगों को सरकार कोऑपरेटिव बैंकों में डायरेक्टर बनाती रही. शायद पाखंड ही भारतीय राजनीति की सबसे मजबूत अदृश्य बहुदलीय शपथ है.

ताजा घटनाक्रम अब तक का सबसे नायाब नमूना है. जून के अंत में भारतीय रिजर्व बैंक ने सहकारी बैंकों में निदेशक और प्रबंध निदेशकों के पद पर सांसदों, विधायकों, स्थानीय निकाय प्रतिनिधियों के मनोनयन पर रोक पर लगा दी. इस तरह का कोई आदेश पहली बार जारी हुआ था. अलबत्ता इस आदेश की पावती, जब तक रिजर्व बैंक को मिलती तब तक केंद्र सरकार में नया सहकारिता मंत्रालय बनाने की फाइल चल चुकी थी.

यानी कि घोटालों और राजनैतिक दुरुपयोग के लंबे इतिहास के बाद पहली बार जब सहकारी बैंकों में राजनैतिक दखल खत्म करने की कोशिश शुरू हुई तो सरकार के दूसरे हाथ ने सियासी दखल की संभावनाओं को ही संस्थागत बना दिया. बहस तो सहकारिता को साफ-सुथरा, स्वायत्त और पेशेवर बनाने की थी लेकिन मंत्रालय के जन्म की बधाई बजते ही सहकारी राजनीति के सहारे देश की राजनीति पर पकड़ मजबूत करने के 'गेम चेंजर प्लान’ के नए नवेले डिजाइन पर तालियां बज उठीं.

इन तालियों ने ही हमें पाखंड के आर-पार देखने से रोक दिया है. रिजर्व बैंक ने 2016 में सभी बैंकों को राजनीति से जुड़े लोगों (पॉलिटिकली एक्सपोज्ड पर्सन-पेप) से कारोबार करने में अतिरिक्त सतर्कता बरतने का आदेश जारी किया था जो वक्त पर नए प्रावधानों से ‘मजबूत’ किया जाता रहा है. 

मनी लॉन्ड्रिंग रोकने के लिए बनी अंतरराष्ट्रीय संस्था एफएटीएफ के नियम के तरह जारी आदेश में सरकारों, सेना, न्यायालयों, केंद्रीय बैंक के मुखिया, सांसद, राजनैतिक दलों के शीर्ष नेता बैंकों के लिए ‘हाइ रिस्क’ वर्ग में रखे गए. जोखिम वाले पॉलिटिकली एक्सपोज्ड पर्सन की दूसरी श्रेणी में सेना, न्यायिक सेवा, सरकारी कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारी, विधायक अन्य चुने हुए प्रतिनिधि, राजनैतिक दलों के पदाधिकारी शामिल हैं.

यह राजनैतिक छल हमारे यहां ही मुमकिन है. जो लोग बैंकों के लिए कारोबारी तौर पर जोखिम से भरे हैं वही सरकारी कंपनियों में स्वतंत्र  निदेशक बन जाते हैं. एक ताजा आरटीआइ सूचना के मुताबिक, 98 सरकारी कंपनियों के बोर्ड में 172 स्वतंत्र निदेशकों में 86 सत्तारूढ़ भाजपा से जुड़े हैं. यह प्रसाद 46 सेवानिवृत्त अफसरों में भी बंटा है.

कंपनी कानून के तहत निदेशकों को बहुत-सी जानकारी सार्वजनिक करनी होती है. अगर वे किसी ऐसे फैसले में शामिल पाए जाते हैं जो उनके कारोबार या निजी हित से जुड़ा है तो उन्हें सजा मिल सकती है. लेकिन 2015 में धूम्रपान के साधनों पर स्वास्थ्य संबंधी चेतावनी निर्धारित करने वाली समिति में बीड़ी कारोबारी सांसदों को शामिल कर लिया गया.

राजनैतिक प्रभुत्व या रसूख के सहारे कारोबार (कनफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट) करने का तंत्र लगातार पेचीदा हो रहा है. 2010 में तत्कालीन नगर विकास मंत्री जयपाल रेड्डी का यह बयान चर्चा में रहा था कि लोकसभा में करीब एक-चौथाई सदस्यों पर राजनीति के जरिए कारोबारी स्वार्थ साधने का मामला बन सकता है. (एडीआर रिपोर्ट).

विधायिकाओं में अब कारोबारी पृष्ठभूमि से आ रहे लोगों की संख्या की लगातार बढ़ रही है. लोकसभा के पोर्टल के मुताबिक, 543 में से करीब (60 फीसद) 352 सदस्य इसी तरह के हैं. कुर्सी के जरिए कारोबारी फायदे उठाने का जोखिम केवल पद पर रहने तक ही नहीं है. राजनैतिक पदों पर बैठे लोग, इस दौरान मिली सूचनाओं का बेजा इस्तेमाल आगे भी कर सकते हैं. 

इसे रोकने के लिए दुनिया के देशों में (ब्रिटेन, कनाडा, अमेरिका) राजनैतिक और सरकारी पदों पर बैठे लोगों के लिए हर तरह की सूचनाएं सार्वजनिक करने पर बाध्य किया जा रहा है. ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और दक्षिण अफ्रीका में चुने हुए प्रतिनिधियों को निजी व कारोबारी हितों के मामलों पर वोट देने का हक नहीं है. कोरिया, ताइवान और कनाडा में राजनैतिक पदों पर रहने के बाद दोबारा नौकरी या रोजगार करने के लिए तरह तरह की शर्तें हैं.

दूसरी ओर, भारत में एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स (एडीआर रिपोर्ट 2015) के बताती है कि लोकसभा की आचरण (इथिक्स) समिति ने 2008 में कनफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट घोषित करने के लिए विस्तृत नियमों का सुझाव दिया था, जो कभी लागू नहीं हुए.

राजा मंत्री की अदला-बदली से भारत में दीमक वाला काठमहल इसलिए नहीं बदलता क्योंकि अब हमें सियासी खेमों में बांट कर इस पाखंड के आर-पार देखने से रोक दिया जाता है. इसलिए बात अब रिटायर्ड जजों को सियासत में लाने और सरकारी कंपनियों में अपनों को बिठाने तक सीमित नहीं है. राजनीति के हमाम के पर्दे उतर चुके हैं. कार्यकर्ताओं को सरकार में 'एडजस्ट’ करना मंत्रियों व मुख्यमंत्रियों का दायित्व बनने लगा है.

सनद रहे कि 2014 के चुनाव में सहकारिता मंत्रालय के गेम चेंजर दांव का नहीं बल्कि साफ-सुथरी सियासत के नए युग का वादा किया गया था, जबकि हमसे राजनैतिक पारदर्शिता के कब्रिस्तान में खड़े होकर ताली-थाली पीटने को कहा जा रहा है.

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